दो चेहरों वाली दिल्ली

सोमवार, 11 मई 2009



दिल्ली  में मैं तकरीबन 16 साल लगातार रहा। कुछ मुश्किलों को छोड़कर हमेशा दिल्ली मुझे दिलवालों की बस्ती ही लगी लेकिन कालकाजी में रहने वाली तीन बहनों की दर्दनाक कहानी ने दिलवालों की कही जाने वाली दिल्ली का निष्ठुर चेहरा एक बार फिर उजागर किया। कथित रूप से निरंतर भूख और कुपोषण की शिकार सबसे छोटी बहन नीरू तो अब इस दुनिया में नहीं रही। लेकिन मीडिया में उसकी मौत का पूरा मंजर सामने आने के बाद मानवीय सहायता के लिए जिस तरह से सैकड़ों हाथ बढ़े, उससे यह भी साबित हुआ है कि अब की दिल्ली एक बहुत बड़ी हृदयहीन मानवों का एक महासमुद्र जरूर बन गई है लेकिन इस शहर की संवेदनाएं पूरी तरह मरी नहीं है, और शायद मरेंगी भी नहीं क्योंकि दिल्ली भी इंसानों की बस्ती है। यह अलग बात है कि यहाँ इंसान की जान  बहुत सस्ती है। यह घटना पुरानी हो चुकी है मगर इसे भुलाया नहीं जा सकता। इंसानियत का तकाजा है कि इससे सबक लिया जाए।
बात नीरू के परिवार की। उसकी बहनें और वो खुद न जाने कितने दिनों से घर पर कैदी की तरह रह रहे थे। अड़ोस-पड़ोस वालों से भी उनकी बोलचाल पहले कम थी जो बाद में बिल्कुल बंद हो गई। माता-पिता के गुजर जाने के बाद  बहनों ने खुद अपने पांव पर खड़े होने की कोशिशें भी की थी लेकिन उनकी किस्मत शायद उन लड़कियों जैसी नहीं थी जिनको हर मोड़ पर किसी भाई, मित्र या किसी शुभचिंतक की छत्रछाया मिल जाती है। समाज तो दूर पड़ोस में ही किसी का आसरा नहीं मिल पाया। लिहाजा उनकी जिंदगी की गाड़ी पटरी से उतरती चली गई। वैसे भी जिस रेल का इंजन ही न हो और सही दिशा (पटरी) तय न हो तो रेल पटरी से उतरेगी ही। लेकिन नीरू और उसकी बहनों की परवरिश शायद ऐसे समाज में हुई जहाँ आदमी दो चेहरे लेकर आगे बढ़ता है। एक चेहरा दिखाने का और एक चेहरा असलियत वाला, जिसे उसी को दिखाया जाता है जिस पर भरोसा किया जाता है। समस्या की जड़ यहीं है। दिल्ली ही नहीं, कह लें कि बहुतेरे ऐसे शहर और कस्बे अब एक ऐसी बस्ती में तब्दील हो रहे हैं जहाँ संकट सामाजिक भरोसे का ही है। समाज तो छोड़ें, अब परिवारों में भी भरोसे टूट रहे हैं। नीरू और उसकी बहनों ने शायद किसी को भरोसे के काबिल नहीं समझा होगा या फिर उनकी सोच ही लगातार इस तरह से विकसित होती चली गई कि इस दुनिया में वो लोग पूरी तरह से बेपनाह हैं और उनकी तरफ कोई ध्यान देने वाला नहीं है। संभवत: खुद्दारी के कारण शुरुआत में ही वे मदद मांगने में संकोच करने लगीं और फिर धीरे-धीरे समस्याओं ने उनको इस बुरी तरह से जकड़ा कि पहले तन बीमार हुआ और फिर मन और नतीजा सामने आ गया।


मैं दावे से कह सकता हूँ कि दिल्ली में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा होगी जिनको ऐसी घटनाओं पर बेहद अफसोस होता है, बनिस्बत ऐसे लोगों के जो सिर्फ अपनी चिंता और मस्ती में मगन हैं। दिल्ली ज्यादातर सजग लोगों का शहर है। दिल्ली में आ करके एक औसत निरक्षर मजदूर भी साल भर में मानसिक तौर पर इतना परिपक्व हो जाता है जितना अपने गाँव-कस्बे में नहीं हो पाता। हर मोड़ पर चुनौतियाँ और तुरंत परिणाण आने की अनिवार्यता ही दिल्ली की खासियत है। आप दोस्ती करें, दुश्मनी करें, तेजी से चलता जीवनचक्र एक झटके में असली चेहरा उजागर कर देता है। दिल्ली का मिजाज ही कुछ इस तरह का है कि आप हर जगह, हर वक्त प्रोडक्टिव बने रहिए। किसी के पास समय नहीं है। कोई किसी से तब तक मिलना नहीं चाहता जब तक कि कोई जरूरत (या मतलब) न हो। इस शहर में भरोसे का ही नहीं पहचान का संकट है। 'स्टेटस' को पहले पाने और फिर उसे बनाए रखने की जद्दोजहद है। हर मोड़ पर स्पर्धा है, हर मोर्चे पर गलाकाट रणनीति है और समाज जिन बंधनों को सदियों से ओढ़ता आया है उसे पूरी तरह काट फेंकने और जो जी में आए कर लो वाली मानसिकता की होड़ नार आती है।
एक समाज हुआ करता था जो गली-मुहल्लों में पसरा नार आता था। शाम ढलते ही बड़े-बूढ़े बच्चे इकट्ठा होकर घर-भर की और दुनिया भर की बातें कर लेते थे। महानगर ने पहले उस समाज को कुचला, टीवी ने आत्मकेंद्रित बनाया और रही-सही कसर बाजारवाद ने पूरी कर दी है। अब सुख खरीदने के लिए साधन जुटाइए, एसी चलाइए, कूलर चलाइए, बिजली नहीं है तो इन्वर्टर लगाइए और मुंह ढंक कर सो जाइए। ज्यादातर लोग तो सप्ताह के अंत में थक कर इतने निढाल हो जाते हैं कि सामाजिक कार्य तो दूर पारिवारिक कार्यों को भी तकिए के नीचे दबाकर सो जाने के लिए विवश रहते हैं। जो इंसान सुबह से रात या पूरी रात सिर्फ काम... काम... काम में ही डूबा रहेगा वह मशीन ही बनेगा।
ऐसी दुनिया में और क्या उम्मीद की जा सकती है। यह ठीक है कि 'बिना माँ-बाप की बच्चियों के साथ तो ऐसा हो सकता है' सोचकर खुद को तसल्ली देने वाले बहुत होंगे। मगर यह जिक्र करना लाजिमी है कि दिल्ली जैसे विकराल महानगरों में आदमी से आदमी की बढ़ती दूरियां और भी कई अड़चनें पैदा करेंगी, कर भी रही हैं। पड़ोसी को पड़ोसी से मतलब नहीं होगा तो शिव खेड़ा की यह उक्ति भी है कि यदि पड़ोस में आग लगी है और आप बेफिक्र हैं तो समझ लीजिए कि अब आपका भी नंबर है।
इस घटना से साबित होता है कि दिल्ली के दो चेहरे हैं। यह कहने की कोई जरूरत नहीं है कि कालकाजी के जिन मुहल्लावासियों को दुनियाभर में कोसा जा रहा है, अब उन्हीं लोगों ने नीरू के घर का कायाकल्प कराया। पहले शायद डर से, उपेक्षा से या किसी और कारण से वे तटस्थ रहे। आखिरकार जीत इंसानियत की ही हुई न। इंसानियत उनमें है तभी तो सामने आई। अब दुबारा कोई नीरू भूख से तड़प कर जान न गंवा दे, इसके लिए सतर्क पड़ोसी को ही रहना होगा और इसके लिए जरूरी है कि संवेदनाओं को दरकिनार करके ऑंखें मूंद लेने की बजाय जितना संभव हो मदद की जाए और औपचारिक ही सही संवाद तो उस पड़ोसी से भी रखा जाए जो किसी मुसीबत में फंसा मदद के इंतजार में है। 

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