<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550</id><updated>2012-01-31T05:23:58.471-08:00</updated><category term='कालाहांडी'/><category term='आदिवासी भारत'/><category term='Aछत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><category term='इनसे मिलिए'/><category term='जंगल की पुकार'/><category term='जुबानी जमाखर्च'/><category term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><category term='टूरिज्म'/><category term='छत्तीसगढ़ पर्यटन'/><title type='text'>यायावर</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>107</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-6206536120558165518</id><published>2012-01-27T04:18:00.000-08:00</published><updated>2012-01-27T04:25:33.426-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>सुरों के सरताज सुरेश वाडकर</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-2alHuvMWtxk/TyKV4AY_KhI/AAAAAAAAAfI/tpR1popFvaU/s1600/s%2Bwadkar.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="194" width="259" src="http://4.bp.blogspot.com/-2alHuvMWtxk/TyKV4AY_KhI/AAAAAAAAAfI/tpR1popFvaU/s400/s%2Bwadkar.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;सुरेश वाडेकर &lt;/b&gt;किसी परिचय के मुहताज नही हैं. रायपुर में एक &lt;i&gt;सुरमयी  शाम &lt;i&gt;&lt;/i&gt;&lt;/i&gt;उन्होंने अपने  साजिंदों  के संग जोश से  भरे गीतों   की ऐसी महफ़िल सजाई कि &lt;i&gt;मेडिकल कालेज  रायपुर &lt;/i&gt;का सभागार उस दौर की संगीतमय पुरवाई में खो गया जब कालजयी गीत  बनते थे और उनकी खुशबू से ज़माना महकता रहता था. अब ऐसे गीत क्यों नही  बनते और गाने वाले क्यों  नही हैं इस बहस में पड़ने की बजाय बताना  ज्यादा लाजिमी है कि सुरेशजी की वाणी में अज भी ओज है और सोज भी है और जब उन्होंने पहली तान छेड़ी तो सभागार तालियों की गूँज से भर गया.  एक ऐसी शाम रही जो श्रोताओं को लंबे समय तक याद रहेगी. सुनने वालों में मुख्य मंत्री डा. रमन सिंह, संस्कृति  मन्त्री बृजमोहन अग्रवाल समेत समेत कई हस्तियों ने देर तक नगमों का आनंद लिया और गणतंत्र दिवस की शाम यादगार बनी.यह एक  एक सर्द शाम थी मगर जोश भरती हुई गुजरी. जाने माने पार्श्व गायक सुरेश वाडेकर ने.  सुरेश वाडेकर ने मंच पर आते ही सीने में जलन सी क्यूं है...आंखों में तूफान सा क्यूं है.. गाना शुरू किया तो सचमुच सीने में दबे हुए नगमों की कसक तालियों में ढलने लगी   सुरेश वाडेकर ने अपना एक और लोकप्रिय गीत – ए जिदंगी गले लगा ले पेश किया तो हाल में तरन्नुम में डूब गया. &lt;br /&gt;कुल मिलाकर एक ऐसी सुरमयी साज और आवाज की वह शाम श्रोताओं को लंबे समय तक याद रहेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरेशजी के गायन से पहले कविता वासनिक और साथियों ने चंद मिनटों के चित्रहारनुमा कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के सुआ करमा ददरिया भरथरी और पारंपरिक नृत्य-गीतों   की समूह प्रस्तुति से सबका मन मोह लिया. &lt;br /&gt;सुरेशजी ने चार साल की उम्र से ही गाना -बजाना प्रारंभ कर दिया था. उनके  पिताजी को शायद कहीं पर लगा होगा उनमे प्रतिभा है इसीलिए उन्होंने उन पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किया.उन्होंने कहा था कि तुम्हारी पढाई लिखाई थोड़ी कम रहेगी तो चलेगा पर संगीत पीछे नहीं होना चाहिए.1954 में जन्में सुरेश वाडकर ने संगीत सीखना शुरू किया जब वो मात्र 10 वर्ष के थे. पंडित जयलाल वसंत थे गुरु. कहते हैं उनके पिता ने उनका नाम सुरेश (सुर+इश) इसलिए रखा क्योंकि वो अपने इस पुत्र को बहुत बड़ा गायक देखना चाहते थे. &lt;br /&gt;उनका  पहला गाना राजश्री प्रोड़कशन की पहेली फिल्म में आया था " वृष्टि पड़े टापुर टुपुर ". इस गाने के लिए पूरा श्रेय रवीन्द्र जैन साहब को जाता है,  क्योंकि पहला  ब्रेक उन्होंने ही दिया.ये गाना 2 अगस्त 1977 को  रिकॉर्ड किया गया था. सुरेश वाडेकर  की संगीत यात्रा की शुरूआत एक तरह से &lt;i&gt;"गमन"&lt;/i&gt; से हीं हुई थी। १९७६ में आयोजित "सुर श्रृंगार" प्रतियोगिता के कई सारे निर्णयकों में जयदेव भी एक थे. इस स्पर्धा को जीतने के बाद इन्हें जयदेव की तरफ़ से गायकी का निमंत्रण मिला. "सीने में जलन" अगर इनका पहला गीत न भी हुआ तो भी शुरूआती दिनों के सदाबहार गाने में इसे ज़रूर हीं गिना जा सकता है।&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-1N-ylzB8NvM/TyKXqeNUBBI/AAAAAAAAAfU/SxIrjb2Y3as/s1600/images.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="194" width="259" src="http://2.bp.blogspot.com/-1N-ylzB8NvM/TyKXqeNUBBI/AAAAAAAAAfU/SxIrjb2Y3as/s320/images.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लता दीदी इनकी आवाज़ से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल","खय्याम","कल्याण जी-आनंद जी" जैसे संगीतकारों से इनकी सिफ़ारिश कर डाली.रामायण धारावाहिक में संगीत देकर प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचे रवीन्द्र जैन के नाम पर मुंबई की उदीयमान संस्थान ने एक पुरस्कार शुरू किया है जिसने पहले 2011 में साल खुद रवीन्द्र जैन के हाथों गायक सुरेश वाडेकर को दिया गया. "प्रेम रोग" के अलावा "क्रोधी", "हम पाँच", "प्यासा सावन","मासूम", "सदमा", "बेमिसाल", "राम तेरी गंगा मैली", "ओंकारा" जैसी फिल्मों में भी इन्होंने सदाबहार गाने गाए हैं। 2007 में महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें "महाराष्ट्र प्राईड अवार्ड" से सम्मानित किया .सुरेशजी को सही पहचान मिली राम तेरी गंगा मैली फिल्म और प्रेम रोग फिल्म में गाए गानों से. सुप्रसिद्ध स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का भी बहुत बड़ा योगदान उनके कैरियर को संवारने में रहा है. एक इंटरव्यू  में उन्होंने खुद कहा कहा -जी हाँ एकदम सही है मेरे करियर में लताजी और आशाजी का बहुत  बड़ा हाथ है.उन्होंने मेरे गाने सुने और खुद से ही फ़ोन कर के मेरी तारीफ की और बहुत सी जगह पर कहा कि मैं एक लड़का भेज रही हूँ इसको एक मौका अवश्य दे.जब स्वयं माँ सरस्वती का आशीर्वाद मिल जाए तो फिर और क्या चाहिए.&lt;br /&gt;मेघा रे, मेघा रे..चप्पा चप्पा चरखा चले, सपने में मिलती है... "गोरों की न कालों की"(बप्पी लाहिरी), "ऐ जिंदगी गले लगा ले"(इल्लायाराजा) और "लगी आज सावन की'(शिव हरी), उनके खाते के हिट गीत हैं. सुरेशजी ने स्व. मोहम्मद रफ़ीजी के साथ भी एक गाना गाया था-अनपढ़ फिल्म में. सुरेशजी ने संगीत का एक मेरा  मुंबई में संगीत प्रशिक्षण विद्यालय शुरू किया है जहाँ हजारो बच्चे शिक्षा पा रहे हैं. उसकी एक शाखा  न्यू जर्सी में भी खोली है, यहाँ भी बहुत से बच्चे शिक्षा  पा रहे हैं. इस पर उनकी राय है- "मेरे पास अपना क्या है? हमने पूज्य गुरु से जो सीखा है, उसे आने वाली पीढ़ी को और बच्चों को दे रहा हूँ। आखिर उसे छाती पर बाँधकर कहाँ ले जाएँगे। विद्या को जितना बाँटेंगे, मस्तिष्क उतना ही जागृत और परिष्कृत होगा। गाना सिखाने से आपका अपना रियाज तो होगा ही, आपकी सूझबूझ और खयाल विस्तृत होगा। जो आदमी खुद की आत्मसात विद्या को छाती पर बाँधकर ले जाता है, वह दुनिया का सबसे बड़ा स्वार्थी व कंजूस व्यक्ति है। विद्या बाँटने से बढ़ती है, न घटती है और न ही कम होती है&lt;br /&gt;उन्होंने एक इंटरव्यू में यह भी कहा है- मैं बहुत भाग्यशाली रहा कि जब-जब भी अच्छे और कुछ अलग किस्म के गाने बने तो मुझे बुलाया गया। हमारा बड़ा भाग्य रहा कि पूरी इंडस्ट्री में जब अनेक नामचीन और स्थापित गायक कार्यरत थे तो रवीन्द्र जैनजी ने मुझे अवसर दिया। यह मामूली बात नहीं है कि जब फिल्म इंडस्ट्री में पैर रखना मुश्किल होता था तो मुझ जैसे नए कलाकार के हिस्से में इतनी मुश्किल तर्जे आई और गाने को मिली। आज उन्हीं सब बुजुर्गों, गुरुजनों और सुनने वालों के आशीर्वाद से मैं 33 साल से गाने की कोशिश कर रहा हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरेशजी ने 1998 में केरल की &lt;i&gt;पदमाजी&lt;/i&gt; से शादी की और ख़ास यह है कि बाय पास सर्जरी के बावजूद उनकी आवाज में दमखम है और मंच पर छा जाने का हुनर भी और सबसे ख़ास यह कि गाने के नाम पर भोंडापन परोसते संगीतकारों-गायकों की भजन मंडली में वे बिलकुल अलग है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-6206536120558165518?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/6206536120558165518/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2012/01/blog-post_27.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/6206536120558165518'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/6206536120558165518'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2012/01/blog-post_27.html' title='सुरों के सरताज सुरेश वाडकर'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-2alHuvMWtxk/TyKV4AY_KhI/AAAAAAAAAfI/tpR1popFvaU/s72-c/s%2Bwadkar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-470323500447647901</id><published>2012-01-20T05:15:00.000-08:00</published><updated>2012-01-21T03:48:41.845-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जंगल की पुकार'/><title type='text'>फिर से बस्तर</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Hn-PVlolXS8/TxlnLJgRFHI/AAAAAAAAAeY/QrVotCfnZks/s1600/bastar.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="300" width="400" src="http://1.bp.blogspot.com/-Hn-PVlolXS8/TxlnLJgRFHI/AAAAAAAAAeY/QrVotCfnZks/s400/bastar.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;आज़ादी&lt;/b&gt; के 64 सालों बाद धुर जंगली इलाके  बस्तर में अब जाकर शायद विकास की नई कहानी  लिखी जाए| घोर नक्सल प्रभावित दंतेवाडा जिले को दो फाड़  करके सुकमा को नया जिला बनाया गया है| इसमें क्या नई बात है ये कोई भी कह सकता है, जिला बनाना कोई ऐसी खबर या मुद्दा तो नही है जिस पर बड़ा लेख लिखा जाए|  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको बता दें &lt;i&gt;दंतेवाडा&lt;/i&gt; वो इलाका है जहां नक्सली हुकूमत के आगे सरकार भी पस्त हो जाती है और  सदियों से बस्तर की  तरक्की की राह में नश्तर जैसे चुभने वाले सघन वन क्षेत्र में आज भी बड़े पत्तों वाले साल वन से ढंके ऐसे इलाके हैं, जहां जमीन तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती। &lt;br /&gt;बेशकीमती खनिज से लबालब इस धरती के लोगों के लब गर्मी में पानी को तरस जाते हैं|  आज आदिवासियों वाला बस्तर हिंसा से तप्त है|  &lt;br /&gt;&lt;i&gt;मुम्बई की हिंसा में बीस लोग मारे जाते हैं तो बवाल मच जता है मगर बस्तर मे कभी पुलिस पार्टी पर हमले तो कभी आदिवासियों पर हमले और कभी नक्सलियों से मुठभेड़ में औसतन इतनी मौतें रोज़ हो रही हैं जितनी नार्थ ईस्ट और जम्मू कश्मीर में भी नही होती तो ऐसा लगता है किसी को कोई रंज नही होता मानो ये इलाके भारत में हैं ही नहीं| &lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब चार हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले सुकमा में &lt;i&gt;अबूझमाड़ &lt;/i&gt;की कंदराएं  हैं जहां  सूरज भी घुसने से घबराता है और नंग-  धड़ंग आदिवासी यहाँ आदिम युगीन सभ्यता में जी रहे हैं| इलाके का राजस्व सर्वे तक नही हो पाया क्योंकि अमला जा नही सका. आपको बता दें यहाँ कई सड़कें सम्राट अकबर के ज़माने में बनी हुई जस की तस हैं. बस्तर का मतलब मीलों तक फैला डरावना जंगल ..सन्नाटा और बीच-बीच में  पक्षियों का कलरव-गान  या अब  बन्दूकों की गूंज.. &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-c6XP3pXijCw/Txln5QPFNVI/AAAAAAAAAek/A3_bV9zSZt8/s1600/bastar-chattishgarh.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="200" width="180" src="http://2.bp.blogspot.com/-c6XP3pXijCw/Txln5QPFNVI/AAAAAAAAAek/A3_bV9zSZt8/s320/bastar-chattishgarh.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;विकास की किरण छूने  को तरसते इस इलाके में केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री &lt;i&gt;जयराम रमेश &lt;/i&gt;भी जा पहुचे और नया जिला बनने के मौके पर उमड़ी आदिवासियों की भीड़ के बीच उन्होंने ऐलान किया कि केंद्र सरकार इलाके के विकास के लिए 30  करोड़ रूपये सालाना देगी और इलाके में एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम चलाया जाएगा| अब देखा ये जाएगा कि सरकार कितना देती है और कितना विकास किसका होता है.  नए जिले &lt;i&gt;सुकमा और कोंडागांव &lt;/i&gt;नक्सल प्रभावित क्षेत्र हैं। घने जंगलों वाला आदिवासी बाहूल्य ये इलाक़ा इतना  पिछड़ा हुआ है कि अगर आप अपने वाहन से एक बार इलाके में घुस जाएं तो पानी की एक बोतल खरीदने और बिस्कुट का एक पैकेट खरीदने के लिए मीलों दूर तक भटकना पड़ सकता है|&lt;br /&gt;इसी दंतेवाडा का सुकमा (अब जिला) इलाक़ा भारत के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक माना जाता रहा है| यहां नक्सलियों के पक्के शिविर चलते हैं-जैसे पीओके में हिजबुल के| यहां नक्सली हिंसा की बड़ी वारदातें होती रही हैं. &lt;br /&gt;वर्ष  अप्रैल 2010  में चिंतलनार में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ के 75 जवानों की नक्सली हमले में मौत समेत  कई बड़ी घटनाएं दंतेवाड़ा -सुकमा अनुमंडल में ही हुई हैं| &lt;br /&gt;सच यह है कि इलाके में पुलिस घुसने से आज भी डरती है| नए जिले बनाने के पीछे  तर्क है कि आदिवासियों को जिला मुख्यालय जाने के लिए ज्यादा चलना नही पडेगा| &lt;br /&gt;मुख्यमंत्री &lt;i&gt;डॉ. रमन सिंह &lt;/i&gt;ने बीते सोमवार नवगठित सुकमा जिले का शुभारंभ किया।  सिंह ने कहा कि इससे राज्य में विकास की प्रक्रिया में तेजी आएगी और यकीनन जब जिला बन गया तो अफसर जाएंगे ही. अफसर जाएंगे तो अमला भी होगा. सब जाएंगे तो काम  करना ही पड़ेगा . काम होगा तो नजर भी आएगा. कुछ तथ्य हैं कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सात जिलों में केवल 526 टीचर काम कर रहे हैं जबकि इन जिलों में 2,558 टीचर होने चाहिए। इसी तरह नक्सलियों की नई पसंदगाह बने उड़ीसा में नक्सल प्रभावित पांच जिलों में 6,003 टीचर होने चाहिए जबकि वहां केवल 3,566 टीचर हैं।यह आंकड़े कुछ पुराने हैं मगर हालात को बयां करने के लिए काफी हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना जा रहा है कि जिला बनने से इलके में सरकारी आमद-रफ्त बढ़ेगी और विकास के काम होने से नक्सलियों के पांव उखड़ेंगे जो पिछड़ेपन को ढाल बनाते आए है| शबरी नदी के तट पर स्थित सुकमा जिला न केवल बस्तर संभाग बल्कि छत्तीसगढ़ के भी दक्षिणी छोर का आखिरी जिला है। इसकी सीमा ओड़िशा और आन्ध्रप्रदेश से लगी हुई है। इलाके में नक्सलवाद शुरू हुआ तो कहा गया कि वह आदिवासी के लिए बन्दूक चला रहा है मगर यह सच भी सामने आने लगा कि नक्सली नेता दूरबैठे किसी और ठिकाने से से संचालन करने लगे और बस्तर में गुरिल्ला स्क्वाड के नाम पर अब आदिवासी ही आदिवासी पर बंदूक चलाने लगा | आदिवासी के हाथ में चीन की बनी हुई रायफलें पहुचने लगी .&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-j5viNJDtKlo/Txlof_-dzSI/AAAAAAAAAew/f1KDrMZS92E/s1600/bob-cut-brigade-in-bastar-women-with-a-bob-cut-haircut-can-get-you-killed.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="225" width="400" src="http://4.bp.blogspot.com/-j5viNJDtKlo/Txlof_-dzSI/AAAAAAAAAew/f1KDrMZS92E/s400/bob-cut-brigade-in-bastar-women-with-a-bob-cut-haircut-can-get-you-killed.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;बस्तर का ही &lt;i&gt;कोंडागांव&lt;/i&gt; दूसरा ऐसा संवेदनशील इलाक़ा है जो सुरक्षा बलों और माओवादी हिंसा से लहुलुहान हुआ पड़ा है| यह भी जिला बन गया है| छत्तीसगढ़ में इस तरह नौ में से पांच नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नए जिलों का गठन हुआ है|  छत्तीसगढ़ में पिछले लगभग दस सालों में ही ज़िलों की संख्या 16 से बढ़ते कर 27 पहुंच गई है|  सुकमा और कोंडागांव के अलावा जिन इलाक़ों को ज़िलों का दर्ज़ा दिया गया है, उनमें बालौद, गरियाबंद, मुंगेली, बेमेतरा, सूरजपुर, बलौदाबाज़ार और बलरामपुर शामिल हैं| बस्तर में पदस्थ सीआरपीएफ़ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह की भी राय है कि छोटे जिलों से अभियान को बल मिलेगा|&lt;br /&gt;सरकार चला रहे रमन सिंह का यह कदम बताता  है कि अब यह भी माना जा रहा है कि हिंसा की बजाय किसी और रास्ते से लोगों का जीवन बदला जाए. अब बस्तर का हल गोली नही बोली है और बंदूकों से हो रहे विनाश की जगह विकास से ही है. अबूझमाड़ में सभी आदिवासी इलाकों में अस्पताल, स्कूल और सड़क की दिक्कतों को दूर किया जाए और औद्योगिकरण की स्थिति में विस्थापन औऱ रोजगार की कारगर योजना के साथ वनोपज संग्रह-विपणन में भी आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए|  सारी बंदूकों को वहां से रुखसत करा के आदिवासियों को उनकी संस्कृति के हाल पे ही छोड़ दे तो बस्तर की  मैना फिर से चहक सकती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-470323500447647901?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/470323500447647901/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/470323500447647901'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/470323500447647901'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='फिर से बस्तर'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-Hn-PVlolXS8/TxlnLJgRFHI/AAAAAAAAAeY/QrVotCfnZks/s72-c/bastar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-3683680138153902824</id><published>2012-01-06T05:31:00.000-08:00</published><updated>2012-01-06T05:37:24.237-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-C0hGL71yR6Y/Twb3XkX7NFI/AAAAAAAAAd0/VUEK2FdkWHc/s1600/images.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="139" width="186" src="http://2.bp.blogspot.com/-C0hGL71yR6Y/Twb3XkX7NFI/AAAAAAAAAd0/VUEK2FdkWHc/s400/images.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;       नए  साल  में  आपको **&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुशियों  की  सौगात  मिलें **   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुख  से  महके  सारा  जीवन  ** &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समृद्धि के दीप जलें  **&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;नए साल की शुभकामनाएं&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;=====================  &lt;br /&gt;sssssssssssssssssssssss&lt;br /&gt;"""""""""""""""""""""""&lt;br /&gt;***************&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-3683680138153902824?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/3683680138153902824/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2012/01/sssssssssssssssssssssssssssssssssssssss.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/3683680138153902824'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/3683680138153902824'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2012/01/sssssssssssssssssssssssssssssssssssssss.html' title=''/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-C0hGL71yR6Y/Twb3XkX7NFI/AAAAAAAAAd0/VUEK2FdkWHc/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-988172461910826951</id><published>2011-12-27T05:40:00.000-08:00</published><updated>2011-12-30T07:31:32.663-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>काल तुझसे होड़ है मेरी...</title><content type='html'>&lt;b&gt;&lt;i&gt;कविता श्रद्धांजलि//आलोक तोमरजी&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-wmUv31Qw4vw/TvnLbea41dI/AAAAAAAAAcU/2uaFzOA0UbY/s1600/alokji.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="194" width="259" src="http://1.bp.blogspot.com/-wmUv31Qw4vw/TvnLbea41dI/AAAAAAAAAcU/2uaFzOA0UbY/s320/alokji.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;काल तुझसे होड़ है मेरी&lt;br /&gt;जानता हूं चल रही है&lt;br /&gt;मेरी तुम्हारी दौड़&lt;br /&gt;मेरे जन्म से ही&lt;br /&gt;मेरे हर मंगल गान में&lt;br /&gt;तुमने रखा है ध्यान में&lt;br /&gt;एक स्वर लहरी,&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-6lnQFUlqptQ/Tv3WspZqm9I/AAAAAAAAAdE/WS-WIT-tSZg/s1600/images.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="194" width="259" src="http://4.bp.blogspot.com/-6lnQFUlqptQ/Tv3WspZqm9I/AAAAAAAAAdE/WS-WIT-tSZg/s320/images.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;शोक की रह जाए&lt;br /&gt;आपके दूत मुझसे मिलें हर मोड़ पर&lt;br /&gt;और जीवन का बड़ा सच&lt;br /&gt;चोट दें, कह जाएं&lt;br /&gt;सारे स्वप्न, सारी कामनाएं, आसक्तियां&lt;br /&gt;तुम्हारे काल जल में बह जाएं&lt;br /&gt;लेकिन अनाड़ी भी हूं&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-9zZZfqkP7vA/TvnJ1xK2EoI/AAAAAAAAAcI/DEdaDQlNR1E/s1600/aaalokkk.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="320" width="172" src="http://1.bp.blogspot.com/-9zZZfqkP7vA/TvnJ1xK2EoI/AAAAAAAAAcI/DEdaDQlNR1E/s320/aaalokkk.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अनूठा भी, किंतु&lt;br /&gt;तुम्हारी चाल से रूठा भी&lt;br /&gt;काल की शतरंज से कभी जुड़ा&lt;br /&gt;और एक पल टूटा भी&lt;br /&gt;तुम सृष्टि के पीछे लगाते दौड़&lt;br /&gt;देते शाप और वरदान&lt;br /&gt;और प्रभंजन, अप्रतिहत&lt;br /&gt;चल रही है&lt;br /&gt;दौड़ तुमसे मेरी&lt;br /&gt;ए अहेरी&lt;br /&gt;काल, तुझसे होड़ है मेरी.....&lt;/b&gt; -आलोक तोमर&lt;br /&gt;&lt;i&gt;(स्वर्गीय आलोकजी ने यह कविता स्वयं लिखी थी// जन्म-दिन-27 दिसंबर)&lt;/i&gt; &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-mIQMFgWBm4w/Tv3X8oJqO-I/AAAAAAAAAdc/lEqBLv7ZSso/s1600/images%2B%25281%2529.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="168" width="299" src="http://4.bp.blogspot.com/-mIQMFgWBm4w/Tv3X8oJqO-I/AAAAAAAAAdc/lEqBLv7ZSso/s400/images%2B%25281%2529.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-988172461910826951?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/988172461910826951/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/12/blog-post_27.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/988172461910826951'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/988172461910826951'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/12/blog-post_27.html' title='काल तुझसे होड़ है मेरी...'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-wmUv31Qw4vw/TvnLbea41dI/AAAAAAAAAcU/2uaFzOA0UbY/s72-c/alokji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-1463698900662241459</id><published>2011-12-25T04:02:00.000-08:00</published><updated>2011-12-25T09:45:16.266-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>सत्यदेव दुबे : जनचेतना के रंग -निर्देशक</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-dZbGf0-6yO8/TvcRtsLnZTI/AAAAAAAAAb8/A8jxEUP5sDg/s1600/s-dubey-150x150.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="150" width="150" src="http://3.bp.blogspot.com/-dZbGf0-6yO8/TvcRtsLnZTI/AAAAAAAAAb8/A8jxEUP5sDg/s320/s-dubey-150x150.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारत के जानेमाने नाटककार, पटकथा लेखक, फिल्म व नाट्य के प्रति समर्पित, प्रयोगशील निर्देशक मशहूर निर्देशक.रंगकर्मी सत्यदेव दुबे का रविवार को मुंबई के एक अस्पताल में  लंबी बीमारी के बाद रविवार निधन हो गया| वे 75 वर्ष के थे| हकीकत यह है कि हिन्दी रंगमंच का इतिहास आज पं0 सत्यदेव दुबे के उल्लेख के बगैर लिखा ही नहीं जा सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्यदेव दुबे (जन्म 1936) भारत के जानेमाने नाटककार, पटकथा लेखक, फिल्म व नाट्य निर्देशक रहे हैं। उनका जन्म&lt;b&gt;&lt;i&gt; छत्तीसगढ़  के बिलासपुर &lt;/i&gt;&lt;/b&gt; में हुआ।  शुरुआती दिनों में दूबेजी की क्रिकेट के प्रति दीवानगी थी और वे एक नामी क्रिकेटर बनना चाहते थे और अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई चले आए थे लेकिन शौकिया तौर पर एक थियेटर ग्रुप में शामिल हो गए थे| पी डी  शिनॉय और निखिलजी का मार्गदर्शन रहा|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरीश कर्नाड के पहले नाटक ययाति और हयवदन. बादल सरकार के   इंद्रजीत और पगला घोडा . मोहन राकेश के आधे अधूरे और विजय तेंदुलकर के खामोश अदालत जारी है जैसे नाटकों का मंचन कर भारतीय रंगमंच मे योगदान दिया|  &lt;br /&gt;सत्यदेव दूबे के पौत्र ने कहा वह पिछले कई महीने से कोमा थे । सत्यदेव दूबे को इस साल सितंबर महीने में जूहू स्थित पृथ्वी थियेटर कैफे में दौरा पड़ा था और तभी से वह कोमा में थे । इसके बाद से वे वह मस्तिष्क-आघात से जूझ रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे चर्चित नाटककार और निर्देशक थे| 'आधे अधूरे' और 'एवम इंद्रजीत' जैसे नाटकों के लिए प्रसिद्ध थे लेकिन उन्हें प्रसिद्ध  किया 'अंधा युग'ने। उन्होंने नाटकों के सौ से ज्यादा शो  किये| हाल में उन्होंने अजामिल से साक्षात्कार में कहा- रंगयात्रा विधिपूर्वक सन् 1959 में आरम्भ हुई..पूरे आत्मविश्वास के साथ। उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ तो मैने हिन्दी के अलवा गुजराती, मराठी, अंग्रेजी आदि बहुत सी दूसरी भाषाओं में भी सौ से ज्यादा नाटको के कई-कई शोज किए। डा0 धर्मवीर भारती का सुप्रसिद्ध काव्य नाटक अन्धायुग मैंने पहली बार सन् 1952 में बम्बई में किया था। इसके सौ से अधिक शो मैंने वभिन्न शहरों में किये। सन् 1971 में मुझे संगीत नाटक अकादमी ने सम्मानित किया था, निर्देशन के लिए। सच तो ये है, कि मैंने अपनी रंगयात्रा में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और न मुझे कभी पूर्ण संतोष ही हुआ। आज इतना वक्त गुजर जाने के बाद भी लगता है, कि अभी बहुत कुछ छूटा हुआ है, जिसे मैं कर सकता हूँ और मुझे करना चाहिए।इसमें संदेह नहीं कि तमाम टी0वी0 चैनलों और मनोरंजन के दूसरे साधन आसानी से उपलब्ध होने के कारण नाटक देखने वाले दर्शकों की संख्या में कमी आयी है, लेकिन हमने भी तो इन हालातों को रंगमंच की स्थिति मानकर चुप्पी साध रखी है। इलेक्ट्रानिक क्रान्ति से आतंकित होकर हम खुद ही नाटक को गए गुजरे जमाने की चीज मान बैठे हैं। क्या यह एक बड़ी भूल नहीं है ? क्या हमने कभी सोचा कि विभिन्न क्षेत्रों में हुए परिवर्तन के साथ-साथ रंगकर्म के आन्तरिक संकट भी यदि गहरे हुए हैं, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? हमारी प्रतिबद्धता और नाटक के प्रति वास्तविक निष्ठा में भी तो गिरावट आयी है। काम से ज्यादा हम आज धर्म और यश को क्या अन्तिम उपलब्धि नहीं मान बैठे हैं ? रंगमंच से जुड़ी नई तकनीकि के प्रति हमारी कोई रूचि, कोई रूझान कोई जिज्ञासा क्या कहीं दिखाई देती है ? लकीर के फकीर बने रहकर हम रंगमंच के विकास की दिशा मं कभी कुछ नहीं कर सकते। मैं कभी यह नही मानता कि दर्शकों को अगर अच्छी चीज दिखाई जाय तो वो उसे नहीं देखेंगें। दर्शकों के अभाव का संकट उन रंगकर्मियों के सामने ज्यादा गहरा है, जो अभी तक अपनी प्रस्तुतियों के प्रति अपने दर्शकों का विश्वास नहीं जीत पाये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने यह भी कहा था-हिन्दी रंगमंच की सबसे बड़ी कमजोरी यही है, कि इसमें अभी तक पेशेवराना अंदाज नहीं बन सका है। पेशेवर अभिनेता को यहाँ दोयम दर्जे का अभिनेता माना जाता है। रंगकर्मियों में रंगकर्म को एक काम-चलाऊ अंदाज में देखने और करने की एक गंदी प्रवृत्ति यहाँ है। चल जायेगा, निकल जायेगा जैसा मुहावरा हिन्दी रंगमंच पर ही सुनने को मिलता है, जबकि रंगकर्मियों का विश्वास होना चाहिए कि यही सही है। मराठी अथवा बांग्ला रंगमंच पर प्रस्तुति, अभिनय और अभिनेता पूरी तरह प्रोफेशनल हो चुका है। दर्शक पूरे आत्मविश्वास के साथ इन भाषाओं के नाटकों को देखता है। सिर्फ बम्बई में ही डेढ़ सौ से लेकर दो सौ तक नये पुराने नाटक हर साल होते हैं, और हर नाटक के कई-कई शो किये जाते हैं। अनुदानों ने भी नाटकों का बड़ा अहित किया है। आज रंगकर्मी अपने दर्शकों के अनुराग पर कम, सरकार के अनुदान पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। सांस्कृतिक केन्द्रों, नाट्य-अकादमियों और बहुत सी दूसरी रंग-संस्थाओं ने कोई अनुराग-धर्मी रंगकर्मी पैदा होने ही नहीं दिया। रंगकर्म की जरा भी तमीज रखने वाले अधिकतर अधिकारियों ने अनुदान का लालच देकर रंगकर्मियों को कठपुतलियों में बदल दिया है। सारा कुछ अनुदानों, लेनदेन और पहुँच पर जाकर ऐसा सिमट गया है, कि दर्शक आज बेशऊर उपभोक्ता दिखाई देने लगा है। लाखों रूपये अनुदान के खर्च करके जब कोई संस्था नाटक अलीबाबा चालीस चोर करती है, तब उसके सामाजिक सरोकार स्वयं सिद्ध हो जाते हैं। हिन्दी रंगमंच आज भी दरबारी रंगकर्म की सीमाओं में बँधा हुआ है। यहाँ सृजनात्मकता की लगभग हत्या हो चुकी है। हिन्दी रंगमंच के पास कोई सामाजिक समर्थन भी नहीं है। अनुदानों के भरोसे रंगकर्म जिन्दा नहीं रह सकता। यह काम जनचेतना से जुड़ा है, और जनता ही इसे जीवित रखती है। रंगकर्म एक उत्सव है, जो हमारे जीवन से जुड़कर साँस लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक के रूप में उन्होंने 1956   में काम शुरू किया। वे अनेक मराठी व हिन्दी फ़िल्मों के निर्देशक रहे हैं। उन्हें 1971  में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया है। श्याम बेनेगल निर्देशित भूमिका फिल्म में पटकथा लेखन के लिये उन्हें 1978  में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। 1980  में जुनून फिल्म में संवाद लेखन के लिये उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला| 1971 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। बाद में भारत सरकार ने कला क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए पद्म भूषण से सम्मानित किया। उन्हें फिल्म भूमिका के लिए 1978 में सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी दिया गया। सत्यदेव ने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया और कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया है। उन्होंने निर्देशक श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी की फिल्मों संवाद और पटकथा भी लिखी। इनमें अंकुर (197।), निशांत (1975), भूमिका (1977), जुनून (1978), कलयुग (1980), आक्रोश (1980), विजेता (1982) और मंडी (1983) शामिल हैं।उनके निधन पर प्रसिद्ध रंगकर्मी रामगोपाल बजाज, देवेंद्र राज अंकुर आदि हस्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है।&lt;br /&gt;इसी साल गणतंत्र दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ के मशहूर सत्यदेव दुबे को पद्मभूषण दिये जाने की घोषणा हुई थी|  दुबे जी थियेटर  को रेप्रेज़ेंट करते रहे हैं | उन्होंने जो ठीक समझा वही किया |एक्टरों को उन्होनें सबसे पहले उसकी ज़मीन पर ठीक से खड़े रहना सिखाया  अगर वो ऎसा नहीं कर पाया तो दुबेजी ने उसे डाट कर उसे ज़मीन पर ला कर खड़ा कर दिया। बम्बई की प्रशिद्ध संस्था 'थियटर यूनिट' ने सत्यदेव दुबे के निर्देशन में 'शुतुरमुर्ग़' के अनेक प्रदर्शन किये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-1463698900662241459?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/1463698900662241459/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/12/blog-post.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1463698900662241459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1463698900662241459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='सत्यदेव दुबे : जनचेतना के रंग -निर्देशक'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-dZbGf0-6yO8/TvcRtsLnZTI/AAAAAAAAAb8/A8jxEUP5sDg/s72-c/s-dubey-150x150.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-4243905714777169282</id><published>2011-12-12T23:40:00.000-08:00</published><updated>2011-12-13T04:58:42.201-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>13 दिसंबर 2001- संसद भवन</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-FbHnEVecrt4/TucAFYSUegI/AAAAAAAAAao/4QR9fUGstds/s1600/13slid2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="213" width="350" src="http://3.bp.blogspot.com/-FbHnEVecrt4/TucAFYSUegI/AAAAAAAAAao/4QR9fUGstds/s400/13slid2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;आज 13  दिसम्बर है&lt;/b&gt; और आज से ठीक 10 साल पहले आज के ही दिन कुछ दिग्भ्रमित लोगो ने भारत के लोकतंत्र के मंदिर के प्रतीक संसद भवन को बम और धमाकों  से थर्रा दिया था मगर वे नेस्तनाबूद  हुए क्योंकि संसद की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति देने वालों की जीत हुई थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरा भारत उन शहीदों को नमन कर रहा है जिन्होंने अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी.13 दिसंबर 2001 को अर्धसैनिक बलों के जाबांज जवानों और पुलिस ने पोजीशन ले जवाबी कार्रवाई की जिसमें पांचों आतंकवादी मारे गए, जबकि आठ सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे.आतंकवादियों की तैयारी संसद भवन के अंदर घुसकर राजनेताओं को बंधक बनाने की थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस साल पहले आज ही के दिन देश की संसद पर हुए हमले के दौरान संयोग या दुर्योग.. मै उस घटना का मूक , अवाक और कुछ पलों का डरा ..फिर कुछ पल दमदारी जुटा कर केवल एक दर्शक के तौर पर सब कुछ घटित होते देखने वाला साक्षी रहा हूँ.&lt;br /&gt;हमले की याद फिर ताजा हो गई. लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद क्या हैं यह उस पल देखा जब कवरेज ड्यूटी के लिए मुख्य मंडप में प्रवेश करने ही जा रहा था.अपनी ड्यूटी थी और पौने बारह इससे कुछ मिनट्स ज्यादा ही हुए होंगे. &lt;br /&gt;दक्षिण के सुरक्षा द्वार से दूसरा द्वार चक्र पार करने के लिए बढ़ा था. &lt;br /&gt;अचानक शांत संसद परिसर में तड़ ..तड़ ..तड़ की आवाज ने सबको चौकाया .&lt;br /&gt;उस वक्त मेरी  हमेशा की तरह गेट पर सुरक्षाकर्मी से इस बात के लिए झिकझिक हो रही थी कि अंदर जाने से पहले मोबाईल क्यों रखवा लिय़ा जाता है. &lt;br /&gt;अगला ड्यूटी से मजबूर था और मै अपनी आदत से . मगर दोंनों को एक अज्ञात आशंका ने भर दिया.. और मैंने संसद परिसर की दीवार में सितारों जैसी शक्ल के बने हुए छेद से झांक कर देखा . नीली वर्दी पहने पीठ पर पिट्ठू बस्ता लादे कुछ लड़के दौड़ रहे थे. वे गोलियां बरसा रहे थे . मैंने गोलियां चलने  की आवाजें सुनीं तो एक पल में भांप लिय़ा कि ये आतंकवादी हैं. &lt;br /&gt;इसी दौरान मैंने देखा मुस्तैद सुरक्षा-कर्मी  गेट बंद करा रहे  थे और वायरलेस घनघना रहे थे कि पोजीशन ले ली जाए. मैंने मुख्य इमारत के दक्षिण द्वार को बंद होते देखा और समझ नही आया कि क्या किया जाए मगर हठात मैंने निर्णय लिय़ा कि सारा नजारा बाहर से देखा जाए. आवाजें मेरे कानों में गूंजीं. लेट जाइए.. गोली लग सकती है लेकिन   &lt;br /&gt;मैं उलटे पांव बाहर दौड़ आया और पहली  बार सिर झुका कर भागने का अनुभव भी हुआ. मुझसे चंद क़दमों के फासले से स्वचालित हथियारों से गोलियां बरस रही थी. मैंने एक दीवार की ओट से देखा हमारे जवान जिनकी खाकी वर्दी नजर आ रही थी वे ओट लिए थे और  रह-रह कर गोलियां चल रही थी. हथगोलों..फायरिंग की आवाजें बढ़ गई थी. &lt;br /&gt;इसी बीच मैंने देखा वे लड़के मुख्य द्वार को बंद पा  कर दक्षिण की तरफ जिधर से राज्य सभा का प्रवेश है उधर गए.. एक सफ़ेद कार के पास रुक गए (जो उनकी थी)और इसी बीच क्या हुआ क्या नही.. कार से विस्फोट की आवाज सुनी गयी.&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-zfkXG_J3Zyo/TucBRhfB1AI/AAAAAAAAAa0/z_aJo77xhPI/s1600/08house.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="135" width="170" src="http://1.bp.blogspot.com/-zfkXG_J3Zyo/TucBRhfB1AI/AAAAAAAAAa0/z_aJo77xhPI/s320/08house.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;मैंने विस्फोट होते हुए नही देखा क्योंकि हर पल बदहवास होने के लिए पर्याप्त घटनाओं में मेरा दिमाग इस बात में फंसा था कि क्या किया जाए.जान कैसे बचे. जान बचे तो रिपोर्टिंग की जाए. इसी दौरान छोटे द्वार से मैंने मुख्य दक्षिण द्वार का रुख किया जिधर से नार्थ साऊथ  ब्लाक के लिए प्रवेश और निकास है. उधर भीड़ लग चुकी थी. &lt;br /&gt;भीतर सुरक्षा कर्मी दमदारी से बचाव कर आरहे थे और पहली बार मुझे लगा कि ये ना होते तो आज क्या होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उस जांबाज वाच एंड वार्ड स्टाफ को भी जमीन पे गिरते देखा जिनकी बाद में &lt;i&gt;शहीद जगदीश प्रसाद यादव&lt;/i&gt; के रूप में शिनाख्त  हुई और यह शाहदत के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है कि उन्होंने अपनी  जान की बाजी लगा वायरलेस पे सन्देश दिया, गेट बंद कराए और खुद आतंकवादियों की गोलियां झेल गए.जैसे ही गोलियां चलनी शुरू हुईं, संसद के सुरक्षा स्टाफ ने मेन बिल्डिंग को चारों तरफ से बंद कर दिया &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-4NUlkL8IDB4/TudE8t6wWLI/AAAAAAAAAbA/dcOi-5A6Lbs/s1600/dead.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="139" width="187" src="http://4.bp.blogspot.com/-4NUlkL8IDB4/TudE8t6wWLI/AAAAAAAAAbA/dcOi-5A6Lbs/s320/dead.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;बाद में यह पता चला कि वे दरवाजे  बंद नही कराते तो आतंकवादी  अंदर घुस जाते. उनकी योजना ब्लैक मेलिंग की थी- संसद को बंधक बनाओ और मांगें मनवाओ. वे जेब में काजू बादाम रस्सियाँ रख कर कई दिनों तक सबको बंधक बनाने की आतंक गाथा रचने आए थे. &lt;br /&gt;इरादे नेक नही थे इसलिए तमाम र्रिहर्सल के बावजूद चूक गए या नियति ने एन मौके पर उनके दिमाग फिरा दिए और वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर को  कलंकित करते इससे पहले, चौखट पर ही मार दिए गए. &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-VJpb5vwqDeE/TudFVohSDOI/AAAAAAAAAbM/CdZLvYXfE28/s1600/images.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="133" width="196" src="http://2.bp.blogspot.com/-VJpb5vwqDeE/TudFVohSDOI/AAAAAAAAAbM/CdZLvYXfE28/s320/images.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;बाद में पता चला वे जिस कार में विस्फोटक लिए आए थे, हडबडी में विस्फोट कर बैठे क्योंकि उपराष्ट्रपति की कार बीच में खडी थी. प्रधानमंत्री सदन में नही थे मगर कई माननीयों को धोती सम्हाले भागते देखा गया. प्रमोद महाजन आज इस दुनिया में नही हैं मगर उन्होंने साहस से सब दरवाजे बंद कराए और कई मंत्रियों  को अपने कक्ष में पनाह दी. लगभग 500 सदस्यों ने संसद के केंद्रीय हाल में शरण ली. हाल के बाहर जवाहर लाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद की विशाल प्रतिमाएं है. आतंकवादी भीतर तो जा ही नही पाए. परिसर में बाहर गांधीजी की प्रतिमा है जिस पर भी गोलियां लगी और संसद की दीवार तो छलनी हो गयी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह साबित भी हो गया कि इस हमले का सूत्रधार &lt;i&gt;लश्करे तैयबा&lt;/i&gt; था. सुरक्षाकर्मियों ने पांचों आतंकवादियों को भी मार गिराया था. शाम को मै उस नौजवान सी आर पी एफ सिपाही &lt;i&gt;रामजी&lt;/i&gt; से मिला और एक्सक्लूसिव खबर बनाई जिसने पेड़ की ओट से साधारण बन्दूक से आतंकवादी को मारा था. उम्मीद करता हु उसका प्रमोशन हो गया होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय एक नारा चला था कि अब आर-पार की लड़ाई होगी मगर संसद के बाद मुम्बई पर भी हमला हो गया और हैरत ये है कि जिस शख्स अफजल गुरु पर हमले का प्रमाणित इल्जाम है उसकी फांसी पर भी राजनीति हो रही है.खबरों के मुताबिक जुलाई में मामले की जानकारी देते हुए एक गोपनीय पत्र में गृह मंत्री पी चिदंबरम ने राष्ट्रपति से दया याचिका को खारिज करने की सिफारिश की थी. सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में अफजल को मौत की सजा के निचली अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था. उसे 20 अक्टूबर 2006 को फांसी दी जानी थी लेकिन अफजल की पत्नी ने दया याचिका की अपील कर दी जिससे फांसी टल गयी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-4243905714777169282?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/4243905714777169282/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/12/13-2011.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4243905714777169282'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4243905714777169282'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/12/13-2011.html' title='13 दिसंबर 2001- संसद भवन'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-FbHnEVecrt4/TucAFYSUegI/AAAAAAAAAao/4QR9fUGstds/s72-c/13slid2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-58553625882509113</id><published>2011-11-21T06:26:00.000-08:00</published><updated>2011-11-21T06:26:26.267-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जंगल की पुकार'/><title type='text'>बचे हैं सिर्फ 23 बाघ</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-sE7cOhG5Nh8/TspdYW7HFDI/AAAAAAAAAac/agGSu_JpdJk/s1600/bagh.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="183" width="275" src="http://1.bp.blogspot.com/-sE7cOhG5Nh8/TspdYW7HFDI/AAAAAAAAAac/agGSu_JpdJk/s320/bagh.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;दुनिया भर में &lt;/b&gt;पशु-चर्म , नख और हड्डी  के सौदागरों ने अनमोल वन्य जीवों का जीना दूभर कर दिया है. नवम्बर का महीना &lt;i&gt;छत्तीसगढ़ के जंगल &lt;/i&gt;से बुरी ख़बरें ले कर आया है . एक बाघिन की मौत से वन्यजीव प्रेमी उबर नहीं पाए थे कि शनिवार को सरगुजा इलाके से दो हाथियों की भी मौत की खबर ने एक और झटका दे दिया. इससे  पहले एक  बाघिन को पीट-पीट कर मार डालने की घटना ने राज्य के वन विभाग की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए थे. &lt;br /&gt;बीते दिनों लालची लोगों ने एक बाघिन को मौत के घट उतार दिया. जांच में पता चला कि जो रक्षक था वही भक्षक बन गया. भोरमदेव अभयारण्य में बाघिन की निर्मम हत्या के आरोप में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है. पास गाय की लाश बरामद हुई है, जिसे जहर देकर मारने की पुष्टि हुई है. मामला उलझा हुआ है.  विभागीय अधिकारियों की लापरवाही  सामने आई है। जांच करने  अधिकारियों की टीम गठित की गयी है. बाघिन के शव का पोस्टमार्टम करने वाले नंदनवन के वन्य प्राणी चिकित्सक के अनुसार गोली लगने से मौत हुई है. &lt;br /&gt;बाघिन के दांत, मूंछ व नाखून भी गायब हैं। यह बताता है कि प्रदेश में तस्करों का जाल फैला हुआ है और वन्य जीवों का अवैध शिकार हो रहा है।&lt;br /&gt;चिंता की बात है कि अब छत्तीसगढ़ में अब सिर्फ 23 बाघ ही बचे हैं.  &lt;br /&gt;आंकड़ों के मुताबिक़ प्रदेश के 13 अभ्यारण्यों एवं राष्ट्रीय उद्यानों में पिछले सात महीनों में अब तक 60 वन्य जीव रहस्यमय तरीके से मारे गए हैं। यह सचमुच  चिंता की बात है. &lt;br /&gt;अब धरमजयगढ़ के जंगल से ताजा खबर है- एक हाथी करंट की चपेट में आकर मर गया, दूसरे की दक्षिण सरगुजा में कीटनाशक खाने से हो  मौत गई. इन मौतों में इलाके के में ग्रामीणों का हाथ होने की आशंका है. मौत के बाद बाकी हाथी रातभर चिंघाड़ते रहे. सूचना पर डीएफओ एस.जगदीशन दल-बल सहित घटनास्थल पहुंचे और पोस्टमार्टम के बाद मृत हाथी को दफना दिया गया.इसी तरह छाल वन परिक्षेत्र अंतर्गत बड़काखार के जंगल में एक  40 वर्ष के हाथी की मौत हो गयी जो जंगली सुअर के  लिए बिछाए गए विद्युत प्रवाहित तार की चपेट में आ गया था. इस बारे में&lt;i&gt; वन मंडाधिकारी, धरमजयगढ़ एस.पी. मसीह&lt;/i&gt; का कहना है  शव का परीक्षण कराया गया है और मामले की जांच की जा रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये घटनाएं बता रही हैं कि कोई भी इलाका जंगली जानवरों के लिए महफूज नहीं है और वन महकमा उनकी सुरक्षा में नितांत असफल रहा है. &lt;br /&gt; इससे पहले राजनांदगांव जिले के कहाड़कसा ग्राम में 7 नवम्बर  को बायसन की, छुरिया के बखरूटोला में 24 सितम्बर को बाघिन की हत्या हुई थी.गांवों के लोगों ने 24 सितंबर को राजनांदगांव छुरिया के करीब बखरूटोला में दो माह से भटक रही एक बेजुबान बाघिन को पीट-पीटकर मार डाला था जबकि वह वह जाल में फंस गई थी. फिर भी  जाल में फंसी बाघिन को वन विभाग के अधिकारियों और पुलिस कर्मियों  के सामने ही &lt;i&gt;मौत के घाट&lt;/i&gt; उतार दिया गया.  मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राजनांदगांव में भीड द्वारा बाघिन को मारे जाने की घटना के बुधवार को जांच के आदेश दिए थे. इस घटना के बाद नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) की ओर से गठित हाई पॉवर कमेटी ने जो रिपोर्ट दी उसमे साफ़ संकेत हैं कि बाघिन की मौत के लिए महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के वन विभाग को संयुक्त रूप से जिम्मेदार रहे हैं. घटना के बाद सामने आया कि गोंदिया मंडल ने बाघिन को घायल होने के बाद दो महीने तक पिंजरे में रखकर इलाज किया। उसके बाद रिसर्च रिपोर्टो और खुद एनटीसीए की गाइडलाइंस को दरकिनार कर बाघिन को एकदम नए इलाके के खुले जंगल में छोड़ा गया। राजनांदगांव वन मंडल ने बाघिन को जिंदा पकड़ने के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं किए।  वन मुख्यालय  के अफसरों ने सही समय पर उचित निर्देश नहीं दिए.एनटीसीए के असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल संजय पाठक के नेतृत्व में बनी जांच कमेटी ने जांच की. जांच  में महाराष्ट्र वन मंडल के एक अधिकारी, पीसीएफ टीआर टाम्टा और डब्लडब्लूएफ की प्रतिनिधि नेहा सेमुअल भाग लिय़ा था.&lt;br /&gt;जिस बाघिन को लोगों ने मारा उसे लेकर बयान हैं  कि यह बाघिन  एक माह से क्षेत्र में दहशत बन आ गई थी मगर वह ऐसी क्यों  थी ? निरंतर कम हो  रहे वन्य जीव प्रागैतिहासिक आवासों की कमी ही दूनिया भर में मुख्य कारण है.अब कोई "उसके" घर को ही छीन लेगा तो जानवर क्या करेगा? जो जंगल का क़ानून जानते हैं वे जानते हैं कि जंगल में एक ही क़ानून चलता है और वह है जो आपको दुखी करे उसे दुखी करो.इसी लिए दुखी जानवर कभी &lt;i&gt;आदमखोर&lt;/i&gt; हो रहे हैं और कभी आए दिन रायपुर की सीमावर्ती डब्ल्यू आर एस कालोनी में भटकते पाए जा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्य राज्यों में भी बाघ और दीगर पशु दुर्घटनाओं में भी मारे जा रहे  हैं . 30 जुलाई को &lt;i&gt;दुधवा नॅशनल पार्क&lt;/i&gt; के किशनपुर के जंगल  भीरा- मेलानी रोड पर रात में वाहन की टक्कर से  तीन साल की किशोर बाघिन की दर्दनाक मौत हो गयी  थी. इसी तरह 8 जून को  कार्बेट टाइगर रिजर्व के अंतर्गत कालागढ़ रेंज में एक और बाघिन की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गईथी. मतलब साफ़ है वन्य जीव निशाने पर हैं. उनको बचाने की किसी को चिंता है भी तो वह कारगर नहीं हो पा रही है, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ राज्य में केंद्र सरकार की हाथी कारीडोर, हाथी उद्यान योजना , टाइगर रिजर्व योजना अधर में है, तीनों टाइगर रिजर्व में 50 प्रतिशत पड़ रिक्त पड़े हैं और फील्ड अधिकारी के पद भी भर नहीं पाए हैं. &lt;br /&gt; जिस प्रदेश की प्रतिष्ठा ही जंगल से से जुड़ी हो, उस प्रदेश में वन्य जीवों का इस तरह मारा जाना शर्मिंदगी पैदा करता है और अगर यह सवाल है तो चिंता सिर्फ सरकार ही नहीं समाज को भी करनी चाहिए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-58553625882509113?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/58553625882509113/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/11/23.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/58553625882509113'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/58553625882509113'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/11/23.html' title='बचे हैं सिर्फ 23 बाघ'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-sE7cOhG5Nh8/TspdYW7HFDI/AAAAAAAAAac/agGSu_JpdJk/s72-c/bagh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-6847867401266553427</id><published>2011-10-25T23:53:00.000-07:00</published><updated>2011-10-26T00:31:30.802-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>यादों में बाबूजी(7)</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-EuH-4-gvvbg/TqeuI1warNI/AAAAAAAAAZ4/FrNIFoHjAZw/s1600/babuji-001.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="166" width="200" src="http://3.bp.blogspot.com/-EuH-4-gvvbg/TqeuI1warNI/AAAAAAAAAZ4/FrNIFoHjAZw/s200/babuji-001.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;दीपावली&lt;/b&gt; आज भी  मनती है और उस दौर में भी मनती थी जब बिजलीविहीन गाँव में चारों तरफ घुप्प अँधेरे में रोशनी की एक छोटी सी किरण भी पुलकित कर देती  थी. वो सुकून रंगीन आर्क लाईट  झालर से नही आता जो  तब एक मिट्टी  के दीये को देख  कर मिलता था.. &lt;br /&gt;&lt;i&gt;दीपावली&lt;/i&gt; घर भर में धूमधाम से मनाई जाती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी  हमेशा इस किस्म के पटाखे लाते कि उनसे ज्यादा शोर ना हो. फुलझड़ियाँ.. जमीन चकरी.. अनार दाना .. और  लक्ष्मी दन्नाका .. &lt;i&gt; दीपावली&lt;/i&gt; से  हफ्ते भर पहले माहौल बनाने के लिए बच्चों को टिकली पटाखे बांट दिए जाते. प्लास्टिक की बंदूकें  तब पैदा नही हुई थी, बच्चे पत्थरों के टुकड़े से टिकली फोड़ते. पैरों के अंगूठे से टिकली को चटाक कर दिया जाता. भले ही पाँव में बारूद  जल जाए उस वक्त मुस्कुराते हुए योद्धा बताते कि देखो हम कितने शूरवीर हैं. रात में सोते समय सबको याद आता.. कहाँ जल गया है ..कहाँ कट गया है.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;दीपावली&lt;/i&gt; पर "छूई मिट्टी" की खुशबू  से घर गमकता रहता. गाँव में टाईल्स मार्बल्स और स्थाई नकली फर्श नही होते थी... मिट्टी से घर लीप दिया जाता ... ..चूना पोता जाता और छूई खास जगहों पर नजर आती.. जगमग और नया-नया सा चारों और रहता.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीताफल .. अमरुद..  मूगफली.. और शकरकंद की फसल उफान पर होती और &lt;i&gt;दीपावली&lt;/i&gt; पर इनका ख़ास पूजन होता.. पूरा मौसम इन्ही चीजों के नाम रहता.  सर्दी  लग जाती नाक बहती जाती मगर इनको खाना नही छूटता.. &lt;br /&gt;दीपावली पर बाबूजी ख़ास गांधी टोपी पहन कर पूजा करते. उन्होंने एक  विशेष आकृति को चमकीले कागज़ पर उकेरा जिसमे कुलदेवी समेत हनुमानजी  की भी फोटो है. उसी को पूजा जाता है. फोटो फ्रेमिंग को हर साल नया किया जाता है ..रंग-रोगन  करके.. &lt;br /&gt;&lt;i&gt;बाबूजी&lt;/i&gt; के पूजा घर में इतनी सारी तस्वीरें थी कि हाथ जोड़ते-जोड़ते खीज होने लगती और जब उनसे पूछता तो वे कह  देते  आराध्य एक होना चाहिए.. और मन से पूजा होनी चाहिए.. मैं  इस दौरान एक अभ्यास करता ..आंख मूँद कर एक एक फोटो का स्मरण करता और नाम याद करता जाता..  स्मृति  का अभ्यास होता.. &lt;i&gt;बाबूजी&lt;/i&gt; कर्मकांड की बजाय सुमिरन में तल्लीन नजर आते.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तराशी हुई लकड़ी के एक  बड़े पाटे  पर लाल कपड़ा  बिछा  कर सारी पूजन सामग्री सजा दी जाती और अगले  दिन अलसुबह&lt;i&gt; बाई&lt;/i&gt;  गोवर्धन पूजा करती . फिर सुबह उन पारंपरिक मिठाईयों से भरे कनस्तर खोल दिए जाते जिनको पूजा तक छूने  की भी मनाही होती..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम के पत्तों के तोरण घर के आंगन में झूलते और रंगीन  कागजों की झंडियाँ बता देती कि यह खास त्यौहार साल में एक बार आता है.. रंगोलियाँ बनाते हुए कोई आकृति गड़बड़ हो जाती तो बाबूजी दुरुस्त कर देते..&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-TGCARVSk-wg/TqeygOxSgmI/AAAAAAAAAaE/8QRVRDBmuUY/s1600/images.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="139" width="186" src="http://4.bp.blogspot.com/-TGCARVSk-wg/TqeygOxSgmI/AAAAAAAAAaE/8QRVRDBmuUY/s320/images.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आसमान के बजाय  बाहर खड़ी बैल  गाड़ियों की  तरफ  राकेट छोड़ना ...किसी  के घर में जलाने के लिए पड़े कचरे के ढेर में चुपचाप एक पटाखा घुसा देना ...  पुराने कनस्तर में बम फोड़ना और कुत्ते की पूछ में पटाखा बांध कर गाँव भर में उसे दौड़ाने के दृश्य उस मदमस्त सांडनुमा दौर की यादों की फुलझड़ियाँ से बावस्ता हैं और इन सबके बीच मंद-मंद मुस्कराते  हुए &lt;i&gt;बाबूजी&lt;/i&gt;..जो एक दिन आंख बचा  कर  देख कर भी अनदेखा करते से लगते सब मस्ती की छूट मानो दे देते थे...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-6847867401266553427?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/6847867401266553427/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/10/7.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/6847867401266553427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/6847867401266553427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/10/7.html' title='यादों में बाबूजी(7)'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-EuH-4-gvvbg/TqeuI1warNI/AAAAAAAAAZ4/FrNIFoHjAZw/s72-c/babuji-001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-7501997497756129680</id><published>2011-09-25T07:55:00.000-07:00</published><updated>2011-09-29T02:58:06.330-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><title type='text'>लता मंगेशकर और अशक्त बच्चे</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-uGDKQ3X3RbM/Tn9AcJ9FDrI/AAAAAAAAAZY/pqBqkHrRT44/s1600/d120471490-large.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="257" width="400" src="http://3.bp.blogspot.com/-uGDKQ3X3RbM/Tn9AcJ9FDrI/AAAAAAAAAZY/pqBqkHrRT44/s400/d120471490-large.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;गीतों &lt;/b&gt;की कोई महफ़िल सजी हो तो अमूमन मै उसमे जरूर समय पर जा धमकता हू. पुराने गीत अपनी तरफ खींचते हैं और यह आज तक समझ नही आया कि जितनी बार भी सुना जाए मन नही भरता और फिर फिर सुन कर भी बोरियत नही लगती.  मौक़ा था सुरों की साम्राज्ञी लता मंगेशकरजी के ८२वें &lt;i&gt;जन्मदिवस&lt;/i&gt; के मौके पर उनको भावभीने गीतों में जरिये याद करके उस सुहाने पुराने दौर में लौटने का जिसकी सुरमयी शाम बाकायदा सजी और श्रोताओं में बड़े-बड़े लोग गीतों की फुहारों से तृप्त होते रहे। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-EU4uLhexnoc/Tn9Eki8OHII/AAAAAAAAAZg/r3FBv7jJzqk/s1600/lata-mangeshkar-stills04.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="177" width="200" src="http://2.bp.blogspot.com/-EU4uLhexnoc/Tn9Eki8OHII/AAAAAAAAAZg/r3FBv7jJzqk/s200/lata-mangeshkar-stills04.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;शहीद सभागार रायपुर में लताजी के नगमों की गीतों भरी वो शाम एक अनूठे अंदाज में मनी जिसे हम किसी से कम नही समझे जाने वाले अशक्त बच्चों ने अपने सुरों के जरिये एक यादगार शाम बना दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कार्यक्रम का आयोजन&lt;i&gt; नेचर्स केयर एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी&lt;/i&gt; ने किया जिसमे विशेष अतिथि श्रीमती वीणा सिंह, महापौर किरणमयी नायक, सभापति संजय श्रीवास्तव, संस्कृति विभाग के संचालक नरेन्द्र शुक्ल इत्यादि न सिर्फ शरीक हुए बल्कि बच्चों का हौसला बढ़ाने देर तक जमे रहे. सफल सरस संचालन सुश्री गांगुली ने किया. संयोजिका &lt;i&gt;डा. विनीता पाण्डेय &lt;/i&gt;की मेहनत रंग लाई जिनकी एक पंक्ति ने श्रीताओं की खूब सराहना पाई, उनका कहना था की उन्हें निशक्त शब्द बहुत चुभता है और ये बच्चे कहीं से भी अशक्त नही हैं . बस जरुरत है उनको प्रोत्साहन की, आगे बढाने की. &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-1n6EPzpbf54/ToQ_r8UrBhI/AAAAAAAAAZw/pR5fMDCqt9A/s1600/DSC_3260.JPG" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="266" width="400" src="http://1.bp.blogspot.com/-1n6EPzpbf54/ToQ_r8UrBhI/AAAAAAAAAZw/pR5fMDCqt9A/s400/DSC_3260.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कई दिन रिहर्सल करके सबको मंच के मुकाबले के लिए तैयार करने में घर वालों, साजिंदे और आयोजक सबने अथक मेहनत की . इन बच्चों ने नृत्य और गीत की अभिनव प्रस्तुति दी।&lt;br /&gt;ब्लाइंड स्कूल की तेजल ने&lt;i&gt; फूलों का तारों का सबका कहना है&lt;/i&gt;...गाया तो सब की आंखें नम हो आईं. ऐसे और कई कलाकार मंच पर आकर माईक सम्हाले जब सधी हुई आवाज में गीत गाते तो अंत में तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गूंज उठता.  &lt;br /&gt;अनेक कार्यक्रमों में शरीक हो कर नाम कमा चुकी चार वर्षीय नन्ही पलक तिवारी ने सजीव नृत्य किया और प्रज्ञा श्रीवास्तव ने बंइया न धरो...पर अनूठी प्रस्तुति दी।  सारिका के गीत&lt;i&gt; रात का समां&lt;/i&gt; ने सचमुच समां बांध दिया  . दसवीं की छात्रा मेघा पिल्लई गीत और डांस दोनों में सटीक रहीं ।   सारिका व जितेन्द्र मिश्रा ने परदेसिया ये सच है पिया... और सारिका व मनोज अग्रवाल ने &lt;i&gt;हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से&lt;/i&gt;... पेश किया। सरिता ने नैनो में बदरा छाए गाया और अर्पणा ने आजकल &lt;i&gt;पॉंव जमीन पर नहीं पड़&lt;/i&gt;ते...गीत पेश किया और खूब दाद पाई । अनोखी प्रतिभा के धनी &lt;i&gt;डा. गौतम देवनानी &lt;/i&gt; जब  मंच  पर आए और सुरीली तान छेड़ी तो सभी हकबक  रह  गए. डा. देवनानी को  महारत हासिल है कि  वे लता की हूबहू नक़ल  कर लेते हैं . उद्घोषिका ने परिचय दिया तो यकीन नही हुआ मगर जब जब उन्होंने दो रास्ते फिल्म के गाने की बिंदिया चमकाई  तो सभागार हर्ष ध्वनि से गूंज उठा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;सोलह बरस की बाली उम्र को सलाम &lt;/i&gt;वाला दिलकश आवाज में पेश हुआ गाना जब ख़त्म हुआ तो राज छबिगृह के पुराने मैनेजर जोशीजी भावुक हो गए .मंच के समीप आ कर उन्होंने गायिका के पांव छू कर अनूठी दाद दी. गीत ने रस घोला था,&lt;i&gt; एक दूजे के लिए&lt;/i&gt; फिल्म उनके थिएटर में लगी थी और कई दिनों तक चली थी. &lt;br /&gt;डा विनीता के इस प्रयास पर उनके साथ कार्यक्रम को सफलता के मुकाम तक लाने में जुटे &lt;i&gt;अशोक मिश्रा&lt;/i&gt; ने कहा कि वे लगातार अकेले डटी रहीं और सारा बीड़ा अकेले उठाया है. कार्यक्रम में जाने की एक और ललक उस निमंत्रण ने पैदा की जिसने मुझे अभिभूत किया और मै अंत तक जमा रहा जबकि अधिकांश लोग जा चुके थे. वजह बने वे बच्चे जिनको कुदरत ने पूरी तवज्जो नही दी लिहाजा उनमे कोई ना कोई कमी रह गयी, ऐसे बच्चे जब कुछ करते हैं तो उनको प्रोत्साहन स्वरुप ही कार्यक्रम में जाना चाहिए और हौसला-आफजाई करनी चाहिए यह तो मूल भावना थी जिसके चलते मैं गया मगर असलियत यह है कि मै ऐसे कार्यक्रम में कई बार जब बिन बुलाए पहुच जाता हू तो किसी पीछे की सीट पर जम जाता हूं , चाहता हूं कि मुझे कोई ना पहचाने, डिस्टर्ब ना करे. शायद इसकी वजह यह हो सकती है कि मै पपी-एज के शुरुआती दौर का असफल कलाकार तो रहा ही हूं मगर कला से श्रोता वाला नाता अब भी इस रूप में है कि कई बार चिर परिचित गीत-संगीत की लय मेरे सारे दुःख-दर्द भुला कर मुझे नई ऊर्जा से लबरेज भी कर देती है जो मुझे बिन मांगी सलाह देते हुए लगता है यह युक्ति तनाव-नाशी गोली खाने वालों को भी एक बार तो आजमानी चाहिए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-7501997497756129680?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/7501997497756129680/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/09/blog-post_25.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/7501997497756129680'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/7501997497756129680'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/09/blog-post_25.html' title='लता मंगेशकर और अशक्त बच्चे'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-uGDKQ3X3RbM/Tn9AcJ9FDrI/AAAAAAAAAZY/pqBqkHrRT44/s72-c/d120471490-large.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-2530318024447851787</id><published>2011-09-18T23:39:00.000-07:00</published><updated>2011-09-19T05:00:33.140-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><title type='text'>हिंदी की अविरल धारा</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-l5HBb26PlhI/Tnbi0CjRfYI/AAAAAAAAAY4/sibudRmW7iM/s1600/Pustak%2BLokarpan-1.JPG" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="181" width="400" src="http://2.bp.blogspot.com/-l5HBb26PlhI/Tnbi0CjRfYI/AAAAAAAAAY4/sibudRmW7iM/s400/Pustak%2BLokarpan-1.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;बालकोनगर &lt;/b&gt;में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी &lt;i&gt;हिंदी दिवस&lt;/i&gt; पर साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अविरल धारा बहती रही. भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) प्रबंधन द्वारा आयोजित हिंदी सप्ताह-2011 के अंतर्गत मुख्य कार्यक्रम बालकोनगर के सेक्टर-1 स्थित प्रगति भवन में धूमधाम से मना । &lt;br /&gt;वक्ताओं ने हिंदी भाषा की परंपरा, उसके मजबूत पक्षों तथा भाषा विकास में आने वाली बाधाओं के विषय में विस्तार से चर्चा की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दैनिक नई दुनिया, रायपुर के संपादक &lt;i&gt;रवि भोई&lt;/i&gt;, कार्यक्रम अध्यक्ष छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार&lt;i&gt; रमेश नैयर&lt;/i&gt;, विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार &lt;i&gt;गिरीश पंकज&lt;/i&gt;, बालको के मानव संसाधन प्रमुख &lt;i&gt;अमित जोशी&lt;/i&gt; तथा बालको के प्रशासन महाप्रबंधक &lt;i&gt;के.एन. बर्नवाल&lt;/i&gt; सहित अन्य विशिष्ट जनों की उपस्थिति में हिंदी सप्ताह के दौरान आयोजित काव्य-पाठ, निबंध-लेखन और भाषण स्पर्धा के विजेता छात्र-छात्राओं को &lt;i&gt;पुरस्कार&lt;/i&gt; दिए गए । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री नैयर ने कहा कि मातृ भाषा हमारी सांसों में बसती है। हम अपने सपने भी हिंदी भाषा में ही देखते हैं। प्रेम की भाषा हिंदी है। हमें अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए। &lt;br /&gt;श्री भोई ने कहा कि हिंदी को आगे ले जाने के लिए स्कूलों और घरों में बच्चों से शुरूआत करनी होगी। हिंदी भाषा संबंधी भेदभाव को समाप्त करना होगा।&lt;br /&gt;श्री पंकज ने कहा कि हिंदी भाषा गैर हिंदी भाषियों के हाथों में अधिक सुरक्षित है। उन्होंने गांधी जी के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चा सुराज हिंदी के रास्ते ही आ सकता है।  &lt;br /&gt;श्री जोशी और श्री बर्नवाल का जोर था की कि हमें निश्चित ही अंग्रेजी और अन्य भाषाएं सीखनी चाहिए परंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि इससे राष्ट्रभाषा को नुकसान न हो। &lt;br /&gt;6वीं से 8वीं कक्षा वर्ग के लिए आयोजित काव्य पाठ स्पर्धा में अंकुश पांडेय को प्रथम, अंशु विश्वकर्मा को द्वितीय और प्रभात कुमार जांगड़े को तृतीय पुरस्कार मिला। आयुश धर द्विवेदी और अम्बरीश पांडेय को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए आयोजित भाषण प्रतियोगिता में संजना साहू को पहला पुरस्कार मिला। श्वेता तिवारी को दूसरा और प्रिया त्रिवेदी को तीसरा पुरस्कार मिला। गौतम सिदार और रंजन कुमार सिंह को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए आयोजित निबंध लेखन में रंजन, कुमार सिंह, शशांक दुबे और अविनाश तिवारी क्रमशरू पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। शुभम यादव और दिशा चंद्रा को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। निबंध लेखन के 11वीं से 12वीं कक्षा वर्ग में श्रद्धा कुंभकार को पहला, किरण गोस्वामी को दूसरा और रेणुका कंवर को तीसरा पुरस्कार दिया गया। प्रिया त्रिवेदी और आयशा खातून को सांत्वना पुरस्कार मिला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतिथियों ने बालको आयोजित हिंदी सप्ताह की सराहना करते हुए स्पर्धा के प्रतिभागियों की हौसला अफजाई की।&lt;br /&gt;बालको के कंपनी संवाद महाप्रबंधक बी.के. श्रीवास्तव ने स्वागत उद्बोधन में बताया कि छत्तीसगढ़ सरस्वती साहित्य समिति के सचिव   महावीर प्रसाद चंद्रा ‘दीन’ द्वारा शेक्सपीयर के नाटक ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’ के छत्तीसगढ़ी भावानुवाद ‘मया के रंग’, समिति के कोषाध्यक्ष  रविंद्रनाथ सरकार रचित काव्य संग्रह ‘सुबह का सूरज’, समिति के पदाधिकारी लोकनाथ साहू रचित नाट्य संकलन ‘रंगविहार’ और समिति के पूर्व अध्यक्ष प्रमोद आदित्य  रचित काव्य संग्रह ‘अगोरा’ का प्रकाशन बालको के सौजन्य से हुआ है. &lt;br /&gt;देवी सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरूआत हुई जिसमे विभिन्न साहित्यिक संगठनों के पदाधिकारी, कोरबा के अनेक साहित्यकार, बालकोनगर के विभिन्न स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाएं, बड़ी संख्या में विद्यार्थी और बालको महिला मंडल की अनेक पदाधिकारी मौजूद थीं। कार्यक्रम का संचालन छत्तीसगढ़ सरस्वती साहित्य समिति के अध्यक्ष शुकदेव पटनायक ने किया। सचिव महावीर प्रसाद चंद्रा ने आभार जताया।  इस अवसर पर राष्ट्रीय धर्म ऊर्जा के संपादक  विकास जोशी और दैनिक नई, दुनिया के सह-संपादक  सुनील गुप्ता भी मौजूद थे।&lt;br /&gt;कार्यक्रम में अगले दिन काव्य गोष्ठी का आयोजन स्मरणीय रहा|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-2530318024447851787?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/2530318024447851787/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/09/blog-post_18.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/2530318024447851787'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/2530318024447851787'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/09/blog-post_18.html' title='हिंदी की अविरल धारा'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-l5HBb26PlhI/Tnbi0CjRfYI/AAAAAAAAAY4/sibudRmW7iM/s72-c/Pustak%2BLokarpan-1.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-28146751949837887</id><published>2011-09-18T07:28:00.000-07:00</published><updated>2011-09-20T15:28:31.359-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>आलोकजी की याद में</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-TBq7i-bj8Jk/TnctneV3d4I/AAAAAAAAAZI/V-awUrRjAy8/s1600/alokji.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="200" width="200" src="http://2.bp.blogspot.com/-TBq7i-bj8Jk/TnctneV3d4I/AAAAAAAAAZI/V-awUrRjAy8/s400/alokji.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;मेरे&lt;/b&gt; दिवंगत बड़े भ्राता-तुल्य एक समूची पीढी के आइडियल बन चुके जंगजू पत्रकार &lt;b&gt;आलोक तोमरजी&lt;/b&gt; के बारे में अब कुछ भी कहने-लिखने में जो तकलीफ होती रही है उसका बयान भी पीड़ा देता है. इसी साल 20 मार्च को उनके देहावसान के अकस्मात् घावों को भरने में समय लगेगा, यादें ही संबल बनेंगी. यादों के समंदर उफनते व बिछोह की हिलोरें जगाते है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके बारे में आइसना के महासचिव &lt;i&gt;विनय डेविड &lt;/i&gt;ने जो मेल भेजा है वह सराहनीय है. स्वागत योग्य है. संगठन के प्रांतीय अध्यक्ष अवधेश भार्गव ने आलोक तोमर की स्मृति में हर साल एक चयनित जांबाज पत्रकार को &lt;i&gt;पच्चीस हजार रुपये&lt;/i&gt; का पुरस्कार देने की घोषणा की है. यह घोषणा&lt;i&gt; भोपाल&lt;/i&gt; में की गयी जहां आलोकजी की पत्नी &lt;i&gt;सुप्रिया रॉय&lt;/i&gt; को आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ने सम्मानित किया.&lt;br /&gt;एक धूमकेतू की तरह हिन्दी बैल्ट पर छा जाने वाले पत्रकार आलोकजी ने अर्श से फर्श तक का सफ़र तय किया और वे गर्दिशों के दौर में भी वे कभी विचलित नही हुए. वे एक जंगजू की तरह पत्रकारिता की जद्दोजहद में जमे और डट कर चुनौतियों से लड़े.  लेखक के रूप में आलोकजी एक रोल माडल बन बीमारी के दिनों में भी कीमोथेरेपी कराते हुए भी लिखते . खरा लिखते . तथ्यों के साथ लिखते और आख़िरी के दिनों में उन्होंने बड़े-बड़ों  को उधेड़ डाला. सच बोलने के खतरे जिए . कार्टून विवाद में जेल भी गए मगर तन कर खड़े  रहे . उनमें जोखिम लेने का जज्बा था. किसी ने लिखा अगर खबर है तो है ,चाहे वो बरखा दत्त हों वीर संघवी हों या उनके अभिन्न मित्र ओमपुरी हों या फिर कोई और. अगर खबर का वो हिस्सा हैं तो आप आलोक जी से पास-ओवर की उम्मीद बिलकुल न करें. वे छाप देते थे डंके की चोट पर. इस दौर में जहां पत्रकारिता की दुनिया बाजारु हो चुकी है, उस दौर में आलोक तोमरजी ने गंभीर सरोकारों वाली  पत्रकारिता  की. पत्रकारिता को लेकर उनके  बारे में उनके शब्दों में ही कहूँ तो दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए  और उन्होंने  भारत में कश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया . दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए . झुकना तो सीखा ही नही. वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले और सीधी-सपाट बात की जिसे सरेआम छापा. जब उनको एक कार्टून मामले में जेल जाना पड़ा तो साफ़ कहा एक सवाल है आप सब से और अपने आप से। जिस देश में एक अफसर की सनक अभिवक्ति की आजादी पर भी भरी पड़ जाए, जिस मामले में रपट लिखवाने वाले से ले कर सारे गवाह पुलिस वाले हों, जिसकी पड़ताल, 17 जांच अधिकारी करें और फिर भी चार्ज शीट आने में सालों लग जायें, जिसमें एक भी नया सबूत नहीं हो-सिवा एक छपी हुई पत्रिका के-ऐसे मामले में जब एक साथी पूरी व्यवस्था से निरस्त्र या ज्यादा से ज्यादा काठ की तलवारों के साथ लड़ता है तो आप सिर्फ़ तमाशा क्यों देखते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;समर शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध &lt;br /&gt;जो तटस्थ है, समय लिखेगा, उनका भी अपराध&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनसत्ता में अपनी मार्मिक खबरों से चर्चा में आये आलोक तोमरजी  ने सिख दंगों से लेकर कालाहांडी की मौत को इस रूप में सामने रखा कि पढ़नेवालों का दिल हिल गया.  कुछ वैसे ही जैसे हर खबर सिर्फ खबर नहीं होती ,कभी कभी ख़बरों को अखबारनवीस जीता भी है उन्हें खाता भी है उन्हें पीता भी है,ख़बरों को जीने वाले ही आलोक तोमर कहलाते हैं.   मौत एक दिन सबको आनी  है. अन्ना हजारे ने भी कहा है की उनको सुरक्षा नही चाहिए क्योंकि हार्ट  अटैक तो कोई नही रोक सकता. आलोक  कैंसर से लड़े ,लड़ते शेर ही हैं ,बाकी आत्मसमर्पण कर देते हैं ,एक ऐसे वक्त में जब  लड़ने की बात  पर है तो सब चाहते हैं इस देश में भगत सिंह पैदा तो हो  मगर पड़ोसी के यहाँ हो. इस दौर में  आलोक जी का ये जज्बा था कि संघर्ष में वे झुके नही, रुके नही., थके नही, लड़े आन बान शान से और मूल्यों के लिए लड़े. कलम की खातिर लड़े. ख़बरों की खतिर लड़े. पूछा जाए उन सिख परिवारों से जिनको न्याय दिलाने के लिए वे लड़े. जिनके खिलाफ एक शब्द भी लिखने से लोग कतराते थे  ,लेकिन आलोक जी ने साहस के साथ उनके बारे में भी लिखा.&lt;br /&gt;आलोक तोमरजी ने सत्रह साल की उम्र में एक छोटे शहर के बड़े अखबार से  जिंदगी शुरू की. दिल्ली में &lt;i&gt;जनसत्ता&lt;/i&gt; में  दिल लगा कर काम किया और अपने संपादक गुरू प्रभाष जोशी के हाथों छह साल में सात पदोन्नतियां पा कर विशेष संवाददाता बन गए। फीचर सेवा शब्दार्थ की स्थापना 1993 में कर दी थी और बाद में इसे समाचार सेवा डेटलाइन इंडिया.कॉम बनाया।&lt;br /&gt;11 मार्च  को उन्होंने लिखा &lt;br /&gt;मै डरता हूं कि मुझे &lt;br /&gt;डर क्यो नहीं  लगता &lt;br /&gt;जैसे कोई कमजोरी है &lt;br /&gt;निरापद होना.. &lt;br /&gt;वे जीवन भर जुझारू रहे.. आइसना (आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन) द्वारा महानतम लेखनी के धनी और हजारों पत्रकारों के प्रेरणा-स्रोत आलोक तोमर की स्मृति में हर साल किसी जांबाज पत्रकार को पच्चीस हजार रुपये का पुरस्कार दिए जाने की घोषणा वंदनीय और अभिनंदनीय है.&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-vs6I87xc3LE/TnkTPABfQ7I/AAAAAAAAAZQ/nGYKAS0TBa8/s1600/aisna%2Baward%2B2011.jpeg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="230" width="320" src="http://3.bp.blogspot.com/-vs6I87xc3LE/TnkTPABfQ7I/AAAAAAAAAZQ/nGYKAS0TBa8/s400/aisna%2Baward%2B2011.jpeg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;संयोजक &lt;i&gt;आलोक मित्र मंच&lt;/i&gt; के डी दयाल और मेरी भी राय में भी दरअसल यह घोषणा तो &lt;i&gt;मध्य प्रदेश &lt;/i&gt;सरकार को करनी चाहिए जिसे नाज होना चाहिए कि आलोकजी वहां जन्मे और देश-दुनिया में मध्य प्रदेश का मान बढ़ाया. एक तरफ हम यह भी देखते हैं, &lt;i&gt;इंदौर प्रेस क्लब&lt;/i&gt; ने भी घोषणा कर दी कि वे लोग हर साल भाषाई महोत्सव में एक यशस्वी पत्रकार को आलोक तोमर की स्मृति में पुरस्कार देंगे ताकि आलोक तोमर के नाम व काम को जिंदा रखा जा सके. इस घोषणा की खबरें भी प्रकाशित हुई मगर आइसना ने कम से कम उनको सच्चे तौर पर याद तो किया है और आशा है&lt;i&gt; आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन&lt;/i&gt; इस वायदे को निभाएगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-28146751949837887?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/28146751949837887/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/09/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/28146751949837887'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/28146751949837887'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='आलोकजी की याद में'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-TBq7i-bj8Jk/TnctneV3d4I/AAAAAAAAAZI/V-awUrRjAy8/s72-c/alokji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-277589905675833538</id><published>2011-08-14T00:10:00.000-07:00</published><updated>2011-08-14T00:10:28.853-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>राष्ट्रीय सहारा के 20 साल</title><content type='html'> &lt;br /&gt; &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-UoPPE1jDJaU/TkdyjA5dyyI/AAAAAAAAAYQ/d8xF1bKxGIU/s1600/images.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="220" width="229" src="http://3.bp.blogspot.com/-UoPPE1jDJaU/TkdyjA5dyyI/AAAAAAAAAYQ/d8xF1bKxGIU/s400/images.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;कल&lt;/b&gt; 15 अगस्त है और देश ने 64 साल पहले अंग्रेजों से आज़ादी की खुली हवा में सांस ली थी, ये याद कर के गर्वित होने का तो दिन है ही एक और खास वजह से मैं इस दिन को याद करूंगा . 20 साल पहले 15 अगस्त को ही दिल्ली में एक कई अख़बारों के बीच एक नए अखबार ने आंखें खोली थी और अपनी नजर से खबरों को देखा ,दिखाया और बीस साल से दिखा रहा है, उसे  खबरों की भीड़ से अलग हट कर पेश  करने का जो अनवरत सिलसिला शुरू किया वो अब एक गौरवशाली परम्परा में ढल चुका है. &lt;br /&gt;&lt;i&gt;राष्ट्रीय सहारा&lt;/i&gt; एक नए अंदाज में शुरू हुआ था और आज बीस साल का जवान अखबार है. नौजवानों के टीम के साथ शुरू हुआ अखबार आज भी तेवर में नौजवानों सरीखा है और अंदाज उमंग जगा कर हर फील्ड में हस्तक्षेप करने वाला जिम्मेदाराना है. बीस साल आंखों के आगे नाचते हैं. कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें हैं और है एक अखबार की ..अखबार के साथ शुरुआत की.&lt;br /&gt;खुशी है  कि मै उस टीम-91 का हिस्सा हूं जिसके समर्पित लोग ही अब अखबार में कायम हैं जिन्होंने एक सपने के साथ कैरियर की शुरुआत के  बेशकीमती ऊर्जा वाले साल अखबार को दिए और नतीजा  है कि अखबार तो इस बीच कई आए-गए, राष्ट्रीय सहारा अपनी जगह बदस्तूर डटा हुआ है,  दमदारी से लिख रहा है, सच कहने की हिम्मत के साथ. &lt;br /&gt;1991 में अखबार के स्लोगन रेडियो पर गूंजते थे..&lt;i&gt; हर  दिन अपना काम करे .. जनहित का रखे ध्यान.. अनुशासन और कर्मठता से है इसकी पहचान .. ये है राष्ट्रीय सहारा ...&lt;/i&gt;और जब&lt;i&gt; राष्ट्रीयता-कर्तव्य-समर्पण&lt;/i&gt; के स्लोगन के साथ अखबार शुरू हुआ तो उस दौर में दिल्ली  में जनसत्ता की पूरी पुरानी टीम बिखरी हुई थी और राजेन्द्र माथुर युग नभाटा में अवसान के कगार पर था . जनसत्ता से मुक्ति पाने में जुटे प्रभाषजी कागद कारे में समर्पित थे और दिल्ली में वे अखबार पनप रहे थे जो सैलून में ही पढ़े जाते हैं या वेलेंटाईन  डे मनाने की परम्परा शुरू कर  रहे थे. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उस दौर में &lt;i&gt;राष्ट्रीय सहारा&lt;/i&gt; दैनिक अखबार ने &lt;i&gt;हस्तक्षेप&lt;/i&gt; किया और पाठकों में नई&lt;i&gt; उमंग&lt;/i&gt; पैदा की. उपेक्षित यमुनापार के दुःख-दर्द उकेरे और बाहरी दिल्ली के बेहाल गांव की तस्वीरें पेश की. दक्षिण दिल्ली महारानी-नई दिल्ली पटरानी बनी दो दिल्ली  का एक पूरा सच सामने किया . रोज़ चार पन्ने रंगीन. उस दौर में रंगीन फोटो सिर्फ सप्ताहांत में अखबार में आती थी जैसे हफ्ते में एक बार टीवी चित्रहार आता था.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उस दौर में मुझे  याद है आदरणीय चेयरमैन सहाराश्री सुब्रत रायजी की मीटिंग में सिर्फ एक बात पर जोर रहता था कि दिन की शुरुआत अच्छे से हो  पाठक को सकारात्मक ख़बरें दी जाएं और सच को सच लिखा जाए. उस मीटिंग में मेरा और साथियों का खून सचमुच बढ़ जाता जब वे कहते थे, चोर को चोर ही लिखिए और डरिये मत. और फिर मीटिंग राष्ट्रगान के साथ समाप्त होती . लौट कर जो धकाधक खबरें लिखी जाती कि पूछिए मत बाई लाइन न्यूज की ढेर कापियां समाचार सम्पादक डा. रवीन्द्र अग्रवाल जांचते थक जाते. टीम के प्रायः कुंवारे रिपोर्टर ख़बरों में इतना डूबे रहते कि देर रात तक कापियां लिखते-काटते-डांट खाते-जूझते- उत्साह के मारे कई बार घर नही जा पाते और दफ्तर में सबका खाना खाना आता मगर जो दूर रहने वाले डीटीसी बसजीवी थे, कई बार जब सारे होटल बंद हो चुके होते तो चाय के निमित्त रखा दूध पी कर अखबार के बण्डल सिराहने रख टेबिल पे सो जाते. टीम को एक स्पिरिट के साथ एक दिशा में गति देना उस दौर की मीटिंग्स में हुआ और यह देख खुशी होती है कि उस दौर में जुड़े कई साथी आज उच्च पद तक जा पहुचे हैं. कुछ बिछड़ भी गए जो मीडिया में आज सफल हैं और धाक जमाए हुए हैं.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-egoNjY1qcoU/Tkd0xaDiKhI/AAAAAAAAAYg/iB9w8XglF2M/s1600/download" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="54" width="144" src="http://1.bp.blogspot.com/-egoNjY1qcoU/Tkd0xaDiKhI/AAAAAAAAAYg/iB9w8XglF2M/s200/download" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;हम किसी भी अखबार की ही नही कोई भी बात करें तो अच्छी और बुरी दोनों बातें कर सकते हैं. पत्रकार चटपटा ना लिखें तो कोई खबर ही ना पढ़े. लाख टके की बात है कि वही खबर बनती है.  मगर मै साफ़ कह दूँ कि &lt;i&gt;राष्ट्रीय सहारा&lt;/i&gt; में  मेरी जिस मिशन भावना जिसके बूते मै पत्रकारिता  में आया , का  पुष्पण-पल्लवन न हुआ होता तो शायद मै 20 साल टिका नही रह सकता था, और सार्वजनिक जीवन को नुकसान पहुँचाने वाला बड़ा सच लिखने पर कोई बंदिश महसूस  नही की यह भी 20 सालों का मेरा अनुभव रहा जिसके कारण मुझे एक निरंतरता मिली वरना सहारा में आने से पहले मै सात नौकरियां बदल चुका था और ज्यादातर में मैंने ही नमस्ते की. &lt;br /&gt;जिस दौर में पूरा प्रिंट मीडिया संकट में हो और अखबार चुड़ैलों का सा खबरीय श्रृंगार कर डरावनी ख़बरें देने में शैतानों को भी मात दे रहे हों उस दौर में एक अखबार&lt;i&gt; हस्तक्षेप&lt;/i&gt; जैसे गंभीर विषय उठा कर पड़ताल करने वाले परिशिष्ट के साथ बीस साल से सतत निकलता रहे यह बहुत बड़ी बात है. &lt;i&gt; राष्ट्रीय सहारा&lt;/i&gt; उसी तेवर के साथ लगातार है, यह संस्थान व अखबारकर्मियों की ही नही पत्रकारिता की भी बड़ी उपलब्धि है. &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-277589905675833538?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/277589905675833538/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/08/20.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/277589905675833538'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/277589905675833538'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/08/20.html' title='राष्ट्रीय सहारा के 20 साल'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-UoPPE1jDJaU/TkdyjA5dyyI/AAAAAAAAAYQ/d8xF1bKxGIU/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-2652001977529657260</id><published>2011-08-06T00:41:00.000-07:00</published><updated>2011-09-30T03:09:17.377-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>46 साल पहले ऐसे बनी थी - कही देबे सन्देश</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Cmgy1rfd5hc/TjznOgRNT-I/AAAAAAAAAYA/xXmgpVVG6KQ/s1600/DSC_0259.JPG" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="200" width="133" src="http://2.bp.blogspot.com/-Cmgy1rfd5hc/TjznOgRNT-I/AAAAAAAAAYA/xXmgpVVG6KQ/s200/DSC_0259.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;'कही देबे संदेस'&lt;/b&gt; (सन्देश कह देना) का नाम तो मैने बचपन से बहुत सुना पर देख नहीं पाया.&lt;br /&gt;अपने-आप में एक मिसाल यादगार - कही देबे संदेस छत्‍तीसगढ़ की पहली फिल्‍म अप्रैल 1965 में रिलीज हुई जिसके निर्माता निर्देशक छत्तीसगढ़िया फिल्मो के भीष्म&lt;i&gt; मनु नायक &lt;/i&gt; उस दौर में सोचते थे कि इस माटी का कर्ज भी कला- संस्कृति के जरिये उतारें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनसे सहज मुलाक़ात हुई और बातचीत में यादों के दरीचे खुलते चले गए और एक संघर्षशील क्षेत्रीय सिनेमाई इतिहास में झांकने जैसा सुखद- कोफ्तप्रद अनुभव हुआ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म &lt;/b&gt;&lt;i&gt;"कहि देबे संदेश"&lt;/i&gt; को बने हुए आज 46 साल पूरे हो चुके है. छत्तीसगढ़ी फिल्में तो बहुत बन रही हैं पर जो बात कहि देबे संदेश जैसी उस दौर की फिल्मों में हुआ करती थी, वो आज कहीं नहीं दिखाई देती। उस फिल्म के मनु नायक से मिलना अतीत के उस दौर को याद करके एक एहसास से गुजरना  रहा है जिस दौर में फिल्मे स्वर्ण काल के स्वप्निल प्रेमिल शीर्ष पर आईं और आज बारह महीने में बारह  तरीके से प्यार जता रही हैं.   &lt;br /&gt;16 अप्रैल 1965 को  फिल्म को तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री&lt;i&gt; इंदिरा गांधी&lt;/i&gt; ने भी देखी थी-कहि देबे संदेस जो एक मील का पत्थर साबित हुई और आज पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले मनु नायक को छत्तीसगढ़ में  के दादा साहब फालके और राज कपूर  सरीखा सम्मान हासिल है। फिल्म  बनते वक्त  कई उतार-चढ़ावों से गुजरी । छूआछूत के खिलाफ प्रेम का संदेश इस फिल्म का मूल कथ्य रहा है जिसकी गूंज दिल्ली  मे भी हुई क्योंकि उस दौर मे एक जकड़े हुए रूढ़िग्रस्त समाज में ये सब वर्जित माना जाता था . विरोधों की वजह से फिल्म का खूब प्रचार हुआ। मिसेज गांधी  ने फिल्म देखी और फिल्म की जम कर तारीफ की.फिल्म टैक्स फ्री हो गयी मगर  बॉक्स  आफिस का गणित मनुजी हल नही कर सके. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म में बतौर नायक कान मोहन लिए गए जो पहली सिंधी फिल्म अबाना के नायक थे।  कान मोहन ने बखूबी छत्तीसगढ़ी संवाद रटे ।  हीरोइन उमा थीं जो राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म दोस्ती में आईं थीं। एक अन्य नायिका सुरेखा ख्वाजा अहमद अब्बास की हिट फिल्म शहर और सपना की हीरोइन थीं। &lt;br /&gt;ख़ास यह है कि फिल्म में आला दर्जे के गायक  मोहम्मद रफी, महेंद्र कपूर, सुमन कल्याणपुर व मीनू पुरुषोत्तम ने स्वर दिए।   रफी साहब ने दो गाने "झमकत नदिया हिनी लागे परबत मोर मितान" (मितान मायने दोस्त) तथा तोर पैरी (पायल)के झनर-झनर.. तोर चूरी(चूड़ी) के खनर-खनर ..और&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूल गीत &lt;i&gt;..दुनिया के मन आघू बढ़गे&lt;br /&gt;चन्दा तक माँ जाए रे &lt;br /&gt;कही देबे सन्देश सबो ला &lt;br /&gt;कौनो नई पछुवाए रे ..   &lt;/i&gt;       &lt;br /&gt;आकाशवाणी की मेहरबानी से आज भी बजते है।  फिल्म में प्रमुख रोल में रमाकांत बख्शी भी थे.संगीतकार मलय चक्रवर्ती और गीतकार – डा.एस.हनुमंत नायडू थे.  मुंबई  में गीत रिकार्ड करवाए गए. दीगर कलाकारों में सुरेखा पारकर, उमा राजु, कानमोहन, कपिल कुमार, दुलारी, वीना, पाशा, सविता, सतीश, टिनटिन और साथ में नई खोज कमला, रसिकराज, विष्णुदत्त वर्मा, फरिश्ता, गोवर्धन, सोहनलाल, आरके शुक्ल, बेबी कुमुद,अरूण, कृष्णकुमार,बेबी केसरी भी थे. &lt;br /&gt;फिल्म का टाईटल इस प्रकार था. संकलन – मधु अड़सुले, सहायक – प्रेमसिंग,वेशभूषा – जग्गू, रंगभूषा – बाबू गणपत, सहायक – किशन,&lt;br /&gt;स्थिर चित्रण – आरवी गाड़ेकर, श्री गुरूदेव स्टूडियो.छाया अंकन – के.रमाकांत, सहायक – बी.के.कदम रसायन क्रिया – बाम्बे फिल्म लेबोरेटरीज प्रा.लिमिटेड, दादर प्रोसेसिंग इंचार्ज – रामसिंग प्रचार सामग्री व परिचय लेखन – काठोटे, भारती चित्र मंदिर रायपुर निर्माण व्यवस्था – बृजमोहन पुरी प्रचार अधिकारी – रमण नृत्य – सतीशचंद्र ध्वनि आलेखन – त्रिवेदी साऊंड सर्विस गीत आलेखन – कौशिक व बीएन शर्मा पार्श्वगायन – मोहम्मद रफी, मन्ना डे, महेंद्र कपूर, मुबारक बेगम,मीनू पुरूषोत्तम, सुमन कल्यानपुर गीत – राजदीप संगीत – मलय चक्रवर्ती, सहायक – प्रभाकर सह निर्देशक – बाल शराफ और लेखक, निर्माता, निर्देशक – मनु नायक.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीतकार &lt;i&gt;डॉ.एस.हनुमंत नायडू राजदीप &lt;/i&gt;की पंक्तियां थी -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘भिलाई तुंहर काशी हे &lt;br /&gt;ऐला जांगर के गंगाजल दौ, &lt;br /&gt;ऐ भारत के नवा सुरूज हे &lt;br /&gt;इन ला जुर मिल के बल दौ, &lt;br /&gt;तुंहर पसीना गिरै फाग मा&lt;br /&gt;नवा फूल मुस्काए रे’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरू मे फ़िल्म मे सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद रचित महाकाव्य&lt;i&gt; ‘कामायनी’&lt;/i&gt; की पंक्ति निर्माता-निर्देशक मनु नायक की आवाज में गूंजती है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;इस पथ का उद्देश्य नहीं है&lt;br /&gt;श्रांत भवन में टिक रहना,&lt;br /&gt;किंतु पहुंचना उस सीमा तक&lt;br /&gt;जिसके आगे राह नहीं है &lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवा (1.25) लाख रुपए मे पूरी फ़िल्म बन गई और 27 दिन में इस का  निर्माण पूरा हो गया. 16 अप्रैल 1965 को इसे प्रदर्शित किया गया. आजकल सालों-साल फिल्मे बनती हैं मगर इस फिल्म की  शूटिंग सिर्फ 22 दिन पलारी में की गयी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुजी निर्माता महेश कौल के सहायक रहे है. वे उनको आज भी  गुरू मानते  है.   &lt;br /&gt;सपनों का सौदागर गोपीनाथ, हम कहां जा रहे हैं, मुक्ति, दीवाना, प्यार की प्यास,  तलाक और पालकी जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाले कश्मीरी मूल के फिल्मकार महेश कौल का रायपुर से भी नाता था।  महेश कौल  को जब फिल्म का पता चला तो  उनका कहना था कि क्षेत्रीय फिल्मों का मार्केट छोटा है इसकी लागत भी नहीं निकलेगी मगर नायक ज़िद पर थे, उन्होंने फिल्म ही नहीं बनाई वरन् उसके माध्यम से छत्तीसगढ़ के लोगों को एक संदेश भी दिया था।  पटकथा लेखक पं.मुखराम शर्मा के साथ व्यवसायिक साझेदारी में अनुपम चित्र  में मुलाजिम भी थे  मनु नायक। काम था  प्रोडक्शन से लेकर अकाउंट तक सम्हालना . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल 62 मे पहली भोजपुरी फिल्म &lt;i&gt;‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’&lt;/i&gt; की रिकार्ड तोड़ सफलता ने मनु नायक को भी प्रेरित किया कि वे भी  छत्तीसगढ़ी में फिल्म  बनाएं.   एक राममूर्ति चतुर्वेदी भी वहां थे . एक दिन सब जश्न मना रहे थे. उनसे पूछा तो पता चला कि गंगा मैया .. सुपर हिट हो गयी है. अब रीजनल फिल्म का सबको बुखार चढ़ गया. ताव में आ कर मनुजी ने अनाउंस कर दिया कि वे भी फिल्म बना रहे हैं. यह खबर सब फ़िल्मी अखबारों में लगी और टाईम्स आफ इंडिया में भी छप गयी. कई दिन उहापोह में बीते. सवाल था फाईनेंस का . जो ब्रोकर लोग अनुपम को फिनांस करते थे उन्होंने मनुजी की ईमानदारी देखी थी, उनको  5000 रूपये बिना ब्याज पेशगी दे दिए . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न कोई कहानी थी न कोई टीम, बस एक धुन थी जो रातों में पीछा करती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;सलीम &lt;/i&gt;(सलमान खान के पिता ) भी तब मुम्बई में जमने की कोशिश में थे, उनसे बात हुई बाकायदा उनको हीरो ले कर 501 रूपये साईनिंग अमाउंट दे दिए गए. बाद में फिल्म डिले हुई तो सलीम किसी और शूटिंग में रम गए वरना वे कही देबे के हीरो बनते. साईनिंग अमाउंट लौटाने का तो सवाल ही नही था. उनने कहा कि पैसे आएंगे तो लौटा दूंगा. अन्य कलाकारों में सुरेखा के पिता ने संपर्क किया. उनको भी 501 दे कर साईन कर लिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैफ़ी आजमी से स्क्रिप्ट की बात तो हुई . फारुखी साब एक थे उनकी मदद मिली. मगर बात नही बनी, उनको दिलचस्पी ही नही थी. उनका घर भी दूर था.  कई लेखकों के चक्कर लगे. गाना लिखवाने बिलासपुर आना हुआ. खुद एक पटकथा लिखी. हनुमंत नायडू साथ थे यहां. द्वारका प्रसाद तिवारी का नाम तय हुआ और विमल कुमार पाठक का, गीत के लिए मगर बात जम नही पाई.  ये बात है सन 62 की। तब लाईट भी नही हुआ करती थी. फिल्म बनेगी इसे ले कर कई मोर्चों पर संशय थे, गीत लिखने पर गफलत भी हुई क्योंकि फिल्म में सिचुएशन पर गीत लिखे जाते हैं और एक लेखकजी ने कह दिया -" देख बाबू &lt;br /&gt;मोर मूड जोन डाहर ले जाथे तो मंय लिखथों . &lt;br /&gt;अइसे में कभो नई कर पाओं ",   &lt;br /&gt;फिर बैरंग रायपुर लौट कर नायडूजी  से बात हुई और तय हुआ वे गीत लिखें, कोई संपादन हुआ तो मैं करूंगा, उस दौर में लिखा गया -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;परबत मोर मितान हवे &lt;br /&gt;मय बेटा हों ये धरती के....&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्गीय बसंत दीवान और परमार (?) का भी पूरा सहयोग मिला. &lt;br /&gt;फिल्म शुरू हुई आख़िरकार . रायपुर में खपरा भट्ठी के पास रामाधार चंद्रवंशी के निवास पर  अपनी पूरी टीम को ठहराया और टहलते हुए बस स्टैंड की तरफ निकले  जहां  मुलाक़ात पलारी से तत्कालीन कांग्रेस विधायक स्वर्गीय&lt;i&gt; बृजलाल वर्मा&lt;/i&gt; से हो गई। चूंकि उन दिनों  मनु नायक और उनकी पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म के बारे में काफी कुछ छप रहा था लिहाजा वर्मा ने पैदल चले जा रहे मनु नायक को रोका और हालचाल पूछा। जब  नायक ने अपनी दुविधा बताई तो उन्होंने तुरंत सारी व्यवस्था करने एक चिट्ठी अपने भाई तिलक दाऊ के नाम लिख दी। बातों-बातों में श्री वर्मा ने  एक प्रस्ताव भी रख दिया कि पूरी फिल्म की शूटिंग पलारी में होगी और यह सुविधा भी दे दी कि महिलाओं के लिए उनके घर के पुश्तैनी गहने इस्तेमाल किए जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुहूर्त शॉट रायपुर के विवेकानंद आश्रम में लिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फिल्म में मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, मीनू पुरूषोत्तम और महेंद्र कपूर ने भी गाने गाए लेकिन जब रफी साहब ने बेहद मामूली रकम लेकर मेरी हौसला अफज़ाई की तो उनकी इज्जत करते हुए इन दूसरे सारे कलाकारों ने भी उसी अनुपात में अपनी फीस घटा दी।  &lt;br /&gt;सीमित खर्च में फिल्म पूरी करना  बेहद कठिन था। पाकिस्तान के साथ युद्ध की वजह से आपातकाल  के चल्ते  कच्ची फिल्म की विदेश से आपूर्ति नहीं हो रही थी और भिलाई इस्पात संयंत्र को सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील मानते हुए इसके आस-पास फोटोग्राफी या शूटिंग पर उन दिनों भारत सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था।  वैन में परदा डाल कर चोरी छिपे भिलाई के शॉट्स लिए।मुबारक बेगम स्टूडियो पहुंची और रिहर्सल भी की। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। उनकी आवाज में यह गाना जम भी रहा था। लेकिन दिक्कत आ रही थी महज एक शब्द के उच्चारण को लेकर। गीत में जहां ‘राते अंजोरिया’ शब्द है उसे वह रिहर्सल में ठीक उच्चारित करती थीं लेकिन पता नहीं क्यों जैसे ही रिकार्डिंग शुरू करते थे वह ‘राते अंझुरिया’ कह देती थीं। इसमें हमारी पूरी-पूरी एक शिफ्ट का नुकसान हो गया। उस रोज पूरे छह घंटे में मुबारक बेगम से ‘अंजोरिया’ नहीं हुआ वह ‘अंझुरिया’ ही रहा। अंतत: हमनें अनुबंध की शर्त के मुताबिक उनका और सारे साजिंदों व तकनीशियनों का भुगतान किया और अगले ही दिन सुमन कल्याणपुर को अनुबंधित कर उनकी आवाज में यह विदाई गीत रिकार्ड करवाया। चूंकि हम एचएमवी से पहले ही अनुबंध कर चुके थे, ऐसे में गीत न गवाने के बावजूद मुबारक बेगम का नाम टाइटिल में हमें देना पड़ा, 14 अप्रैल 1965 को फिल्म रिलीज हुई दुर्ग की प्रभात टाकीज में। फिल्म का प्रीमियर होना था रायपुर के मनोहर टॉकीज में (जो बाद में शारदा हुई और अब खंडहर बन गयी है)  लेकिन कतिपय विवाद के चलते टॉकीज के प्रोप्राइटर ने अनुबंध के बावजूद दो दिन पहले ही फिल्म के प्रदर्शन की  मनाही कर दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14 अप्रैल 1965 को फिल्म रिलीज हुई दुर्ग की प्रभात टाकीज में। &lt;br /&gt;दुर्ग में यह फिल्म बिना किसी विवाद के चली, फिर इसे भाटापारा में रिलीज किया गया और सारे विवादों के निपटारे के बाद जब फिल्म टैक्स फ्री हो गई तो रायपुर के राजकमल (आज की शानदार राज टॉकीज) में प्रदर्शित हुई।&lt;br /&gt;फिल्म नही चलने का कारण आज वे मानते हैं हास्टल में, फैमिली में रामायण देखने का ज़माना था, फिल्मे वर्जित थीं. बिजली नही थी . प्रचार के साधन नही थे,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;11 जुलाई 1937 को रायपुर तहसील के कुर्रा गांव-तिल्दा तहसील में जन्मे नायक 1957 में सपने लिए मुंबई चले गए.&lt;br /&gt;नायक ने रेहाना सुल्ताना  और काजोल की माँ तनूजा की सेक्रेट्रीशिप भी की है . वे आज भी सक्रिय-सेहतमंद हैं, उनको हार्दिक शुभ कामना  । &lt;br /&gt;अब बॉक्स आफिस के गणित का नही इलाके के फ़िल्मी इतिहास का शिखर बन गयी है कही देबे सन्देश और यह एक विचित्र सा सत्य है कि जो फिल्म टैक्स  फ्री हो कर बॉक्स  आफिस का  गणित हल नही कर पाती  हैं वे ही इतिहास में क्यों कर दर्ज हो जाती हैं. मनु नायक ने बाद में दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘पठौनी’ की भी घोषणा की थी। लेकिन  यह फिल्म नहीं बन पाई। शायद कोई संयोग जमे, कुछ साथी हाथ बढ़ाएं .&lt;br /&gt;चंद फिल्में करने के बाद लोग खुद को सुपर स्टार, खलनायक  समझने लगते हैं और फिल्म निर्माता खुद को शो मेन मगर मनु नायक आज भी जमीन से जुड़े  हैं सादगी और नफासत के साथ.  &lt;i&gt; ‘पठौनी’&lt;/i&gt;  बने, इसके लिए हमारी शुभकामना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन 46 वर्षों  में 50 से ज्यादा छत्तीसगढ़ी फिल्मों का निर्माण हुआ है । घर-द्वार, मोर छइयां-भुइयां, झन भूलो मां-बाप ला, ,  मयारू भउजी ,  परदेसी के मया , बनिहार ,  कारी ,मया ,मया देदे मया ले ले, हीरो नं.-1 इत्यादि फ़िल्मे  याद रखी गई है. मगर औसत हर महीने फ्लोर पर आने वाली फिल्मो में कहानी के नाम पर नकल, छत्तीसगढ़ी भाषा के नाम पर हिन्दी,अंग्रेजी की मिक्स खिचड़ी और सस्ते  संवाद के कारण  छत्तीसगढ़ी बोली की संगीतमय अपनत्व भरी मिठास मजाक बन गई है.यह भी आशा है कि अब फिर से कोई &lt;i&gt;कही देबे सन्देश&lt;/i&gt; जैसा सन्देश जरूर आएगा. यहां फिल्में बनना शुरु हुईं और बनती रहीं लेकिन हमने ध्यान नहीं दिया ! सास गारी देती रह गयी और सारी को मुम्बईया नकलची बन्दर ले उड़ा है.&lt;br /&gt;&lt;i&gt; मनु नायक का संपर्क सूत्र है-&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;-4बी/2, फ्लैट-34, वर्सोवा व्यू को-आपरेटिव सोसायटी, 4 बंगला-अंधेरी, मुंबई-53&lt;br /&gt;मोबाइल : 098701-07222.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुजी से बात कर के लगा कि &lt;i&gt;छतीसगढ़ का फिल्म संसार&lt;/i&gt;  समृद्ध रहा है जिसे आजकल टपोरी-टाईप लेखन -निर्देशन लीड कर रहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे क्षेत्रीय फ़िल्में देखना हिन्दी -अंग्रेजी फ़िल्म देखने से ज्यादा अच्छा लगता है. डायलॉग  समझ नही आते मगर गाने-सीन समझ आ जाते है.क्षेत्रीय फ़िल्में अपने देश की विविध संस्कृति को बताती हैं और दूसरों के कल्चर में भी इंसानियत, प्रेम, त्याग, अच्छाई-बुराई सब तो एक जैसी ही होती है.&lt;br /&gt;स्त्रोत सन्कलन साभार  : http://cgsongs.wordpress.com. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;(नीचे तस्वीर में मनुजी के संग श्री स्वराज करुण और डा.परदेसीराम वर्मा भी हैं.)&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;..............................................................................&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-6UgRRIr8_pA/Tj1eb7Omo0I/AAAAAAAAAYI/z40zaAtr7Gk/s1600/AAA.JPG" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="307" width="400" src="http://1.bp.blogspot.com/-6UgRRIr8_pA/Tj1eb7Omo0I/AAAAAAAAAYI/z40zaAtr7Gk/s400/AAA.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;................................................................................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-2652001977529657260?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/2652001977529657260/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/2652001977529657260'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/2652001977529657260'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='46 साल पहले ऐसे बनी थी - कही देबे सन्देश'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-Cmgy1rfd5hc/TjznOgRNT-I/AAAAAAAAAYA/xXmgpVVG6KQ/s72-c/DSC_0259.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-5988277115297348063</id><published>2011-07-16T23:53:00.000-07:00</published><updated>2011-07-17T07:18:51.687-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आदिवासी भारत'/><title type='text'>बस्तर के बहाने फिर से बन्दूक</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-s5eGLaMT8Bw/TiKGwR8hf6I/AAAAAAAAAX4/YbUcad5HruA/s1600/TH09-_BASTAR_625871f.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="263" width="400" src="http://3.bp.blogspot.com/-s5eGLaMT8Bw/TiKGwR8hf6I/AAAAAAAAAX4/YbUcad5HruA/s400/TH09-_BASTAR_625871f.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;देश भर&lt;/b&gt; में इन दिनों बस्तर की फिर से चर्चा है और हमेशा की तरह सिर्फ और सिर्फ यह इसलिए इन दिनों खबरों में है कि एक नए आदेश में सुप्रीम कोर्ट&lt;i&gt; जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस एस. एस. निज्जर &lt;/i&gt;की बेंच ने छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र को निर्देश दिया कि वे आदिवासियों को एसपीओ के तौर पर नियुक्त करने और नक्सलियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर निपटने के लिए उन्हें हथियारबंद करने से "परहेज" करें। आदिवासी युवकों की एसपीओ के तौर पर नियुक्ति असंवैधानिक  है। बेंच ने कहा कि माओवादियों से लड़ने के लिए आदिवासियों की शैक्षणिक योग्यता और प्रशिक्षण समेत अन्य योग्यता मानदंड कानून और संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ जाते हैं। &lt;i&gt;कोया कमांडो और सलवा जुडूम&lt;/i&gt; का गठन संविधान का उल्लंघन है। बस्तर में विशेष पुलिस अधिकारियों को कोया कमांडो का नाम दिया गया है। यह आदेश एक्टिविस्ट नंदिनी सुंदर, इतिहासकार रामचंद गुहा, पूर्व नौकरशाह ई. ए. एस. शर्मा और अन्य की ओर से दायर याचिका पर दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र द्वारा विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) को हथियारबंद करने पर मंगलवार को रोक लगा दी और 5000 सदस्यों वाले इस बल को  असंवैधानिक  करार दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर जनजातियों की भर्ती पर रोक लगाए जाने पर राज्य  पुलिस अधिकारियों की चिंता है कि इससे नक्सलियों के खिलाफ अभियान बुरी तरह प्रभावित होगा। धुर नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में कार्यरत एक पुलिस अधिकारी की राय में एसपीओ की भर्ती पर रोक लगाने के फैसले  पर हैरान हुआ जा सकता है । एसपीओ माओवादियों के आतंकवादी ढांचे को नष्ट करने में दक्ष हैं और क्योंकि वे स्थानीय हैं, जंगली रास्तों, नक्सली दांव-पेंच से अच्छी तरह परिचित हैं। उनके पास नक्सलियों के ठिकानों के बारे में ठोस जानकारी होती है इस नाते वे बस्तर में आतंकवाद  के उन्मूलन के लिए मुफीद सहायक रहे हैं| &lt;br /&gt;अब मानवाधिकार कार्यकर्ता  न्यायालय के इस फैसले के स्वागत में  प्रसन्न हैं और सरकार की पेशानी पर बल हैं कि नक्सलियों से लड़ते-लड़ते बस्तर के नाम पर शुरू हुई इस नई कानूनी लड़ाई से कैसे निपटें । &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-NVCYn2lsz2M/TiKA5l0fRvI/AAAAAAAAAXo/3wL_97Jw860/s1600/untitled.bmp" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="150" width="200" src="http://2.bp.blogspot.com/-NVCYn2lsz2M/TiKA5l0fRvI/AAAAAAAAAXo/3wL_97Jw860/s200/untitled.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कुछ सवाल खुद सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं मसलन सरकार से इन इलाकों में रह रहे सभी आदिवासी और गैर आदिवासी लोगों के मानव अधिकारों की हिफाजत सुनिश्चित करने को कहा गया है।  कहा गया है कि सरकार कानून हाथ में लेने वाले हर तत्व पर लगाम कसे।&lt;br /&gt;अब दो चीजें कैसे एक साथ चल सकती हैं| सभी जानते हैं कि नक्सली बस्तर में सिर्फ और सिर्फ हथियार दिखा कर जोर चलाए हुए हैं और   क्या आदिवासी , क्या शहरी !!  बन्दूक के आगे कौन सिर उठा सकता है? एस पी ओ को बन्दूक दी जाए या नही ये अब क़ानून  का मसला है और इस पर कुछ भी कहना अपनी राय थोपना माना जा सकता है मगर जिनको नही मालूम वे जान लें कि हथियार आदिवासी संस्कृति का हिस्सा हैं और सदियों से जंगल में यही उनके ज़िंदा रहने आत्म रक्षा करने का जरिया रहे हैं| आदिवासी तीर धनुष रखते हैं और ये उनकी संस्कृति है| उस पाषाण युगीन ज़माने में ए के 47 नही हुआ करती थी | होती तो ए के 47 भी आदिवासी  संस्कृति में शामिल रहती| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इस फैसले का साफ़ मतलब है लड़िये मगर बिना हथियार के लड़िये| हकीकत ये है कि सदियों से बस्तर में आज भी बड़े पत्तों वाले साल वन  से ढंके  ऐसे इलाके हैं, जहां  जमीन तक  सूरज की रोशनी  नहीं पहुंचती।  बेशकीमती  खनिज से लबालब इस  धरती के लोगों के लब गर्मी में पानी को तरस जाते हैं|  अब आदिवासियों वाला बस्तर  हिंसा से तप्त है| &lt;i&gt;मुम्बई &lt;/i&gt;की हिंसा में बीस लोग मारे जाते हैं तो बवाल मच जता है मगर&lt;i&gt; बस्तर &lt;/i&gt; मे  कभी पुलिस पार्टी पर हमले तो कभी आदिवासियों पर हमले और कभी  नक्सलियों से  मुठभेड़ में औसतन इतनी मौतें रोज़ हो  रही हैं जितनी नार्थ ईस्ट  और जम्मू  कश्मीर में भी नही होती तो किसी को कोई रंज नही होता मानो ये इलाके भारत में हैं ही नहीं| &lt;br /&gt;&lt;i&gt;नक्सलवाद&lt;/i&gt; शुरू हुआ तो कहा गया कि वह आदिवासी के लिए बन्दूक चला रहा है मगर यह सच भी सामने आने लगा कि नक्सली नेता दूर तेलंगाना से संचालन करने लगे और बस्तर में गुरिल्ला स्क्वाड के नाम पर अब आदिवासी ही आदिवासी पर बंदूक चलाने लगा | इस स्थिति को कोर्ट ने समझा है मगर एकांगी  समझा है|  जजों  ने कहा कि मुकम्मल ट्रेनिंग के बगैर  आदिवासी  को नक्सलियों और सशस्त्र बलों के सामने झोंक देना उन्हें तोप के मुंह में बांधने जैसा है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुलिस की हिंसा  और नक्सल हिंसा के इस पेचीदा  दौर में भी पुराने असली सवाल अब भी अनुत्तरित हैं कि बस्तर में शान्ति कैसे आए?  शांति लाने की ज़िम्मेदारी नक्सलियों की है या सरकार की है?&lt;br /&gt;फैसले से हैरत में आए लोगों की राय में क़ानून  एक तरफ नक्सली को देशद्रोही आतंकी मानता है,सजा देता है| दूसरी तरफ उनके खात्मे के लिए बनी कोया कॉंमांडो फोर्स को ख़त्म करने के आदेश देता है|  यह विरोधाभास अजीब है| मतलब साफ़ है कि बस्तर में अब वे जवान लड़ें  जिनको मालूम ही नही है कि बस्तर क्या है, कैसा है और किधर जाना है, किधर मुड़ना है|  उनके आगे रास्ता दिखाने वाले निहत्थे चलने वाले आदिवासी "उनकी" गोली के शिकार होंगे जिनकी चलाई हुई अंधाधुंध गोलियों का हिसाब किसी सुप्रीम कोर्ट को नही  दिया जाना है|  गोलियां कहां से आ रही हैं, कौन सप्लाई कर रहा है- यह भी बताना जरूरी नहीं है और अब तो बंदूकों पर निर्माता ड्रेगन देश का ठप्पा भी लग कर आ रहा है|   गृह मंत्री चिदंबरम कह चुके  हैं कि  नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मिलकर यह जानने का प्रयास करेंगे कि विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) से हथियार वापस लेने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से नक्सलियों के खिलाफ अभियान कहां तक प्रभावित होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों की राय में कायदे से अब बस्तर का हल गोली नही बोली है और बंदूकों से हो रहे विनाश की जगह विकास से ही है|  अबूझमाड़ में सभी आदिवासी इलाकों में अस्पताल, स्कूल और सड़क की दिक्कतों को दूर किया जाए और औद्योगिकरण की स्थिति में विस्थापन औऱ रोजगार की  कारगर योजना के साथ वनोपज संग्रह-विपणन में भी आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए| मगर सड़क तब बनेगी जब सड़कें बनाने दी जाएंगी, स्कूल तब चलेंगे जब उनकी इमारतें सुरक्षित रहेंगी और अस्पताल तब चलेंगे जब उनके डाक्टर प्रेक्टिस के लिए बस्तर जाने से घबराएं नहीं|  सुप्रीम कोर्ट ने एस पी ओ की बन्दूक तो हटवा दी अब सारी बंदूकों को वहां से रुखसत करा दे तो  बस्तर  की शांत फिजाओं में मैना की मीठी बोली फिर से गूंज सकती है यही बस्तर की चाह है और सही राह है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-5988277115297348063?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/5988277115297348063/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5988277115297348063'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5988277115297348063'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='बस्तर के बहाने फिर से बन्दूक'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-s5eGLaMT8Bw/TiKGwR8hf6I/AAAAAAAAAX4/YbUcad5HruA/s72-c/TH09-_BASTAR_625871f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-5592652547043177436</id><published>2011-06-12T08:37:00.000-07:00</published><updated>2011-06-12T08:51:41.712-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>यादों में बाबूजी (6)</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-rl0K-ZxpJ2w/TfTcncJo4nI/AAAAAAAAAXg/TU2wbtLP2ok/s1600/babuji-001.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="166" width="200" src="http://4.bp.blogspot.com/-rl0K-ZxpJ2w/TfTcncJo4nI/AAAAAAAAAXg/TU2wbtLP2ok/s200/babuji-001.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;बात&lt;/b&gt; अगर दूसरों की मदद की हो  तो बाबूजी को हमने जान की बाज़ी भी लगाते हुए देखा. घटना यह थी, एक बार गांव से लगे राजमार्ग पर एक ट्रक और ट्रेक्टर में भिडंत हो गी थी. ट्रेक्टर चलाने वाला गाँव का ही आदमी था. उसे हल्की चोटें आईं थीं मगर मामले  ने  दूसरा  ही रंग ले लिया. गलती भी ट्रक वाले की नही थी मगर देखते ही देखते लोगों का हुजूम जमा हो  गया.गुसाए हुए लोग ट्रक वाले को ज़िंदा जला देना चाहते थे. बाबूजी को पता चला तो वे तत्काल सड़क पर पहुंचे. महाराज के पहुचने से हुआ कि अपना गाँव अपना इलाका जान कर उन्माद पर उतारू लोग थोड़ा संयमित नजर आए और बाबूजी ने बीच बचाव करते हुए आखिर उस ड्राइवर को भीड़ के चंगुल से बचाया. बाबूजी उसे घर ले आए और जब मामला ठंडा पड़ा तभी भेजा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक आदमी &lt;i&gt;जेठ की तपती हुई दोपहर&lt;/i&gt; में घर के सामने सड़क पर गिर गया. उसने शराब पी रखी थी. बाबूजी उसे घर ले आए. वह नशे में अंट -शंट बकता रहा और लुढ़क गया . बाबूजी ने कहा कि इसे धूप में  भेजना ठीक नही है. जब उसका नशा उतरा तो वह आदमी माफी मांगता हुआ चला गया. बताइये, इस जमाने में लोग उनको क्या कहेंगे जो सड़क पर गिरे हुए शराबी को घर ले आए. इमप्रेकटिकल, नासमझ असामान्य, इत्यादि कोई भी शब्द दिया जा सकता है. मगर बाबूजी जैसे थे, थे.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दशहरे का का दिन. वर्ष 1974. गाँव भर में जोश, उत्साह और उमंग का माहौल है.&lt;br /&gt;मूर्तिशिल्पी नही पहुच सका था तो महाराज और अन्य गाँव वालों ने मिल कर मूर्ति तैयार की और दुर्गा की भव्य प्रतिमा उस पंडाल में विराजी है जिसे सजा दिया गया है. &lt;br /&gt;कल उसका विसर्जन देखने दूर-दूर से लोग आए हैं. &lt;br /&gt;गाँव भर में लाउडस्पीकर बज रहे हैं. &lt;br /&gt;मेले में दुकाने सजी हैं. &lt;br /&gt;नचनिया पार्टी के लड़के नर्तकी बने पूरी अदाएं दिखाते हुए नाच रहे हैं. &lt;br /&gt;सजे  हुए मंच पर गाना बज रहा है.. कोई  &lt;i&gt;शहरी बाबु दिल लहरी बाबू हाय रे पग बांध गया घुंघरू मैं छम छम नचदी  फिरां..&lt;/i&gt; &lt;br /&gt;रूपये लुटाए जा रहे हैं.. पूरी मस्ती , पूरा उत्साह.. &lt;br /&gt;बाबूजी घर पर हैं क्योंकि महाराज ऐसे गाने बजाने  में जाएं  का सवाल ही नही उठता. लिहाजा महाराज घर पर ही हैं. कोई बुलाने की हिमाकत भी नही करता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक मौसम का मिजाज बिगड़ गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;चक्रवाती तूफ़ान &lt;/i&gt;ने पूरे इलाके को एक पल में चपेट में ले लिया. &lt;br /&gt;बदल उमड़-घुमड़ जरुर रहे थे मगर हालात इतने बिगड़ जाएंगे  किसी ने नही सोचा  था. तम्बू उखड गए. लाईटें बुझ गईं और चीख-पुकार मच गई.लोग इधर- उधर भागने लगे. बाबूजी  ने तुरंत नौकर को भेजा और सबको अपने घर में बुला लिया. पूरी भीड़ घर में घुस गई . तिल रखने को भी जगह नही बची.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस तूफानी रात जम कर पानी बरसा. चारों तरफ पानी ही पानी.. रात आसमान से तबाही बरसी. फसल चौपट . सुबह हुई . आसमान साफ़ हुआ. लोग रवाना हुए. दशहरे का मजा किरकिरा हो गया. &lt;br /&gt;अब बाई (माताजी) के भड़कने की बारी थी क्योंकि जिसे जो मिला वो लेकर चलता बना. घर के बर्तन भी गायब थे. लोगों ने आश्रयदाता को ही चपत लगा दी थी. दूर के गाँव वालों को उस रात आसरा नही मिलता तो भारी जनहानि  हो सकती थी. बाबूजी ने पूरा घर खोल दिया था और कभी जिन कमरों में अमूमन हम भी जाने से डरते थे उन कमरों में सारी रात लोग खड़े रहे. इतनी भीड़ थी.मेले से भाग कर घर आने के बाद सोया जरूर मगर रात मेरी नींद खुली थी तो देखा पलंग के सिराहने लोग खड़े हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बर्तन गायब होने की बात बाबूजी  ने हंस कर टाल दी और बाद में कहा-&lt;i&gt; कर भला कटा गला.&lt;/i&gt; बाबूजी मना कर देते तो किसी की हिम्मत नही थी कि आँगन का द्वार भी लाँघ जाए क्योंकि रिवाज था बाहरी लोग आँगन में खड़े हो कर ही बात करते थे. जिनको आँगन लांघते नही देखा था, उनके लिए बाबूजी ने पूरा घर खोल दिया. उन्होंने वक्त की नज़ाकत  को समझा और वास्तविक मदद की.परोपकार के लिए ऐसा आचरण बिरले ही कर पाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;i&gt;(क्रमशः)&lt;/i&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-5592652547043177436?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/5592652547043177436/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/06/6.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5592652547043177436'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5592652547043177436'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/06/6.html' title='यादों में बाबूजी (6)'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-rl0K-ZxpJ2w/TfTcncJo4nI/AAAAAAAAAXg/TU2wbtLP2ok/s72-c/babuji-001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-905279595417202159</id><published>2011-05-25T04:43:00.000-07:00</published><updated>2011-05-25T04:51:26.965-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जंगल की पुकार'/><title type='text'>हमेशा की तरह प्राणघाती चूक</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-4Xbl6fXoZlQ/TdzrUmj3mPI/AAAAAAAAAWU/5I1H2XIt_tM/s1600/naxal_bastar.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="260" width="400" src="http://4.bp.blogspot.com/-4Xbl6fXoZlQ/TdzrUmj3mPI/AAAAAAAAAWU/5I1H2XIt_tM/s400/naxal_bastar.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;सोमवार&lt;/b&gt; को रक्तरंजित माओवाद का एक और हैवानियत भरा चेहरा सामने आया| छत्तीसगढ़- ओडीसा सीमा पर हमले में एक बार फिर एक झटके में 10  परिवार उजड़ गए और हमेशा की तरह निंदा  भर्त्सना  के स्वर उन परिवारों की रुलाई के साथ गूँज रहे हैं जिनका इकलौता कमाने वाला ही चला गया|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना ने नक्सलियों की निर्ममता को तो उजागर किया ही है यह भी बता दिया है, कोई &lt;i&gt;विचारधारा&lt;/i&gt; अगर  हमेशा  के लिए आंख  मूँद ले तो वह शैतान की प्रवक्ता भी बन सकती है और जब वर्ग शत्रु का सिद्धांत स्वीकार ही कर लिया जाता है तो इंसानियत की आवाज बारूद के आगे ढेर कर दी जाती है और जो लोग किसी के शव का सम्मान नहीं  कर सकते वे किसी भी सूरत में कोई भी क्रान्ति कर लें अशांति उनके साथ ही रहेगी और जंगल में भटकते हुए वे जिस मंजिल को पहुचेंगे वो शायद कोई "गोली" ही होगी| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधे आते हैं घटना पर जिसमे पुलिस महकमे की लापरवाही को भी एक बार फिर साबित हुई  है| हमले में मारे गए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक &lt;i&gt;राजेश पवार &lt;/i&gt;जैसे दिलेर अफसरों के भरोसे ही अभियान चल रहा है , लगता है | पवार बहादुर  अधिकारी थे तथा नक्सला प्रभावित बस्तर क्षेत्र में लगातार काम करते रहे हैं। वे प्रत्येक  सोमवार को धवलपुर गाँव जाते रहे हैं| मतलब साफ़ था कि उनके मूवमेंट की जानकारी नक्सलियों को थी और उन्होंने जाल बिछा दिया| पवार अपने छह सिपाहियों समेत ड्राईवर सहायक को लेकर रवाना हुए थे।सूचना थी कि गाँव में नक्सलियों ने समर्पण किया है| यह भ्रामक सूचना थी | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले  भी खबर आती रही है कि इलाके में नक्सली बैठक करते रहे हैं| इस पर सवाल पूछा जा रहा है कि नक्सली होने की खबर के बावजूद यह जानलेवा चूक क्यों की गयी? &lt;br /&gt;सोमवार को क्षेत्र के सोनाबेड़ा के करीब &lt;i&gt;सोसिंग गांव&lt;/i&gt; में नक्सलियों के छिपे होने की जानकारी मिली थी।  महकमे के अफसर मानते हैं कि राजेश बहादुर जरूर थे मगर सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने कई चूकें की| मसलन वे कच्चे रास्ते पर वाहन से गए जबकि जंगलवार का पहला नियम घोषित है कि वाहन का इस्तेमाल  ना किया जाए| इसके अलावा एक और चूक सामने आई है कि वे उसी रास्ते से लौटे जिस रास्ते से गए थे| नक्सली ऐसे ही मौकों के इंतज़ार में रहते हैं और घात लगा कर हमले (एम्बुश) में हार बार उन्होंने साबित किया है कि चूक पुलिस करती है , वे नहीं करते|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले भी सभी बड़े हमलों में यही चूक जानलेवा साबित होती रही है| कल घटित घटना के पहले पुलिस दल जब सोसिंग गांव जा रहा था तो आधारगांव के करीब उनकी गाड़ी खराब हो गई। मजबूरीवश पुलिस दल को सोनाबेड़ा गांव से ट्रेक्टर मंगवाना पड़ा और आगे नहीं बढ़कर वे आमामोरा गांव की तरफ चले गए। जंगल में नक्सलियों ने पुलिस दल पर घात लगाकर हमला कर दिया|  शहीद  परिवारों में मातम छा गया है|&lt;br /&gt;एक सिपाही लापता है | आशंका  है कि नक्सलियों ने उसका अपहरण कर लिया है| पुलिस पार्टी लापता पुलिसकर्मी की खोज में जंगल का चप्पा चप्पा छान रही  है।   शहीदों के शवों को हेलीकाप्टर से रायपुर लाया गया |&lt;br /&gt;शवों की हालत बताती है कि नक्सलियों ने शवों को भी नहीं बख्शा |   धारदार हथियार से अंगों को काटा गया| कई  शव कटे हुए पाए गए हैं। हमेशा की तरह नक्सलियों ने पुलिस के हथियार भी लूट लिए।&lt;br /&gt;क्या &lt;i&gt;मानवाधिकारवादी&lt;/i&gt; बता पाएंगे कि इंसान के अधिकार हो सकते हैं मगर मरने के बाद क्या उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं? यह सिर्फ अधिकार की बात नहीं है| एक तो मारना ही गलत है चाहे कोई भी मारे| मार करके लाशों की दुर्गति करना पैशाचिक कृत्य हैऔर जो पिशाच बन चुके हैं वे क़ानून कायदे की भाषा समझ ही नहीं सकते, यह क़ानून-कायदे वाले कब समझेंगे- समझ नहीं आता|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-905279595417202159?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/905279595417202159/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/05/blog-post_25.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/905279595417202159'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/905279595417202159'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/05/blog-post_25.html' title='हमेशा की तरह प्राणघाती चूक'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-4Xbl6fXoZlQ/TdzrUmj3mPI/AAAAAAAAAWU/5I1H2XIt_tM/s72-c/naxal_bastar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-8784791952292664775</id><published>2011-05-12T07:39:00.000-07:00</published><updated>2011-05-13T13:24:10.300-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Aछत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><title type='text'>खारुन नदी  के साथ बहते  हुए</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-2bMgFAMBfB0/Tcv3IFITLmI/AAAAAAAAAWM/HX-obUZc5ck/s1600/kharun2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="400" width="280" src="http://1.bp.blogspot.com/-2bMgFAMBfB0/Tcv3IFITLmI/AAAAAAAAAWM/HX-obUZc5ck/s400/kharun2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;य&lt;/b&gt;ह अच्छी बात है कि देर से ही सही रायपुर को जीवन देने वाली खारुन नदी की सफाई पर सबका ध्यान गया है मगर निराश करने वाला मुद्दा यह है कि सफाई का काम उतना जोर नहीं पकड़ पाया है जिसकी अपेक्षा शुरुआत के समय की गयी थी और इस दिशा में आगे आए उद्योगपतियों ने जो उत्साह दिखाया था वो बदस्तूर जारी नहीं है|&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;खारून नदी को पिकनिक स्पाट बनाने की योजना है और इस मद में  12 करोड़ रूपये जारी हुए हैं,  ऐसा दावा किया जाता है|  पर फिलहाल तो इस योजना पर पानी फिरता दीखता है| साफ़ लग रहा है कि अगले महीने बरसात के पहले खारुन की सफाई हो जाना संदिग्ध  है। जबकि उद्योगपतियों ने बढ़ चढ़ कर दावे और वादे किये थे और प्रदेश सरकार ने भी सतत काम करने के निर्देश दिए हैं| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बताने कि जरुरत है कि खारुन रायपुर की जीवन रेखा है जैसे यमुना दिल्ली की है| खारुन अब एक नाला बनती जा रही है| तालाबों में गिराया जाने वाला धार्मिक कचरा ढोते हुए खारुन हुगली जैसी लगने लगी है| जैसे राम की गंगा मैली हो गई पापियों के पाप ढोते-ढोते| &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-nlCAxAi_exU/Tcv20xoNfNI/AAAAAAAAAWE/myiu8pbFJ0Y/s1600/kharun1.bmp" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="95" width="137" src="http://2.bp.blogspot.com/-nlCAxAi_exU/Tcv20xoNfNI/AAAAAAAAAWE/myiu8pbFJ0Y/s200/kharun1.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दरअसल मुद्दा सिर्फ खारुन नहीं है| देश भर में नदियाँ नाला बन रही हैं और तालाब पी कर लोग उन पर शापिंग मॉल्स  बना  रहे हैं| सामुदायिक जीवन की प्राचीन चेतना पर शहरी लोभ ने कचरा डल दिया है और कृषि उत्पादकता की बेलगाम हवस  के चलते उर्वरकों -कीटनाशकों का इस कदर इस्तेमाल हुआ कि नदियों की सेहत खतरे में पड़ गयी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;खेती विरासत मिशन &lt;/i&gt;नामक एक गैर सरकारी संगठन यह चीख-चीख कर कहते  आ रहे हैं| पानी, खान-पान और वायुमंडल सभी पर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का असर देखा जा सकता है। यह कहानी उस समय की है जब छत्तीसगढ़ अस्तित्व में ही नहीं आया था और वह मध्यप्रदेश का ही हिस्सा था । छत्तीसगढ़ की एक बड़ी सहायक नदी शिवनाथ को अंधेरे में रखकर &lt;i&gt;रेड़ियस वाटर &lt;/i&gt;लिमिटेड़ को बेच दिया गया।  बोरई ग्राम के किसानों के नैसर्गिक अधिकार पर आक्रमण करते हुए पानी लेने और मत्स्याखेट पर पूरी तरह रोक लगा दी गई । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खारुन शिवनाथ की प्रमुख सहायक नदी है। खारुन नदी दुर्ग जिले के संजारी से  निकलती है और फिर रायपुर से बहती हुई सोमनाथ के पास शिवनाथ नदी में मिल जाती है। शिवनाथ महानदी की प्रमुख सहायक नदी है। महानदी और उसकी सहायक शिवनाथ, मांड़, खारून, जोंक, हसदो आदि नदियों मानव बसाहट और संस्कृतियां जल-स्रोतों, नदियों, समुद्रों के किनारे फली- फूली है |  जमीनों की पहचान करके गांव बसाए जाते रहे हैं और उसी के साथ-साथ तालाबों की खुदाई भी होती रही है। अब सब कुछ सूखता सा लगता है| रायपुर-जगदलपुर मार्ग पर स्थित राज्य की पुरानी राजधानी बस्तर गांव में कहा जाता है कि 'सात आगर सात कोरी' यानि 147 तालाब होते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद आते हैं वो लोग वो ज़माना जब तालाब के लिए लोग जान लगा देते थे| घटना राजनादगांव के लोगों को याद है| 1954-55 में शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी बजरंग महाराज ने भरकापारा के तालाब की गंदगी से दुखी होकर आमरण अनशन की घोषणा कर दी  थी। समाज को जगाने  के लिए किया गया यह अनशन कुल तीन दिन चला था कि प्रेरित और प्रभावित समाज ने तब तालाब की सफाई का काम उठा लिया।आज रानी सागर जैसे तालाब शहर की शोभा बने हैं| वो पानीदार  लोग भी याद आते हैं जो पानी में रम जाते थे|  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिलासपुर जिले के &lt;i&gt;डभरा गांव &lt;/i&gt;के पास एक जोसी है जिनके बारे में कहते हैं कि उन्हे जमीन में पानी की आवाज सुनाई देती है। वे सिर्फ धरती माता पर कान लगाकर बता देते हैं कि कितने हाथ पर कैसा कितना पानी और बीच में कितने हाथ पर रेत और पत्थर मिलेंगे। ऐसे लोग और ऐसे लोगों की मुहिम जब तक साझा नहीं चलेगी और पानी के लिए पानीदार चेतना जागृत नहीं होगी कुछ कहना फिजूल है&lt;i&gt;|(ऊपर छत्तीसगढ़  के जुझारू छायाकार रुपेश यादव की फ्लिकर द्वारा सराही गयी खारून  नदी  की तस्वीर)&lt;/i&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-8784791952292664775?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/8784791952292664775/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/8784791952292664775'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/8784791952292664775'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='खारुन नदी  के साथ बहते  हुए'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-2bMgFAMBfB0/Tcv3IFITLmI/AAAAAAAAAWM/HX-obUZc5ck/s72-c/kharun2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-3404934128439480385</id><published>2011-04-19T23:57:00.000-07:00</published><updated>2011-04-25T07:01:28.885-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>यादों में बाबूजी (5)</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-eryMpns0Lgw/Ta6DS-kdjTI/AAAAAAAAAVI/qR7WmF0BpOA/s1600/babuji.bmp" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="200" width="187" src="http://1.bp.blogspot.com/-eryMpns0Lgw/Ta6DS-kdjTI/AAAAAAAAAVI/qR7WmF0BpOA/s200/babuji.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;बाबूजी&lt;/b&gt; सच्चे अर्थों में निष्काम कर्मयोगी थे| वे किसी चीज की फरमाईश नहीं करते और कुछ देने के बदले कुछ पाने की ख्वाहिश कभी नहीं रखते थे| गाँव में जब झगडे -फसाद की नौबत आती तो &lt;i&gt;'महाराज'&lt;/i&gt; को बुलावा आ जाता| चौपाल पर 'बैठका'(बैठक) होती| भीड़ जुट जाती | वे सबकी बात ध्यान से सुनते और बीच का रास्ता निकालते| राजनीति से उनको परहेज नहीं  था मगर आगे बढ़ने के रास्तों पर मूल्यों से कोई समझौता उनके स्वभाव में नही था|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार &lt;i&gt;पंचायत चुनाव &lt;/i&gt;में बाई(माताजी)खड़ी हुईं| बाबूजी ही प्रेरणा-स्रोत थे क्योंकि सीट महिला आरक्षित थी|  पूरे गाँव भर में धूम के दिन थे| जम कर प्रचार हुआ और जीप से पहाड़ों के दौरे हुए|  बाबूजी &lt;i&gt;उडिया&lt;/i&gt; में भाषण लिखते, माताजी भीड़ में बोलतीं| मैं भी प्रचार में पहुंचा  लेकिन मतदान से पहले नौकरी की वजह से दिल्ली जाना पड़ गया| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतदान की पूर्व संध्या सब कुछ ठीक-ठाक था| जो चुनाव लड़ते हैं जानते हैं कि वो रात क़त्ल की रात होती है | कुछ लोगों ने शराब के लिए फरमाईशें शुरू कर दी क्योंकि जो प्रतिस्पर्धी थे उनने पेटियां खोल दी थी| बाबूजी ने शराब बाँटने से मना कर दिया| एक अजीब सा वातावरण बन गया क्योंकि &lt;i&gt;आदिवासी खुशी और गम दोनों मौकों पर शराब पीते हैं  और यह उनकी परंपरा रहन-सहन का हिस्सा है&lt;/i&gt;| मैं होता तो शायद यह काम उनको बताए बगैर भी कर देता क्योंकि उस दौर में बाबूजी मेरी निगाह में पिछड़े हुए थे मगर आज ऐसा हो तो मैं तन कर मना कर दूंगा| हाँ मेरे दोस्त इस &lt;i&gt;लफड़े &lt;/i&gt;को सम्हाल लें मैं यह चाहूँगा| खैर बाबूजी टस से मस नहीं हुए| न मतलब न|अगले दिन मतदान में पता चला गाँव के ज्यादातर लोग धुत पड़े  थे और जो मुख्य कार्यकर्ता थे उनको साकी ने इतनी पिला दी थी कि वोट पड़ गए और वे सोते रहे| जाहिर था कि यह काम उसी  के इशारे पर हुआ था जिसने पहले शराब के लिए उकसाया और फिर पूरा खेल बिगाड़ दिया| &lt;br /&gt;ऐसे मौकों पर बाबूजी की सदाबहार प्रतिक्रिया होती जो होगा &lt;i&gt;ईश्वर की मर्जी&lt;/i&gt;| ईश्वर ने बाई को मामूली मतों से हरा दिया| ईश्वर ही था जिसने आगे चुनाव से तौबा भी करा दी| &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-ETFhpGfxaH0/TbV9XORwRhI/AAAAAAAAAVY/3wVAVVihDFc/s1600/bai.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="177" width="200" src="http://4.bp.blogspot.com/-ETFhpGfxaH0/TbV9XORwRhI/AAAAAAAAAVY/3wVAVVihDFc/s200/bai.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;बाद में स्वर्गीय राजीव गांधी दौरे पर आए , सबके साथ वरिष्ठ कांग्रेस पदाधिकारी  के नाते बाबूजी से हेलीपेड पर मिले और बड़े फलक पर विधान सभा चुनाव के टिकट की चर्चा हुई तो महाराज ने हाथ जोड़ दिए| चुनाव से नहीं हथकंडों से तौबा | फिर बाबूजी ने चुनाव कभी नहीं लड़ा मगर कांग्रेसी राजनीति से किनारा कर लिया और समाज सेवा में रम गए| अफसर या पुलिस वाले किसी को जबरिया पकड़ ले जाते तो महाराज  सीधे थाने जा धमकते| हमारा घर दीन-दुखियारों की सेवा का केंद्र बना रहता| माताजी झींकती, बाबूजी रमे रहते| कृषि ऋण ग्रेन गोला काण्ड में बाबूजी ने लम्बी लड़ाई लड़ी | नतीजन तत्कालीन &lt;i&gt; मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी &lt;/i&gt;इलाके में आईं और बाबूजी से भी मिलीं| बाबूजी जीवन भर कांग्रेसी रहे और कभी पार्टी नहीं बदली| बाद में बदले हुए हालात में पार्टी की दुर्दशा से प्रायः खिन्न  रहते | इंदिरा गांधी के वे प्रशंसक थे और प्राय कहते कि एक महिला की हिम्मत को देखो जिसे सारी दुनिया मानती है|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-3404934128439480385?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/3404934128439480385/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/04/5.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/3404934128439480385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/3404934128439480385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/04/5.html' title='यादों में बाबूजी (5)'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-eryMpns0Lgw/Ta6DS-kdjTI/AAAAAAAAAVI/qR7WmF0BpOA/s72-c/babuji.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-8343090922310366229</id><published>2011-03-24T22:49:00.000-07:00</published><updated>2011-04-27T03:15:37.257-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>यादों में बाबूजी (4)</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-oy2PTRJMzpU/Tbfsf6UuRVI/AAAAAAAAAV0/wRMpaoevIzM/s1600/babuji-001.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="166" width="200" src="http://3.bp.blogspot.com/-oy2PTRJMzpU/Tbfsf6UuRVI/AAAAAAAAAV0/wRMpaoevIzM/s200/babuji-001.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;आमतौर पर बाहर&lt;/b&gt; से शांत और सरल दिखने वाले बाबूजी कितने वज्र हृदयी थे यह उस रोज पता चला जब &lt;i&gt;'बा' &lt;/i&gt;नहीं रहे| दादाजी को घर में बा कहा जाता था| गांव में बा अपना अंतिम संध्या काल गुजार रहे थे| बाबूजी गाँव में, पूरा परिवार शहर में| लम्बी चौड़ी नाते -रिश्तेदारी ..बा की बहन के पोते का विवाह होना था| तिथि तय हो गयी| जिस तिथि को विवाह था बा स्वर्ग सिधार गए| मृत्यु से पहले बाबूजी से वचन ले लिया की यह खबर शहर में नहीं देना वरना उनकी शादी में विघ्न पड़ जाएगा|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पर पिता की पार्थिव देह पडी है...दारुण दुःख को साझा करने के लिए अपना अगर कोई है तो सिर्फ &lt;i&gt;बाई(माताजी)&lt;/i&gt; है| मृत्यु का आभास हो जाने पर बा ने बाबूजी  को कह दिया था - उनको खाट से जमीन पर उतार दिया जाए| बाबूजी को भी कुछ आशंका हो गयी थी| अर्ध रात्रि में बा ने प्राण त्यागे| मृत्यु पूर्व उनने बाई से सभी जानी अनजानी भूलों के लिए क्षमा याचना की और तुलसी पत्ता- गंगा जल मुंह में लेने के बाद खामोश हो गए| देह त्याग से पूर्व उनने अपनी बनियान भी स्वयं उतार कर धर दी|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत असमंजस की स्थिति थी| पिता के बिछोह की वेदना और वज्राघात के दिल दहला देने वाले पलों में बाबूजी को अब फैसले करने थे| बा तो गुजर गए थे | परिवार को इत्तला नहीं देने का खामियाजा बाबूजी को ही भुगतना था| बाबूजी ने रायपुर खबर नहीं भेजी| पुत्र धर्म का निर्वाह किया|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतिम प्रहर में बाबूजी घर से साईकिल निकाली और अकेले जंगली रास्ते से होते हुए 15 किलोमीटर दूरस्थ कसबे में गए और वहाँ से क्रिया-कर्म का सारा सामान ले कर सूर्योदय से पहले घर लौटे| गांव वालों और आसपास परिजनों के साथ बा का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ|&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-6c-d1byFEPI/TYwrggPUCOI/AAAAAAAAAUg/dXecWuegwYY/s1600/ghar.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="300" width="400" src="http://1.bp.blogspot.com/-6c-d1byFEPI/TYwrggPUCOI/AAAAAAAAAUg/dXecWuegwYY/s400/ghar.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;बा के गुजरने की खबर सबको शादी के प्रीति भोज वाले दिन मिली जब एक परिजन  जो गाँव के समीप ही रहते थे और सारे घटनाक्रम से परिचित थे, भोज में गए और वहाँ उनने बातों ही बातों में जिक्र किया तो सबके होश उड़ गए|  सब लोग गांव भागे| वहाँ बाबूजी का सिर घुटा हुआ मिला|मृत्यु की खबर नहीं आने का वास्तविक कारण जिसने भी सुना वो जड़ हो गया|बाद में जिसकी जैसी सोच थी उसने वैसी व्याख्या की लेकिन बाबूजी ने साबित कर दिया कि  वे  आक्षेप झेल कर भी अपने पिता के कहे हुए का मान रख सकते हैं| बाबूजी की इकलौती बहन को भी खबर नहीं मिल पाई| वे शोक से तप्त हो कर गाँव आईं| बाबूजी से कारण पता चला|  भाई बहन ने दुःख बांटा| निकटवर्ती नातेदारों से बाबूजी ने गाँव में सहज संवाद किया और यह उन्ही का अंदाज था कि मनोमालिन्य दूर हुए| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बा भी अपने-आप में अलमस्त तबीयत के धनी थे| पढने  के शौक़ीन| भजन और कविताएँ लिखते, रात में नींद खुल जाती तो गाते|  कर्म काण्ड के घोर विरोधी| उन्होंने साफ़ कह दिया था की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियाँ &lt;i&gt;राजिम&lt;/i&gt; त्रिवेणी (छत्तीसगढ़) में प्रवाहित की जाएँ| गाँव उनको भी  अंतिम समय में रास आया| 'मा सा' (दादीजी) और 'बा' दोनों ने अंतिम काल में गाँव को ही चुना और उसी मिट्टी में पंच-तत्व में विलीन हुए|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(जारी)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-8343090922310366229?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/8343090922310366229/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/03/4.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/8343090922310366229'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/8343090922310366229'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/03/4.html' title='यादों में बाबूजी (4)'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-oy2PTRJMzpU/Tbfsf6UuRVI/AAAAAAAAAV0/wRMpaoevIzM/s72-c/babuji-001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-388998644410687621</id><published>2011-03-20T10:42:00.000-07:00</published><updated>2011-03-20T10:42:11.384-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>आलोक तोमर का जाना</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-mqG2Az9qpVE/TYY8NoWH8kI/AAAAAAAAATo/PJpS9ztoxmA/s1600/alok_1_990758040.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="226" width="360" src="http://2.bp.blogspot.com/-mqG2Az9qpVE/TYY8NoWH8kI/AAAAAAAAATo/PJpS9ztoxmA/s400/alok_1_990758040.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;भारतीय &lt;/b&gt;पत्रकारिता की मौजूदा पीढी के चर्चित और जांबाज़ पत्रकार आदरणीय आलोक तोमर नहीं रहे, यह मनहूस खबर दोपहर 12 बजे अचानक मोबाईल पर आई| वे कैंसर से जूझ रहे थे और लगातार लिख कर बता भी रहे थे कि एक दिन कैंसर को जरूर हरा देंगे मगर अनहोनी ने ऐसा खेल खेला कि सहसा होली के रंग उड़ गए और अब यह कहने से भी गुरेज नहीं कि ऊपर वाले  के यहाँ  देर भी है और अंधेर भी है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;  इस दुखद मौके पर 25 साल पुरानी स्मृतियों के पहाड़ से यादों के कई झरने फूट पड़े| 1986 में &lt;i&gt;जनसत्ता &lt;/i&gt;दिल्ली के दफ्तर में एक वरिष्ठ के मार्फत जिस अनोखे शख्स से मिलने का मौक़ा मिला उनके सहज बर्ताव और बिंदास लेखनी ने प्रभावित किया| फिर तो ऐसा हुआ कि रोज शाम को जनसत्ता में अपन घूमते पाए जाते| चंद दिनों की मुलाक़ात में ही आलोकजी का स्नेह छोटे भाई पर बड़े भाई की तरह बरसता| वे मुझ जैसे कई स्ट्रगलरों के बड़े भाई थे| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    मैं बताना चाहूँगा कि फुल-टाईम पत्रकारिता और पार्ट-टाईम ड्रामा के उन दिनों में मुझे &lt;i&gt;नेशनल स्कूल आफ ड्रामा&lt;/i&gt; के इंटरव्यू के लिए दिल्ली बुलाया गया था और मैं जा कर लद गया अपने शहर के वरिष्ठ के सिर| परेशानी की वजह थी कि इंटरव्यू  होने थे 19 जुलाई 1986 को और मैं पहुचा 30 जुलाई को | मुझे काल लैटर ही देर से मिला| अपना इरादा तो संचार मंत्री से मिल कर डाक-तार वालों की शिकायत का था क्योंकि और कोई काम तो था नहीं दिल्ली में, इस मौके पर आलोकजी गाईड बन कर सामने आए| पहले तो मेरी नौसिखिया पत्रकार वाली संचार मंत्री से संभावित मुलाक़ात और फिर देश में डाक-क्रांति लाने की मंशा से उखड कर उनने ऐसा भाषण दिया कि आधा दिमाग दुरुस्त हो गया| फिर मैं रोज उनके लिए खबरों के टापिक बताने के लिए पहुँच जाता | मसलन चांदनी चौक  चौराहे पर लगे सरकारी बोर्ड में हिन्दी की वर्तनी गलत है ...वगैरह- वगैरह.. एक छोटे से शहर से गए अनाडी पत्रकार का विजन इससे ज्यादा और क्या हो सकता था|   खीजे हुए आलोकजी ने कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव सुरेश पचौरी के पास भेज कर मुझे एक चिट्ठी दिलवा दी जिसमे  एन एस डी के निदेशक के लिए पत्र था| ताव खा कर मैंने अपने शहर के कई बड़े नेताओं से फोन भी  करा दिए| मेरा स्पेशल इंटरव्यू हुआ मगर मैं  धौंस के सहारे रंगमंच में जाना चाह रहा था लिहाजा इंटरव्यू में सबने मिल कर मुझे इतना रगड़ा कि एन एस डी में दुबारा मैं कभी नहीं गया और पत्रकारिता में ही कैरियर बनाने के इरादे से मैंने आलोकजी से यह भी कहा कि अब रायपुर किस मुंह से जाना| उनके सौजन्य से &lt;i&gt;दिल्ली प्रेस&lt;/i&gt; में मेरा आवेदन जमा हुआ जहां उस दौर में वहाँ बगैर सिफारिश के नौकरी मिल जाती थी और एक लेख लिखने पर नौकरी पक्की| घंटे भर में अपन ने तो दो लेख लिख दिए थे |&lt;br /&gt;       दिल्ली प्रेस से पीछा छूटते ही अपन भी महानगरीय जीवन में ऐसे रमे कि कब आलोकजी जनसत्ता छोड़ गए और एक धूमकेतू की तरह हिन्दी बैल्ट पर छा जाने वाले पत्रकार को आगे चल कर गर्दिशों के दौर से भी गुजरते देख समय-भाग्य के फेर पर विश्वास करने की मजबूरी रही | मुलाक़ात होती मगर कैरियर की मुश्किल घड़ी में| आलोकजी मदद के लिए तत्पर रहते| उनका स्वभाव नहीं बदला | वे दूसरों से इस मायने में भी अलग थे कि दिल्ली में भी उनका शहर उनके सीने में धडकता रहा| छोटों से स्नेह से मिलते| वे खरा बोलते और खरा लिखते| डरना तो शायद सीखा ही नहीं|&lt;br /&gt;    छोटी-मोटी शायरियाँ/कविताएँ  डायरी में लिए चलने के उन दिनों में मैंने कहीं से उडाई हुई एक कविता उनको सुनाई..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    &lt;i&gt;मुझको दीपक सा जलना है&lt;br /&gt;    आलोक सभी को देना है.&lt;br /&gt;    जग कह दे दीपक खूब जला&lt;br /&gt;    बस और मुझे क्या लेना है.&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    आलोकजी ने कविता पसंद की मगर कहा कि &lt;i&gt;"जग के कहने की कोई परवाह नहीं होनी चाहिए| जग के कहने के लिए जलेंगे?"&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;    वे जमीन से जुड़े हुए थे और दिल्ली की कृत्रिमता उनके व्यक्तित्व में  नहीं आ पाई| जिसे कैंसर हो जाए वो इलाज में ही आधा हो जाता है मगर यह आलोकजी  का ही कलेजा था कि उनने इस पर भी जम कर लिखा और इस रोग के इलाज के नाम पर जो धंधेबाजी चल रही है उसकी तरफ भी सबका ध्यान खींचा | &lt;br /&gt; उनकी मौत कैंसर से नहीं बल्कि दिल के दौरे से हुई| कैंसर को तो वे लगभग परास्त कर चुके थे| मरना तो सबको एक दिन है मगर यह साक्षात देखा कि  मौत को सामने देख कर भी जो हौसला ना खोए वह आलोक तोमर ही हो सकते हैं| लेखक के रूप में आलोकजी एक &lt;i&gt;रोल माडल&lt;/i&gt;  बन गए थे|  हाल के दिनों में उनने तथ्यों के साथ बड़े-बड़ों की बखिया उधेड़ डाली|  उनकी अलग शैली थी| उनने सच बोलने के खतरे उठाए| कार्टून विवाद में जेल भी गए मगर झुके नहीं| मैं उनकी स्मृतियों को प्रणाम करता हूँ और सुप्रिया सहित परिवार के लिए के लिए प्रार्थना कि वे इस दारुण दुःख की घड़ी को सहन कर सकें|&lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-388998644410687621?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/388998644410687621/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/03/blog-post_20.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/388998644410687621'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/388998644410687621'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/03/blog-post_20.html' title='आलोक तोमर का जाना'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-mqG2Az9qpVE/TYY8NoWH8kI/AAAAAAAAATo/PJpS9ztoxmA/s72-c/alok_1_990758040.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-1876757468636331020</id><published>2011-03-09T06:24:00.000-08:00</published><updated>2011-03-09T06:25:28.495-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>वही अर्जुन, वही बाण</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-GDCPgNjFU6w/TXeNAR9RnjI/AAAAAAAAATY/1i7M_Lux84s/s1600/arjun-singh-2008-12-16-7-33-36.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="273" width="400" src="http://4.bp.blogspot.com/-GDCPgNjFU6w/TXeNAR9RnjI/AAAAAAAAATY/1i7M_Lux84s/s400/arjun-singh-2008-12-16-7-33-36.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;नब्बे के दशक&lt;/b&gt;  में दिल्ली की पत्रकारिता के उन दिनों में अर्जुन सिंह बहुत बड़ी शख्सियत थे जब अपन ऐसे नेताओं के इंटरव्यू कर के ही खुद को  गदगद रखते थे| कुछ संस्मरण  हैं| उनके आधार पर मैं कह सकता हूँ कि वे सस्ती लोकप्रियता के टोटकों में कतई यकीन नहीं रखते थे और राजनीति में शालीन रह कर भी विरोधी की काट की जा सकती है यह शैली अर्जुन सिंह ने गढ़ी थी| उनमे राजनीति की जितनी समझ थी और हवा के रूख को पहचान कर अपने कदम तय करने का जितना बारीक (शार्प) हुनर था वह कई बड़े नेताओं के पास भी नही था जो नाम में उनसे आगे थे लेकिन अर्जुन सिंह ने उनको भी पीछे छोड़ दिया| एम्स के डाक्टर कृत्रिम प्रणालियों के सहारे कब तक उनको जीवित रख पाते| अब वे संस्मरणों के अर्जुन हैं और अर्जुन सिंह को जो जानते रहे हैं वे जानते हैं कि अर्जुन सचमुच इस इस राजनीति के महाभारत में  अर्जुन थे और लक्ष्य पर उनकी नजर पैनी रहती थी| उनके तीर बेआवाज चलते थे और जिसे बेधते थे वह चारों खाने चित्त पड़ जाता था| जलवा जिसे कहते हैं वो अर्जुन सिंह ने जमाया और एक वो दौर भी था जब अर्जुन सिंह की नजर से सारे बड़े फैसले हो जाया करते थे| उस दौर में अर्जुन सिंह के तर्क से राजनीति में ताकत के मायने गढ़े जाते थे और उनकी चाल का मतलब होता था  सफलता की गारंटी| नब्बे के दशक में कई पत्रकार उनके इस कदर भक्त थे कि हर राजनीतिक खबर के केंद्र में होते थे अर्जुन  सिंह और जो खबर बनती थी वह बताती थी कि एक शख्स ऐसा भी है जो बैठा तो मध्य प्रदेश में है मगर उससे दिल्ली के दिग्गज भी डरते हैं| अर्जुन सिंह से बड़ा अर्जुन सिंह का प्रभा-मंडल था|फिर एक दौर ऐसा भी आया जब वे लोक सभा की टिकट से वंचित कर दिए गए और अपनी पुत्री को भी टिकट नहीं दिला पाए| समय का फेर था | इसीलिए लिखा गया है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नर बली नही होत है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय होत बलवान &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीलन लूटी गोपियाँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही अर्जुन वही बाण&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजीव गांधी जब तक जीवित रहे अर्जुन सिंह सीढियां फलांगते गए| समस्या तब हुई जब राजीव नहीं रहे और नेता का नाम ले कर हर काम करते रहो वाली जिस शैली का सूत्रपात अर्जुनसिंह ने किया था वो चरमरा गयी| सीताराम केसरी और नरसिम्हा राव ने मिल कर अर्जुन के तीरों को ऐसा बोथरा किया कि अंततः उनको तिवारी  कांग्रेस बनानी पडी और यहाँ भी अध्यक्ष नारायण दत्त तिवारी ही रहे| अपनी शैली से अर्जुन सिंह ने जितने मित्र बनाए उतने शत्रु भी, यही उनके लिए शायद गलत हुआ| हर बार उनकी राह काँटों से सजी रहती| उनकी इमेज एक घाघ लीडर की बन गयी जो कब किसको निपटा देगा इससे विरोधी भी घबराए रहते थे| उनने निपटाया  भी| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक उदाहरण याद आता है- उन दिनों वे सी एम् थे और&lt;i&gt; शुक्ल बंधुओं &lt;/i&gt;से उनकी बिलकुल नहीं पटती थी| वे आए दिन छत्तीसगढ़ के दौरे पर आते| शुक्लजी कहते उनको तो रोटी भी  नहीं पचती  अगर यहाँ ना आएं तो..वगैरह- वगैरह.. और जब अर्जुन सिंह से पूछा जाता तो वे रहस्य से भरी अपनी मुस्कान  व तीखी   नजरों को ढके चश्मे से झांकते कहते "वे(शुक्लजी) तो बड़े नेता हैं आदरणीय हैं..." आदरणीय बोल-बोल कर के ऐसा पलीता लगाया  कि कई घटनाएं अब कालखंड का हिस्सा भर हैं| उनके स्कूल आफ पॉलिटिक्स से सीखे लोग बाद में उनको ही पटकनी दे कर आगे निकल गए| मेरा मानना है कि अर्जुन सिंहजी में काबिलियत थी और वे और भी आगे जाते| राष्ट्रीय स्तर  पर एक मौके पर उनने प्रूव किया जब पंजाब में लोंगोवाल समझौता कराया|  इसके बाद वे विरोधियों से निपटने में ही ऊर्जा लगाते रहे| हमारे यहाँ रिवाज है कि दिवंगत होने के बाद व्यक्ति के बारे में अच्छा ही कहा जाता है लेकिन मैं पूरी विनम्रता के साथ उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव  रखते हुए यह जरूर कहना चाहूँगा कि अर्जुन सिंह ने अपने शीर्ष काल में दिमाग से राजनीति ज्यादा की अगर वे दिल से करते तो शायद उनका फलक और बड़ा हो सकता था|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-1876757468636331020?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/1876757468636331020/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/03/blog-post_09.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1876757468636331020'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1876757468636331020'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/03/blog-post_09.html' title='वही अर्जुन, वही बाण'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-GDCPgNjFU6w/TXeNAR9RnjI/AAAAAAAAATY/1i7M_Lux84s/s72-c/arjun-singh-2008-12-16-7-33-36.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-4978685649955922914</id><published>2011-03-03T20:43:00.000-08:00</published><updated>2011-03-03T20:44:50.460-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जंगल की पुकार'/><title type='text'>सिर्फ पलाश बाकी खलास</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-8FrvRwrbI-k/TXBsK-AuyVI/AAAAAAAAATA/3NrAHXAtkFQ/s1600/tesu.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="300" width="400" src="http://4.bp.blogspot.com/-8FrvRwrbI-k/TXBsK-AuyVI/AAAAAAAAATA/3NrAHXAtkFQ/s400/tesu.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;इस बार &lt;/b&gt;लम्बे अरसे बाद गाँव जाना हुआ और वहाँ पंहुच कर बसंत का जो नजारा देखा तो होश उड़ गए| निस्तब्ध वातावरण में प्रकृति एक नए चोले में सज रही है और &lt;i&gt;बसंत &lt;/i&gt;ने कानन में डेरा डाल रखा है| आगबबूला हुए सुर्ख पलाश ने बाजी मार ली है और बाकी सब खलास हैं| सूखे दरख्तों के पत्ते झर रहे हैं और हवा की हिलोर भटकाने के लिए काफी है| पहाड़ अब तक हरी चादर ओढ़े सो रहे थे अब जाग रहे हैं और जंगल का हरेक दरख़्त अपने पत्तों का बोझ धरती पर पटकने को आतुर है| सूखे पत्तों के चादर सी जमी नजर आती है |अब चारों तरफ उजाड़ का मौसम है| कहीं कोई हरित पट्टी दिख जाए तो राहत मानिए|&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-gKNmF8ZXTqM/TXBtGhY214I/AAAAAAAAATQ/lU2NbLim7rg/s1600/daldali.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="300" width="400" src="http://3.bp.blogspot.com/-gKNmF8ZXTqM/TXBtGhY214I/AAAAAAAAATQ/lU2NbLim7rg/s400/daldali.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस पूरे नज़ारे में पलाश उर्फ़ टेसू उर्फ़ पलसा सबसे ज्यादा आकर्षित करता है| उसके लाल सुर्ख फूल खुल कर खिले हैं| यह बसंत है|और बसंत क्या है यह जंगल से ज्यादा कोई नहीं जानता| जब बड़े बड़े पत्तों वाला पलाश अपने सूखते हुए पत्तों को छोड़ सिर्फ सुर्ख लालिमा लिय्रे दहकती हुई फूलों की डालियों के साथ तेज धूप में तना रहता है तो सारे पेड़ उसकी इस आभा के सामने फीके लगते हैं|  एक अकेला पेड़ सारे वीराने को अपने सौन्दर्य से भर देता है। पलाश लाख सुन्दर फूल है पर उसमें सुगन्ध नहीं होती ! वह इतना भारी होता है की उसे जूड़े में सजाया नहीं जा सकता, वह किसी भी गुलदस्ते की शोभा नहीं बन पाता| पलाश इस मौसम में केसरी आभा से दमकता है| फागुन मस्ती कीशुरुआत है| बाकी पेड़ और झाड़ियाँ भी हैं पर रूतबा तो पलाश और सेमल का ही है| सेमल हर जगह नहीं दिखता |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुखद है कि घर के बगीचे में एक अदद पलाश का भी पेड़ साबुत खडा हुआ है और इस बार वही सबके आकर्षण का केंद्र रहा| इसका वानस्पतिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। इसकी लकड़ी से कोई फर्नीचर वगैरह नहीं बन सकता है इसीलिए अमूमन इसे लोग नहीं उगाते|   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगलों में इसके पेड़ बहुतायात में पाए जाते हैं| ख़ास करके इस इलाके में तो सड़क का लगभग हर किनारा पलाश की उपस्थिति दर्शा जाता है| इसे "जंगल की आग" भी कहा जाता है। प्राचीन काल ही से होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है।इसके फूल सुखा कर उबाल लिए जाते हैं जिससे प्राकृतिक रंग तैयार हो जाता है| यह फूल असाध्य चर्म रोगों में भी लाभप्रद होता है। हल्के गुनगुने पानी में डालकर सूजन वाली जगह धोने से सूजन समाप्त होती है।टेसू के फूल को घिस कर चिकन पाक्स के रोगियों को लगाया जा सकता है। इससे एलर्जी नहीं होती है|&lt;br /&gt;गाँव की अमराई और घर का एक अदद आम के पेड़ पर इस बार खूब बौरें आईं हैं| यह सुखद संकेत है कि आम खूब फलेंगे| इन पेड़ों के पास जा कर कोई खडा हो जाए तो उनकी खुशबू पुलकित कर देती है|&lt;i&gt; अमुवा की डाली पे गाए मतवाली... &lt;/i&gt;हमने कोयल की कूक सुनने का इंतज़ार किया मगर शायद कोयल आजकल मौन है| याद आया... बीत गयी रुत सावन की कोयल हो गयी मौन, अब दादुर वक्ता भए तो हमको पूछी कौन| खैर आगे बढ़ने पर देखा सेमल (रुई)पर भी गुलाबी फूल आए हैं और वह भी पलाश के साथ होड़ कर रहा है|&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-4g9YDymCmDc/TXBsgzoYAbI/AAAAAAAAATI/p6eXs46GczU/s1600/semal.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="300" width="400" src="http://2.bp.blogspot.com/-4g9YDymCmDc/TXBsgzoYAbI/AAAAAAAAATI/p6eXs46GczU/s400/semal.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-4978685649955922914?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/4978685649955922914/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/03/blog-post.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4978685649955922914'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4978685649955922914'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='सिर्फ पलाश बाकी खलास'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-8FrvRwrbI-k/TXBsK-AuyVI/AAAAAAAAATA/3NrAHXAtkFQ/s72-c/tesu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-245179794728332751</id><published>2011-02-28T02:44:00.000-08:00</published><updated>2011-02-28T02:44:02.404-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>बन गिस हमर राज अब तहूँ भुगत</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-4bv1t9rqUT8/TWt6xk_bqYI/AAAAAAAAAS4/LkMyWvDgg0I/s1600/vsabha.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="200" width="330" src="http://3.bp.blogspot.com/-4bv1t9rqUT8/TWt6xk_bqYI/AAAAAAAAAS4/LkMyWvDgg0I/s400/vsabha.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;अब &lt;/b&gt;तक तो मैं यह मानता आया हूँ कि पत्रकार को सिर्फ अपने काम से काम रखना चाहिए और छत्तीसगढ़ जैसे अल्प विकसित राज्य में पत्रकारिता करना हो तो अपनी जान सम्हाल कर भी चलना चाहिए| राज्य के दो उदीयमान पत्रकार गोली का निशाना बना दिए गए| किसने मारा अब तक पता नहीं चल पाया है और कब कौन किसको गोली मार जाएगा  इसकी भी गारंटी नहीं है|  थक-हार कर सरकार ने मामला सी बी आई को सौंप दिया है| ऐसा नही है कि पुलिस मामले की जांच नहीं कर सकती मगर देश भर में यह साफ़ देखा जा रहा है कि जब भी ऐसा कोई हाई -प्रोफाईल मामला होता है पुलिस वाले दबाव में घुट जाते  हैं और सी बी आई की जांच सूची बढ़ जाती है वरना आज भी भारत के एक साधारण से  सिपाही को पूरी शै दे दी जाए तो 24 घंटे में पता लग सकता है कि बोफोर्स में दलाली किसने खाई और टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला किसने किया और अपराधों की तो सारी सूची क्लीयर हो सकती है| सारे अपराधी थानों में उठक-बैठक करते नजर आ सकते है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता करना बेहद खतरनाक ही नहीं क्लेश-जनक भी हो गया है| ऐसा लगता है कि कोई सिस्टम जैसी कोई चीज विकसित ही नहीं हो पाई है |ताजा मामला छत्तीसगढ़ विधान-सभा का है| इसका बजट सत्र चल रहा है| सत्र की कवरेज के लिए पत्रकारों के पास बनाने का काम सचिवालय करता है| इसके लिए बाकायदा स्टाफ है मगर लाल फीताशाही की हद देखिए कि यह कैसे काम करती है| आठ दिन पहले एक आवेदन  दिया गया जिसके मुताबिक़ कायदे से प्रवेश"पास" सत्र शुरू होने के दिन से पहले ही बन जाना चाहिए  था मगर नहीं बन पाया| हमेशा की तरह कई संदेशवाहक रिमाईंडर दिए गए मगर कहा गया कि एक आवेदन और दे दीजिए| थक -हार कर वो भी दे दिया गया| सदन में बजट पेश होना था और सुबह नौ बजे तक मेरा पास नहीं बन पाया था|इसके बावजूद कि मुझे यह बताने में शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि मैं विधानसभा की पिछली मीडिया समिति का सदस्य रहा हूँ | दिल्ली विधानसभा की मीडिया सलाहकार समिति का भी सदस्य रहा हूँ और लोक सभा की कवरेज भी छह साल की है| |  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्रों पास तो बन चुका  मगर इसके लिए सुबह-सुबह जितने फोन करने पड़े, फूं-फां करनी पडी कि  उससे सचमुच कोफ़्त होने लगी| अंततः यह सूचना आई कि आपका पास गेट क्रमांक फलां पर है आप सीधे आ जाईए| वे मित्र सहयोगी और अफसर भी सुबह-सुबह परेशान हुए जिनको मैं इस अल्प विकसित  इलाके में तल्लीनता से काम करते हुए देख खिन्नता के दौर में उनसे प्रेरणा लेता हूँ कि इलाके की तस्वीर जरूर बदलेगी ,बशर्ते कोई सिस्टम बने,हम प्रोफेशनल रुख अख्तियार करें| खीज इस बात की भी होती है कि ऐसे दिन देखने के लिए ही हम छत्तीसगढ़िया पत्रकारों ने पिछली सदी के अंत में जंतर -मंतर पर धरने दिए थे और दिल्ली में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री मदनलाल खुराना की कांफ्रेंस में उचक उचक कर नए राज्यों के गठन बाबत सवाल पूछे थे|  इस प्रसंग पर एक मित्र की टिप्पणी  - "बन गिस हमर राज अब तंहू भुगत" |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-245179794728332751?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/245179794728332751/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/02/blog-post_28.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/245179794728332751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/245179794728332751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/02/blog-post_28.html' title='बन गिस हमर राज अब तहूँ भुगत'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-4bv1t9rqUT8/TWt6xk_bqYI/AAAAAAAAAS4/LkMyWvDgg0I/s72-c/vsabha.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-595897636591695944</id><published>2011-02-22T05:02:00.000-08:00</published><updated>2011-02-22T05:04:51.465-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>और नहीं बस और नहीं</title><content type='html'>&lt;b&gt;बीते&lt;/b&gt; रविवार को अवसर था ताज महोत्सव में &lt;i&gt;आगरा &lt;/i&gt;में संपन्न सूरसदन में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का। सभागार खचाखच भरा था| बाकी कवि सम्मलेन जैसा ही यह कवि सम्मलेन हो जाता तो यहाँ लिखने की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन खड़े थे एक प्यार का नगमा है..., जिंदगी की न टूटे लड़ी..., पुरवा सुहानी आई रे... और नहीं बस और नहीं गम के प्याले और नहीं जैसे कालजयी गीतों के रचयिता कवि गीतकार &lt;i&gt;संतोषानंद&lt;/i&gt; के साथ जो बदसलूकी आयोजकों ने की वह बेहद शर्मनाक तरीके से सरेआम हुई  । जो रिपोर्टें हैं उनके मुताबिक़ कंपकंपाते पैरों और लड़खड़ाती जबान से 72 वर्ष की उम्र में यह गीतकार जब  गीतों को सुर देने की कोशिश कर रहे थे तब उनको बैठ जाने के लिए कह दिया गया|  इतना ही नहीं उनसे माईक छीन लिया गया|  उनको&lt;i&gt; हूट&lt;/i&gt; कर के बैठ जाने के लिए विवश कर दिया गया| खबर यह भी है कि संचालक महोदय शुरू से ही उनको ले कर टिप्पणियाँ कर रहे थे और ना मालूम उनको क्या सूझी उनने कविता के दौरान ही अपने माईक से दीगर सूचना देनी शुरू कर दी इस पर एतराज के बाद  हंगामा भी हुआ  और कवि सम्मलेन एक अखाड़े में तब्दील हो गया जिसमे डीएम औए दीगर अफसरों ने व्यवस्था संभाली |&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-KBYeCeaOoMQ/TWO0T9lmnpI/AAAAAAAAASg/2pQl-IWFrNs/s1600/santoshand.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="175" width="142" src="http://3.bp.blogspot.com/-KBYeCeaOoMQ/TWO0T9lmnpI/AAAAAAAAASg/2pQl-IWFrNs/s400/santoshand.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;फिर भी कवि सम्मलेन में झगडे  होते रहे और शरीफ लोग एक एक करके खिसकते रहे|  इसके बावजूद कवि संतोषानंद उस गीत को सुनाना चाहते थे जो उनके लिए प्यार के नगमे से बड़ा था उनने सुना ही दिया ।&lt;i&gt;नज़ारे ये कहने लगे नयन से बड़ी कोई चीज नहीं|मेरे दिल ने कहा कि मेरे वतन से बड़ी कोई चीज नहीं&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;प्रख्यात हिन्दी कवि एवं फिल्म गीतकार संतोषानंद को वर्ष 2010 का 'मनहर ठहाका पुरस्कार' से सम्मानित हैं| 'रोटी, कपड़ा और मकान', 'क्रांति' तथा 'प्रेम रोग' जैसी चर्चित फिल्मों में अपने गीतों के लिए सुर्खियों में रहे लोकप्रिय गीतकार श्री संतोषानंद को 1975 और 1984 में 'फिल्म फेयर पुरस्कार', 'महादेवी वर्मा पुरस्कार', 'निरालाश्री पुरस्कार', 'मौलाना मोहम्मद अली जौहर अवॉर्ड', 'साहित्यश्री पुरस्कार' सातवां 'विपुलम् सहित अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।&lt;br /&gt;संतोषानन्‍द ने हाल में एक इंटरव्यू  में कहा कि &lt;i&gt;‘अब कविता नहीं, कविता का धंधा हो रहा है। चुटकुलेबाज मजे ले रहे हैं। अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं से थाट्स चुरा कर गीत लिखे जा रहे हैं। एक दौर था जब फिल्‍मों में ‘ ऐ मालिक तेरे बंदे हम ’ जैसे गीत लिखे जाते थे, और गीतकारों को भजन लिखने वाला माना जाता था। उसे दौर में मैने भाषा को प्लेन करने का काम किया और सीधी सपाट भाषा में मौलिक थाट्स के साथ ‘ इक प्‍यार का नगमा है, मौजों की रवानी है। जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है ‘ जैसा गीत लिखा। दरअसल यह मौलिक थाट इस लिये था क्‍योंकि यह गीत मैने अपनी पत्‍नी को सामने रख लिखा था। इस गीत की एक-एक पंक्ति मेरे जीवन का भोगा हुआ सच है।"&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल है  कि क्या पकी उम्र के कारण कोई कवि कुर्सी पर बैठ कर कविता सुनाए तो क्या उसका उपहास उड़ाया जाएगा? क्या उपहास उड़ाने वाले कभी वृद्ध नहीं होंगे? इससे भी बडा सवाल यह है कि इतने बड़े रचनाकार के साथ क्या इस तरह का सुलूक क्या उचित है? आपको नहीं सुनना था तो बुलाया ही क्यों और जब वे आ गए तो माईक छीनना कम से कम कवि सम्मलेन की तो परम्परा नहीं है, और वहाँ जो कुछ हुआ उससे यही साबित होता है कि अब अमूमन कवि सम्मलेन में भी लोग सिर्फ चुटकुले चाहते हैं और जो संचालक होते हैं उनको तो दूसरों के पोस्टर उखाड़ने का लाईसेंस मिल जाता है| यह अवमूल्यन लम्बे समय से हुआ है जिसमें दोष श्रोताओं का भी है और कवियों का भी जिनने श्रोता को भ्रष्ट करने में कोई कसर नहीं छोडी है|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-595897636591695944?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/595897636591695944/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/02/blog-post_22.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/595897636591695944'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/595897636591695944'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/02/blog-post_22.html' title='और नहीं बस और नहीं'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-KBYeCeaOoMQ/TWO0T9lmnpI/AAAAAAAAASg/2pQl-IWFrNs/s72-c/santoshand.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-1357680627892473095</id><published>2011-02-15T19:34:00.000-08:00</published><updated>2011-02-15T19:34:03.193-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><title type='text'>लाल लड़ाकों का इमोशनल अत्याचार</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Ij7PWWD5irY/TVtFEVsvYbI/AAAAAAAAASI/w1gXOdWFN7U/s1600/naxal645_1289824283.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="177" width="400" src="http://2.bp.blogspot.com/-Ij7PWWD5irY/TVtFEVsvYbI/AAAAAAAAASI/w1gXOdWFN7U/s400/naxal645_1289824283.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;बस्तर &lt;/b&gt;में अपहरण और रिहाई की का एक और एपिसोड देखने को मिला है जिसमे अंत तो सुखांत ही रहा है| नक्सलियों के चंगुल से छूट कर रिहा हुए जवान और उनके परिजन राहत  की साँसें ले रहे हैं , मीडिया को भरपूर खबर मिली है|स्वामी अग्निवेश ने कहा कि हम एक बड़ी चुनौती, बड़ी समस्या का हल ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी इस कोशिश में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सकारात्मक रूचि दिखाते हुए पहल की है। रिहाई के बाद जो बातें सामने आई हैं उससे हम कह सकते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार ने एक सकारात्मक पहल की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकारों की राय में इस एपिसोड में एक बात खुल कर स्थापित हुई है कि पिछले दो वर्षों से बस्तर में तथाकथित &lt;i&gt;आपरेशन ग्रीन हंट&lt;/i&gt; चलाने के नाम पर जो 700  करोड़ रूपये फूंके गए हैं- नक्सली लड़ाकों ने उस पर पूरी तरह पानी फेर दिया है और अब वे शुद्ध रूप से इमोशनल अत्याचार पर उतर आए हैं| मीडिया का चस्का लग चुका है| यह चस्का नेताओं को भी लगा रहा है|बस्तर के कई गांवों में पीने के  पानी के नल नहीं है लेकिन बस्तर के नक्सली कमांडर मीडिया को रिकार्डेड बयानों की &lt;i&gt;सी डी&lt;/i&gt; भेजते हैं| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह के छत्तीसगढ़ के कुल तीन और बेगुसराय बिहार के पुलिस अपहरण काण्ड की रोशनी में देखें तो साफ़ है कि &lt;i&gt;गुरिल्ला वार&lt;/i&gt; का नया मन्त्र है- जवानो को उठाओ और सरकार की उठक-बैठक कराओ| इस पर भी तुर्रा यह कि दिक्कत सरकार से है , मांगें भी सरकार मानेगी मगर सरकार के किसी नेता या अफसर से बात नहीं करेंगे| ऐसा अपहरण छत्तीसगढ़ में वे पिछले छह महीनों मे दो बार कर चुके हैं और ताजा घटनाक्रम में पांच पुलिसकर्मी पिछले 18 दिनों तक उनके चंगुल में बंधक रहे हैं|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपहृत जवान अबूझमाड़/बस्तर इलाके में रखे गए थे मगर इस इलाके में झाँकने तक की किसी की हिम्मत नहीं रही है क्योंकि इलाका पूरी तरह से जंगली और पहाडी है| दिन में भी यहाँ सूरज की रोशनी जमीन पर बमुश्किल पहुचती है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारायणपुर के गवाड़ी गर्दा गांव के जंगल से आठ नवंबर को दो जवानों का अपहरण कर लिया गया था| हफ्ते भर तक पुलिस खोज में लगी रही और मीडिया के लोग जंगल में नक्सलियों के चंगुल में फंसे जवानों से जा कर मिल आए| इससे पूर्व सितम्बर में सात जवानों का अपहरण करने के बाद नक्सलियों ने तीन जवानों की ह्त्या कर दी थी और शेष चार जवानों को 12 दिनों तक बंधक बनाने के बाद 1 अक्टूबर को रिहा कर दिया था| यह रिहाई मीडिया और सामाजिक संगठनों की पहल पर की गयी थी| नक्सलियों के केशकाल दलम के कमांडर रमेश ने मीडिया में दावा किया था कि वे जवानों को छोड़ देंगे बशर्तें उत्तर बस्तर के उन सभी ग्रामीणों को छोड़ दिया जाए जिनको नक्सली होने के शक में गिरफ्तार किया गया है| हालाकि मीडिया और लोगों के दबाव में सभी रिहा कर दिए गए|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजा हालात में देखें तो नक्सलियों की रणनीति लगता है अब सीधे वार करने की बजाय दबाव बना कर मांगें मनवाने की है और उनके निशाने पर हर बार पुलिस वाले ही होते हैं जिनको बस से बगैर सुरक्षा सफ़र की मनाही है| इस बार भी पुलिसकर्मी बस में निहत्थे सवार थे और आसानी से नक्सली उनको बंधक बना कर ले गए| अपहरण करो और एहसान दिखा कर रिहा करो यह नक्सलियों की नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है|  नक्सलियों की इस नीति का फिलहाल कोई तोड़ नजर नहीं आता क्योंकि बंधक उनके कब्जे में महफूज रहते हैं उनके रहमोकरम पर और कोई उनका किला भेद नहीं पाता हैं और वे कहाँ हैं इसे लेकर सिर्फ कयास भर लगते रहते हैं| वे जिस इलाके में काबिज हैं वह चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला अबूझमाड जंगली इलाका है जहां नंग-धडंग आदिम सभ्यता आज भी ज़िंदा है और यह भी सच है कि पिछले दो वर्षों के सतत काम्बिंग अभियान के बावजूद नक्सली इलाके में महफूज हैं|&lt;br /&gt;for detail news visit samaylive.com hindi/chattisgarh&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-1357680627892473095?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/1357680627892473095/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/02/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1357680627892473095'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1357680627892473095'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='लाल लड़ाकों का इमोशनल अत्याचार'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-Ij7PWWD5irY/TVtFEVsvYbI/AAAAAAAAASI/w1gXOdWFN7U/s72-c/naxal645_1289824283.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-5649695896661542815</id><published>2011-02-07T19:39:00.000-08:00</published><updated>2011-04-25T07:09:14.803-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>यादों में बाबूजी (3 )</title><content type='html'>&lt;b&gt;शिक्षा&lt;/b&gt; के प्रति उनका आग्रह इतना प्रबल था कि गाँव में उन्होंने 1970  के दशक में एक स्कूल खुलवाया, लोग आकर रुक भी जाएं इसके लिए स्कूल के पास कुआं सबके सहयोग से खुदवाया गया |  बेहतर शिक्षा के लिए बच्चों को सदैव प्रेरित करते रहे| उस दौर का कालाहांडी| वेतालकथा वाली रूढ़ियों और आदिम युगीन सभ्यता के दकियानूस रिवाजों से जकड़ा हुआ | &lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-pi_iCvqI3Kc/TbV_b-bAPiI/AAAAAAAAAVg/Arth1H47CBo/s1600/school.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="150" width="200" src="http://3.bp.blogspot.com/-pi_iCvqI3Kc/TbV_b-bAPiI/AAAAAAAAAVg/Arth1H47CBo/s200/school.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;औसत ग्रामीण की सोच थी कि मेरा लड़का पढने जाएगा तो खेत में काम कौन करेगा| अजीब सोच थी कि पढ़ना-लिखना  "लरिया" (हिन्दी भाषी )लोगों का काम है या फिर कटकिया (कटक-उड़ीसा) कुलीन लोग ही पढ़ लिख सकते हैं| बाबूजी ने इस सोच को धीरे-धीरे  बदलने की ठानी| गरीबी इस कदर लोगों में व्याप्त थी कि एक टाईम  के भोजन के लिए लोग बच्चों को कोई न कोई काम कराना ज्यादा पसंद करते| बच्चे पढ़ें और स्कूल में ही उनको &lt;i&gt;"खीरी "&lt;/i&gt;(मध्यान्ह भोजन ) मिले इसकी व्यवस्था की गयी और इस काम के लिए गाँव की एक दबंग और ईमानदार महिला गोरामती को जिम्मेदारी दी गयी| गाँव में उसी दौर में महिला समिति के मार्फ़त बच्चों को दूध पावडर और दीगर चीजें दी जाती| बाबूजी स्वयं आपूर्ति और विभागीय समन्वय के लिए मोर्चा सम्हाले रहते| गाँव के पढ़ाकू लड़कों को पढने के लिए अच्छी पुस्तकें दी जाती| कंदील या ढिबरी जला कर बाबूजी खुद भी पुस्तक या अखबार पढ़ते दीखते| उस जमाने में "लाईट" एक सपना थी| गाँव में अखबार आता नहीं था तो बाबूजी अखबार पढने के लिए दूरस्थ ग्राम पंचायत &lt;i&gt;कुरुमपुरी&lt;/i&gt; जाते और घर पर रेडियो भी चलता | समाचार की एक लाइन पर पूरा गाँव घंटों चर्चा करता |&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TVC3XFMS0GI/AAAAAAAAASA/_4D6uE8Z4U8/s1600/babuji.bmp" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="273" width="255" src="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TVC3XFMS0GI/AAAAAAAAASA/_4D6uE8Z4U8/s400/babuji.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;साईकिल उनके आवागमन का सुलभ साधन थी| घर पर बैल-गाड़ियां उस दौर में आवाजाही का एक मात्र साधन थी मगर बाबूजी साईकिल का ही इस्तेमाल करते | कितनी भी दूर जाना हो वे साईकिल से ही जाते|  भीतर और बाहर से वे एक जैसे थे| समस्या क्या है ये मत देखो समाधान क्या है देखो- वे कहते जब हमारे आँगन में चौपाल लगती और सारे लोग कोई ना कोई समस्या ले कर आते|&lt;i&gt;जय हो &lt;/i&gt;- बाबूजी का अभिवादन तकिया कलाम था | आज गुलजार की मेहरबानी से यह गीत दुनिया भर में गूँज रहा है| गरीब , अमीर सेठ, हमाल, किसान , मजदूर, स्त्री-पुरुष, बच्चे, बूढ़े सबके लिए वे जय हो कहते|आजकल स्कूलों में एक चीज का चलन है- रीसाईक्लिंग मैनेजमेंट| बाबूजी ने घर की पाठशाला में इस बाबत कितने प्रयोग किये यह बताना कठिन है| टूटे कप प्लेट जोड़ दिए जाते जिनमे बिल्लियाँ दूध पीती| &lt;br /&gt;कुर्सी के हत्थे और पाये तार से जोड़ दिए जाते और लोहे की बाल्टी में भी जोड़ लगा कर उसे दुरुस्त करने का हुनर &lt;i&gt;महराज&lt;/i&gt; के पास था जो आसपास के लोग सीख जाते| पुरानी इस्तेमाल की हुई बैटरियों से रेडियो चलाना वे जानते थे| पुराने कपड़ों से रालियाँ (बिस्तर) बनाने में वे माहिर थे| घर की छत पर लगी म्यार (बल्ली) टूट जाती तो उसे बीच से लोहे की पत्तियों पर कीलें ठोक कर जोड़ देते|  ऐसी दुरुस्त बल्लियाँ आज भी सुरक्षित हैं| खाली समय में देसी जुगाड़ से चीजों को दुरुस्त करना उनका प्रिय शगल था| मैंने कभी उनको तनाव ग्रस्त हो कर बैठे नहीं देखा , वे फुर्सत पाते ही किसी  ना किसी  रिसाइक्लिंग वर्क में जुट जाते| साईकिल के टायर-ट्यूब घिस जाते तो उनमे पैबंद लग जाता था|&lt;br /&gt;कोई काम छोटा नहीं होता यह वे अक्सर कहते| वे यह भी कहते कि नीचे देख कर चलो, ठोकर नहीं लगेगी| किफायत, बचत, सादगी और मितव्ययिता और मिनीमम में मैक्सिकम निर्वाह, उस पीढी में सर्वत्र था और बाबूजी तब ऐसा करते हुए एक समय हमें पिछड़े हुए लगते थे मगर आज लगता है कि दिमागों में ठुंसे हुए तथाकथित आधुनिक कचरे के कारण सोच पिछड़ जाती है और पता नहीं क्यों नई पीढी को पुरानी पीढी का काम पिछड़ा हुआ ही लगता है | आज जब मैं गाँव की बात करता हूँ तो बेटा कहता है छोडो ना पापा तब मुझे इस विचित्र पीढी प्रसंग पर हंसी आ जाती है |   (जारी )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-5649695896661542815?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/5649695896661542815/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/02/3.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5649695896661542815'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5649695896661542815'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/02/3.html' title='यादों में बाबूजी (3 )'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-pi_iCvqI3Kc/TbV_b-bAPiI/AAAAAAAAAVg/Arth1H47CBo/s72-c/school.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-4425281885905245629</id><published>2011-01-26T10:26:00.000-08:00</published><updated>2011-04-25T07:08:41.855-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>यादों में बाबूजी(2)</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TUBnBxI_cXI/AAAAAAAAAR0/hqLh-GoO3js/s1600/babuji.bmp" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="273" width="255" src="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TUBnBxI_cXI/AAAAAAAAAR0/hqLh-GoO3js/s400/babuji.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;सदर&lt;/b&gt; बाजार के एक किराए के घर में गुजर-बसर थी| सदर के सेठ हीरालालजी "घी वाले" ने वर को होनहार पाया और किशोरावस्था की शुरुआत में ही सोन महाराज &lt;i&gt;श्रीमती कमलादेवी शर्मा &lt;/i&gt;से ब्याह दिए गए| फिर जैसा कि आम घरों में होता है-गृहस्थी की अडचनें, आगे बढ़ने की ललक और गृहस्थाश्रम  के लक्ष्यों को पाने की कोशिश में सोन महाराज ने कई छोटे -बड़े कामों को साधने की कोशिश की| कुछ दिनों तक आरंग के समीप ग्राम डोमा में भी रहे मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों &lt;i&gt;पश्चिमी उडीसा&lt;/i&gt; में कई मारवाड़ी सेठ अपना कारोबार जमा चुके थे| जहां कारोबार होता है वहाँ मुनीम जरूर होता है| सेठ अनराजजी को भी ग्राम दलदली-नुआपाड़ा- उड़ीसा में भरोसे के मुनीम की जरूरत थी| सोन महाराज को अपने दादाजी श्रीमान &lt;i&gt;रामनारायणजी &lt;/i&gt;के मार्फ़त सन्देश मिला | सोन महाराज रहते तो शहर में जरूर थे मगर उनका मन गाँव डोमा में रम गया था| उनने हामी भर दी| तकदीर उनके लिए एक नया और स्थायी मुकाम तय करने वाली थी| वे अपनी छोटी सी गृहस्थी ले कर दलदली आ गए| गांव नया था मगर सोन  महाराज ने यहाँ काम मुस्तैदी  से किया| कुछ साल सेठजी की मन लगा कर सेवा की लेकिन अगर वे सेठाश्रय में उम्रभर रह जाते तो  शायद वो मुकाम हासिल नहीं कर पाते जो उनने हासिल किया|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोन महाराज की पहली &lt;i&gt;संतान &lt;/i&gt;पुत्री हुई- आशा| छः सात  महीने की आशा को लेकर छोटा सा परिवार दलदली आ गया| फिर परिवार जब बढ़ने लगा तो बड़े स्थान की जरूरत हुई| सेठजी के बाड़े में छोटी सी जगह में गुजारा नहीं हो सका | सेठों से उलझनें कैसे पनपी इसका भी एक प्रसंग है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस जमाने में सरकारी  हुक्म था कि जो भी व्यक्ति जितनी जगह घेर कर सहेजेगा वो जगह उसे दी जाएगी| मुख्य मार्ग की एक जगह सोन महाराज ने विकसित करनी शुरू कर दी तो छोटे सेठ ने आपत्ति दर्ज करा दी| सीमित आमदनी , कई दबाव| पराधीन सपनेहु सुख नाहीं| सोन महाराज आत्म निर्भर होना चाहते थे| आखिरकार नौकरी छोड़ दी| उस जमाने  में  अधिकारी सहृदय हुआ करते थे| उनने देखा कि शहर का एक युवक घोर पिछड़े इलाके में बसना चाहता  है और गाँव के प्रति उसके मन में गहरा अनुराग है लिहाजा मौके पर ही अफसर ने जमीन कुछ शुल्क ले कर सोन महाराज के नाम हस्तांतरित कर दी| छोटा सेठ हाथ मलते रह गए मगर बदले हुए दौर में बड़े सेठजी और उनके परिवार ने हमेशा आत्मीयता कायम रखी| 2 .89 एकड़ के एक विशाल भू -भाग में मकान बना| सोन महाराज बाजार -हाट का काम करने लगे|समय ने ऐसे रफ़्तार पकड़ी कि दस संतानों वाले कुटुंब(आशा,प्रेम,संतोष,हेम,हरीश,रमेश,मोनिका,राजेश,सीमा और चिंटू) में खेत-खलिहान, बाग़-बगीचे और दूध-दही की कोई कमी नहीं रही| आमदनी के कई स्रोत खुले| हर संतान अपना भाग्य ले कर आयी| वह दौर परिवार का स्वर्ण काल था| एक खुशनुमा पल था जो बिखरना तय था| सोन महाराज ने अथक मेहनत करके कुछ संपत्ति जुटा ली तो ईर्ष्यालु  लोग पीछे पड़ गए|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रात जब सोन महाराज और परिवार के लोग गाँव के बाहर थे, चोरों ने सेंध लगा लगा दी| पूरी कमाई लुट गयी| इस घटना ने सोन महाराज को इतना खिन्न और हताश कर दिया कि उसी पल उनने निर्णय ले लिया कि अब गाँव में नहीं रहना| निकटवर्ती कसबे खरियार रोड में जा बसने का इरादा कर लिया| दरअसल इसके पीछे एक वजह और थी| वे चाहते  थे कि पढाई  का जो धन उनको हासिल नहीं हो सका वे उसे अपनी संतानों को जरूर दिलाएं| पढो और बढ़ो- यह वे हमेशा कहते थे| खरियार रोड में बाकायदा मकान खरीदा गया और गृहस्थी एक बार फिर नए सांचे में ढलने लगी| उस खिन्न दौर में गाँव की जमीन का सौदा भी आनन -फानन में कर दिया गया| पेशगी की रकम  मिल गयी मगर होई है वही जो राम रची राखा.. खरीदार पूरे पैसे नही चुका पाया|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे बड़े हो रहे थे| अब फिर फैसले की घड़ी थी| कसबे में रहें या गाँव में रहें? गाँव ज्यादा अनुकूल था| वहाँ सुकून था, नैसर्गिक सहूलियतें थी|  सीधे सच्चे सोन महाराज ने डंडी मरना सीखा नहीं लिहाजा दुकानदारी  भी  नहीं जमा सके| शहरी सभ्यता के तौर-तरीके भी उनको नापसंद थे| मैं भला, मेरी खेती भली| यह उनकी सोच थी| मेहनत करो, फसल उपजाओ -इसके वे पक्षधर थे| उनने एक बार फिर से पक्के तौर पर गाँव में ही जा बसने का इरादा कर लिया और चोरी ने शायद यह सिखा दिया कि सादगी से रहो, जैसा देश वैसा भेस|&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-CMExZm9pRKc/TbWACYlBU5I/AAAAAAAAAVo/5mwBd6CiEGI/s1600/03032011140.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="150" width="200" src="http://2.bp.blogspot.com/-CMExZm9pRKc/TbWACYlBU5I/AAAAAAAAAVo/5mwBd6CiEGI/s200/03032011140.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;एक रात| उनने अपने सभी बच्चों को अपने साथ बिठाया | कंदील और दीपक की रोशनी थी| बच्चों से पूछा- मैं गांव जा रहा हूँ, तुम लोगों को को पढ़ना है तो शहर जाना होगा या फिर मेरे साथ गाँव चलो|बच्चों को पढ़ना था| आम सहमति शहर पर बनी| जिन्दगी ने अब एक नई करवट ली| खरियार रोड पिछड़ा कस्बा था| उच्च शिक्षा के साधन नगण्य थे| बच्चे अपने दादा और नाना के परिवारजनो के पास रायपुर आ गए| तब &lt;i&gt;रायपुर &lt;/i&gt;एक जिला हुआ करता था| शांत और रहमदिल लोगों का धड़कता हुआ शहर | छत्तीसगढ़ राज्य बनने की कल्पना भी नहीं थी|  अब तक मित्रों आप जान ही चुके कि सोन महाराज ही मेरे बाबूजी थे|                                                     (जारी ...)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-4425281885905245629?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/4425281885905245629/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/01/2.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4425281885905245629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4425281885905245629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/01/2.html' title='यादों में बाबूजी(2)'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TUBnBxI_cXI/AAAAAAAAAR0/hqLh-GoO3js/s72-c/babuji.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-1628239809582187736</id><published>2011-01-17T01:13:00.000-08:00</published><updated>2011-04-25T07:09:49.128-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>यादों में बाबूजी-(1)</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TTQBT-iZ3HI/AAAAAAAAARE/7DOjE4_BkKM/s1600/babuji-001.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="332" width="400" src="http://3.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TTQBT-iZ3HI/AAAAAAAAARE/7DOjE4_BkKM/s400/babuji-001.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;------------------------------------------&lt;br /&gt;**************&lt;br /&gt;------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;मेरे पिता को गुजरे हुए 14 साल बीत चुके हैं लेकिन वे लगातार मेरी स्मृतियों में बने रहे हैं| &lt;br /&gt;ये स्मृतियाँ मुझे आगे बढ़ने की शक्ति देती हैं और गहन उदासी के पलों में आंतरिक संबल बनी रहती हैं| &lt;br /&gt;जाने किन-किन पलों में उनके बारे में लिखता चला गया| कई दिन.. कई माह गुजरे और अब न जाने क्यूं लगता है कि मैंने बाबूजी पर जो लिखा वह मेरी निजी डायरी का हिस्सा भर नहीं होना चाहिए|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे अंतस की गहराईयों से दुआ उनके लिए जिनके "बाबूजी" हैं, वे उनको संभालें, बरगद की छाँव नसीब से मिलती है|&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;b&gt;गिरीशजी&lt;/b&gt; का शेर है- &lt;/i&gt;&lt;br /&gt;''जब बुजुर्गों की दुआएं  साथ रहती हैं &lt;br /&gt;यूं लगे शीतल हवाएं साथ रहती हैं''&lt;br /&gt;-------------------------------------------&lt;br /&gt;**************&lt;br /&gt;-------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जीवन &lt;/b&gt;जब से शुरू हुआ है तभी से संघर्ष उसके साथ जुड़ा हुआ है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरेक जीव अपने जीने के लिए संघर्ष करता है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन में आने का संघर्ष, जीवन को बचाने और अपने मुताबिक़ पूर्णत्व को पाने के साथ ही समाप्त होता है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग जीवन के संघर्ष से दुखी हो कर तमाम उम्र रुआंसे रह जाते हैं तो कुछ अपने जीवन के संघर्ष में तप कर सोने के कुंदन हो जाने की स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं और उनका जीवन एक मिसाल बन जाता है-दूसरों के लिए|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगन और मेहनत से वे जीवन में ही बहुत कुछ हासिल कर लेते हैं| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सोन महाराज&lt;/b&gt; का जीवन भी कुछ ऐसा ही था| माँ-पिता के इकलौते पुत्र| लाड-प्यार में पले-बढे| &lt;i&gt;राजस्थान&lt;/i&gt; के जिला जोधपुर-फलोदी-लोहावट में जन्मे मगर तकदीर छत्तीसगढ़ और उड़ीसा ले आई| &lt;br /&gt;तब पश्चिमी उड़ीसा का एक बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ अर्थात दक्षिण कोसल का ही एक अंग था|&lt;br /&gt;सोन महाराज उनका प्रचलित नाम था-पूरा नाम था सोहनलालजी शर्मा| घर के लोग सोनू कहते|&lt;br /&gt;बड़े घरानों में मुनीम ब्राह्मण को महाराज कह कर बुलाया जाता है लिहाजा वे सोन महाराज के नाम से ही जाने गए|  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन से कुशाग्र बुद्धि थे और सहनशीलता,परोपकार,त्यागवृत्ति और सबसे दुर्लभ मानवीय गुण मैत्री समभाव उनके स्वभाव के आभूषण रहे| अपने इन्ही गुणों की बदौलत वे जहां भी रहे उन्होंने सम्मान हासिल किया और सर्वात्मीय बने रहे|  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोन महाराज के पिता&lt;i&gt; अचलदासजी&lt;/i&gt; अपने जमाने के दबंग शिक्षक थे और राजस्थान  में उनके  पढाए हुए छात्र मुख्यमंत्री की कुर्सी तक जा पंहुचे..  लेकिन शायद दीपक तले ही अन्धेरा रहता है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढने-लिखने में कुशल रहने के बावजूद परिस्थितियों ने ऐसा घेरा कि सोन महाराज कालेज की पढाई भी पूरी नहीं कर सके और विभाजन के दिनों में जब पूरे देश में उथल-पुथल थी, पूरा परिवार भीषण दुर्भिक्ष की चपेट में आ कर पलायन के लिए विवश हो गया| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोन महाराज का पूरा कुनबा राजस्थान से रायपुर आ गया| घर पर कुल चार प्राणी| छोटी बहन नरबा और माता बलजीबाई| रायपुर आने के बाद अचलदासजी का कार्यक्षेत्र बदल गया| उनके भाई रिखबदासजी रायपुर की अनेक व्यापारिक फर्मों में मुनीम थे लिहाजा अपने भाई अचलदासजी  का उन्होंने इसी लाईन में पुनर्वास करा दिया| शिक्षा क्षेत्र की पटरी से उखड़ कर अचलदासजी काम तो करते रहे मगर जम नहीं पाए| नतीजा यह हुआ कि सोन महाराज पर समय से पहले परिवार की जिम्मेदारी आ गयी|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विस्थापन के उस दौर में सोन महाराज बमुश्किल 10 बरस के रहे होंगे | रायपुर के हिन्दू हाई स्कूल में दाखिल जरूर हुए मगर कालेज तक नहीं पहुँच पाए| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.................(जारी)...........................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-1628239809582187736?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/1628239809582187736/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/01/1.html#comment-form' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1628239809582187736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1628239809582187736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/01/1.html' title='यादों में बाबूजी-(1)'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TTQBT-iZ3HI/AAAAAAAAARE/7DOjE4_BkKM/s72-c/babuji-001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-386386176142919101</id><published>2011-01-08T20:24:00.000-08:00</published><updated>2011-01-08T20:24:44.417-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>सब पर भारी  श्वेता तिवारी</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TSk3KqRLPdI/AAAAAAAAAQ8/nsm2B8X4xGA/s1600/big-boss3_d.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="242" width="322" src="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TSk3KqRLPdI/AAAAAAAAAQ8/nsm2B8X4xGA/s400/big-boss3_d.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;आमतौर &lt;/b&gt;पर सेल्यूलाईड की रोशनी में झिलमिलाते सितारों को बहुत करीब से दिखाने वाले टीवी शो बिग बॉस में दर्जन भर नामचीन हस्तियों के बीच १४ हफ्ते तक चले मुकाबले में&lt;i&gt; श्वेता तिवारी &lt;/i&gt;सब पर भारी पडीं| बिग बॉस सीजन -४ का यह शो शुरू से ही कई कारणों से दिलचस्प बन गया था| एक तो जम कर गाली-गलौज और दूसरा हॉलीवुड सेलिब्रिटी पामेला एंडरसन की एंट्री और सारा खान की शादी की नौटंकी की वजह की वजह से। &lt;i&gt;कलर्स &lt;/i&gt;पर प्रसारित होने वाले इस चर्चित रियलिटी शो में शशिकला की नई अवतार डाली बिंद्रा और श्वेता तिवारी के बीच झगडे के बाद से ही तय हो गया था की असली कंटेस्टेंट श्वेता ही है| श्वेता ने गुस्सा भी दिखाया लेकिन आपा खोते हुए भी वे वाचाल नहीं हुईं| उनने अपनी इमेज को आखिर तक मेंटेन किया और व्यवहार, विचार और आचार सभी मोर्चों पर वही रहीं जो वे हैं| एक घर में 14 हफ्ते बिताना किसी के लिए भी आसान नहीं है इसके बावजूद कि सब स्क्रिप्टेड हो| एक करोड़ रुपयों की राशि  श्वेता ने जीत ली हैं| यह बड़ी रकम है और इस राशि से यकीनन उनको  अपनी उस बच्ची के लालन पालन में मदद मिलेगी जिसका पियक्कड़  पिता उसके साथ नहीं रह पाया | शो बिजनेस की चकाचौंध से भरी दुनिया में कई श्वेता तिवारी हैं जो एक साथ कई मोर्चों पर जूझती हैं  और सबको हैरान कर  देती हैं जब वे अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवा लेती हैं|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिग बॉस का कांसेप्ट ही शायद इसलिए सफल रहा है कि दर्शक सोप आपेरा देख-देख कर बोर हो चुके हैं| अब वे नया और स्वाभाविक देखना चाहते हैं| रील लाईफ नहीं रीयल लाईफ| यह नए दौर की दुनिया है| सूचना माध्यम इतने  तगड़े हैं कि अब मायापुरी और माधुरी पढने के लिए हफ्ता भर इंतज़ार की  जरुरत नहीं पड़ती| अखबार ही सितारों की जमीन नाप लेते हैं| ऐसे दौर में रीयल लाईफ हीरो या हीरोइन में दर्शक अपना अक्स ढूंढते हैं| क्या वजह रही कि शो के पूरे समय औसतन दर्शक वर्ग से श्वेता के नाम की ही पुकार मचती रही शायद इसलिए भी कि उनने सकारात्मक भारतीय मूल्यों का सर्वाधिक प्रतिनिधित्व किया और यह भी ना भूलें कि हमारे यहाँ&lt;i&gt; सीता &lt;/i&gt;की पूछ है तो &lt;i&gt;कैकेयी &lt;/i&gt;की भी, इसीलिए शो में लड़ लड़ कर या लड़ने के लिए हरवक्त तैयार, भीमकाय खली तक को गरिया देने वाली  &lt;i&gt;डाली बिंद्रा&lt;/i&gt; को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया और इसलिए दुबारा उनकी एंट्री हुई|नायिका को सफल करने के लिए खलनायिका भी जरूरी  है इसलिए क्रेडिट तो डाली को भी जाना चाहिए जिनके कारण श्वेता उभर पाईं|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-386386176142919101?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/386386176142919101/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/386386176142919101'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/386386176142919101'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='सब पर भारी  श्वेता तिवारी'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TSk3KqRLPdI/AAAAAAAAAQ8/nsm2B8X4xGA/s72-c/big-boss3_d.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-9108883483775038096</id><published>2010-12-28T05:38:00.000-08:00</published><updated>2010-12-28T06:20:06.675-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>बामुलाहिजा बिनायक सेन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TRnqX1ovk3I/AAAAAAAAAQg/-DmD4t-HmyE/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 275px; height: 183px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TRnqX1ovk3I/AAAAAAAAAQg/-DmD4t-HmyE/s400/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5555729310594077554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मानवाधिकार&lt;/span&gt; कार्यकर्ता एवं चिकित्सक बिनायक सेन को रायपुर की एक अदालत ने देशद्रोह के आरोप में सजा क्या सुनाई दुनिया-भर में बौद्धिक भूचाल आ गया है| अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई है| सेन की वयोवृद्ध माताजी ने भी अपने बेटे को बेकसूर माना है और रिहाई की अपील की है| ख़ास कर के नेट जगत में इस फैसले की जम कर मजम्मत की जा रही है |सेन और उनके दीगर दो सजा पाए कथित साथियों पर छत्तीसगढ़ में माओवादियों को मदद पहुंचाने का आरोप है और सरकारी वकीलों का आरोप है कि उन्होंने माओवादी नेटवर्क को मजबूत करने में मदद की है| हालांकि सेन हमेशा खुद को बेकसूर बताते रहे हैं. उन्होंने एक ताजा बयान जारी कर कहा है कि उनके खिलाफ सबूत गलत तरीके से जुटाए गए|सेन ने अपने बयान में कहा, &lt;span style="font-style:italic;"&gt;"छत्तीसगढ़ सरकार मुझे मिसाल बना कर पेश करना चाहती है कि कोई दूसरा व्यक्ति राज्य में मानवाधिकार की बात न करे."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेन समर्थक कह रहे हैं कि उनको सुनाई गई सजा कानूनी आधार पर खरी नहीं उतरती। उनके खिलाफ कोई गवाह तक नहीं है। दस्तावेजी सबूत भी देशद्रोह का आरोप सिद्ध नहीं करते| फैसले की आलोचना करने वालों का कहना है कि डॉ. सेन को सीपीआई (माओवादी) का करीबी बताया गया है, जिसका आधार दो पुलिसवालों का निराधार बयान है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; उन्हें रिहा करने के लिए इंटरनेट पर&lt;span style="font-style:italic;"&gt; फेसबुक &lt;/span&gt;और&lt;span style="font-style:italic;"&gt; ट्विटर&lt;/span&gt; के जरिए बड़ा अभियान शुरू हो चुका है| सजा के खिलाफ वामपंथी रुझान रखने वाले तमाम बुद्धिजीवी लामबंद हो गए हैं। दिल्ली समेत देश भर में कई जगहों पर प्रदर्शन हुए हैं । इन बुद्धिजीवियों का हस्ताक्षरित आरोप है कि सेन को जानबूझकर फंसाया गया है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके वकील&lt;span style="font-style:italic;"&gt; कोलिन गोंजाल्वेज&lt;/span&gt; ने सर्वोच्च अदालत के आदेशों को नजरअंदाज करने वाला फैसल बताया। सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ सिंह विरुद्ध बिहार के मामले में कहा था कि देशद्रोह के आरोपों को संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संदर्भ में भी परखना चाहिए|देशद्रोह का अपराध तभी साबित होता है, जब राज्य के खिलाफ बगावत फैलाने का असर सीधे तौर पर हिंसा और कानून-व्यवस्था के गंभीर उल्लंघन के रूप में सामने आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन पलट आरोपों की रोशनी में देखा जाए तो सेन के मामले में ऐसा लगता है कि कोर्ट ने मानो उनको जबरिया सजा सुनाई है | फैसले के पक्षधर लोगों की तरफ से कहा जा सकता है कि सेन समर्थक सिर्फ एकांगी चश्मे से चीजों को देख रहे हैं| सवाल है कि सेन ने ऐसा क्या किया जो वे सुरक्षा बलों की निगाह में आ गए| इसके लिए बस्तर में लौटना  होगा| बस्तर में सलवा जुडूम आन्दोलन चला जो नक्सली हिंसा के खिलाफ था| इस पर पूरे राज्य में औसतन सकारात्मक प्रतिक्रिया आई| हिंसा से आजिज लोगों ने जुलूस निकाले और नक्सलियों की खिलाफत की| 2005 में यह हुआ| हालात ऐसे मोड़ पर आ खड़े हुए कि तब से एक वर्ग जिसमे सेन भी रहे हैं , ने सलवा जुडूम का विरोध किया| सवाल था कि सलवा जुडूम के विरोध का मतलब नक्सलियों का अघोषित समर्थन| इस विरोध के बाद सेन अपनी साफगोई और सादगी के शिकार हुए| वे जेल में बंद संदेहियों से मिलते रहे,पत्र पहुंचाते धरे गए(आरोप है )|वे जिस विचारधारा से जुड़े वो हिंसा को गलत नहीं मानती| साबित हो जाने पर क़ानून गलत मानता है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरीबों के इलाज का जो रास्ता उनने पकड़ा वो तो ठीक था, स्तुत्य था.. मगर खुद श्री सेन भी शायद नही जानते होंगे कि अचानक चलते-चलते  वे एक ऐसी बारूदी सुरंग में फंस गए जिसमे दोनों तरफ खतरे थे| फिर एक समय भी  आया जब नक्सलियों ने वामपंथियों को भी शर्मिन्दा किया तो सेन ने नक्सली हिंसा की निंदा भी की लेकिन तब तक हालात बेकाबू हो चुके थे और अब तो हालात यह हैं कि नक्सली रहें या राज्य सत्ता| नक्सलियों  ने जिस प्रकार जवानों को एम्बुश में फंसा कर उनको मारा , उसकी दिल्ली और दुनिया-भर में प्रतिक्रिया हुई| अब तक बस्तर में आदिवासियों का शोषण हो रहा था, ठेकेदार लूट रहे थे, अफसर घूस लेते थे, सब चलता था. मगर शोषण का जवाब हिंसक शोषण तो नहीं है| अब वहाँ युद्ध के हालात हैं| सीधी लड़ाई है कि नक्सली रहें या सरकार... तो इसमें जो भी सामने पडेगा वो चिन्हित होगा| सेन साब के प्रति परिचय न होते हुए भी सम्मान की भावना है कि उनने डाक्टरी छोड़ कर गरीबों की सेवा का रास्ता चुना वरना आजकल तो लोग मेडिकल पढ़ते हुए ही नर्सिंग होम खोलने की जुगत में भिड जाते हैं| जो भी अमरीका, दिल्ली  या दूर-दराज में बैठ कर चिंतित हैं, उनको यहाँ की स्थिति आ कर देखनी चाहिए कि वे जिन आदिवासियों की बात कर रहे हैं वो सिर्फ शान्ति चाहता है| नक्सली, क्रान्ति लाने में बस्तर के तीस साल निकाल चुके अब सरकार को शान्ति लाने का वायदा पूरा करने के लिए कुछ साल देने में क्या हर्ज है|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-9108883483775038096?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/9108883483775038096/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/12/blog-post_28.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/9108883483775038096'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/9108883483775038096'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/12/blog-post_28.html' title='बामुलाहिजा बिनायक सेन'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TRnqX1ovk3I/AAAAAAAAAQg/-DmD4t-HmyE/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-4292323311678583366</id><published>2010-12-24T07:09:00.000-08:00</published><updated>2010-12-24T07:14:18.596-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>अटल राजनीति</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TRS4w3DOAnI/AAAAAAAAAQU/8JC5N-L-iOA/s1600/atalji.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 263px; height: 192px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TRS4w3DOAnI/AAAAAAAAAQU/8JC5N-L-iOA/s400/atalji.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5554267390005346930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भारतीय&lt;/span&gt; राजनीति के शलाका पुरुष सम्माननीय &lt;span style="font-style:italic;"&gt;अटल बिहारी वाजपेयी&lt;/span&gt; कल अपना 87वां जन्म दिन मनाएंगे| राजनीति हो या समाज का कोई और भी क्षेत्र , अटलजी ने अपनी एक ऐसी साख बनाई है जो आज की तारिख में किसी और नेता की है यह कोशिश करके भी दावे से नही कहा जा सकता| धोती पहनने वाले, सादगी को आचरण में दर्शाने वाले और जो कहा सो कर दिखाने वाले नेताओं की परिदृश्य से गुम हो चुकी पीढी में अटलजी आज भी अग्रिम पंक्ति में हैं और सक्रिय न होते हुए भी अपनी चमक बिखेरे हुए हैं| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में उनके प्रधान मंत्रित्व काल की संसदीय  रिपोर्टिंग से जुडी दो तीन घटनाएं हरदम याद आती हैं| एक तब, जब वे पहले बार पीएम बने मगर सिर्फ एक वोट से सरकार गिर गयी| तब प्रमोद महाजन जीवित थे और जोड़-तोड़ में माहिर थे मगर अटलजी ने जोड़-तोड़ से साफ़ मना कर दिया| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पद के लिए मूल्यों से समझौता नहीं करने का ऐसा जज्बा आज किस नेता में दिखता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संसद में लोक सभा की कार्यवाही उस रोज दिन भर  और पूरी रात चली जब हिंदुत्व पर अटलजी का समापन भाषण आया| उसका सार यही था-हम स्वामी विवेकानंद के हिंदुत्व को मानते हैं जिसमे समरसता और उदात्त भावना है| संकीर्णता नहीं| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषण में सिद्धहस्त अटलजी को सुनते हुए एक पूरी पीढी बड़ी हुई है और कहना न होगा कि भाषण सुनने की वैसी ललक अब नई पीढी में नहीं है क्योंकि अटलजी जैसा भाषण देने वाले भी नहीं हैं| सरस्वती उनके कंठ में विराजती है| भाषण सुनने वाला उनका मुरीद हुए बिना नहीं रह सकता|&lt;br /&gt; हे प्रभु मुझको इतनी ऊंचाई मत देना कि गैरों को गले न लगा सकूँ -जैसी पंक्तियाँ रच चुके अटलजी ने कविता को गहरे मानवीय सरोकार दिए और सब जानते हैं कि राजनीति में आने से पहले वे पत्रकार रहे हैं| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक घटना मुझे याद आती है | तब वे नेता प्रतिपक्ष थे| इंडिया इंटरनॅशनल  सेंटर में उनको साहित्य अकादमी वालों ने बुलाया था| कार्यक्रम के अंत में एक महिला ने तपाक से पूछा &lt;span style="font-style:italic;"&gt;-अटलजी आपको क्या लगता है कि आप राम नहीं बन पाए या सीता को नहीं ढूंढ पाए ? उसी पल तत्काल जवाब आया- आप मिल ही गयी  हैं अब दोनों मिल कर ढूंढ लेंगे| &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हाजिर-जवाबी में माहिर और दूरंदेशी अटलजी ने जब परमाणु विस्फोट कराया तो दुनिया भर में भारत को अजीब नजरों से देखा गया| प्रतिबन्ध लगे| मगर अटलजी टस से मस नहीं हुए| कूटनीति में उनका भी जवाब नहीं रहा| उन्होंने दुनिया भर में दूत भेजे और देर-सबेर सबको मनवा लिया कि हम भी परमाणु शक्ति हैं|आज उस परीक्षण का असर यह है कि आए दिन युद्ध के धमकी देने वाले सदादुखी पड़ोसी अब शांत हैं| सबको साथ ले कर चलने  की राह अटल जी ने चुनी| एन डी ए सरकार बना कर अटलजी ने गठबंधन राजनीति का एक नया अध्याय लिखा| उनकी सरकार पूरे समय तक चली| सेहत ने साथ नहीं दिया और वे खुद घोषणा कर गए कि अब प्रधान मंत्री नहीं बनूंगा वरना राजनीति के पंडित भी जानते हैं कि आज भी अटलजी अखिल भारतीय सर्वमान्य न सही मगर सारे नेताओं में सबसे अधिक बहुमान्य नेता हैं| उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की शुभकामना|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-4292323311678583366?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/4292323311678583366/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/12/blog-post_24.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4292323311678583366'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4292323311678583366'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/12/blog-post_24.html' title='अटल राजनीति'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TRS4w3DOAnI/AAAAAAAAAQU/8JC5N-L-iOA/s72-c/atalji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-7479123951802348498</id><published>2010-12-14T06:15:00.000-08:00</published><updated>2010-12-14T06:18:52.341-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>आदमी को हांकता है आदमी</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TQd8mdc-liI/AAAAAAAAAQE/qYlj4CRydMQ/s1600/riksha.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 266px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TQd8mdc-liI/AAAAAAAAAQE/qYlj4CRydMQ/s400/riksha.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5550542065940469282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;उत्तर प्रदेश &lt;/strong&gt;को देश भर में सिरमौर राज्य का दर्जा यूं ही हासिल नहीं है| फिर चाहे वह साहित्य के क्षेत्र में  हो या राजनीति के क्षेत्र में|  हाल के वर्षों के कुछ घटनाक्रम को छोड़ दिया जाए तो यूपी ने हमेशा लीड किया है और एक बार फिर से &lt;em&gt;अलीगढ&lt;/em&gt; के एक काबिलेतारीफ अफसर  ने मानवता को हमेशा कलंकित करने वाले पेशे के खिलाफ अपना  हौसला दिखाया है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिलाधिकारी &lt;em&gt;रविंद्र नायक  &lt;/em&gt;ने एक आदेश निकला है जिसके मुताबिक़ ऊंचाई वाली जगहों पर रिक्शे पर बैठा हुआ पाए जाने पर सवारी को 500 रुपये का जुर्माना भरना पड़ेगा।आदेश में साफ़ चेतावनी  है कि अगर अलीगढ शहर में फ्लाईओवरों, पुलों या चढ़ाई वाले अन्य स्थानों पर किसी व्यक्ति को साइकिल रिक्शा पर बैठे हुए पाया गया तो उससे 500 रुपये का जुर्माना वसूला जाएगा| नायक का कहना है कि मानवता के लिहाज से यह आदेश जारी किया गया है। मुझे लगता है कि रिक्शेवाले को चढ़ाई वाली जगहों पर किसी व्यक्ति को बैठाकर रिक्शा खींचने में बहुत परेशानी होती है। ज्यादातर लोग चढ़ाई पर नहीं उतरते, जो उचित नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ज़रा गौर करें अपने शहर के हालत पर.. एक हांफता हुआ इंसान खींच रहा है सवारियों से लदा हुआ रिक्शा| मोटे-मोटे हट्टे-कटटे लोग  जम कर बैठ जाते हैं और यह भी नहीं देखते कि बेचारा रिक्शावाला कितनी तकलीफ से रिक्शा  खीचता है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;गिरीश पंकजजी &lt;/em&gt;की कविता से बात शुरू करें जो बरसों पहले जब उनने आग उगलती कविताएँ रचने के दौर में लिखी थी-  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;खून से जो ज़िन्दगी को सींचता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी आदमी को खींचता  है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी को हांकता है आदमी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सदी की सबसे बड़ी नीचता है| &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;सचमुच यह काम बहुत अमानवीय है  कि कोई रिक्शे  पर सपरिवार चढ़  जाए और रिक्शा-वाले की जान पर बन आए| रिक्शा वालों की दशा सुधरने के लिए दुर्ग की सांसद &lt;em&gt;सरोज पांडे &lt;/em&gt;ने मेयर रहते हुए कई अच्छी काम किये थे| उनको चिकित्सा और दीगर सहूलियतें दी थी मगर वो काम नहीं कर पाईं जो &lt;em&gt;रविन्द्र  नायक &lt;/em&gt;साहब कर गए हैं| सचमुच होना चाहिए जुर्माना और यह भी तय हो कि कितने लोग बैठें? सवारियों की लदान को देखते हुए कुछ शहरों में रिक्शे डिजाइन ही इस तरह किये गए कि दो से ज्यादा लोग बैठ ही ना सकें| आखिरकार एक इंसान की मेहनत की  मजदूरी देने का मतलब यह तो नहीं कि उसे बैल की तरह जोत दिया जाए| यह मांगें भी उठती रही हैं  कि रिक्शों पर प्रतिबन्ध होना चाहिए| मतलब रिक्शे बंद| मेरी राय में यह अति होगी| कई लोगों से बातचीत  में मैंने पाया कि रिक्शे आजीविका के सहज स्रोत हैं| गाँव से शहर में आए हैं कोई काम नहीं मिला तो पेट भरने के लिए रिक्शा खींच लिए| कोई ठौर नहीं मिला तो रिक्शे  में ही सो लिए| वैसे अंततः बैन ही विकल्प है मगर वो आदर्श स्थिति तब आएगी जब हर हाथ को मनचाहा काम मिलेगा और हर सवारी को गली के मोड़ पर वाहन मिलेगा| मगर तब  तक ऐसे आदेश की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए बल्कि खुद यह नियम लागू हो जाए कि ऊँचे रास्तों  पर सवारी यदि उतर सके तो उतर जाए वरना भरिये जुर्माना|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-7479123951802348498?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/7479123951802348498/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/12/%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A4%95%E0%A4%A4-%E0%A4%B9-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%AE.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/7479123951802348498'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/7479123951802348498'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/12/%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A4%95%E0%A4%A4-%E0%A4%B9-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%AE.html' title='आदमी को हांकता है आदमी'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TQd8mdc-liI/AAAAAAAAAQE/qYlj4CRydMQ/s72-c/riksha.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-1746641768717846022</id><published>2010-12-01T07:27:00.000-08:00</published><updated>2010-12-04T02:55:49.535-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>राडिया रेडिएशन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TPZrKrP551I/AAAAAAAAAPc/8jR1-59EEWM/s1600/caricature%2Bfor%2Bradia%2Bcolumn.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 291px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TPZrKrP551I/AAAAAAAAAPc/8jR1-59EEWM/s400/caricature%2Bfor%2Bradia%2Bcolumn.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5545737822305642322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पूरे&lt;/span&gt; पत्रकार जगत में आजकल &lt;span style="font-style:italic;"&gt;नीरा राडिया&lt;/span&gt; का नाम  रेडिएशन  की तरह फ़ैल गया है| ख़ास करके दिल्ली  के पत्रकार एक दूसरे से मजाक में ही सही, यह पूछना नहीं  भूल रहे हैं कि डियर!  तुमको भी राडिया ने फोन किया या नहीं?&lt;br /&gt; पूरा मामला एक उच्च  स्तरीय  महिला कॉरपोरेट लॉबियिस्ट और सत्ता के गलियारों में उसकी घुसपैठ का है और कहने में गुरेज नहीं कि जिसे नीरा ने फोन किया और उनके टेप एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत सार्वजनिक हो गए वे अब खिसियाकरअपना खम्बा  भूल दूसरे का खम्बा  नोच रहे हैं और इस पूरे एपिसोड में और भी दिलचस्प यह  है कि बहुत से  लोग प्रवचन बघार रहे हैं  और ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि वे  अब तक नहीं फंसे |&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एन डी टी वी की स्टार रिपोर्टर बरखा दत्त, वीर संघवी  और आजतक के सीधी बात वाले आदरणीय प्रभु चावला के राडिया से बातचीत के टेपों की ट्रांस-स्क्रिप्ट पढ़ चुके लोग जानते हैं कि बावेला इसलिए मच रहा है क्योंकि यह मामला पत्रकारिता का तो कतई नहीं है| आजकल पत्रकारों के साथ अनिवार्य रूप से नत्थी हो चुके दीगर कामों का है और गुड खा कर गुलगुले से परहेज की दलीलें देने जैसा ही कुछ है|  सब जानते हैं कि शार्टकट से ऊपर पहुंचा हुआ जो जितना बड़ा है वो दिनरात मैनेज  करने में भिड़ा है और मैनेज की राह में हर मोड़ पर एक राडिया खडी है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नेता-अफसर-ठेकेदार गठजोड़ की एक पूरी जमात ने पहले पत्रकारों का इस्तेमाल किया (या वे खुद इस्तेमाल हुए )और ख़बरों की, एक दूसरे को धकिया कर रातों-रात पदोन्नत होने, नाम कमाने की पिपासा ने पत्रकारों को एक ऐसे अंधे कुँए में धकेला जिसमे से निकलना मुश्किल है|  इस पूरे प्रसंग में राडिया  की भूमिका खुली किताब की तरह है| वो जो है सो घोषित है  मगर जो,बड़े-बड़े लोग हैं जिनके नाम लेकर नए पत्रकार लिखने के लिए प्रेरित होते रहे हैं उनका कडुवा सच  एक थप्पड़ के तौर पर पत्रकारिता के गाल पर पड़ा है| अब भले ही वे लोग कहें कि हम पत्रकार हैं और ख़बरों के लिए हमें दलालों  से भी संपर्क रखना पड़ता है मगर एक सीधी बात दीखती  है कि "बातचीत" में सब कुछ है बस खबर ही गायब है | यहाँ सवाल पत्रकारिता की हकीकत का है और जिनको नही मालूम कि अब पत्रकारिता मिशन नहीं रही उनको आँखें खोल लेनी चाहिए और जो काजर की इस कोठरी  में बेदाग़ रहने का इरादा रखते हों तो जान लें कि नीरा राडिया हर कदम पर है मगर बातचीत क्या करेंगे यह खुद तय कर लें और यह भी पूरे होश में जान लें कि दूसरों को आईना दिखाने वालों के लिए बहुत आईना देख चुके लोगों ने लगता है अब कमर कस ली है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सूचना: &lt;/strong&gt;&lt;em&gt;मैंने कमेन्ट के लिए निर्बाध प्रणाली चुनी है, जो लिखेंगे, अवश्य छपेगा... मगर देखने में आ रहा है कि अल्ल-बल्ल ठीक नहीं है|अपने कमेन्ट को गुलदस्ता या बगीचा बनाएं...&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;strong&gt;शब्द संवारे बोलिए&lt;br /&gt;          शब्द के हाथ न पांव,&lt;br /&gt;         एक शब्द करे औषधि &lt;br /&gt;          एक शब्द करे घाव &lt;/strong&gt; &lt;br /&gt; ............................................................................................................................................................................................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-1746641768717846022?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/1746641768717846022/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form' title='13 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1746641768717846022'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1746641768717846022'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='राडिया रेडिएशन'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TPZrKrP551I/AAAAAAAAAPc/8jR1-59EEWM/s72-c/caricature%2Bfor%2Bradia%2Bcolumn.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-5848301264316964288</id><published>2010-11-23T06:16:00.000-08:00</published><updated>2010-11-24T03:34:33.891-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>अति वर्जयेत अरुंधति</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TOvQ-zIZilI/AAAAAAAAAPU/BjgE13VDkLc/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 272px; height: 185px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TOvQ-zIZilI/AAAAAAAAAPU/BjgE13VDkLc/s400/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5542753543705430610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;#लेखिका &lt;/span&gt;एवं सामाजिक कार्यकत्री अरूधंति राय के &lt;span style="font-style:italic;"&gt;भुवनेश्वर&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; के एक कार्यक्रम में संघ के कार्यकर्ताओं और आयोजकों के बीच हुए एक संघर्ष में आधा दर्जन लोग घायल हो गए. अरुंधति ने नक्सलियों को देशभक्त माना है|&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;.# भड़काऊ भाषण देने पर लेखिका अरुंधति रॉय के खिलाफ जिला अदालत में एक याचिका दायर की गई। ग्लोबल ह्यूमन राइट्स काउंसिल की तरफ से एसीजेएम अंशुल बेरी की अदालत में दायर इस याचिका में मांग की गई है कि अरुंधति रॉय को इस तरह के बयान देने से रोका जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# कश्मीर पर दिए बयान से विवादों में घिरी लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा कि देश में स्वतंत्र लेखकों की आवाज को दबाया जा रहा है। &lt;span style="font-style:italic;"&gt;बुकर पुरस्कार&lt;/span&gt; विजेता लेखिका अरुंधति रॉय ने दिल्ली में हुए एक सेमिनार में कहा कि कश्मीर के लोग दुनिया के सबसे बर्बर सैनिकों के कब्जे में रह रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# दिल्ली में रविवार को भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा ने अरुंधति रॉय के घर के बाहर हंगामा और तोड़फोड़ किया। भाजपा महिला मोर्चा ने कहा कि या तो अरुंधति रॉय कश्मीर पर दिए अपने बयान को वापस लें या पाकिस्तान जाकर रहें।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;# पटियाला हाउस कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर पूछा है कि अरुंधति रॉय और सैयद अली शाह गिलानी के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# 13 फरवरी को दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक वार्ता के दौरान युवा (यूथ यूनिटी फॉर वाइब्रेंट एक्शन) के एक सदस्य ने लेखिका पर पाकिस्तान का समर्थन करने के विरोध में जूता फेंक दिया था। बाद में एक नीलामी में यह जूता एक लाख रुपए में बिका था। &lt;br /&gt;# जम्मू एवं कश्मीर को लेकर विवादास्पद बयान देनेवाली लेखिका अरुंधति राय ने कहा है कि उन्हें उस मुल्क पर दया आती है, जहां इंसाफ की बात करनेवालों को जेल में डाला जाता है। उन्होंने कहा कि उनकी ओर से कश्मीरियों के लिए सिर्फ इंसाफ की आवाज उठाई गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         ये कुछ शाब्दिक तस्वीरें हैं | मकसद सिर्फ यह है कि स्वतन्त्रता अब इस कदर सिर चढ़ गयी है कि बोलने की छूट है तो इसका मतलब देश को ही जुतियाने लगिए| ऐसा लगता है कि अरुंधति खुद को संविधान से भी परे मानने लगी हैं|  यह इसी भारत देश में संभव है वरना आन सांग सू की को एक दशक नजरबन्द रहना पडा और बेचारी बेनजीर ज़िंदा ही नहीं रह पाईं| इस दौर में यह साफ़ देखा जा रहा है कि सविधान और भारत की अखंडता के मायने उन लोगों के लिए कुछ नहीं हैं जिनको पुरस्कारों की चिंता सर्वोपरि रहती है| ऐसे लोगों में अरुंधति रॉय आजकल टॉप पर हैं और शर्मनाक हैरत की बात यह है कि एक बार कश्मीर पर वे इतना गलत बोल चुकी हैं कि उनकी जगह और कोई और होता तो अब तक जेल में ठूंस दिया गया होता| मगर अरुंधति देश के संयम, बड़े पुरस्कार की विजेता और एक प्रगतिशील लेखिका होने के प्रति सम्मान भाव को भीरुता समझे बैठी हैं और वे एक जिद्दी और वाचाल की छवि धारण कर  रही हैं| कश्मीर पर ज़माना कुछ और बोले मगर वे तो खुद को सुकरात समझ बैठी हैं| भले ही कश्मीर में पाक-पोषित इंसर्जेंसी के कारण अशांति है मगर क्या करें अरुंधति जैसे लोगों को इसमें भारत का दोष लगता है| किसी एक मामले में वे कुछ बोलें तो समझा जा सकता है मगर वे तो अलगाववादियों की जुबान बोल रही हैं और पूरा पाक मीडिया उनके बयानों पर झूम रहा है|उनका भ्रम एक बार तो दूर होना ही चाहिए| &lt;br /&gt;अब एक बार फिर अरुंधति को हिंसक माओवादी भा रहे हैं| सेमिनारों में उग्र वामपंथ को खुलकर ताज पहनाने वाले  लीडरों को यह देखना चाहिए कि कई गुटों में माओवादी खुद विचारधारा से भटक गए हैं| नाम माओ का, कर रहे हैं -मनमानी | जो लोग निहत्थों का, अपनों का ही खून बहा रहे हों उनकी तो मजम्मत ही की जाएगी|  सुनो अरुंधति छत्तीसगढ़ आओ और एक महीना रहो, आपको सब समझ आ जाएगा| जंगल में लोग हिंसा से आजिज आ चुके हैं | कश्मीर में जिस इन्साफ की बात आप कर रही हैं वो भारतीय संविधान के जरिये ही आएगा मगर क्या करें पाकिस्तान और अमरीका जैसे देश चाहते हैं कि कश्मीर को दुनिया के फलक पर ला कर भारत को लगातार नीचा दिखाया जाए.... और आप उनकी लाबी का महज एक टूल बन कर इस्तेमाल हो रही हैं|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-5848301264316964288?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/5848301264316964288/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/11/blog-post_23.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5848301264316964288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5848301264316964288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/11/blog-post_23.html' title='अति वर्जयेत अरुंधति'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TOvQ-zIZilI/AAAAAAAAAPU/BjgE13VDkLc/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-6114675591340858305</id><published>2010-11-15T08:28:00.000-08:00</published><updated>2010-11-15T08:33:16.465-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आदिवासी भारत'/><title type='text'>डमी सही टीचर तो हैं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TOFgqH-JbdI/AAAAAAAAAPM/usbMbzyT6sI/s1600/teaching.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 286px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TOFgqH-JbdI/AAAAAAAAAPM/usbMbzyT6sI/s400/teaching.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5539815293452905938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बन्दूक&lt;/span&gt; के जोर पर टिके नक्सलवाद के दुष्परिणामों को लेकर काफी कुछ कहा जा चुका है और अब प्रभावित इलाकों में एक- दर -एक नए तरह की  स्थितियां सामने आ रही हैं|  ऐसे इलाकों में जान के जोखिम को देखते हुए सरकारी  टीचर अब अपनी जगह  स्कूल में पढ़ाने के लिए स्थानीय युवकों को डमी टीचर बना कर भेज रहे हैं। ये टीचर अपनी आधी सैलरी इसी&lt;span style="font-style:italic;"&gt; आउट-सोर्सिंग &lt;/span&gt; पर खर्च कर रहे  हैं।&lt;br /&gt;हाल में प्रकाश में आए तथ्य हैं कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सात जिलों में केवल 526 टीचर काम कर रहे हैं जबकि इन जिलों में 2,558 टीचर होने चाहिए। इसी तरह नक्सलियों की नई पसंदगाह बने &lt;span style="font-style:italic;"&gt;उड़ीसा&lt;/span&gt; में नक्सल प्रभावित पांच जिलों में 6,003 टीचर होने चाहिए जबकि वहां केवल 3,566 टीचर हैं।यह आंकड़े कुछ पुराने हैं क्योंकि नक्सलवाद का विस्तार काफी तेजी से हुआ है और सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही 18 में से ११ जिले नक्सलियों के शिकंजे में हैं| यहाँ जिक्र सिर्फ टीचरों का ही हो रहा है | कह सकते हैं कि शुक्र है कि पढ़ा तो रहे हैं| आदिवासी बच्चे पढाई का मुंह तो देखेंगे| हकीकत में कौन कहाँ पोस्टिंग पर है और उसकी जगह कौन ड्यूटी बजा रहा होगा यह कहना मुश्किल है| इसकी विभागीय तस्दीक के लिए जंगल के भीतर जाना होगा| जाए कौन? बस्तर की ही बात करें तो कई अफसर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए राजी हैं मगर जाने के लिए राजी नहीं हैं| ऐसे हालात सभी  विभागों के  हैं| कोई जाना नहीं चाहता| जो गया है वो "कब निकलूं और खुली हवा छोड़ प्रदूषित शहर में सांस लूँ" इसकी जुगत भिडाने में ही  ड्यूटी का आधा और शेष का पूरा समय निकाल रहा है|  जान सबको प्यारी है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंपरा ऐसी बन गयी है कि हर राज्य में कुछ इलाके पनिशमेंट पोस्टिंग के मान लिए गए हैं| अब नक्सली खौफ है, पहले बस्तर को पिछड़ेपन की वजह से पनिशमेंट क्षेत्र माना जाता था| गौर करें कि जब सरकारे कारिंदे आएँगे ही नहीं तो विकास नहीं होगा और विकास नहीं होने का फायदा ही तो नक्सलियों को मिलता आया है| तब  हालात काबू थे तो साहब से आया नही गया, अब बेकाबू हैं तो आने का चांस ही नहीं है| जो किसी तरह से डटे है वे काम नही करते यह कहना गलत होगा|  अच्छा काम करने वाले भी उन लोगों के साथ नाप लिए जाते हैं जिनको पनिशमेंट नहीं मिला होता है और सचमुच वे अच्छा काम कर रहे हैं| यहाँ एक पहलू गौर करने लायक  है कि नक्सलियों से ज्यादा उनका टेरर काम कर रहा है| होना यह चाहिए कि क़ानून का, सरकार का, व्यवस्था का टेरर(अर्थात असर) काम करे|&lt;br /&gt;मुझे दिल्ली में कुछ लोग मिले जिनने रायपुर का नाम सुन कर कहा कि वही&lt;span style="font-style:italic;"&gt; दंतेवाड़ा &lt;/span&gt;वाला..!!  जबकि रायपुर से दंतेवाडा पूरी रात के सफ़र के फासले पर है| कई काबिल लोग जो नक्सलवाद के कारण इलाके से परहेज करते हैं और दुःख इस बात का होता है कि उनके अनुभव का लाभ उस इलाके को नहीं मिल पा रहा|  इसका परिणाम फिलहाल तो यही दिख रहा है कि देश के निस्पृह और सरल नागरिक सदियों से सुविधाओं से महरूम रह कर पाषाण-युगीन जीवन जीने को बाध्य हैं और दो पाटों में पिस रहे हैं|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-6114675591340858305?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/6114675591340858305/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/11/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/6114675591340858305'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/6114675591340858305'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='डमी सही टीचर तो हैं'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TOFgqH-JbdI/AAAAAAAAAPM/usbMbzyT6sI/s72-c/teaching.gif' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-4599555752508308161</id><published>2010-10-30T08:45:00.000-07:00</published><updated>2010-10-30T08:49:43.066-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>राज्योत्सव और सलमान खान</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TMw94702KAI/AAAAAAAAAPE/zPm0QOjFk84/s1600/rajyotsaw.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 252px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TMw94702KAI/AAAAAAAAAPE/zPm0QOjFk84/s400/rajyotsaw.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5533866090472810498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रायपुर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;में राज्योत्सव की शुरुआत 26 अक्टूबर को हुई| खुशी का मौक़ा था | दो राज्यों के मुख्यमंत्री भी थे |  ... &lt;span style="font-style:italic;"&gt;सलमान खान&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; भी आए| आए क्या एक उद्योगपति उनको मुहमांगे दाम दे कर मुम्बई से उनके दबंगों समेत उठा लाए | सलमान के लिए रायपुर नया था और रायपुर वालों ने भी जता दिया कि वे स्टारों के ऊपर किस तरह न्योछावर होना जानते हैं| सल्लू मियाँ की जो इमेज है वो सबको पता है मगर यहाँ वे मंच पर मुश्किल से बारह मिनट रुके और एक चवन्नी छाप डायलाग भी सुना गए - &lt;span style="font-style:italic;"&gt;"इतनी जगह से छेद कर देंगे कि..."&lt;/span&gt; सलमान को देखने उमड़े लोगों के सामने मैदान भी छोटा पड़ रहा था|&lt;br /&gt;  पहले तो भरोसा नहीं था कि सलमान आएँगे मगर आ गए तो सारा मंच गड़बड़ा गया | उदघोषिका को खुश करने के लिए सलमान ने जुमला सुनाया| गनीमत थी हमेशा की तरह अपनी शर्ट नहीं उतारी| सलमान ने दस का दम दिखा कर उद्योगपति की खुलेआम पब्लिसिटी की| फिर सवाल आया कि राज्य के गवर्नर और मुख्यमंत्रियों के साथ सलमान को मिला दिया जाए| सभी वीआईपी मंच के नीचे थे | सलमान मंच से उतरते तो यकीनन भगदड़ मच जाती लिहाजा उदघोषिका ने सबको मंच पर बुला लिया | अब मौके की नजाकत देखिए- अचानक गवर्नर को बलाया गया|  वे नही  जाते तो राज्य के अतिथि की अवमानना के सवाल उठते| भलमनसाहत देखिए गवर्नर भी मंच पर आ गए| सलमान सबसे मिले| मुख्यमंत्रीगण एक कतार में जुट कर सलमान से मिले | गवर्नर भी मिले|&lt;br /&gt;इसी पर बवाल शुरू हो गया | बुद्धि-वमन जैसे हालात हैं| कई बड़े लिक्खाड़चंदों को भी यह मामला पच नहीं रहा है| जितने मुंह उतनी बातें,सुलगते सवाल कलमवीर उठा रहे हैं- गवर्नर साब के प्रोटोकाल का ध्यान रखना था, डा. रमन सिंह को यूँ लाईन लग कर सलमान से नहीं मिलना था| वगैरह वगैरह.. कई सवाल उठ रहे और कार्यक्रम की जम कर लानत-मलामत की जा रही है|मैं उस कार्यक्रम में नहीं था मगर मैंने सारा लाईव देखा है|इस मामले में अपनी साफ़ राय रखता हूँ-&lt;br /&gt;यहाँ कुछ सवाल हैं- क्या तब किसी ने एक शब्द भी लिखा था जब आरोपी (भाई लोग अपराधी लिख रहे हैं) को लाने की ख़बरें आ रही थी? सलमान को कोई रामायण की चौपाईयां सुनवाने नहीं ला रहा था| तब किसी ने एक भी आपत्ति नहीं की, अब सब गरिया रहे हैं कि सलमान को क्यों बुलाया|राज्योत्सव की गरिमा के सवाल सलमान से तो नत्थी नहीं होने चाहिएं- सलमान से उम्मीद भी नहीं की जाए कि वे औपचारिक उद्बोधन देंगे जैसे बाकी मुख्य अतिथि देते हैं| यह सब तो उनको बुलाते समय देखा जाना था| जब बुला लिया तो यह तो देखा जाना था कि कार्यक्रम के &lt;span style="font-style:italic;"&gt;मिनट्स &lt;/span&gt;क्या होंगे| और खुद सलमान को भी यह एहसास होना चाहिए था कि &lt;span style="font-style:italic;"&gt;प्रोटोकाल &lt;/span&gt;क्या होता है| मंच से उनने खुद सबको बताया कि वे विख्यात सिंधिया स्कूल-ग्वालियर  में पढ़े हैं| मौके की नजाकत राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों ने समझ ली और मंच पर चढ़ गए| एन-मौके पर ऐंठते और मंच पर ही नहीं  चढ़ते तो कितनी फजीहत मचती | गलती उद्घोषिका की थी मगर वो कौन था जो उनको लिख-लिख कर भेज रहा था जिसे वो पढ़ रही थी| इन सारे सवालों के जवाब लेने की बजाय भाई लोग लकीर को पीट रहे हैं जबकि सांप गुजर चुका है| 28 अक्टूबर को अखिल भारतीय &lt;span style="font-style:italic;"&gt;कवि सम्मेलन &lt;/span&gt;में अशोक चक्रधर, पद्मभूषण गोपाल दास नीरज, गजेंद्र सोलंकी, वेदव्रत बाजपेयी, शशिकांत यादव, कुंवर बैचेन, डॉ. सुरेश अवस्थी, डॉ. प्रवीण शुक्ला, पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे, ममता शर्मा, दानेश्वर शर्मा एवं मुकुंद कौशल अपनी कविताओं से लोगों को गुदगुदा गए पर इस पर कोई कुछ नहीं लिख रहा |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-4599555752508308161?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/4599555752508308161/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/10/blog-post_30.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4599555752508308161'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4599555752508308161'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/10/blog-post_30.html' title='राज्योत्सव और सलमान खान'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TMw94702KAI/AAAAAAAAAPE/zPm0QOjFk84/s72-c/rajyotsaw.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-2302519517659414662</id><published>2010-10-25T05:02:00.001-07:00</published><updated>2010-10-25T05:25:50.337-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>कांग्रेस की कालिख</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TMVze_rS1II/AAAAAAAAAO0/-Meo3d69fsA/s1600/sami_369728687.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 350px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TMVze_rS1II/AAAAAAAAAO0/-Meo3d69fsA/s400/sami_369728687.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5531954693620814978" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;छत्तीसगढ़&lt;/span&gt; में कांग्रेस पार्टी के भीतरी हालात एक ऐसे सुसुप्त ज्वालामुखी की तरह हो गए हैं जिसमे से लावा फूटने ही वाला है| हाल में कालिख फूटी है| केन्द्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री &lt;span style="font-style:italic;"&gt;नारायण सामी&lt;/span&gt; के ऊपर कांग्रेस भवन में कालिख फेंके जाने की घटना ने राजनीति के स्वस्थ मापदंडों को कलुषित कर दिया है| जिस पार्टी ने आजादी से पहले एक लम्बे समय तक जनमानस को शुचिता, सादगी  और अनशन जैसी अहिंसक परम्पराओं से जोड़े रखा उसके नेताओं का पतन इस रूप में हुआ है कि अपने मतभेद या खुन्नस निकालने के लिए लोग कालिख फेंकने पर आमादा हैं|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीते हफ्ते कांग्रेस भवन में सामी कार्यकर्ताओं से घिरे थे और कार्यकर्ताओं की भीड़ में से&lt;br /&gt;ही कालिख फेंकी गयी| इस मामले का असली फ़रिश्ता अभी लापता है मगर सात लोग पकडे गए हैं| कार्यक्रम कांग्रेस भवन में था और ऐसे कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं के पीछे रहने में ही पुलिस वाले अपनी  भलाई समझते हैं|&lt;br /&gt;पुलिस ने मौके पर पकडे गए आरोपियों से उगलवा लिया है कि इस पूरे&lt;br /&gt;कालिख काण्ड का सूत्रधार कांग्रेस का पुराना पदाधिकारी ही&lt;br /&gt;था|&lt;br /&gt;इधर पार्टी के पुराने नेताओं का कहना है कि आलाकमान जिस तरह से छत्तीसगढ़&lt;br /&gt;में तीन-तीन अध्यक्ष (चरणदास महंत, धनेन्द्र साहू और सत्यनारायण शर्मा )बना कर &lt;span style="font-style:italic;"&gt;तदर्थवाद&lt;/span&gt;  के सहारे सभी गुटों को खुली छूट लम्बे समय से दे रहा है उसके कारण पार्टी का अनुशासनात्मक ढांचा बुरी तरह चरमरा गया है| हाल में&lt;br /&gt;विधानसभा के उप-चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद गुटबाजी और बढ़ गयी है| कांग्रेस की स्थिति यह है कि तीन-तीन घुड़सवारों के भरोसे पार्टी  का रथ तीन दिशाओं में दौड़ रहा है और ऊपर से नौबत यह है कि मोहसिना किदवई जैसी उम्रदराज नेत्रियाँ यहाँ से पार्टी कोटे से राज्य सभा में हैं जो भूले-भटके सिर्फ नामांकन के समय ही रायपुर आती हैं| केंद्र सरकार में छत्तीसगढ़ से मंत्रिपद पाने की मुराद में बड़े नेता रिटायरमेंट के नजदीक पहुच रहे हैं|बड़े नेताओं की यह हालत है| निचले स्तर पर कालिख सामने आने के पीछे कितना फ्रस्ट्रेशन काम कर रहा है, यह सोचनीय है|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-2302519517659414662?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/2302519517659414662/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/10/blog-post_2108.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/2302519517659414662'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/2302519517659414662'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/10/blog-post_2108.html' title='कांग्रेस की कालिख'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TMVze_rS1II/AAAAAAAAAO0/-Meo3d69fsA/s72-c/sami_369728687.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-4607148325643750772</id><published>2010-10-09T03:19:00.000-07:00</published><updated>2010-10-09T03:47:43.875-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जंगल की पुकार'/><title type='text'>नक्सलियों के हवाले कालाहांडी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TLBH4WuktlI/AAAAAAAAAOk/SocuNUmrazo/s1600/images123.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 281px; height: 180px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TLBH4WuktlI/AAAAAAAAAOk/SocuNUmrazo/s400/images123.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5525995776282768978" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बस्तर &lt;/span&gt;और सरगुजा में भीषण तपाने के बाद लाल हवाओं  की बढ़ती धमक ने छत्तीसगढ़ के शांत पड़े पूर्वी दक्षिणी मुहाने पर बंदूकों और बूटों की हलचल बढ़ा दी है| ये हलचल नई चिंताओं का सबब बन रही है और इलाके में आम जनजीवन आने वाले समय के एक खामोश तूफ़ान की आहट से सशंकित है| खुली ख़बरें बताती हैं कि राष्ट्रीय राजमार्ग (217) पर उनकी पदचाप एक नए संकट का आगाज कर रही है|&lt;br /&gt;महासमुंद, सराईपाली,बसना, पिथौरा समेत जोंक नदी पार पश्चिमी ओडीसा में कालाहांडी और नुआपाड़ा जिले तक नक्सलियों की उपस्थिति दर्ज हो चुकी है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कालाहांडी के नाम से भुखमरी के लिए कुख्यात एक बड़ा हिस्सा भी अब नक्सलियों के निशाने पर आ गया है|&lt;br /&gt;भीषण गरीबी और जहालत की उर्वर जमीन पर नक्सली अपना सुरक्षित ठिकाना बना चुके हैं ओडीसा के नुआपाड़ा-संबलपुर-बोलांगीर जिले में गांवों में बैठकें लेनी शुरू कर दी है|ख़बरें हैं कि नुआपाड़ा-सोनाबेड़ा इलाके में नक्सलियों ने एक सरकारी इमारत को फूंक दिया और वन विभाग के अफसर की इससे पहले ह्त्या कर दी| &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कालाहांडी का खरियार रोड इलाका पिछली सदी के पूर्वार्ध तक छत्तीसगढ़ में शामिल रहा है |  राष्ट्रीय राजमार्ग (217) पर जोंक नदी पुल पार करते ही पश्चिम उड़ीसा शुरू हो जाता है| महासमुंद जिले के कई गांवों में वर्दी पहने नक्सलियों को देखा जा रहा है|नक्सलियों ने चारों ओर से ग्रामीणों को घेर कर नुक्कड़ नाटक दिखाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-style:italic;"&gt;सोनाबेड़ा&lt;/span&gt; पहाड़ी इलाका है जिसकी एक सीमा छत्तीसगढ़ के &lt;span style="font-style:italic;"&gt;देवभोग&lt;/span&gt; से लगी है|सोनाबेडा कोरापुट( उड़ीसा ) जिले  में आता है|आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नक्सलियों पर दबाव बढ़ने लगा है लिहाजा  अब वे नए सुरक्षित ठिकाने के रूप में  सोनाबेड़ा-कालाहांडी में पाँव पसार रहे हैं|सोनाबेड़ा इलाका भी अबूझमाड़ -बस्तर की तरह दुर्गम और पर्वतीय है जहां पहुचना मुश्किल होने की वजह से नक्सली इस इलाके को नया सेफ जोन बना रहे हैं| कालाहांडी में दुर्भिक्ष और बेहद पिछड़ापन नक्सलियों को अपने पाँव जमाने में मददगार लग रहा है| खुद महासमुंद (छत्तीसगढ़) जिले के बागबाहरा में आलम यह है कि रायपुर से महज 90 किलोमीटर दूरस्थ महासमुंद जिले मुख्य राजमार्ग(217) पर पूरे दस किलोमीटर सड़क पर सिर्फ कीचड और नुकीले पत्थर हैं| &lt;br /&gt;  उन्होंने मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं के दबाव में चार पुलिस कर्मियों को रिहा करके अपना चेहरा बदलने की भी कोशिश की है लेकिन उनका विस्तार राष्ट्रीय राजमार्ग और पर होना उनकी रेड कारीडोर योजना  को उजागर करता है|  यह राजमार्ग रायपुर से भवानीपटना होते हुए गोपालपुर(पुरी-उड़ीसा) जाता है|ख़बरें हैं कि नक्सली अब यह भी तय करने लगे हैं कि लडकियां क्या पहनें जैसा कि एक नए फरमान में है कि वे जींस नहीं पहनें| क्या यही  काम तालिबान  भी नहीं करते रहे हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-4607148325643750772?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/4607148325643750772/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/10/blog-post_09.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4607148325643750772'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/4607148325643750772'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/10/blog-post_09.html' title='नक्सलियों के हवाले कालाहांडी'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TLBH4WuktlI/AAAAAAAAAOk/SocuNUmrazo/s72-c/images123.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-2484884859435746975</id><published>2010-10-02T06:12:00.000-07:00</published><updated>2010-10-02T07:10:30.891-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>सैल्यूट इंडिया</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TKc4QmhEzsI/AAAAAAAAAOc/xjf-RO782xw/s1600/tiranga.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 259px; height: 194px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TKc4QmhEzsI/AAAAAAAAAOc/xjf-RO782xw/s400/tiranga.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5523445325861539522" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;महात्मा गांधी&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; और शास्त्रीजी की जयन्ती पर देश अब शायद पहली बार एक शान्ति और एक सुकून का अनुभव कर रहा है| अयोध्या पर फैसला आ चुका है| कोर्ट का नहीं भारत का, 21वीं सदी के भारत ने यह फैसला सुना दिया है कि दुनिया जिसे अब तक सांप सपेरों और ज़रा सी बात पर लड़-मरने के लिए उतारू होने वाले पिछड़े और दकियानूस लोगों का देश मानती थी वे समय के साथ अपनी सोच में आमूलचूल परिवर्तन लाने के साथ नए विश्व नागरिक बन गए हैं और अब ३ अक्टूबर से राष्ट्र मंडल खेलों का उदात खेल भावना और पूरे उचित माहौल में आनंद लेने के लिए तत्पर हैं| कहना न होगा कि अयोध्या फैसले पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी थी|&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TKc3mwVJ-II/AAAAAAAAAOU/S6DzcInDKD0/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 223px; height: 167px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TKc3mwVJ-II/AAAAAAAAAOU/S6DzcInDKD0/s400/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5523444606941395074" /&gt;&lt;/a&gt;यकीनन कुछ लोगों को और शायद कुछ देशों को भी यह उम्मीद रही होगी कि अयोध्या का जिन्न जिस दिन बोतल से बाहर आएगा भारत में 1992 फिर से दोहराया जाएगा और &lt;span style="font-style:italic;"&gt;साम्प्रदायिक  दंगे&lt;/span&gt; एक बार फिर से विश्व की बड़ी  शक्ति  बन कर उभर रहे&lt;span style="font-style:italic;"&gt; भारत&lt;/span&gt; के भाल  पर कलंक की नई कालिख पोत देंगे|मगर इस बार इतिहास पलटा और  ऐसा मुझे लगता है सिर्फ मीडिया के कारण हुआ है| याद करें जब भी दंगे भड़के तो मीडिया या तो मौजूद नहीं था या उसकी भूमिका ही सीमित थी मगर इस बार  फैसले के दिन पूरा मीडिया एक सुर में &lt;span style="font-style:italic;"&gt;राग सौमनस्य &lt;/span&gt;गा रहा था| हालाकि कुछ भाई इतने उत्तेजित हो कर अयोध्या लाईव कर रहे थे कि उनकी  उत्तेजना ने फसादी तत्वों को को भी एकबारगी सोचने के लिए मजबूर कर दिया होगा|हमेशा आग उगलने वाले धर्म-गुरुओं को भी  फैसले पर संयम बरतते देखना सुखद लगा| कुल मिला कर कहें कि नगर निगम के नल से इस बार सब जगह गंगाजल बहता दिखा | देश ने एक सुर में.. एक सांस में और एकजुट हो कर बता दिया कि &lt;span style="font-style:italic;"&gt;कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा|    &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;और नक्सली भाई...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में जब फैसले के बाद सुखद बयार बह  रही थी तो बस्तर में भी नक्सलियों के दिल पसीजे नजर आ रहे थे| नक्सलियों ने 12 दिनों तक बंधक बनाए रखने के बाद चार पुलिस कर्मियों को आजाद  कर दिया| नक्सली गिरफ्त में एक पुलिसकर्मी की त्वरित प्रतिक्रया थी कि "भाईयों"  ने मेरे साथ कोई बुरा व्यवहार नहीं किया|&lt;br /&gt; सरकार की समझ, परिजनों की पीड़ा, पुलिस के संयम  और बस्तर व आंध्र  प्रदेश के पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की कई दिनों की मेहनत ने जंगली गुरिल्लों का दिल नरम किया| अब एक उम्मीद भी बंधी है कि बंदूकों और बारूदी धमाकों से तप कर थरथरा रही जंगल की फिजाओं में &lt;span style="font-style:italic;"&gt;बंदूकों का सिर&lt;/span&gt; हमेशा नीचे रहेगा और गांधी के देश में शान्ति से सारे मसले हल होगे|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-2484884859435746975?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/2484884859435746975/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/2484884859435746975'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/2484884859435746975'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='सैल्यूट इंडिया'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TKc4QmhEzsI/AAAAAAAAAOc/xjf-RO782xw/s72-c/tiranga.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-5434290854806266106</id><published>2010-09-27T00:15:00.000-07:00</published><updated>2010-09-27T03:51:15.810-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><title type='text'>वे जो हमसे बड़े हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TKBFWrg48CI/AAAAAAAAAOE/5bLn5QVznAw/s1600/oldies2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 351px; height: 279px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TKBFWrg48CI/AAAAAAAAAOE/5bLn5QVznAw/s400/oldies2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5521489399096340514" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;सुबह &lt;/strong&gt;एक अच्छी खबर से दिन का आगाज हुआ| खबर है कि छत्तीसगढ़ सरकार आगामी अक्टूबर माह में बुजुर्ग लोगों के लिए एक विशेष अभियान चलाएगी जिसमे एक जगह पर शिविर लगा कर उनके स्वास्थ्य परीक्षण  से लेकर जरूरी मुफ्त चीजों के वितरण तक के कार्य संपन्न होंगे| यह खबर अखबार में प्रथम  पृष्ठ  पर नहीं किसी भीतरी पन्ने के निचले पायदान पर मिली लेकिन खबर ने मन को प्रसन्न किया| मैं जानता हूँ कि ऐसी वास्तविक मदद वाली योजना का खाका होता तो सबके मन में है मगर  अमल में लाने का हौसला दिखाने वाले ही सराहे जाते हैं| दिल्ली में&lt;em&gt; डा. हर्षवर्धन &lt;/em&gt;जब स्वास्थ्य मंत्री थे तब वे इसी तरह के अनूठे काम हाथ में लेते थे और यह बताने की जरुरत नहीं है कि भारत से पोलियो को उखाड़  फेंकने के वृहत अभियान चलाने का बीड़ा डा. हर्षवर्धन ने ही उठाया था| अब &lt;em&gt;डा. रमन सिंह &lt;/em&gt;ऐसे कामों को आगे बढ़ा रहे हैं तो यकीनन उनकी साख और लोगों के दिल में उनके प्रति सम्मान में बढ़ोतरी ही होगी| राजनीति में एक चीज साफ़ दिख रही है कि जहां भी पढ़े लिखे लोग सत्ता या विपक्ष में हैं वहां चीजें बदल रही हैं | नजरिया बदला है और एक दिन शायद आए जब नेताओं से तौबा करने वाली जनता सचमुच अपने नायकों के ऊपर फख्र करे| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बताने की जरुरत नहीं है कि हमारे देश में बुजुर्गों की औसतन क्या स्थिति है| वे सिर्फ एक चलते-फिरते या सोए हुए या अध् सोए ऐसे सदस्य समझे जाते हैं   जिनसे यही उम्मीद की जाती है कि टाईम पर खा लें और चुपचाप पड़े रहें| बोलना हो तो पूजाघर में सिर्फ मन्त्र बोलें या शादी ब्याह या किसी अन्य मौके पर आशीष वचन बोलें वरना चुप ही रहें| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;भारत में एक हज़ार से भी अधिक वृद्धाश्रम हैं। &lt;/em&gt;वहाँ जा कर देखा जा सकता है कि यह वही देश है जहां &lt;em&gt;वानप्रस्थ&lt;/em&gt; की कल्पना की गयी थी  मगर समय ने सब कुछ बदल दिया और जिनको पकी उम्र में सहारा मिलना था वे बेसहारा कर के छोड़ दिए जाते हैं| कोई उनसे दो बोल भी नहीं बोलना चाहता है | आज घर से चला तो मुझे सड़क पर एक सज्जन दिख गए| वे साइकिल थामे चले जा रहे थे| मैंने मुस्करा कर देखा और रुका तो वे समझे कि मैं उनका कोई परिचित हूँ| वे लगे बताने- उम्र हो गयी है 90  साल  | बस कट रही है| वगैरह वगैरह .. मैं आश्चर्य से भरा देखता रहा गया नब्बे की  साल उम्र !! सड़क पर अकेले साइकिल थामे| प्रणम्य सेहत | ऐसा ही होता है| लोग चलते रहते हैं जब तक चल सकें| कुछ घरों में जरा सी दिक्कत पर डाक्टर बुला लिए जाते हैं मगर फिर भी तकलीफें हजार | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत सरकार की सीनियर सिटीजन की सुविधाओं को दर्शाने वाली &lt;em&gt;वेबसाईट &lt;/em&gt;बताती है कि छत्तीसगढ़ में एक भी वृद्धाश्रम नहीं है? शायद इसका कारण कोई बता सके| मुझे लगता है कि अभी वो कल्चर यहाँ नहीं आया है जिसमे लोग पकी उम्र में ऐसे ठिकानों पर ढकेल दिए जाने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं| मगर इससे यह नतीजा निकाला नहीं जा सकता है कि यहाँ बुजुर्ग बहुत मजे में हैं| उनकी तकलीफें कम करने की दिशा में सरकार आगे आ रही है तो इसे एक सकारात्मक पहल ही माना जाए और दुआ  कि वृद्धजन दिवस ( 1 अक्टूबर ) आशानुरूप मनेगा|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-5434290854806266106?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/5434290854806266106/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5434290854806266106'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5434290854806266106'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html' title='वे जो हमसे बड़े हैं'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TKBFWrg48CI/AAAAAAAAAOE/5bLn5QVznAw/s72-c/oldies2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-5875291112266566720</id><published>2010-09-23T02:45:00.000-07:00</published><updated>2010-09-24T01:27:04.495-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>शुक्र है संकट टला</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJskMbX-cMI/AAAAAAAAAN8/pxWkuqZwSOk/s1600/ayodhya_457767905.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 350px; height: 253px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJskMbX-cMI/AAAAAAAAAN8/pxWkuqZwSOk/s400/ayodhya_457767905.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5520045564198023362" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कल &lt;/strong&gt;24  सितम्बर है. इसे मीडिया  की मेहरबानी कहें या सरकारों और नेताओं की कि  इसे एक ऐसा कुहासे से आशंकित दिन बना दिया गया है मानों कोई एक बड़ी  घटना होने वाली है जिसके  होने की सशंक प्रतीक्षा में कई लोग दुबले हो रहे है सिर्फ अंदेशे से|  अंदेशा यह है कि  कोर्ट से फैसला क्या आएगा| फैसले के बाद की संभावित स्थितियों को लेकर सारे इंतजाम हैं |ला एंड आर्डर की "स्थिति तनावपूर्ण मगर नियंत्रण में" करने तक| पूरा ध्रुवीकरण एक ऐसे फैसले पर है जिसे साठ साल से टाला  ही गया  था| अब कर रहे हैं मानो देश तैयार खडा हो| कोर्ट से जो भी फैसला आए उसके प्रभाव को लेकर व्यापक चिंताएं हैं| पूरा शहर &lt;em&gt;छावनी &lt;/em&gt;बना नजर आता है|  हर मोर्चे पर जवान और हर संदिग्ध की पहचान| तलाशी,  एहतियात  व निपटने का पूरा साजो सामान | &lt;br /&gt;सुबह इस बात की चिंता कि  बच्चे कल स्कूल जाएं या नहीं| स्कूल प्रबंधन परेशान|अपन तो बीच का रास्ता चुनते हैं| बेहतर हो आधे दिन की गणेश विसर्जन की छुट्टी  ताकि बच्चियां सुरक्षित घर आ जाएं| यह क्यों बताया जाए बच्चों को कि टेंशन का माहौल है | बच्चों को फसाद ही नहीं उसके कारणों से भी दूर रखा  जाना चाहिए यह मेरी राय थी जिसे मान लिया गया शुक्रिया | &lt;br /&gt;खीझ इस बात की है कि पिछले साठ वर्षों बाद भी हम कितना बदले? आज भी हमारे देश में धर्म के नाम पर इतना मोबिलाइजेशन होता है जो दीगर समस्याओं को लेकर भी होना चाहिए| भूख, गरीबी. अशिक्षा , नक्सलवाद, लिंग परीक्षण , भ्रष्टाचार, दुराचार जैसे कई मुद्दे हैं मगर हम उनको तवज्जो नहीं दे  पाते हैं और जब भी धर्म का मुद्दा उठता है तो  आशंकाएं पूरे देश को दुश्चिंताओं  के भवर में उलझा देती हैं| जो जोड़े वह &lt;em&gt;धर्म &lt;/em&gt;और जो तोड़े वो कैसा धर्म| कितने दिहाड़ी मजदूर और अखबार नहीं पढने वाले लोग कल रोजी कमाने नहीं जा पाएंगे| एक आशंका पूरे समाज को गिरफ्त में ले चुकी है| कई पैरंट्स तो आज भी स्कूल पहुचे और गणेशजी एक दिन पहले विसर्जित कर दिए गए|  वहां क्या बनाना चाइए ताकि झगड़ा ख़त्म हो इसे ले कर बहस चलती है मगर सर्वमान्य फार्मूला सामने आए तो बात बने| फिलहाल तो यह समस्या सामने रही है कि कल का दिन शान्ति से गुजरे और अब अयोध्या का फैसला मर्यादित रीति-नीति  से हो वरना रावण तो तैयार बैठे लगते हैं मगर कुछ भी हो एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहे भारत में 1992  बीत  चुका है और किसी भी सूरत में भाईचारे को बनाए रखकर धर्मांध  और तिरंगा  विरोधी ताकतों को 2010  में सही  जवाब मिलना  चाहिए। देश और आपसी सद्भाव से ऊपर कोई पूजाघर  नहीं है। समरसता इस देश की गंगा जमुनी संस्कृति  का हिस्सा है और समभाव भारत का आदि दर्शन रहा है| &lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;em&gt;चलते-चलते : शुक्र है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को हफ्ते भर तक टाल दिया है| गौर कीजिए, दोनों पक्ष कोर्ट में थे| दोनों ने कहा कि फैसला ही चाहिए | माननीय जज ने कहा कि जब आप इस मुद्दे पर राजी हो, एक हो  तो आपस में भी राजी हो कर आगे तय कर लो और फैसला टल गया |  &lt;/em&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;इस मौके पर दो कवित्त पुष्प की सुगंध आप भी लीजिए &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर से  मस्जिद है बहुत दूर &lt;br /&gt;चलो यूं कर लें -किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए &lt;br /&gt;                        &lt;em&gt;- निदा फाजली &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कोई जहान मिले&lt;br /&gt;चेहरे पर मुस्कान मिले &lt;br /&gt;काश मिले मंदिर में अल्लाह &lt;br /&gt;मस्जिद में भगवान् मिले &lt;br /&gt;      &lt;em&gt;- गिरीश पंकज   &lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-5875291112266566720?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/5875291112266566720/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5875291112266566720'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/5875291112266566720'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html' title='शुक्र है संकट टला'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJskMbX-cMI/AAAAAAAAAN8/pxWkuqZwSOk/s72-c/ayodhya_457767905.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-1713836754523697638</id><published>2010-09-17T04:21:00.000-07:00</published><updated>2010-09-24T03:11:19.373-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><title type='text'>हिन्दी के साथ बहते हुए</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJNo5th0wJI/AAAAAAAAAN0/okTws6G-oPc/s1600/untitled.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJNo5th0wJI/AAAAAAAAAN0/okTws6G-oPc/s400/untitled.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5517869309142286482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt; अवसर &lt;/strong&gt;था &lt;em&gt;हिन्दी दिवस &lt;/em&gt;का और कोरबा में हिन्दी को मंच देने बालको नगर के प्रगति  सभागार में हिन्दी प्रेमी जुटे| सरस्वती साहित्य समिति और बालको महिला मंडल ने एक वैचारिक आयोजन किया जिसमे &lt;em&gt;"हिन्दी के उत्थान में बाधाएं"&lt;/em&gt; विषय पर लम्बे विमर्श का कुल निचोड़ यह रहा कि अब हिन्दी को कोई खतरा नहीं है| ख़तरा अंगरेजी को हो सकता है क्योंकि हिन्दी का भूगोल बढ़ रहा और अंगरेजी अब हिन्दी के शब्दों के सहारे अपना विकास कर रही है| हिन्दी तो एक बहती हुई नदी है जिसमे कंकड़-पत्थर को भी बहा ले जाने की क्षमता है| &lt;br /&gt;मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार &lt;em&gt;&lt;em&gt;किशोर दिवसेजी &lt;/em&gt;&lt;/em&gt;(बिलासपुर) ने कहा कि हिन्दी को सिनेमा ने बढाया और मीडिया ने घर-घर में पहुंचा  दिया है| हिन्दी को उतना खतरा नहीं है जितना प्रचारित होता है|हिन्दी को बढना है तो क्षेत्रीय  भाषा और बोलियों को भी बढना होगा| हिन्दी में सबको साथ लेकर चलने की क्षमता है| वह जन-जन की भाषा है| &lt;br /&gt;बालको के महाप्रबंधक श्री &lt;em&gt;&lt;em&gt;जितेन्द्र धीर &lt;/em&gt;&lt;/em&gt;ने कहा कि हिन्दी तो एक &lt;em&gt;बहती हुई नदी&lt;/em&gt; है जिसका विस्तार विदेश में हो रहा है और हमारे देश के लाखों हिन्दी के राजदूत अपनी भाषा और संस्कृति की खुशबू परदेस में महका रहे हैं| हिन्दी का आँगन सदा हरा-भरा रहेगा | जरूरत इस बात की है कि हम भाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकार्यता को बढ़ावा दें| मन में हिन्दी को जगह दें| कंपनी के संवाद प्रमुख श्री &lt;em&gt;बी के श्रीवास्तव &lt;/em&gt;की राय थी कि हिन्दी को जनभाषा के रूप में उचित विस्तार दिया जाए और इसके कामकाजी भाषिक स्वरुप में क्लिष्टता को कम से कम किया जाए| बोलचाल की हिन्दी ही सर्वत्र वरेण्य है और यही भारत की नई पहचान है|  उन्होंने बताया कि वेदान्त ने हिन्दी को लगातार बढ़ावा दिया है और आगे भी देता रहेगा| हिन्दी का परचम विश्व में लहरा रहा है और विदेश में भारत की साख हिन्दी से बनी है| &lt;br /&gt;समिति की अध्यक्ष श्रीमती गीता विश्वकर्मा ने&lt;em&gt; किरण&lt;/em&gt; पत्रिका का विमोचन कराया |लेखक के रूप में अपनी कृति  &lt;em&gt;"अंतर-द्वन्द"&lt;/em&gt; का विमोचन कराने के बाद अंचल के लेखक भुवनेश्वरप्रसाद देवांगन "नेही" का चेहरा खुशी से दमक रहा था| यह हिन्दी का सम्मान था और  कई नए  लेखक/प्रतियोगी  बालको मंच से पुरस्कृत हुए| हिन्दी के  मंच पर हिन्दी के निमित्त यह जो  उदारता देखी गयी  उससे  वाकई लगा कि दीगर कारपोरेट कंपनियों को भी हिन्दी के उत्थान के लिए ऐसी ही उन्मुक्तता का कलेजा दिखाना चाहिए अन्यथा खानापूर्ति के लिए खानापूर्ति हिन्दी दिवस तो हैं ही|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-1713836754523697638?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/1713836754523697638/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post_17.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1713836754523697638'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1713836754523697638'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post_17.html' title='हिन्दी के साथ बहते हुए'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJNo5th0wJI/AAAAAAAAAN0/okTws6G-oPc/s72-c/untitled.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-7351348366513571077</id><published>2010-09-15T06:12:00.000-07:00</published><updated>2010-09-15T06:20:58.759-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जुबानी जमाखर्च'/><title type='text'>दबंग वर्दी के दाग</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJDHF4xuYkI/AAAAAAAAANs/hJqMuvjYSLQ/s1600/d_668909953.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 350px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJDHF4xuYkI/AAAAAAAAANs/hJqMuvjYSLQ/s400/d_668909953.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5517128447483077186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;पुलिस &lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;पर प्रताड़ना के आरोप कोई नई बात नहीं है| पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए कई आयोग बने और सिफारिशें अमल में लाई गयी लेकिन ढाक के तीन पात ही रहे हैं| छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले के पुलिस कप्तान साहब रविवार को &lt;em&gt;दबंग &lt;/em&gt;फिल्म देखने गए थे|  उनकी सुरक्षा में लगे जवानो ने किसी बात से तैश में आ कर सिनेमाघर के गेट कीपर को इतना पीटा कि उस बेचारे की जान ही चली गयी|  घटना के बाद दो सिपाहियों को मुअत्तल कर दिया गया है और न्यायिक जांच कराई जा रही है| &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है  कि एसपी साहब सादी वर्दी में थे लिहाजा भीड़ में जब वे निकले तो गेट कीपर उनको पहचान नहीं पाया और इस वजह से उनको भी भीड़ में रुकना पडा| बताते हैं कि गेट पर भीड़ थी लिहाजा भीड़ को आहिस्ता निकालने के लिए गार्ड ने सादी वर्दी में गए कप्तान साब को रोक दिया था| यह बात सिपाहियों को नागवार गुजरी | उनके जाने के बाद वे सब गार्ड पर पिल पड़े| बताते हैं कि आध दर्जन पुलिस वाले &lt;em&gt;महेंद्र &lt;/em&gt;पर टूट पड़े थे और लात-घूसों से उसे पीटा गया| जब उसकी साँसें उखड़ने लगी तो सब भाग निकले| बाद में तारबाहर थाने से पुलिस पहुची और घायल पड़े महेंद्र को अस्पताल ले जाया गया जहां उसने दम तोड़ दिया|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घटना के बाद मृतक के गुस्साए  साथियों ने मौके पर जो भी पुलिसकर्मी दिखा उसकी जम कर पिटाई की| पब्लिक की  पिटाई से सिपाही दिनेश तिवारी घायल हो गया| पुलिस के आला अफसर मौके पर आए तो भीड़ ने उनको भी खदेड़ दिया| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे शहर में तनाव के हालात के मद्दे नजर पुलिस बल तैनात किया गया| आखिरकार पुलिस के आला अफसरों ने मौक़ा मुआयना करके दो पुलिसकर्मियों के निलंबन की घोषणा की| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह घटना बताती है कि पुलिस वाले कितने बेरहम हो सकते हैं| अगर मान लिया जाए गार्ड का कोई कसूर भी था तो इस वजह से उसकी ह्त्या का तो अधिकार पुलिस को नहीं  मिल जाता| एक बात यह भी सामने आई है कि जो पुलिसवाले सस्पैंड हुए हैं वे नए-नए भर्ती हुए हैं ... तो जाहिर है कि उनकी &lt;em&gt;ट्रेनिंग &lt;/em&gt;में जरूर  कमी रह गयी थी और यकीनन गलत लोग भर्ती कर लिए गए | मान सकते हैं कि  उन्होंने साहब की नजर में अपने नंबर बढ़ाने के लिए बल प्रयोग किया होगा  जो  कप्तान के लिए मुसीबत बन गया है| दिलचस्प यह है कि एसपी साहब ने पुस्तकें भी लिखी हैं और कई मार्मिक कविताएँ भी| लेकिन वे उस मार्मिकता को अपने सिपाहियों में नहीं उतार पाए| अब जांच में सारे तथ्य सामने आएँगे लेकिन यह बात बिलकुल साफ़ है कि पुलिस वालों को तनाव प्रबंधन और स्थितियों से निपटने के गुर अच्छे से सिखाए जाने चाहिए| दुर्दांत अपराधी और साधारण अपराधी में फर्क होना चाहिए| समाज में लोग गुस्से में तो हैं ही| इसके कई सामाजिक और अनेक कारण हैं  मगर पुलिसवाले ही तैश में आ कर हत्याएं करने लगेंगे तो व्यवस्था कैसे चलेगी|  और ज़रा सी बात का इतना जानलेवा पुलिसिया गुस्सा तो बेहद खतरनाक साबित हुआ है| कोई &lt;em&gt;&lt;em&gt;दबंग&lt;/em&gt;&lt;/em&gt; देख कर निकले और फिल्म का प्रभाव किसी की जान ले ले  तो  यह घटना एक साथ कई सबक लेने के लिए मजबूर करती है|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-7351348366513571077?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/7351348366513571077/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/7351348366513571077'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/7351348366513571077'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html' title='दबंग वर्दी के दाग'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TJDHF4xuYkI/AAAAAAAAANs/hJqMuvjYSLQ/s72-c/d_668909953.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-1108189496725639428</id><published>2010-09-08T05:25:00.000-07:00</published><updated>2010-09-08T06:47:46.853-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ के दस साल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TIeOuRlcJXI/AAAAAAAAANM/pP00dk4f40U/s1600/image_large%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 84px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TIeOuRlcJXI/AAAAAAAAANM/pP00dk4f40U/s400/image_large%5B2%5D.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5514533194384024946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;दृश्य एक :&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; रायपुर शहर, गौरव पथ में रात का नजारा . लगता है कनाट प्लेस में टहल रहे हैं..| नियोन साईन  बोर्ड  और लकदक करती लाईटें, कृत्रिम झरना और फव्व्वारे ...चमकती हुए सड़क पर भागती हुई कारें ...लगता है छत्तीसगढ़ का नवा बिहान(नया सवेरा) यहीं  हुआ है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;दृश्य दो;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; बागबाहरा-जिला महासमुंद, रायपुर से महज 90  किलोमीटर दूरस्थ  महासमुंद जिले का यह सीमान्त इलाका बदहाली के दिन गिन रहा है| मुख्य राजमार्ग पर पूरे दस किलोमीटर सड़क पर सिर्फ कीचड और नुकीले पत्थर हैं| आसपास गांवों में सहूलियतें सिफर| सड़क पर चलना हो तो गाडी में अतिरिक्त पहिया रख लें. ख़ास बात यह है कि पुलिसिया  उदासीनता के कारण अब यहाँ भी बस्तर वाली लाल बयार खुल कर गावों में बहने लगी है और शायद किसी दिन धमाकों के साथ इलाके का नया परिचय दुनिया के  सामने आए|  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस दृश्य की चर्चा यूँ कि एक अच्छी खबर बीते दिनों आई-दिल्ली से, दस साल पहले एक नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ ने पिछले दस वर्षों में बीमारू और अविकसित कहे जाने वाले सदियों पुराने कलंक को  धो कर &lt;em&gt;विकास दर &lt;/em&gt;के मामले में राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया है और कई बड़े राज्यों से होड़ कर ली है|  यह एक अच्छा संकेत रहा है और इसके लिए सरकार- प्रशासन को यकीनन &lt;em&gt;शाबासी &lt;/em&gt;  मिलनी चाहिए लेकिन जिस राज्य में शान्ति के लिए प्रख्यात रहे घने जंगल रोजाना होने वाले धमाकों से थर्रा रहे हों, विनाश दर की लाल छलांग अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गयी हो  और नक्सली मोर्चे पर जवानों की शहादत की लिस्ट देश भर के मुकाबले अव्वल हो वहाँ इस तरह के खिताब केवल कागजी संतोष दे सकते हैं और ज्यादा से ज्यादा एक सरकारी सुकून, जिसकी आंकड़ेबाजी अर्थशास्त्री ही ज्यादा समझ सकते हैं, अपन नहीं| &lt;br /&gt;एक ख़ास बात तो यह  भी है कि तमाम दिक्कतों के बावजूद &lt;em&gt;छत्तीसगढ़ &lt;/em&gt;बढ़ा, यह भी कोई कम अचम्भे की बात नहीं है| राज्य को बनना था तो बढना ही था, अपने को तो उसी दिन राज्य का भविष्य दिखाई दे रहा था जिस दिन राज्य बना और तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री रमेश  बैस ने खुश हो कर मिठाई भेजी| इन दस सालों में दो तरह का छत्तीसगढ़ बनता दीख रहा है| एक शहर वाला , एक गाँव कस्बों और छोटे शहरों वाला , फर्क साफ़ किया जा सकता है| अपराध बढ़ रहे हैं, समाज रोज बदल रहा है| जमीनों के सौदों में दलाल लाल हो रहे हैं और बेचने वाले बर्बादी की तरफ बढ़ते दीख रहे हैं| एक ग्रामीण पीढी होंडा गाड़ियों में  भागती हुई दिखाई दे जाती है| अचानक जमीन की कीमत  बढ़ गयी तो उनके सौदे होने लगे और किसानी से मुंह चुराने वाली पीढी ने शहरों का रुख करना शुरू कर दिया है| दिल्ली-गुडगाँव- फरीदाबाद में जाट-गुर्जर किसानों की नई पीढी के साथ जो हुआ था वैसा ही यहाँ होता दीख रहा है|सब कुछ बेचो और एक बढ़िया  कार खरीदो- इस मानसिकता का असर देखा जा रहा है| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रायपुर में अपराध की स्थिति यह है कि 1980 -90 के दशक में आजाद चौक पर दो गुटों के बीच झगडे में चाकू निकलता था तो दो कालम की खबर बनती थी| अब रोज़ ह्त्या और लूट की ख़बरें राज्य की प्रगति के साथ बोनस में आई हैं| &lt;em&gt;पहली नवंबर को प्रदेश की स्थापना के 10 साल पूरे हो रहे हैं। &lt;/em&gt;राज्य बना और शहरीकरण बढ़ गया| शहरों में भीड़ बढ़ गई है| एक छत्तीसगढ़ जो रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और दीगर शहरों में नजर आता है जहां कुछ ख़ास इलाकों में साफ़ सड़कों का शहरी रूतबा है,प्रगति पथ की धाक है, हाई मास्ट  लाईटें ग्रामीण आगंतुक को शहरी  रुतबे से सहमा देती हैं| ....  और दूसरी तरफ बहुतेरे छोटे कस्बे हैं जहां बारिश में चलना मुहाल है |&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TIeTwZdlwxI/AAAAAAAAANc/BoygLBbrcKg/s1600/road10_20090721_080538.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TIeTwZdlwxI/AAAAAAAAANc/BoygLBbrcKg/s400/road10_20090721_080538.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5514538728416461586" /&gt;&lt;/a&gt; लोग मुफ्त में चावल ले रहे हैं मगर सब्जी नहीं खरीद पा रहे हैं| मोबाईल बजते हैं, लडकियां  साइकिल पर स्कूल जाती दीखती हैं मगर बारिश मे उनके पास रेन-कोट नहीं हैं| &lt;em&gt;धमतरी &lt;/em&gt; एक जिला मुख्यालय है| वहा जा कर लौटा हूँ| सदर बाजार जैसी मुख्य सड़क पर इतने गड्ढे हैं कि सड़क में गड्ढे या गड्ढे में सड़क वाला जुमला याद आता रहा|  धन्य हैं जनप्रतिनिधि और धन्य है नगर पालिका| यह वही शहर है जो पूरे रायपुर शहर को गर्मियों में गंगरेल बाँध का पानी पिलाता है मगर शहर में नागरिक प्रशासन नाम की चीज नजर नहीं आती| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल यह राज्य  सरकार या प्रशासन की उपलब्धि की विरोधी दल मार्का आलोचना नहीं है और यह अवसर ऐसे मुद्दे उठाने का भी नहीं है| लेकिन सवाल तो उठते ही हैं| बहरहाल दस साल में कई मुकाम तय करके  दस वर्षीय छत्तीसगढ़ के लड़कपन को अब जवानी की तरफ बढ़ते देखना है| विकास दर के मामले में शीर्ष पर आने के मौके पर राज्य में एक स्लोगन जारी हुआ है- &lt;em&gt;क्रेडिबल छत्तीसगढ़&lt;/em&gt;|  मुख्यमंत्री&lt;em&gt; डा. रमन सिंह &lt;/em&gt;ने कहा कि यही इस प्रतीक वाक्य की रचना की बुनियाद है। उन्होंने कहा कि पहले छत्तीसग़ढ की पहचान अपार प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण एक ऐसे राज्य के रूप में थी, जो देश की आजादी की लगभग आधी शताब्दी गुजर जाने के बाद भी पिछड़ेपन की छाया से मुक्त नहीं हो पाया था। राज्य में सामाजिक-आर्थिक विकास के अनेक क्षेत्रों में कई अभूतपूर्व और महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज की गयी हैं। राज्य के संसाधनों में विकास की क्षमता के प्रति भी राज्य के भीतर और बाहर विश्वास की एक नई लहर देखी जा रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन्हीं भावनाओं को शामिल करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य के नए प्रतीक&lt;em&gt; ‘ विश्वसनीय छत्तीसगढ़’ &lt;/em&gt;की रचना की गई है। इसमें हर रंग राज्य की वन-संस्कृति और कृषि-संस्कृति का प्रतीक है।  नई दिल्ली के &lt;em&gt;प्रगति मैदान &lt;/em&gt;पर 14 से 27 नवंबर तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में छत्तीसगढ़ की दस साल की विकास यात्रा भी प्रदर्शित की जाएगी। प्रदेश की लोक कला और लोक संस्कृति के साथ वर्किंग मॉड़ल प्रस्तुत किए जाएंगे।  क्लीन एंड एनर्जी एफिशिएंट टेक्नालाजी प्रोडक्ट एंड सर्विसेस। इसी थीम के आधार पर राज्य के क्रेडा, ऊर्डा, वन, सीएसईबी, पर्यावरण मंडल, औद्योगिक इकाईयों आदि विभागों के वर्किंग मॉडल पेश किए जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-1108189496725639428?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/1108189496725639428/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1108189496725639428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/1108189496725639428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ के दस साल'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TIeOuRlcJXI/AAAAAAAAANM/pP00dk4f40U/s72-c/image_large%5B2%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-3291751539846787752</id><published>2010-08-26T00:23:00.000-07:00</published><updated>2010-08-26T00:51:16.541-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इनसे मिलिए'/><title type='text'>पीपली लाईव मानिकपुरी</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/THYZt7DSjxI/AAAAAAAAAM8/SUR1E0kqZuk/s1600/manikpuri.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 260px; height: 400px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/THYZt7DSjxI/AAAAAAAAAM8/SUR1E0kqZuk/s400/manikpuri.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5509619470870679314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;आमिर खान &lt;/strong&gt;की ताजा हिट फिल्म&lt;em&gt; पीपली लाईव &lt;/em&gt;के कलाकार &lt;em&gt;नत्था &lt;/em&gt; के रूप में सराहे जा रहे ओंकारदास मानिकपुरी अब किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और वे जिस शहर से हैं उस शहर में कलाकार पैदा करने की कुव्वत का दुनिया लोहा मान रही है| छत्तीसगढ़ का &lt;em&gt;चंडीगढ़&lt;/em&gt; कह सकते हैं&lt;em&gt;भिलाई&lt;/em&gt; को जहां से मानिकपुरी आते हैं| प्रख्यात पंडवानी गायिका&lt;em&gt; तीजन &lt;/em&gt;बाई भी भिलाई से ही हैं| अनुराग बासु और दीगर  अनेक कलाकार-फनकार इस्पात भूमि से तप कर निकले हैं| यह गौरव की बात है|  महंगाई डायन ने फिल्म को जबरदस्त पब्लिसिटी दे कर  नत्था को घर घर में पहचान दिला दी है| &lt;br /&gt; फिल्म में काम करने के  एवज में दो लाख रूपये मिले थे जो खर्च हो चुके हैं| आमिर को इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें नहीं  थी लिहाजा उनने कम बजट की फिल्म बनाई थी लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने नत्था को एक लाख रूपये दे कर सम्मानित किया है| यह सम्मान नत्था को स्वयम मुख्यमंत्री &lt;em&gt;डा. रमन सिंह &lt;/em&gt;ने प्रदान किया और शायद अब संस्कृति विभाग और  भी कोई मदद  करे| प्रेस क्लब-रायपुर ने भी नत्था को सम्मनित किया।&lt;br /&gt; पीपली लाइव ने महंगाई और किसानों की गंभीर समस्या पर संवेदनाओं को जगाने का प्रयास किया है। &lt;em&gt;'पीपली लाइव'&lt;/em&gt;  रिलीज हो चुकी है। फिल्म ने रिलीज से पहले ही अपनी लागत से अधिक कमाई कर ली है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;नत्था उर्फ़ ओंकार दास मानिक पुरी रायपुर एयरपोर्ट पर उतरे तो शहर भर के प्रशंसकों का हुजूम उनके स्वागत के लिए उमड़ पडा |नत्था का रोल पहले खुद आमिर करने वाले थे मगर वे जब आमिर से मिले और आडिशन दिया तो उनको चयनित कर लिया गया| मानिकपुरी ने अपने समय के विख्यात रंग निदेशक &lt;em&gt;हबीब तनवीर &lt;/em&gt;के साथ भी काम किया है|  मानिकपुरी  को इस बात की कोई शिकायत नहीं है कि उन्हें दो लाख रुपए ही मिले हैं, वे तो निहाल हैं कि उन्हें आमिर खान जैसे बड़े कलाकार फिल्म में काम करने का मौका मिला। भिलाई में नत्था की माँ मजदूरी करती हैं और वे खुद भी मजदूरी करते रहे हैं| उनका कच्चा सा घर अब लोगों से भरा रहता है और नत्था का क्रेज इतना है कि वे जहां  भी  जाते हैं लोग उनको घेर लेते  हैं|  लोग उन्हें नत्था के नाम से ही ज्यादा जानते हैं। हाल ही में वे अपने गृहग्राम &lt;em&gt;वृंदानगर&lt;/em&gt; गए तो लोगों ने उनका जबरदस्त स्वागत किया। उन्हें पलकों पर धर लिया। सभी उनकी झलक पाने के लिए बेताब थे। जिस स्कूल में उन्होंने प्राइमरी तक की पढ़ाई की थी उसी स्कूल में उनका सम्मान किया गया। ओंकारदास के प्रति लोगों के प्यार को देखते हुए उनकी माँ गुलाब बाई, पत्नी शिवकुमारी, बेटी चुमेश्वरी, गीतांजलि और बेटे देवेंद्र दास की आँखों से आँसू छलक पड़े। खुद ओंकारदास भी अपने आँसुओं को रोक नहीं पाए। &lt;br /&gt;ओंकारदास के लिए सफलता की राहें बहुत कठिन रही हैं | वे कई रातों को भूखे भी सोए|  लेकिन अभिनय के प्रति उनकी लगन सच्ची रही और अब वे कला की नई  राहों पर बढ़ चले हैं | वे अब अच्छी स्क्रिप्ट की तलाश में हैं और शुभकामना दी जाए कि उनको आगे भी अच्छी फ़िल्में हासिल होंगी|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-3291751539846787752?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/3291751539846787752/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/08/blog-post_26.html#comment-form' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/3291751539846787752'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4470499365844214550/posts/default/3291751539846787752'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/2010/08/blog-post_26.html' title='पीपली लाईव मानिकपुरी'/><author><name>रमेश शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02460937692115119359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/-tGrH3OCTXiE/TeYfAyHqp6I/AAAAAAAAAW8/5vKKMqVi1DE/s220/zoom%2Bramesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/THYZt7DSjxI/AAAAAAAAAM8/SUR1E0kqZuk/s72-c/manikpuri.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4470499365844214550.post-7049918559957446475</id><published>2010-08-18T08:37:00.000-07:00</published><updated>2010-08-19T08:14:02.660-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कालाहांडी'/><title type='text'>गाँव से लौट कर...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_fJf2BDEpVfI/TGwAqlwaWNI/AAAAAAAAAM0/QiHU8Jcfl8c/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; 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ऊंची चारदीवारी बनेगी और बच्चों के लिए झूले लगाए जाएंगे| कोई अफसर आकर निर्देश दे कर जा चुके हैं| ऐसे अफसर ही पिछड़े इलाकों का विकास करते हैं| &lt;br /&gt;रायपुर के बाद आप&lt;span style="font-style:italic;"&gt; महासमुंद &lt;/span&gt;जिले की सीमा पर पहुचते हैं तो भू दृश्य देख कर ही महसूस होता है कि आप एक सबसे पिछड़े माने जाने वाले इलाके में प्रवेश कर रहे हैं जहां &lt;em&gt;भुखमरी &lt;/em&gt;एक अंतर्राष्ट्रीय सवाल है| हालाकि अब इलाके में तस्वीर बदल रही है| छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पश्चिमी ओडीसा के कई कामगार गरीबी रेखा लांघ चुके हैं और श्रम करके कमा रहे हैं| इस साल बारिश कम हुई है लिहाजा कालाहांडी में फसल को लेकर किसान चिंतित हैं| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद भी कि वहाँ रात में बिजली के बल्ब लो वोल्टेज के कारण टिमटिमाते हैं और साधनों की कमी शहर की याद दिलाती है, मुझे गाँव जाना पसंद है| सिर्फ चौबीस घंटों में शुद्ध हवा और प्रफुल्लित कर देने वाला ऐसा माहौल मिला कि लौटे तो लगा कितने दिनों बाद शहर आना हुआ है और सब कुछ नया सा बदला-बदला  सा लगता रहा| चूल्हे पर पकी रोटी और घर की बाडी में उगी खेक्सी की सब्जी खा कर तृप्त हुए हम सब लौटे| नौकर ने जल्दी में &lt;span style="font-style:italic;"&gt;खेक्सी &lt;/span&gt;बाँध भी दी जो रायपुर में बहुत महंगी  सब्जी में शुमार है|खेक्सी,आमतौर से देखने में &lt;em&gt;"करेले की छोटी बहन"&lt;/em&gt;  जैसी लगने वाली यह सब्जी दुर्लभ रूप में बेलों में यत्र-तत्र उग आती है और किसान लोग आमतौर से खेतों में इसकी फसल नहीं उगाते हैं। शायद यही कारण है कि यह बाजारों में दिखाई नहीं पड़ती और ऊंची कीमत पर मिलती है। इसका &lt;em&gt;वानस्पतिक नाम &lt;/em&gt;आपको मालूम हो, तो जरूर बताएं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने बगीचे का बाहरी चक्कर लगाते हुए देखा एक&lt;span style="font-style:italic;"&gt; सांप &lt;/span&gt;तेजी से सरक रहा था| मैं उसे देख कर सतर्क होऊं इससे पहले वह फर्राटे भरता उगी हुई झाड़ियों में गुम  हो गया | नौकर ने कहा कि -ऐसन तो कत्तेक घुमत रहिथे | तैं अपन रस्ते वो अपन रस्ते|नौकर से ज्ञान मिला| सच है कि हम जब तब किसी को नहीं छेड़ेंगे वो क्यों हमें छेड़ेगा| &lt;em&gt;सांप &lt;/em&gt;तभी काटते हैं जब हम उस पर पाँव धर देते है | इसीलिए गाँव वाले शाम होते ही खा-पी लेते हैं और सुरक्षित ठिकानों पर जम जाते हैं और रात में निकलना भी हुआ तो लाठी के सहारे &lt;span style="font-style:italic;"&gt;ठक-ठक&lt;/span&gt; करते चलते हैं ताकि रास्ते में आगे कोई जीव-जंतु हो तो अपना रास्ता ले ले| यह कभी सुनने में भी नहीं आया कि सीधे रास्ते चलते हुए सांप ने काट लिया| सांप पर पैर पड़ जाए या उसे खतरे का आभास हो तभी वह काटते हैं| गाँव की यह यात्रा अच्छी रही|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;है अजीब शहर की जिंदगी, न सफर रहा, न कयाम है। &lt;br /&gt;कहीं कारोबार सी दोपहर, कहीं बदमिजाज सी शाम है।&lt;/em&gt;(बशीर बद्र )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4470499365844214550-7049918559957446475?l=sharmaramesh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sharmaramesh.blogspot.com/feeds/7049918559957446475/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' 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