यादों में बाबूजी (5)

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

बाबूजी सच्चे अर्थों में निष्काम कर्मयोगी थे| वे किसी चीज की फरमाईश नहीं करते और कुछ देने के बदले कुछ पाने की ख्वाहिश कभी नहीं रखते थे| गाँव में जब झगडे -फसाद की नौबत आती तो 'महाराज' को बुलावा आ जाता| चौपाल पर 'बैठका'(बैठक) होती| भीड़ जुट जाती | वे सबकी बात ध्यान से सुनते और बीच का रास्ता निकालते| राजनीति से उनको परहेज नहीं था मगर आगे बढ़ने के रास्तों पर मूल्यों से कोई समझौता उनके स्वभाव में नही था|

एक बार पंचायत चुनाव में बाई(माताजी)खड़ी हुईं| बाबूजी ही प्रेरणा-स्रोत थे क्योंकि सीट महिला आरक्षित थी| पूरे गाँव भर में धूम के दिन थे| जम कर प्रचार हुआ और जीप से पहाड़ों के दौरे हुए| बाबूजी उडिया में भाषण लिखते, माताजी भीड़ में बोलतीं| मैं भी प्रचार में पहुंचा लेकिन मतदान से पहले नौकरी की वजह से दिल्ली जाना पड़ गया|

मतदान की पूर्व संध्या सब कुछ ठीक-ठाक था| जो चुनाव लड़ते हैं जानते हैं कि वो रात क़त्ल की रात होती है | कुछ लोगों ने शराब के लिए फरमाईशें शुरू कर दी क्योंकि जो प्रतिस्पर्धी थे उनने पेटियां खोल दी थी| बाबूजी ने शराब बाँटने से मना कर दिया| एक अजीब सा वातावरण बन गया क्योंकि आदिवासी खुशी और गम दोनों मौकों पर शराब पीते हैं और यह उनकी परंपरा रहन-सहन का हिस्सा है| मैं होता तो शायद यह काम उनको बताए बगैर भी कर देता क्योंकि उस दौर में बाबूजी मेरी निगाह में पिछड़े हुए थे मगर आज ऐसा हो तो मैं तन कर मना कर दूंगा| हाँ मेरे दोस्त इस लफड़े को सम्हाल लें मैं यह चाहूँगा| खैर बाबूजी टस से मस नहीं हुए| न मतलब न|अगले दिन मतदान में पता चला गाँव के ज्यादातर लोग धुत पड़े थे और जो मुख्य कार्यकर्ता थे उनको साकी ने इतनी पिला दी थी कि वोट पड़ गए और वे सोते रहे| जाहिर था कि यह काम उसी के इशारे पर हुआ था जिसने पहले शराब के लिए उकसाया और फिर पूरा खेल बिगाड़ दिया|
ऐसे मौकों पर बाबूजी की सदाबहार प्रतिक्रिया होती जो होगा ईश्वर की मर्जी| ईश्वर ने बाई को मामूली मतों से हरा दिया| ईश्वर ही था जिसने आगे चुनाव से तौबा भी करा दी|
बाद में स्वर्गीय राजीव गांधी दौरे पर आए , सबके साथ वरिष्ठ कांग्रेस पदाधिकारी के नाते बाबूजी से हेलीपेड पर मिले और बड़े फलक पर विधान सभा चुनाव के टिकट की चर्चा हुई तो महाराज ने हाथ जोड़ दिए| चुनाव से नहीं हथकंडों से तौबा | फिर बाबूजी ने चुनाव कभी नहीं लड़ा मगर कांग्रेसी राजनीति से किनारा कर लिया और समाज सेवा में रम गए| अफसर या पुलिस वाले किसी को जबरिया पकड़ ले जाते तो महाराज सीधे थाने जा धमकते| हमारा घर दीन-दुखियारों की सेवा का केंद्र बना रहता| माताजी झींकती, बाबूजी रमे रहते| कृषि ऋण ग्रेन गोला काण्ड में बाबूजी ने लम्बी लड़ाई लड़ी | नतीजन तत्कालीन मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी इलाके में आईं और बाबूजी से भी मिलीं| बाबूजी जीवन भर कांग्रेसी रहे और कभी पार्टी नहीं बदली| बाद में बदले हुए हालात में पार्टी की दुर्दशा से प्रायः खिन्न रहते | इंदिरा गांधी के वे प्रशंसक थे और प्राय कहते कि एक महिला की हिम्मत को देखो जिसे सारी दुनिया मानती है|

7 comments:

shikha varshney 20 अप्रैल 2011 को 3:36 am  

behtareen sansmaran ban raha hai ...jaaree rahe.

Swarajya karun 20 अप्रैल 2011 को 11:10 am  

एक सात्विक पुण्यात्मा से जुड़ा प्रेरक प्रसंग. भावनाओं से परिपूर्ण आलेख. आभार .

girish pankaj 22 अप्रैल 2011 को 4:23 am  

yah khand bhi rochak hai. dil ko chhoone vala..

www.sujeetkumarindia.blogspot.com 25 अप्रैल 2011 को 7:14 am  

Like reading yr some of the recent posts related to yr family, it's nice to know something offbeat. Keep up writing because u r a true professional and good human being as well.

Ramesh Sharma 25 अप्रैल 2011 को 8:36 am  

thanks dear

om prakash 2 मई 2011 को 1:36 am  

babuji ke bare me jitna likha jaye sayad kam lagata hai.par aapne itne kam sabdo mai jo likha hai....wakai hamari babuji ko sachhi sharadhanjali hum pariwar ke baki log babuji ke aadrso par chl sake itni shakti ishwar de.om sharma

amitab 2 मई 2011 को 1:46 am  

aabtak ki ye yatra ko padha.wakai rochak hai chalne do sharma ji.

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