सिर्फ पलाश बाकी खलास

गुरुवार, 3 मार्च 2011

इस बार लम्बे अरसे बाद गाँव जाना हुआ और वहाँ पंहुच कर बसंत का जो नजारा देखा तो होश उड़ गए| निस्तब्ध वातावरण में प्रकृति एक नए चोले में सज रही है और बसंत ने कानन में डेरा डाल रखा है| आगबबूला हुए सुर्ख पलाश ने बाजी मार ली है और बाकी सब खलास हैं| सूखे दरख्तों के पत्ते झर रहे हैं और हवा की हिलोर भटकाने के लिए काफी है| पहाड़ अब तक हरी चादर ओढ़े सो रहे थे अब जाग रहे हैं और जंगल का हरेक दरख़्त अपने पत्तों का बोझ धरती पर पटकने को आतुर है| सूखे पत्तों के चादर सी जमी नजर आती है |अब चारों तरफ उजाड़ का मौसम है| कहीं कोई हरित पट्टी दिख जाए तो राहत मानिए|
इस पूरे नज़ारे में पलाश उर्फ़ टेसू उर्फ़ पलसा सबसे ज्यादा आकर्षित करता है| उसके लाल सुर्ख फूल खुल कर खिले हैं| यह बसंत है|और बसंत क्या है यह जंगल से ज्यादा कोई नहीं जानता| जब बड़े बड़े पत्तों वाला पलाश अपने सूखते हुए पत्तों को छोड़ सिर्फ सुर्ख लालिमा लिय्रे दहकती हुई फूलों की डालियों के साथ तेज धूप में तना रहता है तो सारे पेड़ उसकी इस आभा के सामने फीके लगते हैं| एक अकेला पेड़ सारे वीराने को अपने सौन्दर्य से भर देता है। पलाश लाख सुन्दर फूल है पर उसमें सुगन्ध नहीं होती ! वह इतना भारी होता है की उसे जूड़े में सजाया नहीं जा सकता, वह किसी भी गुलदस्ते की शोभा नहीं बन पाता| पलाश इस मौसम में केसरी आभा से दमकता है| फागुन मस्ती कीशुरुआत है| बाकी पेड़ और झाड़ियाँ भी हैं पर रूतबा तो पलाश और सेमल का ही है| सेमल हर जगह नहीं दिखता |

सुखद है कि घर के बगीचे में एक अदद पलाश का भी पेड़ साबुत खडा हुआ है और इस बार वही सबके आकर्षण का केंद्र रहा| इसका वानस्पतिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। इसकी लकड़ी से कोई फर्नीचर वगैरह नहीं बन सकता है इसीलिए अमूमन इसे लोग नहीं उगाते|

जंगलों में इसके पेड़ बहुतायात में पाए जाते हैं| ख़ास करके इस इलाके में तो सड़क का लगभग हर किनारा पलाश की उपस्थिति दर्शा जाता है| इसे "जंगल की आग" भी कहा जाता है। प्राचीन काल ही से होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है।इसके फूल सुखा कर उबाल लिए जाते हैं जिससे प्राकृतिक रंग तैयार हो जाता है| यह फूल असाध्य चर्म रोगों में भी लाभप्रद होता है। हल्के गुनगुने पानी में डालकर सूजन वाली जगह धोने से सूजन समाप्त होती है।टेसू के फूल को घिस कर चिकन पाक्स के रोगियों को लगाया जा सकता है। इससे एलर्जी नहीं होती है|
गाँव की अमराई और घर का एक अदद आम के पेड़ पर इस बार खूब बौरें आईं हैं| यह सुखद संकेत है कि आम खूब फलेंगे| इन पेड़ों के पास जा कर कोई खडा हो जाए तो उनकी खुशबू पुलकित कर देती है| अमुवा की डाली पे गाए मतवाली... हमने कोयल की कूक सुनने का इंतज़ार किया मगर शायद कोयल आजकल मौन है| याद आया... बीत गयी रुत सावन की कोयल हो गयी मौन, अब दादुर वक्ता भए तो हमको पूछी कौन| खैर आगे बढ़ने पर देखा सेमल (रुई)पर भी गुलाबी फूल आए हैं और वह भी पलाश के साथ होड़ कर रहा है|

4 comments:

ललित शर्मा 3 मार्च 2011 को 9:33 pm  

बसंत आयो,रंग भी लायो,
कामदेव ने काम जगायो
देखत ही बौराई अमिया
आयो है रे मस्त फ़गुनवा
कैसी कीनी प्रीत बलमवा

मेरे एक गीत से चंद पंक्तियां,

सतीश सक्सेना 3 मार्च 2011 को 10:03 pm  

आपका सरल प्रवाह पसंद आया ! शुभकामनायें !!

Rahul Singh 4 मार्च 2011 को 6:40 am  

बस थोड़े दिन और, सेमल पर तोते बैठ जाएंगे.

Swarajya karun 4 मार्च 2011 को 11:37 am  

हमारे जीवन से गायब हो रहे पलाश की फ़िक्र करते इस आलेख के लिए आभार .

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