चुपचाप दफन..चौतरफा गूँज

शनिवार, 19 अगस्त 2017

इसी हफ्ते जब पूरा देश गौभक्त कृष्ण की जन्माष्टमी के धार्मिक उल्लास में डूबा हुआ था तब दुर्ग जिले की शगुन गौशाला में दर्जनों गौमाताएँ भूख-प्यास से तड़प कर बेमौत मर रही थीं।  छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के धमधा ब्लॉक की एक गोशाला में यकायक दो सौ से ज्यादा गायों की कारूणिक मौत...राजपुर गांव के गौशाला संचालक ने मरी हुई गायों को चुपचाप दफना दिया जिसकी चौतरफा गूँज हुई है ...

मामला तब फूटा जब सोशल मीडिया पर मरी हुई गायों की तस्वीरें वायरल हुईं। घटना की जानकारी गौशाला के संचालकों ने न तो प्रशासन को दी और ना ही पशुपालन विभाग -स्थानीय प्रशासन को सूचित किया। गांव के सरपंच सेवाराम साहू का कहना है 200 से ज्यादा गायों की मौत हुई है।  गौशाला में लगभग पांच सौ गाए हैं। बताया जा रहा कि इस गौशाला में भूख और प्यास के चलते हफ्ते भर के भीतर दो सौ से ज्यादा गायों की मौत हो गई।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि इस गौशाला में ना तो चारा है और ना ही दाना-पानी और इसी वजह से गायों की मौत हुई है।   
राजपुर-धमधा की इस गौशाला के बाहर गेट पर  कमल का फूल यानि बीजेपी का चुनाव चिन्ह बना हुआ है।  इसे गौशाला प्रबंधन समिति के अध्यक्ष और जामुल नगर पालिका के उपाध्यक्ष  बीजेपी  नेता हरीश वर्मा चलाते हैं। मुख्य विपक्षी कांगेस ने आरोप लगाया है कि गायों की मौत भूख के कारण हुई है। प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता ज्ञानेश शर्मा  के मुताबिक धमधा में करीब 250 गायों की मौत, इससे पहले जुलाई में ही रायगढ़ जिले में स्थित चक्रधर गौशाला में 15 गायों की मौत और उससे भी पूर्व दुर्गुकोंदल के कर्रामाड़ में स्थित गौशाला में अगस्त 2016 में करीब 150 गायों की मौत, इन सब मामलों को देखकर साफ जाहिर होता है कि गौमाता को लेकर भाजपा सरकारों की कथनी और करनी में फर्क है। भाजपा के लिए गौमाता महज एक मुद्दा है जिसे लेकर वह जनता की भावनाओं से खेलती आई है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इसी वर्ष 'गौहत्यारों को फांसी पर लटका देंगे' कहते हुए राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां जरुर बटोर ली थी  लेकिन लेकिन वे तो महज नए सिरे से सभी गौशालाओं के जांच के आदेश देने में व्यस्त हैं। साफ जाहिर है कि धमधा गौशाला का संचालक चूंकि भाजपा नेता है, इसलिए उसे बचाने ऐसा आदेश दिया गया है।
पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा  के मुताबिक कि गौसेवा आयोग की शिकायत पर गायों की मृत्यु के मामले में हरीश वर्मा से पूछताछ की जाएगी।
एसडीएम ने भी घटनास्थल का दौरा किया और कहा कि घटना की जांच के बाद ही जानवरों की मौत के कारणों का पता चल सकेगा।   गौशाला संचालक एवं भाजपा नेता हरीश वर्मा ने मीडिया
वालों से कहा कि 15 तारीख को क्षेत्र में तेज बारिश के कारण गौशाला की 90 फीट लंबी दीवार गिर गई थी। चोट लगने के कराण ही पिछले तीन दिनों में 27 गायों की मौत हुई है। वर्मा ने दावा किया कि पिछले एक साल से उन्हें गौशाला के लिए छत्तीसगढ़ राज्य गौसेवा आयोग से कोई भी अनुदान नहीं मिला है। हरीश वर्मा का बयान है कि उसे अनुदान नहीं मिलता था।  अनुदान के एवज में उससे  रिश्वत की मांग की जा रही थी। 

 मामला अब राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में उछल गया है लिहाजा  बची हुई गायों को दूसरी जगह शिफ्ट करने के इंतज़ाम हो रहे हैं। गौशाला के क्रूर संचालक को गिरफ्तार करके आज कोर्ट में पेश किया जा रहा था तब उसके मुंह कालिख पोत दी गई।गायों की मौत से गुस्साए लोगों ने हरीश को लोगों  कालिख पोत दी। पुलिस वाले चुपचाप देखते रहे।

यह शर्मनाक हादसा ऐसे मौके पर हुआ है जब हाल में सरकार ने घोषणा की है कि राज्य में हादसों में घायल गायों को अस्पताल पहुंचाने के लिए दस जिलों में एम्बुलेंस सेवा शुरू की जाएगी और 10 सबसे अच्छी गौशालाओं का चयन कर उन्हें दस-दस लाख रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा।

 राजपुर गांव में गौशाला की गाएं आजकल नुमाइश की चीज बन गई है. उनको देखने अफसरों की फ़ौज चली आ रही है है। हरे चारे के इंतज़ाम हो रहे हैं। डाक्टर तीमारदारी में लगे हैं जबकि तीन दिन पहले शगुन गौशाला के जिस मेन गेट पर  ‘कमल’बना हुआ है, दर्जनों गायें मौत के आगोश में जाती रही हैं। जो जिन्दा बची हैं उनके जिस्म की हड्डियां उनकी हालत और बेबसी की गवाह हैं, पसलियां साफ दिखाई देती हैं। गांव भर में पिछले हफ्ते भर में मौत की शिकार हुई कई गायों के अवशेष पड़े हैं। कुछ गौ-शव खेतों में सड़ रहे हैं और कुछ आवारा कुत्‍तों की खुराक बन रहे हैं।  अब दुर्गन्ध उठ रही है इलाके में और गायों के शवों को उठाने का कार्य नहीं किया गया है।  आवारा कुत्ते मृत गायों के शव को नोंच रहे हैं।  ग्रामीणों को शंका तब हुई और हल्ला मचा जब जेसीबी से गहरे गड्ढे खोदते और ट्रैक्‍टर में गायों के अवशेष ले जाते देखा गया। राजपुर गांव के सरपंच पति शिव राम साहू का कहना है कि आरोपी कभी किसी को गौशाला में घुसने नहीं देता था। जो गाएं बची हैं, उनके खाने पीने को कुछ नहीं है।
अब सनसनी फैली तो गौ सेवा आयोग भी जगा जबकि उनको पहले ही इस गौशाला के बारे में अनियमितता की शिकायतें मिलती रही है। आयोग ने संचालक को नोटिस जारी कर उससे जवाब तलब भी किया था लेकिन आरोपी हरीश वर्मा चूंकि जमूल नगर पंचायत क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष है लिहाजा उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। सिर्फ फाइलें नोटिसों से भरती रही।
गौ सेवा आयोग ने अब पाया कि 'गौशाला में गायों के चारे आदि की व्यवस्था बहुत ही खराब है। गौशाला में पहले भी गायों की मौत होती रही है, लेकिन उसे छिपाया जाता था।' लेकिन किसी भी अफसर ने कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस भी मूकदर्शक रही। हल्ला मचा तो संचालक को गिरफ्तार किया गया मगर थाने में नहीं रख कर उसे होटल में रखा गया।  छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने जारी बयान में कहा कि गौ-रक्षा, गौ-सेवा, गौ-सुरक्षा का दावा कर रही भाजपा का असली चेहरा उजागर हुआ है। जिस भाजपा नेता ने गौ-माता की सेवा के नाम पर 93 लाख रूपये डाकरे हों उसके व्यवस्थापन में 250 गायों की भूख से मौत हो जाना बेहद शर्मनाक घृणित और निंदनीय घटना है। इससे भी ज्यादा निंदनीय रवैया भाजपा सरकार का उस आरोपी को संरक्षण दिया जाना है। भाजपा नेता हरीश वर्मा गिरफ्तार का समाचार फैला पंरतु जिस थाने में उसकी गिरफ्तारी बतायी जा रही है, वहां वह नही मिला। उसे वीआईपी सुविधा प्रदान की जा रही है। उसे होटल में भोजन कराया जा रहा है।
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जे के संस्थापक अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने सगुन गौशाला मे 250 से अधिक गायों की मृत्यु प्रदेश को कलंकित करने वाली घटना निरूपित करते हुए कहा कि इस गौहत्याकांड ने भाजपा के दिखावटी गौ प्रेम की बखिया उधेड़ कर रख दी है। शासकीय अनुदान की राशि गौशाला के संचालक स्वयं डकार गये और मूक गौमाताओं को भूखा रख कर मार डाला गया जो सुनियोजित एवं अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता है। गोरक्षा का स्वांग रचने वाले भाजपा एवं उनके जनप्रतिनिधियों के पास इतना भी समय नहीं था कि वह शगुन गौशाला का निरीक्षण कर लेते । पशुपालन विभाग द्वारा निरीक्षण किया गया होता तो गौशाला के अव्यवस्थित रखरखाव एवं गायों की दयनीय स्थिति की सही जानकारी मिल सकती थी तथा मृत गायों को बचाया जा सकता था । भाजपा सरकार मे ही दुर्गुकोंदल गांव स्थित शासकीय गौशाला में बड़ी संख्या में गायों के अचानक भूख से मरने की दर्दनाक घटना से भी प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया।
 बताया जा रहा है कि हरीश वर्मा पर गौशाला का प्रबंधन सही तरह से न करने और गायों की देखभाल न करने का लगातार आरोप रहा मगर नेता होने के नाते वह बचता रहा।
गायों की मौत के आंकड़े अबूझ हैं। पशुचिकित्सक दो दिन में 27 गायों का पोस्टमार्टम करने की बात मान रहे हैं।

गायों की कथित रूप से भूख से मौत के बाद गौशाला संचालक हरीश वर्मा के खिलाफ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम की धारा 4 और 6 तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 एवं भारतीय दण्ड अधिनियम की धारा 409 के तहत अपराध पंजीकृत किया गया है। 

भाजपा नेता हरीश वर्मा पर आरोप लगा है कि मृत गायों की खाल उतारकर बेच देता था और मांस को मछलियों के चारे के रूप में इस्तेमाल करता था।
छत्तीसगढ़ छात्र संगठन जोगी के अहिवारा ने एक ज्ञापन में कहा है कि संचालक गायों की तस्करी करने, गाय की हड्डियों को टेलकम कंपनी (पाउडर) को बेचने में  लिप्त रहा  है।   ग्रामीणों का कहना  है कि हरीश मृत गायों की खाल उतारकर मछलियों के चारा के रूप में इस्तेमाल करने बेच देता था। मांस गांव के निकट एक तालाब के किनारे मृत गायों को फेंक देता था।

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने राज्य के दुर्ग जिले में एक गोशाला में बड़ी संख्या में गायों की मौत के बाद राज्यभर में गोशालाओं की जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने दुर्ग की घटना को गंभीरता से लिया है और गोशाला के संचालक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। जांच में सभी गोशालाओं को शामिल किया जाएगा, चाहे उन्हें राज्य शासन से अनुदान मिलता हो या नहीं। 

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क्यों बौखलाए हैं नक्सली

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बस्तर की खूनी धरती पर एक बार फिर जघन्य नक्सली वारदात ने उन रक्तरंजित सवालों को कुरेद दिया है जो इस शांत वादी में लगातार सुलग रहे हैं। नक्सली वारदातों में हाल में आई तेजी के लिए कई कारण गिनाए जा रहे हैं जिसमे पहला कारण स्ट्रैटेजिक है। 
नक्सली कतई नहीं चाहते हैं कि जंगल में उनके महफूज ठिकानो तक सड़के बने। दरअसल बस्तर में अब सडक निर्माण का काम कराना सुरक्षा बलों के जिम्मे है जिसमे रोड ओपनिंग पार्टी के लगातार बढ़ते दबाव की वजह से बस्तर संभाग में नक्सलियों के पैर उखड़ने लगे हैं।
नक्सली बयानों में हमेशा कहा गया है कि 'छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपत्ति व संसाधनों खासकर जल-जंगल-जमीन व खनिज संसाधनों एवं आदिवासी अस्तित्व पर आद्योगिक खतरे हैं। इसलिए सडके नहीं बनने देंगे।' 
वे बुरी तरह बौखला गए हैं...छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, बंगाल और मध्य प्रदेश के नक्सलियों के प्रभाव वाले 44 जिलों में 5,412 किमी सड़क निर्माण परियोजना को मंजूरी दी गई है. निर्माणकार्यों से ये नक्सली खतरा महसूस करते हैं. 
रायपुर से 500 किलोमीटर दूर सुकमा/बस्तर छत्तीसगढ़ का वो इलाका है जहां नक्सली हुकूमत तक सरकार भी नहीं पहुंच पाती है। बड़े पत्तों वाले सालवन से ढंके जंगलों में कई नक्सली ठिकाने हैं।

जाहिर तौर पर 26 जवानों की शहादत खुफिया महकमे की नाकामी मानी जा रही है लेकिन दो महीने में दूसरी बड़ी घटना बताती है कि सीआरपीएफ के ही जवान लगातार शहीद हो रहे हैं तो हैं कही न कही इनपुट ओरिएंटेड कॉर्डिनेशन में कमी है। बस्तर में आम नागरिक सिर कलम किये जाने के भय से खुफिया सूचनाएं देने का साहस नही जुटा पाता और नक्सली भय का माहौल लगातार कायम रखने इस तरह की जघन्य वारदातों को अंजाम देते हैं। यह उनकी रणनीति का हिस्सा है।
जीरम घाटी में नक्सलियों के दुश्मन नंबर एक बस्तर टाईगर के नाम से मशहूर दिलेर महेंद्र कर्मा मार डाले गए थे। 2013 की इस घटना बाद नक्सलियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नही हुई और दुश्मनो को निपटा कर नक्सली अपने मकसद में कामयाब हो गए।
बस्तर का ही सुकमा ,दंतेवाडा व नारायणपुर सबसे ज्यादा तबाह है। नक्सलियों के रास्ते में बाधक जनप्रतिनिधि व आदिवासी नक्सलियों के निशाने पर हैं। लगातार इनकी हत्या और अपहरण की घटनाएं सामने आ रही हैं। इसके पीछे लोकतंत्र को कमजोर करने और दहशत फैला कर अपना वजूद कायम रखने की नक्सली मंशा साफ है। 2015 में मोदी की बस्तर में सभा न होने पाए इस मंशा से बस्तर में काबिज माओवादियों ने एडी चोटी का जोर लगा दिया था . लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) में सेना के हाथों बुरी तरह कुचले जाने और आंध्र प्रदेश में ग्रे हाउंड फोर्स से खदेड़े जाने के बाद पश्चिम ओडीसा और दक्षिण छतीसगढ़ नक्सिलयों का अभ्यारण्य बना हुआ है।शबरी नदी के तट पर स्थित सुकमा जिला न केवल बस्तर संभाग बल्कि छत्तीसगढ़ के भी दक्षिण छोर का आखिरी जिला है। इसकी सीमा ओड़िशा और आन्ध्र प्रदेश से लगी हुई है।


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कनाडाई युवक अंततः रिहा

गुरुवार, 30 मार्च 2017


बस्तर के धुर नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में एक कनाडाई युवक को अंततः नक्सलियों ने रिहा कर दिया। 25 वर्षीय जॉन सेजेलक के नक्सली चंगुल में फंस जाने की खबर ने रायपुर से दिल्ली और कनाडा तक सबके हाथ पाँव फुला दिए थे।  कनाडाई नागरिक जान सजलाक साईकिल यात्रा पर इलाके में आया था और फिर 27 मार्च को लापता हो गया। विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज के ट्वीट ने पुलिस प्रशासन पर दबाव बना दिया था।   

नक्सल मामलों के डीजी डीएम अवस्थी के अनुसार जॉन को नक्सलियों ने लंबी पूछताछ के बाद रिहा कर दिया। सुकमा के एसपी अभिषेक मीणा ने बताया, 'सजलाक को अरनमपल्ली के जंगलों में छोड़ा गया 
यह विदेशी नागरिक इस महीने की 14 तारीख को मुंबई से साईकिल से निकला था और वह 27 तारीख को सुकमा पहुंचा। फॉरेन रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत सभी विदेशियों को स्थानीय थाने में आमद दर्ज करवानी होती है लेकिन जॉन की तरफ से ऐसी कोई इत्तला दर्ज नहीं हुई।  नक्सली संघम  सदस्यों ने उसे पकड़ा और अपने मिलिट्री कमांडरों के हवाले कर दिया। इसके बाद हंगामा मचने पर चौतरफा प्रयास शुरू हुए और कनाडा से ले आकर दिल्ली तक हड़कंप मैच रहा।  
 बस्तर से कनाडाई सामाजिक कार्यकर्ता के अचानक गायब होने के मामले में केंद्र सरकार के स्तर पर भी चिंता जताई गई। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट कर ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से बातचीत कर तुरंत जानकारी देने कहा। 
सुषमा स्वराज ने दो ट्वीट में लिखा-हम अवाक हैं। मैंने ओडिशा सरकार से जानकारी मांगी है। सुषमा ने दोबारा ट्वीट कर कहा कनाडियन नागरिक को ओडिशा के कोरापुट में बंधक बनाए जाने की बात कही और लिखा - मामले में मैने ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक से बात की है। सुषमा स्वराज ने ओडीशा सरकार से इस कथित किडनैपिंग के पूरे मामले की रिपोर्ट भी मांगी है। सजलाक कनाडा स्थित संगठन इमीग्रेशन रिफ्यूजी सिटीजन से जुड़े हैं।

  जिस जगह पर उसकी लोकेशन बताई जा रही वह इलाका घोर नक्सल प्रभावित है। यह इलाका नक्सली मिलिट्री बटालियन के हिडमा का इलाका है। जॉन की साइकिल में एक जीपीएस डिवाइस लगा हुआ है। जब जॉन सुकमा जिले के किस्टाराम थानाक्षेत्र में सिंगामड़गु पहुंचे और ग्रामीणों ने उसको रोक।  इसके बाद खतरे का आभास होने पर जॉन ने अपने जीपीएस में लगे रेड बटन को दबाया।  रेड बटन के दबते ही डिवाइस ने अमेरिका के न्यूयार्क सिटी में जॉन के मुसीबत में फंसने के संकेत भेजे जिसे डिवाइस निर्माता कंपनी ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन -इसरो को भेज जॉन की लोकेशन पता लगाने की कोशिश की। इसरो ने जब जीपीएस द्वारा दिए गए आंकड़ो की जाँच की तब जॉन की लोकेशन सुकमा के सिंगामड़गु में मिली | इलाक़ा छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा की सीमा पर स्थित है। रिहाई के लिए नक्सलियों से संपर्क रखने वाले सामाजिक कार्यकर्त्ता भी सक्रिय हो गए।   

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सोलह बरस की बाली उमर को सलाम

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

एक छोटे से राज्य के रूप में उदित हुआ छत्तीसगढ़ राज्य अपनी स्थापना के सोलहवें वर्ष में प्रवेश कर गया है। यह अलग बात है कि 1983 में जब एक जिला था रायपुर ...तो आम तौर पर किसी मुहल्ले में लाठियां -तलवारें निकलती थी तो हम लोग 'युगधर्म' अख़बार में हेडिंग लगाते थे 5 कालम में ..मसलन 'आज़ाद चौक में तलवारें निकली' मगर बढ़ते शहरीकरण और टूटती संवेदनाओं का हाल यह हो चुका है कि अब जघन्य हत्या तक हो जाती है और बड़े अख़बारों में महज सिंगल कालम खबर लगती है। 
फिर भी कहना जायज है कि राज्य बनने से विकास तो हुआ है जो बताने के काबिल है और यह भी अच्छा लगा कि एक तेजी से बढ़ते राज्य के जश्न में उत्साह बढाने प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदीजी भी पहुंच गए।
16 साल पहले जब छत्तीसगढ़ बना तो किसी ने नहीं सोचा था कि नक्सल प्रभावित राज्य आगे चलकर भारत के अन्य राज्यों के साथ विकास की दौड़ में टक्कर लेगा। मोदी ने छत्तीसगढ़ की नई राजधानी नया रायपुर में राज्य स्थापना दिवस के मौके पर पांच दिन राज्योत्सव मनाया गया। 
शहर और गांव की बात करें तो नागरिक सुविधाओं के मामले में वर्गभेद दूर होना चाहिए। एक छत्तीसगढ़ जो रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और दीगर शहरों में नजर आता है जहां कुछ ख़ास इलाकों में अचंभित  कर देने वाली शान का किसी आदिवासी को सहमा देने वाला रूतबा है, प्रगति पथ की धाक है, चमचमाती हाई मास्ट लाईटें हैं और दूसरी तरफ बहुतेरे छोटे कस्बे हैं जहां अँधेरे में टूटी सड़कें मुहाल है |  यह बताता है कि सफर अभी बहुत लंबा है..मीलों चलना है। सुखद है छत्तीसगढ़ ने पिछले 15 वर्षों में बीमारू और अविकसित कहे जाने वाले सदियों पुराने कलंक को धो कर विकास दर के मामले में राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया है और कई बड़े राज्यों से होड़ कर ली है|
एक तरफ सरकार ने छत्तीसगढ़ में राज्य का 16वां स्थापना दिवस मनाया वहीं, कांग्रेसी इसका विरोध जताते रहे. कांग्रेस के नेताओं का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बेरोजगार आत्मदाह कर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे राज्य स्थापना दिवस का बहिष्कार करते हुए पूरे प्रदेश में आंदोलन करेंगे।
बहरहाल यह राज्य सरकार या प्रशासन की उपलब्धि की सोशल मीडिया वाली अंधाधुंध आलोचना नहीं है और यह अवसर ऐसे मुद्दे उठाने का भी नहीं है लेकिन सवाल तो उठते ही हैं| 15 साल में कई मुकाम तय करके छत्तीसगढ़ के लड़कपन को अब जवानी की तरफ बढ़ते देखना सुखद है| (ghatarani near raipur..below)

इस मौके पर किसी की  लिखी यह पंक्तियां मौजूं है -

नीम का पेड़ चंदन से क्या कम है... 
छत्तीसगढ़ हमारा लंदन से क्या कम है.... 
काजू क्या खाते हो.... 
कभी बोईर खाकर तो देखो... 
शहर-शहर क्या जाते हो..
कभी छत्तीसगढ़ आकर तो देखो .
" छत्तीसगढिया सबले बढ़िया "

ईमेल sharmarameshcg@gmail.com

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राजनीति की महानदी

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016


महानदी भी अब राजनीति की भेंट चढ़ रही है। विवाद राजनीतिक रंग लेने लगा है।  विवाद इसके जल-उपयोग का है जिसमे ओडीशा में सरकार चला रहे बीजू जनता दल ने छत्तीसगढ़ में सिंचाई परियोजनाओं को बंद करने की मांग के साथ ही लगभग टकराव के हालात पैदा कर दिए हैं । ओडीशा का कहना है कि रायगढ़ में बांध नहीं बने (जो अब पूर्णता की और है)। ओडीशा सरकार की ओर से पहले भी अरपा-भैंसाझार सिंचाई परियोजना के निर्माण का विरोध किया गया था और केन्द्रीय जल आयोग में आपत्ति दर्ज कराई गई थी । आयोग ने उसकी आपत्ति खारिज कर दी थी।
  
 तीन साल बाद ओडीशा में विधान सभा चुनाव होने हैं और दो साल बाद छत्तीसगढ़ में, और दोनों राज्यों के कई भड़काऊ नेता जिस तरह से पानी उलीच रहे हैं लगता है कावेरी-कृष्णा की तरह महानदी का दामन भी दागदार हो जाएगा। महानदी का उद्गम छत्तीसगढ़ में धमतरी जिले में स्थित सिहावा नामक पर्वत श्रेणी से हुआ है और यह ओडीशा के रास्ते समुद्र में मिल जाती है।
चेतनशील सामाजिक संगठन के संयोजक अनंतभाई पण्डा  ने ओडीशा सरकार द्वारा महानदी पर विवाद को ढकोसला बताया है. उन्होंने ईटीवी/प्रदेश18 से बातचीत में कहा कि नदियां अब समाप्ति की और हैं. ओडिशा सरकार ने अब तक 90 उद्योगों को पानी देने के लिए एमओयू किया है जिनमे अधिकांश उद्योगों को महानदी के हीराकुंड से पानी दिया जाएगा. हीराकुंड डेम का अधिकांश पानी उद्योगों को दिया जा रहा है. पहले हीराकुंड डेम में 332.8 मीट्रिक टन मछली उत्पादन हुआ करता था, वह घटकर महज 150 मीट्रिक टन रह गया है. 20 हजार मछुवारों का भविष्य खतरे में है. महानदी के जल प्रवाह की एक रिपोर्ट यह भी है जितना पानी इस नदी में बहता है उससे ओडिशा का हीराकुंड बांध चार बार भरा जा सकता है।


इस मुद्दे पर तनातनी न हो यह सबकी चिंता है। वरिष्ठ पत्रकार ललित सुरजन  की राय में दोनों राज्य के सांस्कृतिक मेल को बिगाड़ने की कोशिश हो रही है. सामाजिक और अन्य संगठनों की जिम्मेदारी है कि ऐसा माहौल तैयार करें जिससे दोनों राज्य सरकार शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत करें और जरूरत हो तो केंद्र सरकार को चर्चा में शामिल किया जायें. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ल ने कहा कि दोनों राज्य सरकारें गलत तत्थों को बताकर जनता को गुमराह कर रहे है. सरकार सार्वजनिक करें कि कितना पानी उधोगपति को देने का अनुबंध किया है. वक्ताओं ने महानदी के पानी को लेकर हो रही निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा दोनों प्रदेश की जनता के बीच वैमनस्य फैलाने की तीखी आलोचना की.


तथ्य 

-छत्तीसगढ़ के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 55 प्रतिशत हिस्से का पानी महानदी में जाता है। यह नदी और इसकी सहायक नदियों के कुल ड्रेनेज एरिया का 53.90 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में, 45.73 प्रतिशत ओडिशा में और 0.35 प्रतिशत अन्य राज्यों में है। हीराकुंड बांध तक महानदी का जलग्रहण क्षेत्र 82 हजार 432 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 71 हजार 424 वर्ग किलोमीटर छत्तीसगढ़ में है, जो कि इसके संपूर्ण जल ग्रहण क्षेत्र का 86 प्रतिशत है। 
-33 साल पहले दोनों राज्यों के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों ने इस बोर्ड के गठन का निर्णय लिया था। 
-महानदी सहित नदियों पर बने बांधों द्वारा हुए विस्थापन, नदियों के पानी का औद्योगिक उपयोग, खासकर पानी निगलने एवं धुआँ उगलने वाले तापविद्युत गृहों से हो रहे नुकसान एवं सामाजिक तनाव के मुद्दे अहम् हैं। 

 छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों के बीच चल रहा यह महानदी विवाद केंद्र सरकार के पास जा पहुचा है। वैसे  भी यह विवाद 33 साल पुराना है।

महानदी के पानी को लेकर 
ओडिशा और छत्तीसगढ़
में तनाव के हालात की गूँज 
दिल्ली में भी हुई। 

इस विवाद को सुलझाने केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने मंत्रालय के ओएसडी अमरजीत के नेतृत्व में एक समिति बनाने का निर्देश दिया है। इस बीच छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने एक बार फिर दोहराया है कि महानदी पर छत्तीसगढ़ में निर्मित सभी जल परियोजनाएं केन्द्र सरकार के निर्धारित मापदंडों और नियमों के अनुरूप है। बातचीत से ही इस विषय का समाधान निकलेगा। महानदी पर वह हर तरह की बातचीत और विचार विमर्श के लिए हमेशा तैयार है और बातचीत से ही इस विषय का समाधान निकलेगा। उन्होंने ओडिशा के सामने दोनो राज्यों का एक कंट्रोल बोर्ड बनाने का प्रस्ताव भी रखा और कहा कि इससे भविष्य के सभी परियोजनाओं के लिए भी आपसी सामजंस्य की राह बनेगी।
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक  बैठक से खुश नहीं थे। उन्होंने दिल्ली में कहा कि उनकी सरकार राज्य के हितों की रक्षा के लिए कोई फैसला लेगी। बैठक में पटनायक ने कहा कि वह चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ तत्काल अपने यहां महानदी पर बन रहे बैराजों का काम रोक दे। लेकिन बैठक में मौजूद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

  
उन्होंने त्रिपक्षीय बैठक में कहा कि छत्तीसगढ़ पूरी पारदर्शिता के साथ अपनी जल परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है और इससे ओडिशा का हित प्रभावित नहीं होता है। उन्होंने कहा कि महानदी के पानी पर किसी भी तरह का विवाद अनावश्यक है। डॉ. रमन सिंह ने बैठक में कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि महानदी के पानी पर विवाद करने के बजाय किस तरह इसका बेहतर उपयोग किया जाए।  बैठक में छत्तीसगढ़ के जल संसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और मुख्य सचिव विवेक ढांड भी उपस्थित थे।
बैठक में छत्तीसगढ़ सरकार ने केन्द्रीय जल आयोग की संयुक्त समिति द्वारा एक सप्ताह में छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जल परियोजनाओं की प्राथमिक समीक्षा के केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती के प्रस्ताव को सहमति प्रदान की।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह  ने कहा कि महानदी पर ओडिशा की सभी आशंकाए भ्रम या सही तथ्यों की जानकारी न होने पर आधारित है। उन्होंने कहा कि तथ्य यह बताते है कि छत्तीसगढ़ में निर्माणाधीन सभी जल परियोजनाओं के बाद भी महानदी में इतना पानी शेष बचता है कि इससे हीराकूद बांध 5 से 7 बार तक भरा जा सकता है। उन्होंने कहा कि महानदी में मानसून में जल का प्रवाह 96 प्रतिशत और गैरमानसून में केवल 4 प्रतिशत होता है, इसलिए किसी भी बांध में केवल वर्षा का जल ही संचय रहता है। उन्होंने कहा कि आंकड़े यह भी दर्शाते है कि इन्ही बांधों के चलते 70 के दशक से गैरमानसून समय में नदी में पानी के बहाव में वृद्धि देखी गई है। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि छत्तीसगढ़ ने केवल 274 एमसीएम नई जल संग्रहण क्षमता निर्मित की है जो की बांधों में सिल्टिंग के कारण हुई खोई क्षमता से भी कम है ।
डॉ. रमन सिंह ने कहा कि महानदी का 57 प्रतिशत पानी बिना उपयोग आए समुद्र में चला जाता है। ओडिशा को छत्तीसगढ़ द्वारा बनाये गये बांधो में एकत्रित 274 एमसीएम पानी की चिंता करने के बजाय अपने राज्य में व्यर्थ जा रहे 57 प्रतिशत जल के सदुपयोग पर ध्यान केन्द्रीत करना चाहिए। डॉ. रमन सिंह ने कहा – राज्य में महानदी पर समोदा, शिवरीनारायण, बसंतपुर , मिरोनी , साराडीह और कलमा बांध निर्माणाधीन है और ये सारी 2 हजार हेक्टेयर से कम में सिंचाई क्षमता की परियोजनायें है। इनकी सम्मिलित सिंचाई क्षमता कुल 3 हजार 149 हेक्टर है । उन्होंने बताया कि दो हजार हेक्टर से कम सिंचाई क्षमता वाली सिंचाई परियोजनायें लघु सिंचाई परियोजनायें होती है और इसके लिए केन्द्रीय जल आयोग से स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि इन सभी परियोजनाओं में वर्षा जल एकत्रित होगा जिससे नदी को कोई हानि नही है। इसी तरह अमामुडा, सालका, लच्छनपुर और खोंगसरा डाइवर्जन योजना अरपा नदी पर है तथा ये सभी योजनायें भी दो हजार हेक्टेयर से कम सिंचाई क्षमता वाली लघु सिंचाई योजनायें है । राज्य की केलो और अरपा भैंसाझार परियोजनाओं को केन्द्रीय जल आयोग की पहले ही स्वीकृति मिल चुकी है तथा पैरी-महानदी और तांदुल लिंक परियोजना अभी प्राथमिक चरण में है और इसकी डीपीआर ओडिशा राज्य को भेजी जा चुकी है ।
बैठक में छत्तीसगढ़ के जल संसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने बताया कि ओडिशा ने हदुआ, हीराकूद की सासोन नहर के आधुनिकीकरण और लोअर इंद्र परियोजना की कोई जानकारी छत्तीसगढ़ को उपलब्ध नहीं कराई है। 

राजनीति न हो -अमित जोगी 

मरवाही विधायक अमित जोगी की राय में केंद्र सरकार मसले का राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रही है। इसे सुलझाने के बजाए उसे और लटकाते हुए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। पहले संयुक्त नियंत्रण बोर्ड बनाने की बात थी, लेकिन वहां तो मामले को लटकाने के लिए अस्थाई कमेटी बनाए जाने का निर्णय ले लिया गया और रमन सरकार ने उस पर सहमति भी दे दी। जोगी ने कहा कि महानदी बेसिन का नेट सिंचित क्षेत्र का रकबा कम होता जा रहा है। राज्य सरकार यह नहीं देख रही कि राज्य के किसानों को पानी मिल रहा है या नहीं। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की कि महानदी बेसिन में किसानों को कितना पानी मिल रहा है, इस पर राज्य सरकार श्वेत पत्र जारी करे।  कहीं इसे भी कावेरी नदी जल विवाद की तरह न लटका दिया जाए। जिसकी वजह से आज कर्नाटक जल रहा है। 

ओडीसा में राजनीति 

एक अख़बार की खबर के मुताबिक महानदी मामले में बीजद के नेता परस्पर विरोध में है।  ढेंकानाल के सासद तथागत सतपथी ने एक स्थानीय ओडि़या अखबार में अपने संपादकीय में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक एवं जल संपदा विभाग के अधिकारियों को सीधे तौर पर टारगेट किया है। उन्होंने लिखा है कि जल संपदा विभाग केवल कैनालों की खुदाई कर ठेकेदारों का पेट भर रहा है। उन्हें दंडित करना राज्य सरकार का दायित्व है। खुद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक जल संपद विभाग को अपने पास रखे हैं फिर भी ऐसा लग रहा है कि विभाग का कोई माई व बाप नहीं है। बीजद सासद के इस लेख से राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया है।
बीजद प्रवक्ता अमर सतपथी ने कहा है कि तथागत बाबू अपने संपादकीय में अपना विचार प्रकट किए हैं। वह बीजद से लोकसभा सदस्य हैं। वह अपने अखबार में अपना विचार प्रकट किए हैं। जल संपद विभाग ओडिशा के लिए काफी महत्वपूर्ण है। बीजद के ही एक और प्रवक्ता शशि भूषण बेहेरा ने कहा है कि तथागत बाबू एक अखबार के संपादक के तौर पर अपना विचार रखे हैं। यह उनका संपादकीय विचार है। वहीं समवाय मंत्री दामोदर राउत ने कहा है कि जल संपद विभाग तो क्या किसी भी विभाग के कोई माई-बाप नहीं हैं। वह यदि एक विभाग को बता रहे हैं कि कोई माई- बाप नहीं हैं तो मेरे पास इसका जवाब नहीं है। सासद के संपादकीय पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं भाजपा के महासचिव पृथ्वीराज हरिचंदन  ने कहा है कि तथागत सतपथी के संपादकीय ने राज्य के असली मुखौटा को खोल दिया है। मैं इस संपादकीय का स्वागत करता हूं। पीसीसी अध्यक्ष प्रसाद हरिचन्दन ने कहा है कि खाली जल संपद विभाग ही नहीं ओडिशा सरकार के माई- बाप हैं मुख्यमंत्री नवीन पटनायक। प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में शासन की बागडोर है और ठेकेदारों के हाथ में जल सिंचाई विभाग।


सामाजिक प्रयास शुरू 

जल विवाद पर भुवनेश्वर में एक राष्ट्रीय सेमीनार हुआ जिसकी की अध्यक्षता जनार्दन पाती ने की और महानदी जल विकी। इस सम्मलेन में बताया गया कि ओडिशा और छत्तीसगढ़ सरकार ने पानी संरक्षण क्षमता से ज्यादा उद्योगों को पानी देने के लिए समझौता कर लिया है जिसके कारण पानी का संकट गहराया है। उद्योगों का दबाव सरकारों पर बढ़ रहा है। सेमिनार में ओडिशा के पूर्व वित्तमंत्री पंचानन कानूनगो, राज्य सचिव सीपीआईएम भुवनेश्वर सुरेश पाणिग्रही, अंतर्राष्ट्रीय जल विशेषज्ञ डॉ. श्रीनिवास चोकाकुला, सीपीआईएम रायपुर धर्मराज महापात्र, ट्रेड यूनियन कौंसिल रायगढ़ के गणेश कछवाहा, ओडिशा डेवलोपमेंट ट्रस्ट के चेयरमेन विष्णु मोहंती एवं सीआईटीयू ओडिशा के अध्यक्ष लंबोदर नायक मुख्य रुप से शामिल हुए। अन्य प्रयासों में भुवनेश्वर एक अन्य सम्मलेन में देशबन्धु समाचारपत्र के प्रधान संपादक ललित सुरजन ने कहा कि समाज जब तक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा तब तक ऐसे हालात बनते रहेंगे। इसके समाधान के लिए समाज अपनी आम राय दे और उसके माध्यम से सरकार को निर्णय लेना चाहिए।  दिए।

'महानदी जोड़़ती है, तोड़ती नहीं'
 शीर्षक को लेकर भुवनेश्वर में आयोजित ओडिशा-छत्तीसगढ़ सामाजिक संगठन के सम्मेलन में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को सौंपने प्रस्ताव पत्र बनाया गया है। इसके अलावा दोनों राज्यों को जोडऩे के लिए महानदी यात्रा की जाएगी। प्रस्ताव को केन्द्र तक पहुंचाते हुए जनसंगठनों की ओर से एक सम्मेलन करने का निर्णय भी लिया गया है। इस सम्मेलन में आगामी ओडिशा के संयोजक सुदर्शन दास, भूतपूर्व राष्ट्रदूत अबसर बरुआ, वरिष्ठ भाषाविद् पद्मश्री देबी प्रसन्न पटनायक, धीरेन्द्र राय, दिलीप सावत, डॉक्टर विनायक रथ, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला, वरिष्ठ राजनेता आनंद मिश्रा, किसान नेता नंद कुमार कश्यप आदि इस सम्मेलन में शामिल हुए।




  

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बस्तर / पत्रकार.. दोधारी तलवार..

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016




लगातार प्रेशर बम, लैंड माइन बिछे हुए इलाकों में काम कर रहे बस्तर  के  पत्रकार अब निरंतर भय के माहौल में काम कर रहे हैं...  हालात यह हैं  कि नक्सल प्रभावित इलाकों में पत्रकार दोधारी तलवार पर चल रहे है. पत्रकारों को यहां कोई “नक्सली एजेंट” समझता है तो कोई “पुलिस एजेंट”,.वे सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच पिस रहे हैं अब चूंकि क्योंकि कलम बंदूक से ज्यादा ताकतवर होती है.  लिहाजा इलाके के दमदार लोगों ने क़ानून को ही नही कलम को भी बंधक सा बना लिया है। अकबर इलाहाबादी ने कहा है कि तीर  निकालो ना तलवार निकालो गर मुक़ाबिल  हो तोप तो अखबार निकालो मगर बस्तर में  रहा है ऐसे हालात हैं कि पत्रकार को ही बाहर निकलो।शायद दुनिया से बाहर।
बस्तर  के  पत्रकार के लिए चित्र परिणाम मगर जुझारू पत्रकार डटे हैं यह मानकर कि सत्य परेशान तो हो सकता है ..पराजित नही|  पत्रकार एजिटेटेड हैं और अब सड़कों पर भी हैं| पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग करते हुए पत्रकार आंदोलन कर रहे हैंउनको दबाने वालो की यह गलतफहमी है कि कलम हमेशा के लिए दबेगी| एक अनुमान के मुताबिक बस्तर में करीब 300 पत्रकार काम कर रहे हैं.अब यह राष्ट्रीय सुर्ख़ियों का मुदा है क्योंकि पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति छत्तीसगढ़ ने बस्तर सहित पूरे प्रदेश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के खिलाफ और पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर में प्रदर्शन किया।
 हाल में दंतेवाड़ा के पत्रकार प्रभात सिंह को भी आईटी एक्ट के एक मामले में जेल भेज दिया गया । बीजापुर के ही पत्रकार कमलेश पैकरा को पुलिस ने नक्सली मामले में गिरफ्तार किया था। कुछ दिनों पहले दरभा के पत्रकार संतोष यादव और सोमारू नाग को भी पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है। इसके अलावा एक अन्य मामले में जगदलपुर के पत्रकार अनिमेश पाल को भी जेल जाना पड़ा था। प्रभात के खिलाफ़ स्कूल परिसर में जबरन घुसने, शिक्षकों और स्टाफ से हाथापाई करने और पैसे मांगने के कथित आरोप में एफआईआर पिछले साल हुई थी। अधिवक्ता महेंद्र दुबे के मुताबिक  प्रभात सिंह के खिलाफ की गयी लिखित शिकायत और एफआईआर के तथ्यों से प्रभात सिंह के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 67, 67A और आईपीसी की धारा 292 का अपराध बनता ही नहीं है इसके बावजूद उसे बिना किसी कानून सम्मत कारण के गिरफ्तार किया जाना पुलिस की नीयत पर सवाल खड़ा करता है।
मुख्य्मंत्री डा रमन सिंह  पत्रकार मामले में एक कमेटी बनने का एलान कर चुके हैं। कमेटी राज्य में पत्रकारों की समस्याओं को लेकर विशेष तौर पर गठित  की .
छत्तीसगढ़ में दो पत्रकारों की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ बस्तर -जगदलपुर में पत्रकारों के शुरू हुए आंदोलन के पहले दिन राज्य सरकार ने एलान कर दिया कि राज्य में पत्रकारों की समस्याओं को लेकर एक विशेष समिति गठित  की जाएगी। किसी भी पत्रकार की गिरफ्तारी के संबंध में 72 घण्टे के भीतर समिति को मिलने वाली शिकायत की जांच सरकार के पास उपलब्ध ठोस तथ्यों के आधार पर की जाएगी और आवश्यक हुआ तो संबंधित पत्रकार को राहत देने के लिए उपयुक्त निर्णय लिया जाएगा। बस्तर में दो पत्रकारों को कथित तौर पर नक्सली समर्थक बता कर गिरफ्तार किए जाने के विरोध में बस्तर के पत्रकार लामबंद हुए और धरना दिया गया। ये मुद्दा राज्य की विधानसभा में भी उठा ।

मुख्यमंत्री डा रमन सिंह ने रायपुर से टेलीफोन पर आंदोलित पत्रकारों के प्रतिनिधियों को यह भी आश्वासन दिया कि उनकी सुरक्षा के लिए राज्य सरकार सजग है और इसके लिए सभी जरूरी उपाय किए जाएंगे।
डा. रमन सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का गौरवशाली इतिहास रहा है। यहां की माटी पत्रकारिता एवं साहित्य की उर्वरा भूमि रही है। स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप राज्य सरकार छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है। रमन सिंह ने बस्तर के अधिकारियों को निर्देश दिये हैं कि पत्रकारों को भरोसे में लेकर काम करें.
  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निर्देश पर परिपत्र  में कहा गया है कि प्रदेश में समय-समय पर पत्रकारों के विरूद्ध आपारिधक प्रकरण दर्ज करने या गिरफ्तार करने की स्थिति में पत्रकारिता की स्वतंत्रता के मुददे पर सवाल उठते हैं। शासन को कई बार इस प्रकार की शिकायतें भी प्राप्त होती हैं कि किसी पत्रकार पर पुलिस कर्मियों द्वारा ज्यादती की गयी है, या उनके विरूद्ध आपराधिक प्रकरण दुर्भावनावश कायम किया गया है।

पत्रकारों के निंमित्त जारी परिपत्र में दी गयी व्यवस्था इस प्रकार होगी -

(1) पत्रकारों पर ज्यादतियां होने की शिकायतों को संचालक जनसम्पर्क विभाग एकत्रित कर पुलिस मुख्यालय में कार्यरत उप पुलिस महानिरीक्षक (शिकायत) को भेजेंगे। संचालक जनसम्पर्क से प्राप्त प्रकरणों में पुलिस मुख्यालय द्वारा आवश्यक कार्रवाई किए जाने के बाद इसकी सूचना संचालक जनसम्पर्क को और प्रतिलिखि गृह विभाग को दी जाएगी।

(2) जहां तक पत्रकारों के विरूद्ध कोई प्रकरण कायम किए जाने का प्रश्न है, इस संबंध में राज्य शासन ने यह निर्णय लिया है कि यदि किसी भी (चाहे वह अभी स्वीकृत पत्र प्रतिनिधि हो या न हो) के विरूद्ध कोई प्ररकण कायम किया जाता है, तो उन प्रकरणों में चालान किए जाने के पहले उन पर उपलब्ध साक्ष्य की समीक्षा संबंधित पुलिस अधीक्षक और क्षेत्रीय उप पुलिस महानिरीक्षक कर लें और स्वयं को आश्वस्त कर लें कि कोई भी प्रकरण दुर्भावनावश या तकनीकी किस्म के स्थापित नहीं किए जाए। यदि उप महानिरीक्षक के मत में यह पाया जाए कि कोई प्रकरण दुर्भावनावश कायम किया गया है, तो तत्काल उनको समाप्त करने के निर्देश दिए जाएं और संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरूद्ध कार्रवाई की जाए। इस कंडिका में यह भी कहा गया है कि बगैर समीक्षा किए हुए प्रकरणों का चालान न्यायालय में प्रस्तुत न किया जाए। प्रत्येक तिमाही में क्षेत्रीय उप पुलिस महानिरीक्षण इस प्रकार के प्रकरणों की समीक्षा करेंगे और वे पुलिस महानिदेशक को सूचना भेजेंगे। पुलिस महानिदेशक से यह सूचना गृह विभाग को भेजी जाएगी।

(3) यह व्यवस्था यथावत जारी रहेगी। इसके अन्तर्गत उप पुलिस महानिरीक्षक के स्थान पर अब पुलिस महानिरीक्षक (रेंज) कार्रवाई करेंगे।

(4) उपरोक्त व्यवस्था के अतिरिक्त शासन स्तर पर एक उच्च स्तरीय समन्वय समिति का भी गठन किया गया है, जो पत्रकारों और शासन के बीच आपराधिक प्रकरणों और संबंधित विषयों में आवश्यक समन्वय स्थापित करने की कार्रवाई करेगी। समन्वय समिति के अध्यक्ष सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव होंगे। समिति में गृह (पुलिस) विभाग के सचिव, पुलिस मुख्यालय की अपराध अनुसंधान शाखा के प्रभारी अधिकारी और शासन द्वारा नामांकित दो वरिष्ठ पत्रकार सदस्य होंगे। समन्वय समिति में जनसम्पर्क विभाग के संचालक सदस्य सचिव होंगे। समिति द्वारा संबंधित रेंज पुलिस महानिरीक्षक को भी आवश्यकतानुसार आमंत्रित किया जा सकता है।

(5) उपरोक्त समन्वय समिति के संदर्भ की शर्ते इस प्रकार होंगी - परिपत्र की कंडिका-2 में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार यदि कार्रवाई से संतुष्टि नहीं होती है, तो उन प्रकरणों में उच्च स्तरीय समन्वय समिति द्वारा विचार किया जाएगा। समिति द्वारा विचारण से संबंधित मामले के चयन का अधिकार संचालक जनसम्पर्क के पास रहेगा।  पत्रकार के रूप मंे किए गए किसी कार्य के कारण पत्रकारो के विरूद्ध दर्ज आपराधिक प्रकरणों के संबंध में यह उच्च स्तरीय समन्वय समिति पुलिस और पत्रकारों के बीच समन्वयक की भूमिका का निर्वहन करेगी। समिति पुलिस और पत्रकारों की ओर से आवश्यक सूचना और जानकारियों को आदान-प्रदान करेगी। इसके लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त करने और प्रकरण से जुड़े पक्षों को बुलाने के लिए समिति आवश्यक निर्देश भी जारी करेगी।

परिपत्र की प्रतिलिपि पुलिस महानिदेशक और सामान्य प्रशासन विभाग तथा जनसम्पर्क विभाग के सचिवों सहित समस्त संभागीय कमिश्नरों, कलेक्टर और जिला दण्डाधिकारियों, रेंज पुलिस महानिरीक्षकों और सभी पुलिस अधीक्षकों को भी भेजी गयी है।
छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के लिए बनी बीमा एवं सम्मान निधि (पेंशन योजना) की तकनीकी खामियों को दूर करने एवं वेतन बोर्ड की सिफारिशों को प्रदेश स्तर पर लागू करवाने की मांग को लेकर एक प्रतिनिधिमंडल  ने राज्यपाल बलरामजी दास टंडन से मिलकर ज्ञापन सौंपा।
ज्ञापन में बताया गया कि सम्मान निधि (पेंशन योजना) में सेवानिवृत्त पत्रकार इसलिए पात्र नहीं माने जा रहे है क्योंकि विभिन्न समाचार पत्रों में काम करने के बाद भी जनसंपर्क विभाग में उनकी अधिमान्यता नहीं रही है। 

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भूले -बिसरे "महिपाल भंडारी"

शुक्रवार, 17 जून 2016

आजकल फैंटेसी फ़िल्में बनती ही नहीं और टाकीज पर मॉल्स बन गए हैं। थिएटर जा कर सामूहिक फिल्मदर्शन का सामजिक सुकून टीवी जैसे घरघुस्सू और सेलफोन जैसे घनघोर सेल्फिश बनाने वाले माध्यम ने छीन लिया है।
  भूले बिसरे बेजोड़ कलाकार "महिपाल भंडारी" ने लंबा अरसा पौराणिक और तिलस्मी फिल्मो को जिया। राजकपूर दिलीप और देवानंद जैसे दिग्गजों के रहते अपनी अलग पहचान बनाई।
महिपाल का जन्म जोधपुर में 1919 को ओसवाल जैन परिवार में हुआ था। महज़ 6 साल के थे कि उनकी मां गुज़र गयीं। नवरंग 1959, संपूर्ण रामायण 1961, बजरंग बाली 1956 और पारसमणि 1963 , लक्ष्मीनारायण’ 1951 और ‘अलादीन और जादुई चिराग़’ (1952) जैसी अनेक फिल्मे उनके खाते में हैं। 40 साल -130 फिल्मे ... नारद की भूमिका में भी याद किए जाते रहे। 

15 मई 2005 को 86 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।अभिनेता महिपाल ज्यादातर फैंटेसी  फिल्मों के लिए प्रसिद्द थे
बहुत ही कम लोग जानते हैं कि लता का पहला गीत प्रख्यात अभिनेता महीपाल ने ही लिखा था। अदालत में ज्यादातर गीत महीपाल ने ही लिखे, महिपाल ने माली, आपकी सेवा में, अदालत (पुरानी), मेरे लाल इत्यादि फिल्मों के गीत भी लिखे थे।  फिल्म आपकी सेवा में लता मंगेशकर ने अपने पार्श्व गायन की शुरुआत की थी।महिपाल चन्द भण्डारी ने अपने रिटायरमेंट के बाद कविताएं भी लिखी थी। उनका एक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ था......उनको हार्दिक श्रद्धांजलि

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