इस बरसात में भीगते हुए

बुधवार, 14 जुलाई 2010

बारिश का मौसम मुझे भीतर तक भिगो देता है| समूचे छत्तीसगढ़ में इन दिनों झमाझम बारिश हो रही है और देश भर में बरसात अपना असर दिखा रही है| उत्तर-पूर्व के कई राज्य जलाप्लावन से जूझ रहे हैं | मूसलाधार बारिश में खिड़की पर खड़े हो कर घर के आगे लगे हुए गुलमोहर के पेड़ को शिथिल झूमते देखना सुहाना लगता है| यही गुलमोहर प्रचंड गर्मी में लाल सुर्ख हो कर दहकता है जब पेड़ों की पत्तियां झड जाती हैं और हरियाली के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं| बारिश का इंतज़ार इंसान ही नहीं करते बल्कि हरेक जीव-जंतु करते हैं|
अगस्त में पैदा हुआ.. और मेरे लेखन की तरफ मुड़ने की वजह भी बारिश बनी थी| बरसात की उस रात कालेज के दिनों में मैंने कविता लिखी और वो छपी तो उत्साह दूना हो गया| रिमझिम बरसती बूंदों और सबको आल्हादित कर देने वाली फुहारों के खुशनुमा मौसम में अंतर्मन गुनगुनाने लगता है और मन के किसी कोने में दबे बरसात के नगमे होठों पर मचल जाते हैं|
मैं आसपास एक खुशगवार बदलाव भी देखता हूँ|गर्मी में किसी से साधारण बात कीजिए तो वह अलग तरह का चिडचिडा सा रिस्पांस देगा मगर बरसात हो रही हो तो आमतौर पर सड़क पर जिसे जो जगह दिख जाए, चाहे वह किसी बंद पडी दूकान का गंदा कोना क्यों न हो वहाँ शरण लिए बारिश थमने का इंतजार करते लोग प्रफुल्लित हो कर बातचीत करते हैं|
मेरे कुछ पहाडी मित्रों को छोड़ दिया जाए तो अमूमन ठण्ड का मौसम अधिकतर सबको ठंडा कर देता है और ठण्ड बीतने के बाद बढ़ती गर्मी में मैं दिन गिनना शुरू कर देता हूँ कि मानसून कब आएगा| यह दौर "कब होगी बारिश" के साथ ही एक तसल्ली के साथ कटता है कि झेल लो गर्मी .. जितनी गर्मी पड़ेगी उतनी अच्छी बरसात होगी|
इस दौर में मौसम विभाग के नित बदलते पूर्वानुमानों से खीज होने लागती है जो मानसून को खिसका देते हैं| फिर जून के एक दिन घनन-घनन घिर आए बदरा बिजली की चमक और गरज के साथ बरसते हैं तो लगता है साध पूरी हुई| रिमझिम बूंदों और फुहारों में लांग ड्राईव पर जाने के ख्वाब तैरने लगते हैं|ऐसे खुशनुमा मौसम में एकाएक मन गुनगुनाने लगता है और लब बरसात के नगमों की झड़ी में फिसलते लगते हैं| बरसात के गीत अंतरतम में नया एहसास जगाते हैं और हर कोई एक भीगी हुई ऊर्जा से लबालब दीखता है।नजर जिधर भी जाती है चंद दिनों में सड़क के किनारे सूखी और बेजान सी पडी मिट्टी में छोटे-छोटे हरित पल्लवों का एक बिछौना सा चढ़ जाता है और जिन पौधों को पानी देने के बावजूद रंगत नहीं चढ़ती वे लहलहा उठते हैं|
सब जगह बारिश वही है... एहसास वही है... सुकून वही है... और नजारा भी वही है मगर व्याख्या अलग होती है| मूल मुद्दा यह है कि यह सब कुछ निशुल्क है| कोई टैक्स नहीं है| कोई कतार नहीं है... मगर हम इस प्रकृति चक्र को ही बदल देने पर तुले हैं| .....और ज्यादा ..ज्यादा की कंकरीटी ख्वाहिशों में पेड़ काट रहे हैं और सीमेंट से सजी दुनिया देखना चाहते हैं| भूजल को पहले तो निचोड़ लेना चाहते है और फिर भूमि को पक्के तौर पर ढंक कर भीतर जल जाने से रोक देते हैं| जहरीली गैसों को आसमान के कूड़ेदान के हवाले करके चाहते हैं कि हम बारिश का मजा लें| .... तो अब कुदरत का मिजाज बिगड़ गया है | यह आगे और बिगड़ेगा| इस वजह से मौसम चक्र गड़बड़ा गया है|
छत्तीसगढ़ में सालाना 1400 मिलीमीटर बारिश होती रही है जो अब 1200 मिलीमीटर सालाना के औसत पर आ गई है| अमूमन दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं जैसे चक्रवात से भी फसलों को भारी नुकसान की ख़बरें इधर लगातार आ रही है और ब्रिटेन सरीखा ठंडा देश भी इस साल भीषण गर्मी से तप रहा है| करें कुछ लोग भरे पूरी दुनिया| मैं प्रायः सोचता हूँ कि दुनिया में पृथ्वी के लोगों को कितना कुछ हासिल है मगर हम उसे बर्बाद कर देने पर तुल चुके हैं|

4 comments:

shikha varshney 14 जुलाई 2010 को 5:21 am  

ये इशारा है प्रकृति का कि संभल जाओ वर्ना बारिश चित्रों में भी देखने को नहीं मिलेगी..
प्रभावशाली पोस्ट.

Sanjeet Tripathi 22 जुलाई 2010 को 12:44 am  

hmm, aaj ki barsat me kamre me dubak kar yah post padh raha hu.

sahi chitan hai, ham sab ko chetna hi hoga ...

Anil Pandey 3 जुलाई 2016 को 8:07 am  

एकदम सही शर्मा जी, जल के बगैर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जल के लिये जरूरी है बारिश का होना और बारिश के पानी को सहेजना. पर हम एक तरफ मौसम चक्र को बिगाडने पर तुले हैं तो दूसरी तहफ पानी को सहेजने से भी और ज्यादा विमुख होते जा रहे हैं. एक तरह से विनाश की ओर ही रहे हैं हम.

Anil Pandey 3 जुलाई 2016 को 8:07 am  

एकदम सही शर्मा जी, जल के बगैर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जल के लिये जरूरी है बारिश का होना और बारिश के पानी को सहेजना. पर हम एक तरफ मौसम चक्र को बिगाडने पर तुले हैं तो दूसरी तहफ पानी को सहेजने से भी और ज्यादा विमुख होते जा रहे हैं. एक तरह से विनाश की ओर ही रहे हैं हम.

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