टोनही... अब नहीं

शुक्रवार, 1 मई 2009


छत्तीसगढ़ में टोनही प्रथा जाने कब रूकेगी? दूरदराज के पिछड़े अंचलों में टोनही (डायन) घोषित करके महिलाओं को सरेआम जलील करने और मास हिस्टीरिया की क्रूरतम परिणति के रूप में 'टोनहियों' को मौत के घाट उतार देने की अनेक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाओं के बाद सरकार मानों नींद से जागी और 19 जुलाई 2005 का दिन छत्तीसगढ़ विधान सभा में सचमुच ऐतिहासिक दिन के रूप में दर्ज हो गया जब थोडे से विरोध के बाद राज्य में टोनही प्रथा उन्मूलन विधेयक 2005 ध्वनिमत से पारित हो 
गया। राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य के महिला एवं बाल कल्याण विभाग ने इसके लिए लंबी कवायद की थी।

किसी अभिशाप की तरह छत्तीसगढ़ की मजलूम विधवाओं और परिवार में एकाकीपन की शिकार हुई  महिलाओं को एक कुचक्र के चलते टोनही घोषित कर देने की सदियों से चली आ रही प्रथा पर अब अंकुश लग जाने की उम्मीद की जा रही है। विधेयक में कड़े प्रावधान किेए गए हैं। मसलन 'टोनही' से अभिप्रेत है व्यक्ति जिसे किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों द्वारा उपदर्शित किया जाए कि वह किसी अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों अथवा समाज अथवा पशु अथवा जीवित वस्तुओं को काला जादू, बुरी नजर या अन्य किसी रीति से हानि पहुंचाएगा अथवा हानि पहुंचने की शक्ति रखता है अथवा ऐसा आशय रखता है, चाहे वह डायन, टोनहा या अन्य किसी नाम से जाना जाता हो। 'पहचानकर्ता' से अभिप्रेत है व्यक्ति जो किसी व्यक्ति को टोनही के रूप में उपदर्शित करता हो या अन्य व्यक्ति को प्रेरित करता हो 

जिससे ऐसी पहचान के आधार पर उस व्यक्ति को क्षति पहुंचे अथवा पहुंचने की आशंका हो। 'ओझा' चाहे वह किसी भी अन्य नाम (बैगा-गुनिया) से जाना जाता हो, से अभिप्रेत व्यक्ति जो दावा करता हो कि उसमें झाड़-फूंक, टोटका, तंत्र-मंत्र या अन्य साधनों द्वारा टोनही या टोनही द्वारा प्रभावित कहे गए किसी व्यक्ति या पशु या जीवित वस्तुओं को नियंत्रित, उपचारित, शक्तिहीन करने की क्षमता रखता हो। हानि में शामिल है शारीरिक, मानसिक या आर्थिक नुकसान तथा प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा हो।

विधेयक में कहा गया है कि जो कोई, किसी भी माध्यम से टोनही के रूप में पहचान करता है वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष हो सकेगी तथा जुर्माने से भी दंडित किया जाएगा। अर्थात् टोनही कहा जाना सिध्द होने पर तीन साल का दंड तय है। इसी तरह जो कोई, स्वयं या अन्य किसी व्यक्ति द्वारा टोनही के रूप में पहचान किए व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है या नुकसान पहुंचाता है वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक हो सकेगी तथा जुर्माना से भी दंडित किया जाएगा। टोनही के नाम पर झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र करने वालों को भी पांच वर्ष तक का दंड दिया जाएगा। प्रावधान के मुताबिक काला जादू, बुरी नजर या अन्य किसी रीति से प्रचारित करने वाले को भी एक वर्ष तक का दंड और जुर्माना किया जाएगा। इस अधिनियम के तहत अपराध में सहभागी को भी दंडित किया जाएगा और इस तरह के अपराध प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में विचाराधीन रहेंगे। खासियत यह है कि यह अपराध गैरजमानती होगा।

इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद अब छत्तीसगढ़ में औसतन हर पखवाड़े टोनही के नाम पर महिलाओं की प्रताड़ना पर अंकुश लगने की उम्मीद की जा रही है। बिहार व झारखंड में यह कानून लागू है।

दरअसल छत्तीसगढ़ में इस कानून की पिछले कई वर्षों से जरूरत महसूस की जा रही थी। अमूमन हर हफ्ते-पखवाड़े किसी न किसी गांव में किसी विद्रोही, वाचाल, अर्धविक्षिप्त अथवा गांव के मठाधीशों से हर मोर्चे पर लोहा लेने वाली दबंग किंतु टोनही कहे जाने पर प्रताड़ना और लांछन के चलते 'खंडित व्यक्तित्व' जैसे मनोरोगों की चपेट में आ चुकी महिलाओं के साथ ज्यादती की घटनाएं उजागर होती रही हैं। ग्राम जुनवानी में एक महिला को टोनही बताकर अपना मल खाने के लिए मजबूर किया। बैगा मानते हैं कि टोनही अपना मल खा ले तो उसका प्रभाव क्षीण हो जाता है। जुलाई में जब इस विधेयक का प्रारूप तैयार किया जा रहा था, तब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निर्वाचन क्षेत्र से सटे राजनांदगांव अंबागढ़ चौकी, तारमटोला इलाके में एक विधवा को टोनही होने के शक में समूचे गांवभर में बैठक करके जलील किया गया और पिछले दिनों गांव में एक-एक करके हुई मौतों का दोषी ठहराया गया। फूलवती नामक महिला टोनही करार दे दी गई। इस विधवा ने कसमें खाकर मिन्नतें की कि वह बेगुनाह है, लेकिन गांववाले नहीं माने। 'टोनही' के दो जवान पुत्रों की आंखों के सामने तालाब में जिंदा डुबोकर मार डाला गया। इस घटना में गांव के 56 लोगों को गिरफ्तार किया गया जो मूढ़ता के चलते अब भी बयान दे रहे हैं कि वह महिला डायन थी। इस घटना पर बावेला मचा। विधान सभा में जब विधेयक पेश हुआ तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह खुद खास तौरपर उपस्थित थे। महिला सदस्यों ने इसका पुरजोर समर्थन किया, लेकिन राजनीति यहां भी हुई। कांग्रेस ने विरोध दर्ज जरूर कराया लेकिन विधेयक पारित जाने दिया। समस्या यह है कि इस तरह की कुरीतियों की जड़ें पिछड़े अंचल में इतनी गहरी हैं कि लगातार सरकारी प्रयासों के अलावा सामाजिक स्तर पर भी एक बड़े जनजागरण अभियान की जरूरत है। और खुशी इस बात की है कि रायपुर के नामी चिकित्सक डॉ दिनेश मिश्र और उनके साथी इस दिशा में सतत प्रयास कर रहे हैं।

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