जाना था जापान पहुँच गए चीन,अब जाईए जेल

बुधवार, ९ दिसम्बर २००९



छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य विभाग में अस्पताल में काम आने वाली मशीनें जापान से मंगाने की बजाय अफसरों ने फर्जीवाड़ा करके चीन से मंगा ली और सरकार को करोड़े रुपयों का चूना लगा दिया गया लेकिन अब इस फर्जीवाड़े में बुरी तरह फंसे अफसर गिरफ्तारी से बचते फिर रहे हैं| राज्य शासन ने इस मामले में अदालत का सख्त रवैया देखते हुए एक बड़े अफसर की वेतन वृद्धि रोकने के निर्देश दिए हैं और सारा मामला पुलिस जांच के लिए सौंप दिया गया है|

रायपुर के अम्बेडकर अस्पताल में मरीजों की जांच के लिए कलर डोपलर मशीन खरीदने का मामला इसी साल तब चर्चा में आया जब खरीदी गयी मशीनों ने काम करना बंद कर दिया जबकि इनको खरीदे हुए बमुश्किल एक साल भी पूरा नहीं हुआ था| हल्ला मचा तो जांच शुरू हुई जिसमे पाया गया कि स्वास्थ्य विभाग ने चेन्नई की एक कम्पनी टीवीट्रान को इस मशीन की बड़ी खेप के लिए ठेका दिया था| टीवीट्रान के कर्ताधर्ताओं ने धमतरी की एक लोकल कंपनी छत्तीसगढ़ सर्जिकल को अपने साथ जोड़ लिया लेकिन यहाँ खेल शुरू हो गया | छत्तीसगढ़ सर्जिकल के लोग स्वास्थ्य विभाग के अफसरों से मिल गए और एक फर्जी टीवीट्रान कंपनी के जरिये सारी खरीद प्रक्रिया शुरू हो गयी| निविदा में शर्त थी की कलर डाप्लर मशीन और मल्टी पैरामीटर जैसे उपकरण जापान से मांगा कर आपूर्ति किये जाएंगे मगर आपूर्तिकर्ता ने यह उपकरण चीन से मंगा कर अस्पतालों में रखवा दिए | यह उपकरण सभी अस्पतालों में कबाड़ का हिस्सा बनने लगे तो सारा भांडा फूटा और यह भी उजागर हुआ कि सारा गोरखधंधा वरिष्ठ अफसरों और शातिर कर्मचारियों की मिलीभगत से हुआ है| धमतरी के आपूर्तिकर्ता के बारे में असली टीवीट्रान के संचालकों ने मामला दर्ज कराया| साल भर से जांच चल रही थी जिसको हर स्तर पर प्रभावित करने की कोशिशों पर न्यायालय की सख्ती ने पलीता लगा दिया | सरकार में भी उच्च स्तर पर साफ़ कर दिया गया कि भ्रष्ट अफसरों को कतई नहीं बख्शा जाएगा| अब नौबत है कि स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी को जेल भेज दिया गया है और एक शीर्ष अधिकारी फरार चलरहे हैं जबकि एक अन्य अधिकारी को जमानत याचिका वापस लेनी पडी है|

राज्य शासन ने स्वास्थ्य विभाग के संचालक और इस मामले में आरोपी डा. प्रमोद सिंह के खिलाफ कडा रुख अपनाते हुए उनकी वेतन वृद्धि रोकने के आदेश दिए हैं| बताया गया है कि फिलहाल लापता हैं| उनकी जमानत अर्जी अदालत से खारिज हो चुकी है| विभाग में वे 7 नवम्बर से छुट्टी पर चल रहे हैं जबकि निचली अदालत ने कल इस मामले में एक अन्य स्वास्थ्य संचालक डा. सार्वा को न्यायिक हिरासत में 17 दिसंबर तक के लिए जेल भेजने का आदेश दिया है| जेल भेजे गए सार्वा स्वास्थ्य आधार पर जेल जाने से बच रहे थे लेकिन सत्र न्यायाधीश एन के चन्द्रवंशी ने कडा रुख अपनाते हुए आदेश दिया है कि उनकी जांच जेल के डाक्टरों से कराई जाए और स्वास्थ्य की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए| एक अन्य आरोपी स्वास्थ्य संचालक डा डी के सेन फिलहाल जमानत पर हैं जबकि कई डाक्टर और अस्पताल के कुछ लिपिक स्तर के कर्मचारी जेल भेज दिए गए हैं| गोल बाजार पुलिस इस मामले की जांच कर रही है| 17 दिसंबर को इस मामले में सुनवाई होगी|

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ह्त्या नक्सलियों ने की या हीरा खदान माफिया ने

शनिवार, ५ दिसम्बर २००९

छत्तीसगढ़ के हीरा खदान क्षेत्र में पिछले शनिवार की रात वन विभाग के अधिकारी की ह्त्या नक्सलियों ने की थी अथवा वे इलाके में काबिज अवैध खनन माफिया का शिकार बन गए ? यह सवाल पिछले कई दिनों से इलाके चल रही अवैध हीरा उत्खनन की वारदातों की पृष्ठभूमि में कौंध रहा है| मारे गए वनपाल मार्क तांडी को शनिवार को रात में झांसा दे कर गरियाबंद-देवभोग के जंगल में बुलाया गया था| वे बिना पुलिस सुरक्षा के चार वनकर्मियों को लेकर जंगल में चले गए थे| सूचना किसी गाँववाले से आई थी कि जंगल में अवैध कटाई चल रही है| इसकी पुष्टि और रोकथाम के लिए 48 वर्षीय तांडी इन्दागाँव के समीप जंगल में प्रवेश कर गए लेकिन वे जिंदा नहीं लौट सके|
इस घटना ने जंगलों में ड्यूटी करने वाले आम अफसरों, कर्मचारियों समेत पुलिस महकमे के मैदानी दस्तों की सुरक्षा की असलियत बयान कर दी है| गरियाबंद इलाका दरअसल सरकार से ज्यादा जंगल के उस माफिया की नजर में चढ़ रहा है जिसे मालूम है कि इलाके में ज़रा सी खुदाई करने पर असली हीरे के खनिज स्रोत निकल आते हैं| लोग रातों में इलाके में सारी रात खुदाई करते रहते हैं यह इलाके का बच्चा - बच्चा जानता है| इलाके में नक्सलियों की पकड़ भी बढ़ रही है| इस बाबत भी कई घटनाओं से प्रमाण मिलता रहा| मसलन इसी साल कांकेर की पुलिस फ़ोर्स के 13 जवान जंगल में नक्सली हमले में तब मारे गए जब झांसा दे कर उनको जंगल में बुलाया गया था| गरियाबंद इलाका रायपुर और धमतरी के समीप है| बस्तर में लाल झंडा गाड़ने के बाद नक्सली इस इलाके में लगातार दबिश दे रहे थे| पिछले साल उनका एक बड़ा नेता गोपन्ना यहाँ से पकड़ा गया था| गोपन्ना को पकड़ने के बाद नक्सलियों ने खूब कोहराम मचाया| पुलिस विभाग को भी गोपनीय इत्तला मिल रही थी कि नक्सली यहाँ लोकल आपरेशन स्क्वाड बनाने की तैयारियों में जुटे हैं| इलाके में पुलिसकर्मियों की संख्या दुगुनी करने के अलावा इसे नया पुलिस जिला बनाने की पहल पूरी हो पाती इससे पहले नक्सलियों ने वन विभाग के अफसर की ह्त्या करके पूरे महकमे के कर्मचारियों में दहशत भर दी है| इलाके में सक्रिय नक्सलियों ने 22 नवम्बर को वन विभाग का नियंत्रण कक्ष भी आग के हवाले कर दिया था| पिछले दिनों बोरई[गरियाबंद] इलाके का एक वन अधिकारी जंगल में कुछ सशस्त्र लोगों द्वारा धर लिया गया था मगर शुक्र रहा कि उन लोगों ने उसके रूपये और मोबाईल छीन कर उसे ज़िंदा वापस जंगल से खदेड़ दिया |
दरअसल यह जांच का मसला है कि इलाके में जो सशस्त्र लोग सक्रिय हैं वे कौन हैं और उन्होंने वन विभाग के अफसर को क्यों निशाना बनाया ? इलाके में नक्सली सक्रिय हैं यह पुलिस के अधिकारी भी मान रहे हैं लेकिन अब तक देखा गया है कि नक्सली झांसा दे कर पुलिस पार्टी को निशाना बनाते रहे हैं, किसी साधारण अफसर को जंगल में बुला कर मारने की संभवतः यह पहली घटना है| गोली से नहीं वरन लाठी अथवा बन्दूक के कुंदे जैसी चीज से मार डालने की घटना नक्सलियों की प्रचलित ह्त्या शैली से मेल नहीं खा रही है| जिन लोगों ने वनपाल की ह्त्या की, उन्होंने उनके साथ आए चार कर्मचारियों को जाने दिया| इलाके में रात में खुदाई करने वालों में आसपास के ग्रामीण और दूर-दूर से आए हीरा व्यापारी भी शामिल हैं जो किम्बर्लाईट और कोरेंडम का अवैध उत्खनन करा रहे हैं| इलाके में जुलाई में सुरक्षा दस्ते को हटा लिया गया था जिसे लेकर वन विभाग के आला अधिकारी नाराजगी भी जता चुके हैं| देवभोग में हीरे की खदानों में सरकारी स्तर पर पूर्वेक्षण का काम चल रहा है और सरकार अगले दोतीन वर्षों में यहाँ खुदाई की योजना पर काम कर रही है| हीरे का कारोबार करने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी डी बियर्स की सहयोगी इकाई डायमंड ट्रेडिंग कंपनी (डीटीसी) के मुताबिक दुनिया के 90 फीसदी हीरों के तराशने का काम भारत में होता है, ऐसे में यहाँ हीरा उद्योग के फलने-फूलने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं लेकिन एक बड़ा खनन माफिया अभी से खुदाई में भिड गया है जिसे रोकने का काम वन विभाग के अमले के लिए कितना जोखिम भरा है यह शनिवार को हुई घटना में सामने आ गया है|

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बस्तर में शाह और मात का खेल

सोमवार, ३० नवम्बर २००९



छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित इलाके बस्तर में पुलिस ने सघन रूप से नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन ग्रीन हंट चला रखा है लेकिन लगातार शिकस्त के बावजूद नक्सलियों के हौसले पस्त नहीं हैं बल्कि वे अब गुरिल्ला तौर तरीकों से पुलिस बल को परेशान करने में जुट गए हैं और इसी रणनीति के तहत नक्सली जंगल में आने वाले पुलिस दस्तों की सुविधा के ठिकानों पर हमले कर रहे हैं और ताबड़तोड़ ढंग से रसद मदद के सारे रास्तों को बंद करने में जुट गए हैं |

कुछ दिन पहले रायगढ़ के आगे कोलकाता लाइन एक यात्री ट्रेन पत्री से उतार दी गयी | दरअसल निशाने पर सुरक्षा बालों को ला रही एक दूसरी ट्रेन थी|
बस्तर में एक प्रकार से पुलिस बल और नक्सलियों के बीच लुकाछिपी का खेल चल रहा है| पुलिस बल ने कोदेनार के जंगल में छापा मार कर नक्सली शिविर से 1.6 टन बारूद बरामद करने में बड़ी सफलता हासिल की जबकि गढ़चिरोली इलाके में नक्सलियों ने एक बांस डिपो को फूंक दिया | यह बांस डिपो वन विभाग का था जिसको ले कर नक्सली संदेह कर रहे थे कि इस बांस से सुरक्षा बालों के लिए आधार शिविर स्थापित किये जाएंगे | सुरक्षा बल जंगल में ठिकाना नहीं बना सकें यह सोच कर नक्सलियों ने बांस डिपो को ही जला डाला| हजारों बांस जल कर राख हो गए| अंतागढ़ इलाके में नक्सलियों ने बिजली के ट्रांसफार्मर जला दिए | बिजली विभाग ने हाल में आधार शिविर के लिए 66 के वी का ट्रांसफार्मर लगाया था| कुछ खम्बे भी गाड़े गए थे| नक्सलियों ने समूह में पंहुच कर खम्बे उखाड़ दिए और ट्रांसफार्मर को आग के हवाले कर दिया |
आसपास के गांवों में नक्सली पर्चे फेंक कर दहशत का माहौल बना रहे हैं और धमतरी जिले से यह शिकायत भी आई है कि प्रत्येक परिवार से एक युवक की मांग की जा रही है| कुछ गांवों में शिकायत की गयी है कि युवकों को जबरन उठा लिया गया है|
पिछले कुछ महीनो से सुरक्षा बालों के बढ़ते दबाव के बावजूद नक्सली जंगल के भीतरी ठिकानों में एक प्रकार से मोर्चा ले कर डटे हुए हैं जिससे पुलिस बल भी भोंचक है| कुछ नक्सलियों के कब्जे से अत्याधुनिक किस्म के चीन निर्मित हथियार भी बरामद हुए हैं| नक्सली पुलिस से लुका छिपी का भी खेल खेल रहे हैं | पुलिस जब उनके पीछे एक जिले में जाती है तो वे जंगली रास्तों से दूसरे जिले में चले जाते हैं| उन्होंने पुलिस के छीने हुए वायरलेस सेटों का इस्तेमाल भी इस लुका छिपी के लिए करना शुरू कर दिया है| दरअसल पुलिस के लिए जंगल में मूव करना आसान नहीं है जबकि नक्सली जंगल के चप्पे चप्पे से वाकिफ हैं | इस बार आपरेशन ग्रीन हंट में राज्य की पुलिस का साथ देने के लिए अर्ध सैन्य बालों के जवान जंगल की ख़ाक छान रहे हैं| उनका साथ मिल जाने से राज्य पुलिस के जवानो के हौसले भी बुलंद हैं| इस बीच लगातार मानवाधिकार संगठनो से मिल रही आलोचना को देखते हुए राज्य पुलिस के महानिदेशक विश्व रंजन ने एलान किया है कि हमारे जवान किसी भी सूरत में पहले गोली नहीं चलाएंगे मगर गोली का जवाब गोली से ही दिया जाएगा|
अबूझमाड़ में पुलिस ने दबिश दे दी तो इसे नक्सलियों उनके खिलाफ उसकी एक बड़ी सफलता कहा जाएगा| राज्य पुलिस ने यह भी साफ़ कर दिया है कि अभी जो आपरेशन ग्रीन हंट चलाया जा रहा है वह छत्तीसगढ़ की पुलिस ही चला रही है| केंद्र सरकार का संयुक्त आपरेशन अभी शुरू नहीं हुआ है| बाहर से आ रहे जवानो को अभी सम्बंधित मोर्चो पर रवाना किया जा रहा है| इस आपरेशन की तैयारियां जोरों पर हैं और उधर नक्सली भी झुकने के लिए तत्पर नजर नहीं आ रहे हैं|
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आज भी अबूझ है आदिमयुगीन अबूझमाड़

बुधवार, २५ नवम्बर २००९


छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल में फैला हुआ अबूझमाड़ इलाका नक्सल विरोधी आपरेशन 'ग्रीन हंट' के लिए एक बड़ा अवरोध साबित हो रहा है| बस्तर के भीतरी इलाके में करीब चार हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले अबूझमाड़ में आज भी आदिमयुगीन सभ्यता जीवित है| इसी साल सरकार ने अबूझमाड़ में घुसने पर से लगी पाबंदी हटा ली थी लेकिन यह इलाका नक्सलियों का सर्वाधिक सुरक्षित प्रशिक्षण केन्द्र बना हुआ है और सुरक्षा बलों सहित सरकार के लिए अबूझ पहेली बना हुआ है|
दक्षिनी बस्तर में अबूझमाड़ में हाल में सरकारी राजस्व सर्वे के लिए विभाग ने 25 निरीक्षको की भर्ती की थी लेकिन एक भी राजस्व निरीक्षक ने इलाके में अपनी ड्यूटी ज्वाइन नहीं की | कारण एक ही रहा -नक्सली खौफ | इस इलाके में साल के सघन वन फैले हुए हैं| आज भी इलाके में जगह जगह तत्कालीन मध्य प्रदेश शासन के बोर्ड नजर आते हैं |
पुलिस वाले तो भूल कर भी इधर नहीं झांकते और वन समेत दीगर सरकारी महकमों के अधिकारी -कर्मचारी डर के मारे जंगल से दूर ही रहते हैं|
अबूझमाड़ में कुल 237 राजस्व गांवों का पिछले साल एरियल सर्वे हुआ था लेकिन यह सच है कि अबूझमाड़ का अंतिम राजस्व सर्वे शायद शहंशाह अकबर के जमाने में ही हुआ था और तब हालात इतने बुरे नहीं थे कि सरकारी कारिंदे नक्सलियों के भय से भीतर नहीं घुस पाते थे|
इलाके में सर्वाधिक ग्राम नारायणपुर जिले में आते हैं जो सघन नक्सल प्रभावित इलाका है| नक्सलियों की दंडकारन्य जोन कमेटी ने इस इलाके को स्वतंत्र क्षेत्र घोषित कर रखा है और जानकार बताते हैं कि यहाँ नक्सलियों के दर्जनों स्थायी शिविर चल रहे हैं|
पिछले साल नक्सलियों ने इलाके के 40 आदिवासियों का अपहरण कर लिया था लेकिन जंगल में उनका क्या हुआ इसकी कोई खबर नहीं आ सकी| इलाके में आज भी तीरधनुष के सहारे शिकार होते हैं| आदिवासी अधोवस्त्र पहनते हैं और घोटुल जैसी प्रथाओं को जारी रख कर आधुनिक दुनिया से पूरी तरह कटे हुए हैं|
सरकार की एक भी योजना यहाँ नहीं चल रही है| स्कूल, अस्पताल, हेंडपंप और सड़क जैसी सुविधाएं तो बहुत दूर की बात है| नक्सली उनके बीच घुल-मिल गए हैं और उनकी भाषा में ही बात करते हैं | पुलिस के कई अधिकारी यह मानते हैं कि जमीनी लड़ाई में अबूझमाड़ में बेहद कठिनाइयां हैं लेकिन् इसका उपाय अगर ढूँढ भी लिया गया है तो उसे घोषित नहीं किया गया है| बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक टी जे लांगकुमेर ने कहा कि अब पुलिस बल अबूझमाड़ के जंगल में घुसने की तैयारी में हैं| इस इलाके में कई सालों से कोई बाहरी आदमी नहीं पंहुच पाया है और वहा दर्जनों स्थानों पर नक्सलियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं| माना जा रहा है कि अबूझमाड़ में पुलिस ने दबिश दे दी तो इसे नक्सलियों उनके खिलाफ उसकी एक बड़ी सफलता कहा जाएगा|

छत्तीसगढ़ के राजस्व एवं स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का कहना है की वे इस पर विचार कर रहे हैं कि इलाके के जमीनी सर्वे का काम निजी क्षेत्र से करा लिया जाए क्योंकि रेवेन्यू इंस्पेक्टरों से काम नहीं हो पाया है| इस बारे में शीघ्र निर्णय लिए जाएंगे|

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चाईना मोबाईल की तरह ध्वस्त हो गई चाईना चिमनी

शुक्रवार, ६ नवम्बर २००९

चीनी मोबाईल और खिलौनों की खराब गुणवत्ता के बाद अब बिजलीघर बनाने में चीनी कंपनियाँ जिस प्रकार से खराब प्रदर्शन कर रही हैं उससे इन कंपनियों की साख पर सवाल उठ रहे हैं| | कोरबा में चीनी कंपनी सिपको आमतौर पर घरों में इस्तेमाल होने वाली आठ और दस एम्एम् की लोहे की छडों से 275 मीटर ऊंचा चिमनीमीनार बना रही थी | यह मीनार भरभरा कर गिर गयी| चिमनी के मलबे से 50 लाशें निकली| अब तक की जांच में यह भी सामने आया है कि सीमेंट और रेट के अनुपातिक मिश्रण में जम कर घालमेल किया जा रहा था और लगभग थूकपालिश वाले अंदाज में चिमनी बनाई जा रही थी जिसे आज नहीं तो कल ध्वस्त हो ही जाना था क्योंकि दुर्घटना के बाद मलबे से लोहे की छड़ें अलग और सीमेंट का मसाला अलग है जबकि भवन निर्माण सामग्री में मसाला छडों से चिपक जाता है|

मामला चूंकि न्यायिक जांच की प्रक्रिया में है लिहाजा अपना नाम नहीं छपे जाने की शर्त पर एक शीर्ष अभियंता ने बताया कि चीन की कंपनी ने जो नक्शा तैयार किया था वह सिर्फ दस-पंद्रह सालों के लिए कारगर हो सकता है जबकि भारतीय कंपनियाँ आगामी 30-40 वर्षों को देख कर काम करती है| घटना स्थल से मुआयाना कर लौटे पूर्व शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा के अनुसार सिपको ने बालको से यह ठेका 75 करोड़ रुपयों में हासिल किया था जबकि इस निर्माणाधीन चिमनी के समीप पांच साल पहले बनाई गई चिमनी की लागत 95 करोड़ रूपये बताई गयी है| सिपको ने यह ठेका एक अन्य कंपनी आई डी पी एल को सौंप दिया जो चिमनी बना रही थी| नाम सिपको का चल रहा था| बारिश में चिमनी अचानक ढह गयी| उसका मलबा आसपास की केन्टीन और सामानघर पर गिरा|चिमनी के मलबे से 50 से भी ज्यादा शव बरामद हुए| मुख्यमंत्री ने दौरा किया और न्यायिक जांच की पहल कर दी लेकिन अभी जांच के सारे तथ्य सामने आने बाकी हैं | इस दुर्घटना ने एक सबक दिया है कि निर्माण में गुणवत्ता के साथ समझौता किया जाने पर भारी पैमाने पर जनधन की हानि
हो सकती है|
अब यह तथ्य आरोपित हो रहे हैं कि बालको ने जिस जमीन पर बिजलीघर बनाना शुरू किया था उस जमीन का हस्तांतरण वन विभाग ने नहीं किया था| कोरबा के विधायक जे सिंह अग्रवाल का आरोप है कि उच्चतम न्यायालय को भी अँधेरे में रख कर निर्माण कराया जा रहा था| नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे का कहना है कि पिछले विधान सभा सत्र में इस बाबत सवाल पूछे गए तो कोंग्रेस को विकास विरोधी कह दिया गया| उन्होंने कहा कि इस मामले को विधान सभा को सौंप देना चाहिए|

विशेषज्ञ इस बात पर भी आर्श्चय कर रहे हैं कि जिस जगह चिमनी गिरी वहा एक और चिमनी पिछले पांच वर्षों से खडी है लेकिन उसे कोई नुक्सान नहीं पंहुचा जबकि चीनी ढांचा पूरी तरह जमींदोज हो गया जिसका मलबा साफ़ होने में कई दिन लग गए|

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नक्सली शिविर ध्वस्त करेंगे, गाँव नहीं - डा. रमन सिंह

मंगलवार, ३ नवम्बर २००९


देश भर में नक्सल प्रभावित सभी राज्यों में हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के सफाए के लिए आपरेशन ग्रीन हंट शुरू करने की औपचारिक घोषणा की जा चुकी है| मतलब साफ़ है कि नक्सली और सुरक्षा बलों में सीधी भिडंत के बाद जो हालात बनेंगे, उन पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी|
इन हालात में राज्य के मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह क्या सोच रहे हैं और दरअसल उनकी मंशा क्या है. इसे ले कर ख़ास बातचीत की गयी, पेश है-प्रमुख अंश-

* केंद्र और राज्य सरकार ने अब यह तय कर लिया है कि वामपंथी उग्रवाद से सख्ती से निपटेंगे और शुरूआत छत्तीसगढ़ से की जाएगी| इस मोड़ पर भी क्या ऐसी कोई संभावना है कि बातचीत से कोई रास्ता निकल आए?
- हमारा उद्देश्य यह है कि किसी भी तरह से शान्ति हो और शान्ति के लिए चलाए जाने वाले अभियान का मतलब ही है कि वे लोग (नक्सली) आत्म समर्पण करें| केंद्र सरकार ने आत्म समर्पण के लिए नीति भी अच्छी बनाई है| अधिकाँश लोग जो इस आन्दोलन में हैं वे वापस आएँगे और ये (हार्डकोर माओवादी) अकेले हो जाएंगे तो मैं समझता हूँ कि कंही न कंही चर्चा से समाधान संभव होगा|

* नक्सलवाद को अब तक जितना समझा गया है उसमे वे लोग समता, समानता, शोषण के खात्मे की बात करते हैं और कानून में भी यह स्पष्ट है जिसका पालन सरकार को करना है| तो फिर गड़बड़ क्या है?
* गड़बड़ देखिये , एक तरफ तो वे रिफार्म की बात करते हैं, क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने की बात करते हैं | शहरों जैसी सुविधाएं चाहते हैं मगर जो आन्दोलन चला रहे हैं उसने बस्तर को १८ वीं सदी में जीने के लिये मजबूर कर दिया है| यह किस तरह की क्रान्ति है जिसमे हजारों स्कूलों-अस्पतालों को तबाह कर दिया जाता है| मेरा स्पष्ट मानना है कि यह आन्दोलन अपने उद्देश्य से भटक गया है| हम ढाई लाख लोगों को पट्टे दे रहे हैं उसका विरोध क्यों? सबको स्वास्थ्य , शिक्षा और रोज़गार मुहैय्या कराना चाहती है सरकार लेकिन वे लोग इसका भी विरोध करते हैं | आप कहाँ से क्रांतिकारी हो गए, ३०० करोड़ रूपये की सालाना अवैध वसूली करते हैं| उसमे से तीन करोड़ भी क्यों खर्च नहीं करते ? सारा पैसा जाता कहाँ है उसका हिसाब कौन देगा?

ऐसा नहीं है कि किसी गाँव पर गोलीबारी की जाएगी| आक्रमण नक्सली शिविरों पर होगा| सरकार को चिंता है कि एक भी बेक़सूर व्यक्ति ना मारा जाए| अंततः हमारा उद्देश्य यह है कि हिंसा करने वाले को सही जवाब दिया जाए और जो सामने आएगा उससे बात भी की जाएगी|

* नक्सलवाद के पैदा होने के कारणों की भी तलाश करके स्थाई समाधान निकालने पर आपकी सोच क्या है?

* आज से ३०-४० साल पहले एक कारण था कि बस्तर या सरगुजा की या फिर छत्तीसगढ़ की उपेक्षा को एक कारण माना जा सकता था लेकिन जंगल में तो कोई वर्गभेद नहीं होता वंहा न कोई गरीब है न कोई अमीर है, न जमीदार है | वनों में जनजीवन कृषि पर नहीं वनोपज पर आधारित है| जंगल में सभी एक हैं| हमने नीतियाँ भी समग्र रूप से सोच कर बनाई हैं |
हमने इस बार कहा है कि हमें पैसा नहीं जरूरत की चीजें दे दीजिये| मसलन बुलेट प्रूफ़ जेकेट,एंटी लैण्ड माइन वेहीकल वगैरह केंद्र स्वयं हमें उपलब्ध करा सकता है|वे एक नीति तय करके हमें बेहतर सामान उपलब्ध करा दें तो यह बेहतर रहेगा और समय भी बचेगा|
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शान्ति की कामना में बस्तर के आदिवासी

गुरुवार, २९ अक्तूबर २००९


छत्तीसगढ़ को किसी जमाने में शान्ति का टापू कहा जाता था लेकिन आज हालात ऐसे नहीं हैं बस्तर की शांत वादियों में बन्दूक और बारूद की गूँज है और हजारों साल से जंगल की लौकिक तपस्या में लीन आदिवासी पुलिस बनाम नक्सली मुठभेडों से त्रस्त हो चुके हैं| एक आम शहरी अब पेड़ों की छाँव और झरनों की गोद में सुस्ताने के इरादे से बस्तर जाने का ख्वाब जरूर देखता है लेकिन उसको मालूम है कि बस्तर में नीरवता और सन्नाटे की उसकी कामना रक्तरंजित क्रान्ति के आधुनिक प्रणेताओं और उनसे लोहा ले रहे सुरक्षा बालों ने छीन ली है

बस्तर को अब शान्ति चाहिए यह बात यंहा के आदिवासी पिछले पांच सालों से सलवा जुडूम की भाषा में कह रहे हैं| सलवा जुडूम (शान्ति के लिए जनजुडाव) आन्दोलन बस्तर में १९९५ में इसी इरादे से शुरू हुआ था लेकिन यह अलग बात है कि इसमें भी शहर की राजनीति ने अड़ंगा लगा कर इसे सरकारी शिविरों में कैद कर दिया| आज भी करीब ५० हजार लोग नक्सलियों के भय से राहत शिविरों में रह रहे हैं लेकिन आदिवासियों का दर्द यह है की उनकी बात न तो सरकार सुन रही है ना नक्सली जो उनके रहनुमा बन कर जंगलों में आए थे लेकिन अब हालात यह हैं कि आदिवासियों को नक्सली भी मार रहे हैं| आदिवासी की दिक्कत देखिये, पुलिस उससे मुखबिरी कराना चाहती है और वह मुखबिरी करता है तो नक्सली उसकी जान के दुश्मन बन जाते हैं| उसके सामने दोनों तरफ से मुश्किल|

बस्तर में जा कर किसी आम नागरिक से बात की जाए तो उसका पहला सवाल यही होता है कि यह कब तक चलेगा? अव्वल तो बाहर से जाने वाले हर इंसान को आदिवासी शक की निगाह से देखते हैं क्योंकि हालात ही ऐसे हो चुके हैं कि पुलिस और नक्सली दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं| पुलिस ने अब सख्त आक्रामक रवैया अख्तियार करना शुरू कर दिया है तो नक्सली भी पलटवार में जब भी उनको मौका हाथ लगता है, वे सुरक्षा बलों से भरी हुई जीप विस्फोट के जरिये उड़ा देते हैं| छत्तीसगढ़ में इस साल अब तक २५० लोगों की ह्त्या हो चुकी है जिसका सीधा सम्बन्ध नक्सली मामले से है| नक्सलवाद के सूरमा अब निहत्थे आदिवासियों पर निशाना साध रहे हैं और आदिवासियों से भरे ट्रक को विस्फोट के जरिये उड़ा रहे हैं| बस्तर में स्कूल भवन ध्वस्त नजर आते हैं क्योंकि नक्सली यह कह कर भवन को बर्बाद कर देते हैं कि इन भवनों में सुरक्षा बल को ठहराया जाता है| बस्तर में भीतरी इलाकों में घुसते ही एक अजीब सी सिहरन और आतंक मिश्रित डर की भावना पूरे रास्ते आपके साथ चलती है जब आप चौपाया किसी वाहन में चलते हैं| क्या पता कब कोई गोली आकर आपकी खोपडी उड़ा दे या जिस गाडी में सवार हैं, वह किसी लैण्ड माइन की चपेट में आ जाए? आए दिन बस्तर में बिजली के पोल गिरा कर समूचे इलाके को मध्य युग में धकेल दिया जाता है| नक्सली यह कहते हैं कि सरकार की बिजली भी नहीं चाहिए| बस्तर में शुद्ध पेयजल आज भी झरने से ही मिल सकता है और जब झरने सूख जाते हैं तो आदिवासी कीचडयुक्त झिरिया से पानी पीते हैं|

बस्तर में एक और समस्या से आए दिन लोग परेशान होते हैं- जब भी पुलिस कोई बड़ा अभियान चला कर नक्सलियों को मारती है तो नक्सली संगठन बंद का आव्हान करके पूरे इलाके में सड़क परिवहन ठप कर देते हैं| हाल में एक अजीब से फरमान से सभी ट्रांसपोर्टर परेशान हैं| नक्सली फरमान है कि किसी भी पुलिसवाले को बस में नहीं बिठाया जाए| इस फरमान से डरे बस चालकों ने बसें खड़ी कर दी| सरकार की समस्या असल यह है कि बात किससे की जाए? सरकार कहती है कि पहले बंदूकें छोड़ कर बात के लिए नक्सली आगे आएं जबकि नक्सली कहते हैं कि हमारे पास बन्दूक है तभी तो सरकार बात के लिए आगे आती है

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