राजेश खन्ना का वो ज़माना

शुक्रवार, 22 जून 2012



40 साल में 180 फ़िल्मे.. 15 फ़िल्में लगातार हिट.. राजेश खन्ना नाम ही काफ़ी था. राजेश खन्ना अब हमेशा के लिए अलविदा कह गए. यह हकीकत बिलकुल ऐसी ही है जैसे ट्रेलर में ही क्लाईमैक्स आ जाए. इस सुपरस्टार ने अपनी जिंदगी की उलझनों को सुलझाते-सुलझाते ही इस दुनिया से रुखसती ले ली. अंत समय में डिम्पल ने ब्याहता धर्म निभाया और अंजू महेंद्रू ने आखिरी वक़्त मे साथ देकर बता दिया कि बुरे वक़्त मे सच्चे दोस्त ही काम आते है.
राजेश की निजी जिन्दगी की अब आगे चीर-फाड़ होती रहेगी मगर  उनकी हालिया गुज़री लाईफ को देखते हुए उन पर  ’दुश्मन’ फ़िल्म मे  फ़िल्माया गया एक गीत सटीक नजर आता है.. 
 
-"सब ने माफ़ किया मुझको पर, 
मै हू जिसका दोषी..
कब टूटॆगी उसके घायल 
होठों की खामोशी ..
वो भी माफ़ करे तो जानू ..
मन को साफ़ करे तो जानू ..
इन्साफ़ करे तो जानू तो जानू .. 
तेरा नही ..मेरा नही ..
इसका नही ..उसका नही ..
किसी का नही ..
ये दोष तकदीर का सारा है..
दुश्मन -दुश्मन जो दोस्तो से प्यारा है."

 राजेश खन्ना नाम है उस जादू का जो गुजरे हुए जमाने की उस अनजानी  और अनोखी चमक से रूबरू कराता है जब फिल्मों का मतलब होता था एक पूरे परिवार  के लिए महीने भर की चटखारी चर्चा का इंतजाम और राजेश खन्ना  का मतलब होता था अल्हड़ होती.. स्कूल से निकल  कर कालेज पंहुचती  लड़कियों की सिसकारी भरती इठलाती मदमाती धड़कती ज़िन्दगी का अनोखा चितेरा जो यकीनन एक जादू था.. एक स्वप्निल रोमांस का दीवाना युग था जो देवानंद ने शुरू किया और  राजेश खन्ना के साथ रोमानियत के मुकाम तक पहुचा और अमिताभ के आते ही एंग्री यंग मैन में ढल गया. तब लिपस्टिक सौन्दर्य श्रृंगार की  प्रतीक थी  मगर प्रेम या आसक्ति या उससे भी बढ़ कर दीवानगी के प्रकटीकरण के तौर पर पर लडकियां इसे खन्ना की तस्वीर पर होठों से चस्पां कर देती थी. खन्ना उस युग में आए जब चीन से लड़ चुका देश आज़ादी के बाड़ की ढांचागत समस्याओं से जूझ रहा था और सपनो में ही जी रहा था,. 
खन्ना ने इन सपनों में अपने आनंद 'अंदाज' में रोमेंटिक रंग भरे. मगर बसंत ज्यादा देर नहीं ठहरता .. सावन हमेशा नहीं रहता ..हेमंत काल बहुत छोटा होता है..  परदे के रोमांस की ज्यादा उम्र नहीं होती लिहाजा बदलते भारत में युवाओं की दुखती रग  पर एंग्री यंग मैन ने हाथ धरा , दर्शकों की वास्तविक समस्याओं को  पेश किया ..लोग बाबू मोशाय बोलने वाले को भूल कर बाबू मोशाय  (अमिताभ) पर ही लपक लिए. शाहरुख़ भी 90 पार के दशक में तब अचानक उभरे जब दीवाना में उन्होंने एक सनकी प्रेमी का सच्चा रोल किया .
 
जिन्होंने दुश्मन  . दो रास्ते. आराधना..अपना देश  नहीं देखी वे जान या मान ही  नही सकते  यहाँ  फिल्म 'आनंद'  में  'बाबू मोशाय'  बोलने वाले के किस जादू की बात हो रही है. ये उस दौर की बात है जब मूंगफली की पुडिया लिए दर्शकों से टाकिजें गुलजार  रहती  थी पर अब मल्टी- प्लेक्स में पिजा बर्गर पापकार्न के युग में भी फ़िल्में सामूहिक आनंद  का वो माध्यम नहीं  बन पाती जो  70 के दशक में हर्ष शोक ..विषाद  या आल्हाद के साथ सांयकालीन  या मैटिनी शो के उत्सव में ढलती थीं.
आज का सच है  शुक्रवार को सुपर स्टार गायब हो जाता है, पहले सुपर स्टार का मतलब होता था सालों साल दर्शकों की धड़कन बने  रहने वाला अजूबा नायक. जिसके हाव- भाव- अंदाज की देश भर में  नक़ल होती थी.जिसकी 'उस' जैसी शकल होती थी वो मजे  करते थे. सुपस्टार के लिए दीवानगी क्या होती है इसका एक पूरा युग था जिसे राजेश खन्ना ने जिया.
 
29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना  असली नाम जतिन खन्ना ने 1966 में उन्होंने पहली बार 24 साल की उम्र में आखिरी खत नामक फिल्म में काम किया था. इसके बाद राज, बहारों के सपने, औरत  में आए मगर पहचान मिली आराधना से और फिर तो देश भर में टाकिजें राजेश खाना के पोस्टरों से ही आबाद नजर आती थीं.टीवी अखबार मोबाईल एस एम् एस एम् एम् एस कुछ नहीं था बस एक कोई तस्वीर होती थी जो लडकियां सिराहने रख कर सोती  थीं और लड़के बीच से सिर के मांग निकाल  कर हाथ में रुमाल बांधे खन्ना  बने नजर आते थे, हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे राजेश खन्ना यह  कहने  में कोई गुरेज नहीं.. देवानद के समय में रंगीन फिल्मे नहीं होती थी  मगर उनका क्रेज  कम  नही  था.
 
आखिर क्यों, आप की कसम  आराधना  अजनबी  अमर प्रेम  आनंद  अंदाज  अनुरोध  दो रास्ते  जनता हवालदार  कटी पतंग  खामोशी  कुदरत  मेहबूब की मेहंदी  मेरे जीवन साथी   नमक हराम   सफर  फिल्मे राजेश खन्ना के खाते में दर्ज हैं.बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार कहे जाने वाले राजेश खन्ना पहली बार किसी विज्ञापन में दिखे  जिसमे वे कहते हैं -बाबू मोशाय मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता.हैवेल्स फैन के एड का निर्देशन आर बालकी ने किया.
हाल में कुछ लोगों ने लिखा है कि राजेश आत्म मुग्ध कलाकार थे और अपनी वास्तविक जिन्दगी को समझ नहीं पाए.. उनसे यही कहना है कि सिनेमाई रोमांटिसिस्म के इस अद्भुत चितेरे का अधूरा और चलताऊ आकलन ना किया जाए. किसी भी शख्स की कार के आगे लडकियां लेट जाएं और दुपट्टे बिछा दे तो ऋषि-मुनि भी तपस्या भंग कर दें.. राजेश तो आखिरकार एक इंसान थे मगर जिन्दगी को जिस तरह से अमिताभ ने लिया और जिया उस तरह से राजेश भी हकीकत को समझ लेते तो शायद ज्यादा उम्र जीते मगर फ़िल्मी दुनिया का यही सच है कि जब तक सितारे चमकते हैं लोग तालियाँ बजाते हैं और जब तालियाँ नही मिलती तो तो बुझते हुए सितारे की तड़प को कोई नहीं जान पाता. 
 

3 comments:

shikha varshney 23 जून 2012 को 2:51 am  

कहा जाता है कि राजेश खन्ना हिंदी फिल्म जगत के इकलौते सुपर स्टार है. उनके जैसा स्टारडम न उनसे पहले किसी ने देखा न उनके बाद आजतक किसी ने.

Afsar ali 23 जून 2012 को 6:18 am  

lambe samy tak suparstar bane rahne wale we akele film abhineta the.

girish pankaj 23 जून 2012 को 8:00 am  

राजेश खन्ना ने अनेक यादगार फ़िल्में दी हैं बचपन में धर्मेन्द्र और राजेश खन्ना की फिल्मो का दीवाना था. आज भी हूँ. वे स्वस्थ रहे, यही कामना करता हूँ. और हाँ, दिल को छूने वाला लेख लिखा है, बधाई तुमको...

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