राष्ट्रीय सहारा के 20 साल

रविवार, 14 अगस्त 2011


कल 15 अगस्त है और देश ने 64 साल पहले अंग्रेजों से आज़ादी की खुली हवा में सांस ली थी, ये याद कर के गर्वित होने का तो दिन है ही एक और खास वजह से मैं इस दिन को याद करूंगा . 20 साल पहले 15 अगस्त को ही दिल्ली में एक कई अख़बारों के बीच एक नए अखबार ने आंखें खोली थी और अपनी नजर से खबरों को देखा ,दिखाया और बीस साल से दिखा रहा है, उसे खबरों की भीड़ से अलग हट कर पेश करने का जो अनवरत सिलसिला शुरू किया वो अब एक गौरवशाली परम्परा में ढल चुका है.
राष्ट्रीय सहारा  एक नए अंदाज में शुरू हुआ था और आज बीस साल का जवान अखबार है. नौजवानों के टीम के साथ शुरू हुआ अखबार आज भी तेवर में नौजवानों सरीखा है और अंदाज उमंग जगा कर हर फील्ड में हस्तक्षेप करने वाला जिम्मेदाराना है. बीस साल आंखों के आगे नाचते हैं. कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें हैं और है एक अखबार की ..अखबार के साथ शुरुआत की.
खुशी है कि मै उस टीम-91 का हिस्सा हूं जिसके समर्पित लोग ही अब अखबार में कायम हैं जिन्होंने एक सपने के साथ कैरियर की शुरुआत के बेशकीमती ऊर्जा वाले साल अखबार को दिए और नतीजा है कि अखबार तो इस बीच कई आए-गए, राष्ट्रीय सहारा अपनी जगह बदस्तूर डटा हुआ है, 'दमदारी' से लिख रहा है, सच कहने की हिम्मत के साथ.
1991 में अखबार के स्लोगन रेडियो पर गूंजते थे.. हर दिन अपना काम करे .. जनहित का रखे ध्यान.. अनुशासन और कर्मठता से है इसकी पहचान .. ये है राष्ट्रीय सहारा ...और जब राष्ट्रीयता-कर्तव्य-समर्पण के स्लोगन के साथ अखबार शुरू हुआ तो उस दौर में दिल्ली में जनसत्ता की पूरी पुरानी टीम बिखरी हुई थी और राजेन्द्र माथुर युग नभाटा में अवसान के कगार पर था . जनसत्ता से मुक्ति पाने में जुटे प्रभाषजी कागद कारे में समर्पित थे और दिल्ली में वे अखबार पनप रहे थे जो सैलून में ही पढ़े जाते हैं या वेलेंटाईन डे मनाने की परम्परा शुरू कर रहे थे.

उस दौर में राष्ट्रीय सहारा  दैनिक अखबार ने हस्तक्षेप  किया और पाठकों में नई उमंग  पैदा की. उपेक्षित यमुनापार के दुःख-दर्द उकेरे और बाहरी दिल्ली के बेहाल गांव की तस्वीरें पेश की. दक्षिण दिल्ली महारानी-नई दिल्ली पटरानी बनी दो दिल्ली का एक पूरा सच सामने किया . रोज़ चार पन्ने रंगीन. उस दौर में रंगीन फोटो सिर्फ सप्ताहांत में अखबार में आती थी जैसे हफ्ते में एक बार टीवी चित्रहार आता था.

उस दौर में मुझे याद है आदरणीय चेयरमैन सहाराश्री सुब्रत राय सहाराजी की मीटिंग में सिर्फ एक बात पर जोर रहता था कि दिन की शुरुआत अच्छे से हो पाठक को सकारात्मक ख़बरें दी जाएं और सच को सच लिखा जाए. उस मीटिंग में मेरा और साथियों का खून सचमुच बढ़ जाता जब वे कहते थे, चोर को चोर ही लिखिए और डरिये मत. और फिर मीटिंग राष्ट्रगान के साथ समाप्त होती . लौट कर जो धकाधक खबरें लिखी जाती कि पूछिए मत बाई लाइन न्यूज की ढेर कापियां समाचार सम्पादक डा. रवीन्द्र अग्रवाल जांचते थक जाते. टीम के प्रायः कुंवारे रिपोर्टर ख़बरों में इतना डूबे रहते कि देर रात तक कापियां लिखते-काटते-डांट खाते-जूझते- उत्साह के मारे कई बार घर नही जा पाते और दफ्तर में सबका खाना खाना आता मगर जो दूर रहने वाले डीटीसी बसजीवी थे, कई बार जब सारे होटल बंद हो चुके होते तो चाय के निमित्त रखा दूध पी कर अखबार के बण्डल सिराहने रख टेबिल पे सो जाते. टीम को एक स्पिरिट के साथ एक दिशा में गति देना उस दौर की मीटिंग्स में हुआ और यह देख खुशी होती है कि उस दौर में जुड़े कई साथी आज उच्च पद तक जा पहुचे हैं. कुछ बिछड़ भी गए जो मीडिया में आज सफल हैं और धाक जमाए हुए हैं.
हम किसी भी अखबार की ही नही कोई भी बात करें तो अच्छी और बुरी दोनों बातें कर सकते हैं. पत्रकार चटपटा ना लिखें तो कोई खबर ही ना पढ़े. लाख टके की बात है कि वही खबर बनती है. मगर मै साफ़ कह दूँ कि राष्ट्रीय सहारा  में मेरी जिस मिशन भावना जिसके बूते मै पत्रकारिता में आया , का पुष्पण-पल्लवन न हुआ होता तो शायद मै 20 साल टिका नही रह सकता था,.. और सार्वजनिक जीवन को नुकसान पहुँचाने वाला बड़ा सच लिखने पर कोई बंदिश महसूस नही की यह भी 20 सालों का मेरा अनुभव रहा जिसके कारण मुझे एक निरंतरता मिली वरना सहारा में आने से पहले मै सात नौकरियां बदल चुका था और ज्यादातर में मैंने ही नमस्ते की.
जिस दौर में पूरा प्रिंट मीडिया संकट में हो और अखबार चुड़ैलों का सा खबरीय श्रृंगार कर डरावनी ख़बरें देने में शैतानों को भी मात दे रहे हों उस दौर में एक अखबार हस्तक्षेप जैसे गंभीर विषय उठा कर पड़ताल करने वाले परिशिष्ट के साथ बीस साल से सतत निकलता रहे यह बहुत बड़ी बात है. राष्ट्रीय सहारा  उसी तेवर के साथ लगातार है, यह संस्थान व अखबारकर्मियों की ही नही पत्रकारिता की भी बड़ी उपलब्धि है.                            (in 2016 rashtriya sahara celebreted 25th years of delhi edition, in the noida campus all seniors attended programme.)

2 comments:

zaidi 13 सितंबर 2011 को 3:02 am  

sharma ji best wish of your career


आज एक दैनिक समाचार पत्र मे रायपुर शर की धुल के बारे मे बड़ा सा लेख आया है जिसमे शहर के बड़े-२ कई डॉक्टर के ओपिनिओन थे की घर से निकले तो ये करे घर से निकले तो वो करे...........लेकिन वस समाचार पत्र मे कही भी जिसकी ड्यूटी है इन् सब चीजों से शहर को निजात दिलाना उनको कोई नस्हियत नहीं दी गए है | मै रायपुर शहर के साथ-2 अपने भारतवर्ष के पूरे शहर तो नहीं लेकिन ज्यादातर बडे शहर घूम चूका हु वहा की night लाइफ ओर सुबह का उगता हुआ सूरज भी देखा है लेकिन रायपुर शहर ही ऐसा पाया जहा अल-सुबह सफाई न होकर शहर की मुख्य-मुख्य सडको पर सुबह आठ बजे से शुरू होती है जिसका गवाह मै खुद हु क्योकि मैने कई बार ऐसा देखा है.......अब आप लोग खुद समझते होंगे की सुधरने की किसको जरुरत है...........आप हम को या जिनकी ड्यूटी है उनको.............हां एक बात अंत मै बतलाता चालू की जब मैने उस विभाग के नेता जी से रायपुर शहर के लेट साफ़ सफाई के बारे मै पूछा की ऐसा रायपुर शहर मै ही क्यों होता है तो उनका जवाब उन्लोजिकल था की जो फिमेल सफाई वोर्केर है उनके साथ बदतमीजी होती है इस लिए शहर की साफ सफाई लेट होती है......मै उन नेता जी से कहना च रहा हु की जनाब नेता जी आप ओर हम तो सुबह-२ ये हरकत करने जाने से रहे ये हरकत उन्ही मै से किसी की होती होगी इस बात को सुधरने के बजाय शहर के लोगो को धुल खिलाना ज्यादा पसंद है, लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन समय की कमी है.............कम लिखे को ज्यादा माने |
अंत मै ये ही बोलना पडेगा की ..........................हम नहीं सुधरेगे.......?

zaidi 15 सितंबर 2011 को 9:54 pm  

आप सब को पेट्रोल के रेट बढने पर बधाई............
क्योकि इसके जिमेदार और कोई नहीं आप और हम है इसलिए ज्यादा अफ़सोस करने की जरुरत नहीं,क्योकि जब तक आप,हम विरोध नहीं करेंगे तब तक किसी की भी सरकार हो जनता को बेइकुफ़ समझेगी.........हा अपनी नियति मान ली है तो अलग बात है इसमे सबसे ज्यादा मार आप और हम पर ही पड़नी है ...........ऐसी सरकारों (मै किसी का नाम लेना भी उचित नहीं मानता) से क्या फायदा क्योकि जब से मे व्यस्क हुआ हु तब से इन लोगो कि सरकार बनाने मे मेरा कभी योगदान नहीं रहा इस्सलिये मुझे ये बात कहने मे कताई परहेज़ नहीं कि ....... चोर-२ मोसेरे भाई ....

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