दिग्भ्रमित सिंह

मंगलवार, 4 मई 2010


कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को मौजूदा राजनीति में वो मुकाम हासिल है जिसके लिए कांग्रेस में धुरंधर नेता कई दशकों से इंतज़ार कर रहे हैं| वे साफ़ -सुथरी छवि वाले हैं और राजनीति में सिद्ध पुरुष हैं| | वे खरा बोलते हैं और उनके तथ्य अकाट्य होते हैं| मेरा मानना है कि पोलिटिकल स्कूल ऑफ़ अर्जुन सिंह से जो-जो स्टुडेंट दीक्षित हो कर आए उनमे दिग्गी राजा ने अर्जुन सिंह की एक पुरानी ख़ास शैली में खुद को इतना पारंगत कर लिया है कि खुद अर्जुन भी काफी पीछे रह गए हैं| बाकी छात्र भी मुख्यधारा से ठिकाने लग गए हैं| दिग्विजय सिंह ने अपने दौर के कई नेताओं को कद के मामले में पीछे कर दिया है| वे अपनी प्रतिज्ञा किये बैठे हैं कि एक निश्चित समय (शायद दस साल) तक कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे| कांग्रेस के अगले नेतृत्व की ताजपोशी के लिए रास्ता सुगम बनाने का जिम्मा भी दिग्विजय सिंह पर है और वे इस काम में डट कर जुटे हैं लेकिन इधर कुछ दिनों से दिग्विजय सिंह ने एक ऐसा राग छेड़ दिया है जिसने उनको काफी मुश्किल में डाल दिया है| वे नक्सल मामले में गृह मंत्री पी चिदंबरम की आलोचना कर बैठे जिसके कारण उनको माफी मांगनी पड़ी| अब वे छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री डा. रमन सिंह से राजनीतिक रस्साकसी में जुट गए हैं जिसमे पिछले सारे गड़े मुर्दे उखड़ने की पूरी संभावना है |
चिदंबरम की नक्सल नीति को लेकर दिग्विजय सिंह ने एक लेख लिखा जिसमे बवाल मचने पर उन्होंने माफी मांग ली| चूंकि यह मामला छत्तीसगढ़ से जुड़ा है लिहाजा डॉ.रमन सिंह ने करारा जवाब देते हुए एक लेख लिखा जिसमे साफ़ कहा गया कि दिग्विजय सिंह दस साल तक अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मगर उन्होंने नक्सल समस्या के निदान के लिए कुछ नहीं किया|वगैरह- वगैरह ...|
इस पर दिग्विजय सिंह ने कुछ दिनों तक चुप रहने के बाद एक खुला पत्र रमन सिंह को लिखा है जिसमे कहा गया है कि लेख की "भाषा" से उन्हें बेहद दुख पहुंचा| दिग्गी राजा ने कहा कि नक्सलवाद से लड़ने के लिए यह आवश्यक है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का विश्वास शासन में हो।दुर्भाग्य से ऐसी स्थिति वर्तमान में नजर नहीं आती।महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में सलवा जुड़ूम शुरू हुआ लेकिन गलत नीतियों के कारण हजारों आदिवासियों को शरणार्थी बनकर जीवन व्यतीत करना पडा है|दिग्विजय सिंह ने राज्य सरकार पर आरोप मढ़ते हुए कहा कि 700 गांव वीरान हो गए हैं। मुख्यमंत्री किन क्षेत्रों में विकास की बात कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने रमन सिंह से पूछा है कि उनके कार्यकाल में कितनी घटनाएं होती थीं और अब कितनी हो रही हैं? दिग्गी राजा पूछते हैं कि सांसद बलीराम कश्यप द्वारा नक्सलियों को किए गए वायदे की पूर्ति नहीं होने पर उसके बेटे की हत्या की गई? विगत ६ अप्रैल की दंतेवाडा घटना को लेकर उन्होंने सवाल किया है कि दंतेवाडा में 1000 नक्सलियों का जमावड़ा होता है और गुप्तचर एजेंसियों को भनक तक नहीं लगती।
दूसरी तरफ रमन सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में उनके मौजूदा कार्यकाल और नक्सली समस्या पर दिग्भ्रमित दिग्विजय सिंह जहां भी चाहें वे उनसे बहस कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ की जनता का समर्थन उनके जीवन की बड़ी कमाई है।डॉ. सिंह ने कहा कि दिग्विजय सिंह के आरोप पहले भी मनगढ़ंत थे और अभी भी आधारहीन हैं। उनका पूरा पत्र ही आधारहीन है। वे पहले केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के बारे में कोई बात कहते हैं और एक हफ्ते बाद माफी मांग लेते हैं| इसी तरह सलवा जुड़ूम पर वे कहते हैं कि सरकार को समर्थन देना बंद कर देना चाहिए। उन्हीं के पार्टी के लोग समर्थन देने की बात करते हैं। ऐसा लगता है कि वे पूरी तरह कन्फ्यूज्ड हैं।
दिग्विजय सरकार के कार्यकाल में कितनी नक्सली हिंसा होने और मौतों के आंकड़े पर मुख्यमंत्री ने कटाक्ष किया कि नक्सलियों के सामने दोनों हाथ ऊपर कर खड़े हो गए तो कुछ होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। मौतों के आंकड़े तो कम ही रहेंगे। हम कार्रवाई कर रहे हैं लिहाजा मौतों के आंकड़े ज्यादा नजर आ रहे हैं|
इस पूरे प्रसंग में दिग्विजय सिंह की स्थिति को देख कर लगता है कि मंशा उनकी चाहे जो भी हो मगर वे गलत समय पर सही मुद्दा उठा रहे हैं| अभी कोई चुनाव नहीं होने हैं| उनके समर्थक जरूर पशोपेश में हैं| एक तरफ बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ अभियान चले दूसरी तरफ नेता आपस में छीछालेदर करें तो क्या हालात बनेंगे यह सहज समझा जा सकता है| जरूर ऐसा लगता है कि चिदंबरम और दिग्विजय विवाद में डा. रमन नाहक कूद पड़े हैं मगर उनकी स्थिति जो है उसमे साफ़ है कि जिस मुद्दे को राष्ट्रीय फलक पर लाने के लिए पिछले सात सालों से वे मेहनत कर रहे थे उसमे अब जा कर गतिशीलता आई है | इसमें दिग्विजय सिंह ने अडंगा लगा दिया| शायद इसी वजह से रमन सिंह ने जो आमतौर पर विवाद से कन्नी काट लेते हैं, ने खुला बयान दे कर सिंह वर्सेस सिंह का नया शिगूफा छेड़ दिया है| लोगों को सिंहों की इस भिडंत में मजा भी आ रहा है| अब यह बताने की जरुरत है कि एक माओवादी नेता ने बयान दिया है कि दिग्विजय सिंह उनसे गुप्त वार्ता करना चाहते थे| इस पर सफाई आनी बाकी है|

4 comments:

ललित शर्मा 4 मई 2010 को 3:46 am  

बहुत अच्छी पोस्ट ....

धन्यवाद

नरेश सोनी 4 मई 2010 को 4:20 am  

सटीक लेख।

jay 4 मई 2010 को 5:28 am  

बहुत शानदार आलेख...हर नक्सल समर्थक की ऐसी ही खबर लेते रहिये....साधुवाद.
पंकज झा.

Omprakash chandraker 4 मई 2010 को 8:54 am  

हर शाख पे उल्लू बैठा है , अंजाम- ऐ- गुलिस्ताँ क्या होगा ....ये राजनितिक पार्टीओ के बस का रोग नहीं की नक्सल समस्या को ठीक किया जा सके, इसे प्रशासनिक स्तर पर ही ठीक किया जा सकता है लेकिन ये दुभाग्य है इस देश का की अंगूठा छाप नेता देश की कमान सँभालते है ....

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