हो गया एक साल

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010


अनियमित रूप से ब्लागिंग करते हुए मैंने पहला साल आज पूरा कर लिया - इस बात से मुझे निजी तौर पर खुशी है| एक साल पहले पहली फीड अपलोड करते हुए जो उत्साह महसूस हुआ था वो आज भी बना हुआ है यह मेरे लिए संतोष का विषय है| कई ब्लॉगर साल भर में एक हजार फीड का रिकार्ड बना चुके हैं और मैं अभी तक 50 तक भी नहीं पहुचा हूँ|

इस एक साल की अवधि में मेरी सबसे ज्यादा फीड नक्सलवाद पर रही | हांलाकि मैं चाहता था कि छत्तीसगढ़ और पश्चिमी उड़ीसा के उन अछूते हिस्सों की कुछ अच्छी तस्वीरें ब्लॉग के माध्यम से बाहर की दुनिया में पहुचे मगर ऐसा हो नहीं पाया | इस एक साल में बस्तर में इतना खून बहा कि आज दंतेवाडा की गूँज सब तरफ है| इस लिहाज से सच कहूँ तो जो दिखता रहा मैं लिखता रहा| मैं चाहता था कि कुछ अच्छी और सकारात्मक चीजें पेश की जाएं जो इलाके की विशिष्ट पहचान से जुडी हों| एक अलग पहचान बनाने की ललक पत्रकारिता की तरफ खीच लाई थी और इसी ललक ने ब्लागिंग जगत से भी जोड़ा मगर मुझे यह मानने में कोई गुरेज नहीं कि आज के मापदंड के मुताबिक मैं सफल ब्लॉगर नहीं हूँ| मैं तो इस माध्यम को एक्सटेंशन ऑफ़ जर्नलिज्म ही मानता हूँ| जैसे प्रिंट जर्नलिज्म वैसे नेट या वेब जर्नलिज्म| यह जरूर महसूस हुआ कि ब्लॉग में विश्लेषण की आप पूरी छूट ले सकते हैं| इस छूट का बेजा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता क्योंकि त्वरित टिप्पणियों से आप को आईना दिखाने के लिए भी लोग तैयार बैठे हैं| मैंने टिप्पणियों की निर्बाध प्रणाली को चुना जिसके लिए मैं टिप्पणी भेजने वालों का ख़ास तौर पर शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने शालीनता बनाए रखी| विनम्रतापूर्वक आगे भी यही उम्मीद करूंगा|
इस एक साल में मेरे ब्लॉगबाड़ा मित्रों ने मुझे अपने व्यस्त क्षणों में भी झेला और तकनीकी मदद की| ख़ास कर संजीत त्रिपाठी मेरी कम्प्युटर इल्लिटरेसी के सर्वाधिक पीड़ित रहे|
मुझे इस वक्त यह पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग मिलते ही रहे काफिला बढ़ता गया |

आदरणीय गिरीशजी की यह पंक्तियाँ हमेशा याद रहती हैं -
हो मुसीबत लाख पर ये ध्यान रखना तुम
मन को भीतर से बहुत बलवान रखना तुम
बहुत संभव है बना दे भीड़ तुमको देवता
मन के भीतर एक अदद इंसान रखना तुम

मेरे ब्लॉग पर आने का बहुत शुक्रिया और "मेरे साथ" किसी भी रूप में जुड़ने का हार्दिक आभार|
-रमेश शर्मा/ रायपुर

8 comments:

राजेन्द्र मीणा 30 अप्रैल 2010 को 4:55 am  

बधाई हो भई !...एक साल पूरा जो कर लिया ......बस इसी तरह कुछ ना कुछ लिखते रहा कीजिये लेखनी को विराम मत दीजिये ......एक बार फिर से बधाई

http://athaah.blogspot.com/

Er. Ankit Kumar Gautam 30 अप्रैल 2010 को 5:16 am  

congrats for completing one year........

Amitraghat 30 अप्रैल 2010 को 5:47 am  

बधाई कबूल करें जनाब.."

'उदय' 30 अप्रैल 2010 को 6:09 am  

...बधाई व शुभकामनाएं !!!

girish pankaj 30 अप्रैल 2010 को 6:34 am  

इसी तरह तुम आगे बढ़ना लेकर सदा उसूल .
बन जायेंगे कंटक सारे, इक दिन सुन्दर फूल
''यायावर'' बन कर ही दुनिया देख सके इंसान
अभी और चलना है हमको लक्ष्य न जाना भूल
सुन्दर बातें, सुंदर चिंतन है रमेश का धर्म
'ब्लॉग' तुम्हारा 'बाग़' बने इक रहे न कोई शूल
------------
बधाई...ब्लोगिंग को गरिमा प्रदान करने में तुम सफल रहे हो. बेशक तुमने कम लिखा मगर अच्छा लिखा. आंकड़े मत देखो, पचास में भी आस है. मैं तो कहता हूँ, दो बूँद भी आये, मगर अमृत ही आये, ज़हर नहीं. यहाँ तो देख ही रहे हो, क्या हालत है. सृजनकर धीरे-धीरे ही चलता है. उसका मकसद होता है विचार देना. तुमने वही दिया. बहरहाल, अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है

jay 2 मई 2010 को 12:51 am  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
jay 2 मई 2010 को 12:54 am  

आपको नए रूप में पहले जनम दिन की भूरि-भूरि शुभ कामना. आपने लिखा की लोग हज़ार लिख लेते हैं और आप पचास ही लिख पाए हैं. ऐसा बिलकुल नहीं है. आ. गिरीश जी ने बिलकुल सही कहा है अरबों पेज के इस नेट-संसार में संख्यात्मक रूप से अपने को पेश करने के बदले गुणात्मक अभिवृद्धि महत्त्वपूर्ण है. इस मामले में आप पूरे ही खड़े उतरे हैं..आगे भी यह कायम रहेगा यही उम्मीद. सादर.
पंकज झा.

Sanjeet Tripathi 17 मई 2010 को 1:15 am  

badhai sir jee, vilambit badhai aur shubhkamnayein kabul karein....

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