संस्कृति के लठैत

सोमवार, 2 अगस्त 2010


धर्म सेना और बजरंग दल के उत्पातियों ने फ्रेंडशिप डे के दिन रविवार को रायपुर पार्कों में जा कर प्रेमियों के साथ जो करतूत की उससे भारतीय समाज का एक नया और ऐसा कुरूप चेहरा सामने आया है जिसकी मजम्मत के लिए शब्द भी शायद कम पड़ें| अपनी दुनिया में डूबे युवा जोड़े अचानक जोर-जोर से नारे लगाते इन गुंडों को देख कर सकपका गए और फिर जब तक उनको माजरा समझ में आता वे घिरे हुए थे संस्कृति के नए लठैतों से जिनके हाथ जो पड़ गया उसको जीवन भर के लिए बेलज्जत होना पड़ गया| एक युवती के सिर पर क्यू फिक्स डाल कर उसके बाल सिर की त्वचा से चिपका दिए गए| विरोध का यह तरीका शायद तालिबानी भी विकसित न कर पाए हों |
संस्कृत की रक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार हो कर आए इन युवकों में से किसी ने बैठे हुए युवक- युवतियों को लात मारना शुरू किया, तो किसी को कीचड़ में ढकेल दिया गया। कोई युवती को पकड़कर घसीटने लगा। लाचार और शर्मसार जोड़े उत्पातियों से उनको बख्श देने की गुहार लगाते रहे लेकिन एक नहीं सुनी गयी| उन पर काले आयल की पूरी कुप्पी उड़ेल दी। देखते ही देखते बगीचे में भगदड़ मच गई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़ एक युवती के सिर पर किसी ने क्यू फिक्स डाल दिया जससे उसकी त्वचा झुलस गयी| हालाकि इस मामले में किसी ने कोई शिकायत नहीं की है| कुछ दूरी पर मौजूद पुलिस तमाशा देखती रही। एक भी बजरंगी को उसने रोकने की कोशिश नहीं की।
बाद में उत्पात मचाने के आरोप 15 लोग गिरफ्तार किये गए हैं जिनमे से पांच के खिलाफ छेड़छाड़ और बदतमीजी करने का मामला दर्ज किया गया है| 10 पुलिस वाले भी इस चक्कर में सस्पैंड कर दिए गए हैं|
यहाँ सवाल है कि यह कौन सा बर्ताव है कि आप दूसरों को जीने का हक़ भी ना दें? कोई पार्क में जा कर बैठे तो यह कैसे नाजायज है? फिर पार्क किस लिए बनते हैं| ज़रा गौर करने वाली बात यह है कि गिरफ्त में आए ज्यादातर धर्म सैनिकों के कपडे बताते हैं कि वे जींस पहने, कमीज के दो बटन खोल कर चलने और खुला गला रखने वाले अर्ध आधुनिक हैं जिनका बस चले तो कृष्ण और राधा का पूरा पौराणिक इतिहास जला दें और सिनेमाघर तो एक दिन भी नहीं चल पाएं| हमें यह भी देखना होगा कि यह विरोध इतना कुत्सित क्यों होता जा रहा है | इसके जवाब में यौन शिक्षा , वर्ग भेद, घटता लैंगिक अनुपात, एफ एम्/ चैनलों पर उगली जा रही अश्लीलता समेत युवाओं में बढ़ रहे फ्रस्ट्रेशन जैसे विषयों से भी गुजरना होगा| यह हताशा संस्कृति रक्षा की नजर नहीं आती है| ऐसे ज्यादातर हिप्पोक्रेट लोग छुप कर तो सारा कुकर्म करना चाहते हैं मगर कोई पार्क में बैठ कर बात करे तो उनको संस्कृति खतरे में नजर आती है| दरअसल खतरे में उनकी वह सोच है जो एक तेजी से बदलती हुई दुनिया को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है| मगर इससे दुनिया का बदलना शायद ही रुके| वैसे इस मामले में एक दलील यह भी हो सकती है कि दोस्ती के नाम पर सार्वजनिक फूहड़ता का विरोध होना चाहिए क्योंकि पार्क में बच्चे भी तो आते हैं| मगर ऐसा विरोध तो नहीं ही होना चाहिए | यह जरूर है कि सार्वजनिक जगहों को लास वेगास बना देने पर तुले लोगों को भी यह तो समझना चाहिए कि भारतीय समाज में शर्म लिहाज जैसी चीजें अभी लुप्त नहीं हुई हैं| धोती जरूर गायब हो रही है मगर पतलून गायब नहीं हुई है|
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि जोड़े बिना शादी किये साथ रह सकते हैं मगर यहाँ तो पार्क में भी साथ बैठने के भयावह खतरे हैं| यहाँ यह चीज बिलकुल साफ़ होनी चाहिए कि विरोध फ्रैंडशिप डे(विदेशी सभ्यता के नाम पर ) का हो तो समझ में आता है मगर फ्रैंडशिप का विरोध है तो वे जो पकडे गए हवालात में हैं वे भी तो आपस में फ्रैंड होंगे| अब उनको यह कोई कैसे समझाए कि लडकी भी तो फ्रैंड हो सकती है| फ्रैंड न भी बना सको तो कम से कम उसे एक इंसान पहले समझा जाए लडकी बाद में... और फिर इस तरह का व्यवहार लड़कियों के साथ तो किसी भी रूप में भारतीय संस्कृति नहीं है| यह शुद्ध गुंडई है|

4 comments:

L.Goswami 2 अगस्त 2010 को 7:24 am  

अंधेर है ....

ललित शर्मा 2 अगस्त 2010 को 8:03 am  

प्रजातंत्र का मखौल उड़ाया जा रहा है।
आजादी किसी को बेईज्जत करने की नहीं है।
विरोध का सभ्य तरीका भी है।
संस्कृति का तालिबानीकरण ठीक नहीं है।
इस कृत्य की पुरजोर निंदा करनी चाहिए

बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है रमे्श भाई
शुभकामनाएं

M VERMA 2 अगस्त 2010 को 8:56 am  

कहें किससे ... सुने कौन
अन्धेरपुर नगरी है ये
राजा भी तो चौपट है

SAMEER 3 अगस्त 2010 को 3:39 am  

बहुत अछि पोस्ट लिखी है.... हम सभी को इस गुंडागिरी का पुरजोर विरोध करना चाहिए

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