हाथी नहीं रहे साथी

शुक्रवार, 1 मई 2009

छत्तीसगढ़-झारखंड-उड़ीसा  के सीमाई जंगलों में उन्मत जंगली हाथियों के झुंडों और इंसानी बस्तियों के बीच अरसे से भिड़ंत चल रही है। वर्चस्व कायम रखने के इस शुध्द नैसर्गिक संघर्ष में फिलहाल हाथी ही आगे हैं लेकिन जब भी हाथियों को गुस्सा आता है, वे मानव बस्तियों में घुसकर उन्हें रौंद डालते हैं और फसलों को जितना चट करते हैं, उससे  अधिक नुकसान पहुंचा जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में  हाल के वर्षों में पचास से ज्यादा लोग हाथियों के कोप के चलते मारे जा चुके हैं और करीब सवा करोड़ रूपए की संपत्ति को नुकसान हुआ है। जशपुर, सरगुजा, रायगढ़, कोरिया और कोरबा जिलों में हाथियों  का प्रकोप पूरे साल रहता है। दरअसल, झारखंड अलग राज्य बनने के बाद वहां जारी उत्खनन और पेड़ों की कटाई के चलते हाथी जंगलों को छोड़ रहे हैं। वे झुंडों में चिंघाड़ते हुए राज्य की सीमाओं को चुनौती देते हैं। हाल के वर्षों में हाथियों की क्रूरता इतनी अधिक बढ़ गई कि जंगलात के अफसरों को उन पर काबू पाने के लिए असम की हाथी नियंत्रण विशेषज्ञ पार्वती बरुवा की सेवाएं लेनी पड़ गई थीं। बरुवा भी इन मदमस्त हाथियों को ठीक नहीं कर पाईं और वे अपना मिशन आगे बढ़ातीं, इससे पहले ही भुगतान संबंधी कुछ विवाद के कारण उन्हें वापस जाना पड़ गया।

 कर्नाटक  के कुछ महावत और उनके प्रशिक्षित हाथी इन जंगली हाथियों को ठीक करने में लगे हुए हैं। राज्य के पूर्व वन संरक्षक  डॉ. एस.सी. जेना कहते हैं कि राज्य के इस खास हिस्से में हाथियों का प्रकोप है लेकिन उनका मानना है कि लोगों को हाथियों के साथ रहना सीखना चाहिए। वे कहते हैं, 'छत्तीसगढ़ में लोग हाथियों की पूजा करते हैं। हाथी पालतू हो तो बात और है लेकिन जंगली हाथियों को पूजा करके शीश नवाना और केले खिलाना सचमुच भारी पड़ सकता है।' हाथी शोर-शराबा बिल्कुल पसंद नहीं करता और बौखला उठे तो रौद्र रूप धारण कर लेता है। 

इसी रौद्र रूप के चलते 2003 में 11 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। सन् 2004 में 16 लोग मारे गए थे। इस साल अभी तक 28 लोगों के मारे जाने की सूचना है। राज्य का वन अमला हाथी के हमले में मरने वालों को प्रति मृतक एक लाख रुपए मुआवजा देता है। हाथी यदि फसल खराब भी कर दे तो मुआवजा मिलता है।

बादलखोल के जंगल में हाथियों का डेरा है। आजकल 28 हाथी एक झुंड में इसमें घूम रहे हैं। हाल में 53 हाथियों का एक दल भी आ चुका है। कोरबा-धर्मजयगढ़ में 11 हाथी हैं और 28 हाथी झारखंड से आते-जाते रहते हैं। मूलत: शाकाहारी इस प्राणी ने इंसान की मुश्किल बढ़ाई जरूर है लेकिन उसकी मुश्किलें भी कम नहीं हैं। दांत वाले हाथी घात लगाकर गोली दागने वालों से डरे रहते हैं और लंबे अरसे तक हिंसक बने रहते हैं। उनसे छेड़छाड़, पथराव, बम-पटाखे, ढोल-नगाड़े बजाने जैसी कोशिशों के कारण उनका क्रोधित हो जाना स्वाभाविक है।

नेचर क्लब बिलासपुर का मानना है कि वन्य प्राणियों का लगातार होता शिकार और उनके निवास क्षेत्र में इंसानी अतिक्रमण उनके अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी है। नवनिर्मित छत्तीसगढ़ में वन्य प्राणी संरक्षण की नीति को कारगर बनाने की जरूरत है। सरकार को सुरक्षित वन क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्यों की सीमा रेखा में वन ग्रामों का सीमांकन करना चाहिए। वनों की कटाई हाथियों ही नहीं, दीगर जानवरों के लिए भी बेहद मुश्किलों का सबब बनती जा रही है। पिछले 33 महीनों में अवैध वन कटाई के 66 हजार 705 प्रकरण दर्ज किए जा चुके हैं। कुल 52 हजार 310 व्यक्तियों पर कार्रवाई हुई है और इस गोरखधंधे में छह राजपत्रित अफसरों समेत 233 दीगर कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई है। कोरबा वनमंडल के फुटका पहाड़ क्षेत्र में अवैध कटाई की जांच में दो रेंजरों समेत 10 वन कर्मियों को दोषी ठहराया गया। अहम् यह है कि राज्य में 44 प्रतिशत वनक्षेत्र हैं जिसका संरक्षण जरूरी है।

झारखंड से जुड़ा यह इलाका नक्सल प्रभावित है। हाथी तो कभी-कभार चुनौती बनते हैं लेकिन नक्सली तो पूरे साल अपनी धमक बनाकर रखते हैं। जंगल में अकेला वनकर्मी दो पुलिस वालों को साथ लेकर भी डयूटी पर जाने में गुरेज करता है। हाथियों के बढ़ते उत्पात को देखते हुए इलाके में सौर ऊर्जा बाड़ (फेंसिंग) के बंदोबस्त किए गए। 9343 मामलों में एक करोड़ 20 लाख रुपये मुआवजे के रूप में बांटे जा चुके हैं। यह राशि पिछले तीन वर्षों में बांटी गई है।

आजकल कर्नाटक  के प्रशिक्षित हाथी इन उत्पाती हाथियों को काबू करते हैं। जिस हाथी को घेरना होता है, उसके पीछे तीन हाथी दौड़ा दिए जाते हैं। दो हाथी अगल-बगल से घेरते हैं और तीसरा हाथी पीछे से काबू करता है। हाथी के पैरों में बाकायदा बेड़ी डाल दी जाती है और एक बार काबू आने के बाद उसे दूर झुंड के साथ जंगलों में छोड़ दिया जाता है।

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