इन्डियन टैलेंट का सुपर बग

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

भारत में जहां कॉमन वेल्थ खेलों की तैयारियों लेकर आपस में सिर फुटव्वल के कारण पूरा देश शर्मसार हो रहा है वहीं ब्रिटेन ने 2012 के ओलंपिक खेलों के लिए अभी से पुख्ता तैयारी शुरू कर दी है और लाखों पर्यटकों के आगमन के बाद किसी संभावित पचड़े से बचने की खातिर अपने देश के लोगों को भारत से आने वाले पर्यटकों को न छूने और उनके बहुत करीब न जाने की सलाह दी है ताकि किसी को कोई रोग-दोष हो जाए तो ठीकरा भारतीयों के सिर फोड़ने का पहले से बंदोबस्त रहे|

ब्रिटेन की पर्यटन एजेंसी 'विजिट ब्रिटेन' ने बुधवार को जारी की गई'क्या करें और क्या न करें'की एक सूची में ब्रिटेनवासियों से कहा है कि वह ओलंपिक के दौरान भारत से आए किसी व्यक्ति से पहली बार मिलने पर उनके बहुत करीब जाने से बचें। ख़तरा एक जीवाणु को लेकर है जिसे फिरंगियों का शरीर लड़ नहीं पा रहा है और सारा बवाल ब्रिटेन की मेडिकल पत्रिका लैंसेट के एक नये अध्ययन से मचा है| अध्ययन में बताया गया है कि भारत और पाकिस्तान में नए किस्म के बैक्टीरिया ‘दिल्ली सुपरबग’ ने जन्म ले लिया है। इस बैक्टीरिया पर किसी भी एंटीबॉयोटिक दवा का असर नहीं होता है। रिपोर्ट में सभी विदेशी नागरिकों को भारत या पाकिस्तान में अपना इलाज कराने से परहेज करने की हिदायत दी गई है। तर्क है कि यह हिदायतें केवल सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाने और गलतफहमी से बचने के लिए हैं।
'विजिट ब्रिटेन' ने ब्रिटिश लोगों को यह भी कहा है वह फ्रांस के लोगों से भी सुरक्षित दूरी बनाये रखें क्यूंकि वह स्वभाव से आक्रामक होते हैं।
'विजिट ब्रिटेन की मानें तो अगर पहली नजर में भारतीय अभद्र, शोर करने वाले और अति-उत्साही होते हैं। ऐसा कहने के पीछे 'विजिट ब्रिटेन का तर्क यह है कि अधिकतर भारतीय अस्त-व्यस्त शहरों और और बिगडे पर्यावरण में रहते हैं जिस कारण वो कुछ अधिक अभद्र और उतावले होते हैं।

अब जरा इस मसले पर डाक्टरों की राय भी सुन लें- दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल से स्थानीय जीबीएच अमेरिकन अस्पताल में सेवाएं दे रहे प्लास्टिक सर्जरी विशेषज्ञ डॉ. गुरु गुलशन कहते हैं कि भारत के राजकीय अस्पताल पर किए गए सर्वे की रिपोर्ट पूरी तरह से भ्रामक है। जिस बैक्टीरिया (न्यू देहली, मेटेलो बीटा लैक्टोमेस 1) की बात है तो वो भारत ही नहीं अधिकतर देशों में पाए जा सकते हैं।

रही बात भारत के अस्त-व्यस्त माहौल की तो उदयपुर जैसे शहर में अब तक 36 देशों से आए लोगों ने लाईलाज बीमारियों का इलाज करवाया है और केरल जा कर देखिये मालिश करा कर प्राकृतिक चिकित्सा करने वालों की लाइन लगी है| प्लास्टिक सर्जन डॉ. प्रशांत अग्रवाल कहते हैं कि इस रिपोर्ट को जिस स्तर से बढ़ा चढ़ा कर बताया गया है, दरअसल ऐसा कुछ नहीं है। भारत अन्य देशों के सामने एक चुनौती बनकर खड़ा है। इस कारण हमारी साख को खराब करने का प्रयास किया जा रहा है।

अब इस खबर पर भी गौर करें- गैरयूरोपीय देशों से ब्रिटेन आने वाले वालों की संख्या कम करने के ब्रिटेन की डेविड कैमरन सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद इस साल अप्रैल से जून के बीच 37,000 भारतीय काम के लिये ब्रिटेन पहुँचे।

ब्रिटेन के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आँकड़ों ने आव्रजन मंत्री डैमियन ग्रीन के प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। ग्रीन ने रोजगार के लिए ब्रिटेन आने वाले गैरयूरोपीय कामगारों पर रोक लगाने के विभिन्न उपाय किए हैं।आँकड़ों के मुताबिक, अप्रैल और जून के बीच 1,86,000 लोगों ने ब्रिटेन में काम करना शुरू किया जिसमें से 1,45,000 लोग विदेशी हैं, जबकि 41,000 लोग ब्रिटेन के नागरिक हैं।आधे से ज्यादा 77,000 विदेशी कर्मचारी यूरोपीय देशों के हैं जिनके पास ब्रिटेन में काम करने का अधिकार है। यूरोपीय संघ के बाहर से ब्रिटेन आने वाले लोगों में आधे से अधिक 37,000 लोग भारत से ब्रिटेन आए। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय पेशेवरों के हुनर की ब्रिटेन में काफी माँग है।

सांख्यिकी कार्यालय के इन आँकड़ों ने मंदी, छँटनी और बेरोजगारी के इस दौर में ब्रिटेन सरकार को चिंता में डाल दिया है और शायद इस तरह की दलीलों के पीछे वही मानसिकता काम कर रही है जो भारतीयों की पेशागत खूबियों को पचा नहीं पा रही है| इस वजह से आस्ट्रेलिया में नस्लभेद के जरिये भारतीयों से निपटा जा रहा है और दीगर जगहों पर भी उनकी प्रतिभा को दबाने के लिए रंगभेद का सहारा लिया जाता है मगर भारतीय शायद किस मिट्टी के बने हैं यह दुनिया अब धीरे-धीरे जान रही है| इस हालात में भी कि यह भारत की तरक्की को नजरअंदाज करके वही सांप-सपेरों वाले पुराने चश्मे से देखने का पश्चिमी ढर्रा है हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश की किन परिस्थितियों से विदेशी दूरी बनाए रखना चाहते हैं और उन कमियों को दूर करने के प्रयास भी होने चाहिए| यह भी तो सच है कि अपने यहाँ तो हम एक-दूसरे की टांग खींचने की कला में माहिर हैं मगर जैसे ही जहाज में चढ़ते हैं हमारा स्किल दनदनाने लगता है |

4 comments:

shikha varshney 13 अगस्त 2010 को 4:17 am  

हाँ ठीक ही है ..हिंदुस्तानियों से बचो पर अपने काम इन्हीं से कराओ ..सारे भारतीय डॉ अगर निकल दो ब्रिटेन से तो जुखाम का इलाज करने के लायक भी नहीं रह जायेंगे .

'उदय' 13 अगस्त 2010 को 7:47 am  

... saarthak abhivyakti !!!

ललित शर्मा-للت شرما 13 अगस्त 2010 को 6:13 pm  

अंग्रेजों के दिमाग में बग पड़ गयी है,
आज इन्हे दूध का अर्पण करें-नागपंचमी की बधाई
सार्थक लेखन के लिए शुभकामनाएं-हिन्दी सेवा करते रहें।


नौजवानों की शहादत-पिज्जा बर्गर-बेरोजगारी-भ्रष्टाचार और आजादी की वर्षगाँठ

Swarajya karun 18 अगस्त 2010 को 9:27 pm  

भारतीय प्रतिभाओं से आतंकित अंग्रेजों ने भारत की छवि बिगाड़ने के लिए ऐसी अफवाह फैलायी है . इसके बावजूद अगर हम चुप हैं ,तो शायद गुलामी के वायरस से आज भी हमें मुक्ति नहीं मिल पायी है .बहरहाल एक बहुत संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे पर गंभीर आलेखन के लिए आपको बधाई. -स्वराज्य करुण

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