कोबरे के भरोसे नागलोक

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009





पूर्व  पर्यावरण मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के इलाके जशपुर की आबोहवा कोबरा को रास आती है। यह सांप खतरे की आशंका मात्र पर हमला कर देता है। तुरंत इलाज न मिलने पर व्यक्ति की मौत हो जाती है। पिछले साल यहां 64 लोग मारे गये थे।

छत्तीसगढ़ के  सुदूर उत्तर पूर्व में एक इलाका ऐसा भी है जिसे 'नागलोक' के नाम से जाना जाता है। सांपों की प्रजाति कोबरा के लिए कुख्यात इस इलाके में सर्पदंश से होने वाली मौतों का सिलसिला बारिश आते ही शुरू हो जाता है। पिछले एक पखवाड़े में सर्पदंश के कारण दर्जनभर लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं। इलाके में सांप काटने से हर साल दो सौ लोग अकाल मौत के शिकार होते हैं और विषदंश का यह क्रम इस साल भी जारी है। यह दिलीप सिंह जूदेव का इलाका है।

जशपुर जिले के आदिवासी बहुल इलाके में आठ विकासखंड हैं और बरसात होते ही सांपों के जोड़े यहां उन्मुक्त विचरण करने लगते हैं। पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री दिलीप सिंह जूदेव जशपुर संसदीय क्षेत्र का ही प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन पर्यावरण के साथ जन-धन को हर साल होने वाली क्षति उनके क्षेत्र में बदस्तूर जारी है। जूदेव के मुताबिक वन्य जीवों से होने वाली मौतों को देखते हुए मुआवजा राशि 25 हजार रूपये से बढ़ाकर एक लाख रूपये की जा चुकी है, जबकि दूसरी ओर इलाके में सक्रिय जनजातीय ग्रामीण विकास एवं शोध अनुसंधान परिषद के निदेशक डॉ. अजय शर्मा के मुताबिक सर्पदंश का एकमात्र कारण सतर्कता का अभाव होता है।

इलाके के लोग सर्पदंश के इलाज के लिए बैगा-ओझा पर ही निर्भर रहते हैं। गांवों में बिजली नहीं रहने के कारण भी कई बार लोग सर्पदंश के शिकार होते हैं। यह इलाका ऐसा है जिसकी जलवायु और मिट्टी सांपों को प्रिय है। यहां की मिट्टी भुरभुरी और जलवायु आर्द्र है। कोबरा चूंकि शीत प्रकृति का सांप है, लिहाजा इलाके की आबोहवा सदियों से उसे रास आ रही है। भुरभुरी मिट्टी होने के कारण दीमक यहां अपनी बांबियां (मिट्टी के टीले) बना लेते हैं जिनमें घुस कर सांपों के जोड़े जनन करते हैं और दीमकों को चट कर जाते हैं। सांप इस इलाके में तभी से रह रहे हैं जब से आदिवासी रहते आये हैं।

आदिवासियों ने तो सर्पदंश की अनवरत घटनाओं के बावजूद उनको पूजना बंद नहीं किया है और आज भी सर्पदंश के बाद वे ओझा के पास ही जाते हैं। दूसरी तरफ अस्पताल में एंटी-स्नेक वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित करने और सर्पदंश रोकने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने की जरूरत आजादी के 55 साल बाद भी पूरी नहीं हो पायी है। हालांकि सरकार सर्पदंश के शिकार लोगों को राजस्व परिपत्र के प्रावधान के मुताबिक मुआवजा देती है और नवम्बर 2001 से अक्टूबर 2002 तक कुल 64 लोगों के आश्रितों को 12 लाख 80 हजार रूपये की मुआवजा राशि का भुगतान किया गया। पिछले साल यह राशि 16 लाख थी। लेकिन इलाके में अंधविश्वास मिटाने, तत्काल उपचार, डाक्टरों की कमी जैसे मामलों में केन्द्र व राज्य सरकारें कछ ठोस नहीं कर पायी हैं।

1997 में बिलासपुर जोन के तत्कालीन  पुलिस महानिरीक्षक बीबीएस चौहान ने खासतौर पर इलाके में समस्या को लेकर काफी भ्रमण किया था। उन्होंने पुलिस बल को ग्रामवासियों को जागरूक करने के लिए मुस्तैद किया था। चौहान जब तक रहे तब तक इस दिशा में जनचेतना जगाने का खूब काम चला। लोगों को जमीन की बजाय खाट पर सोने के लिए प्रेरित किया गया। थाना प्रभारी भी गांव में जाकर सुतली, पोटाश और ब्लेड के उपयोग के तौर-तरीके समझाते रहे लेकिन इलाके में अंधविश्वास की जड़ों को और मजबूत कर रहे झोला छाप डॉक्टरों के प्रभाव को पुलिस समाप्त नहीं कर पायी। रही-सही कसर स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग पूरी कर रहे हैं,जिन्होंने छत्तीसग राज्य बन जाने के बाद भी अशिक्षा और अंधविश्वास को खत्म करने के लिए कोई व्यापक कार्यक्रम नहीं चलाया है।

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