हमेशा की तरह प्राणघाती चूक

बुधवार, 25 मई 2011

सोमवार को रक्तरंजित माओवाद का एक और हैवानियत भरा चेहरा सामने आया| छत्तीसगढ़- ओडीसा सीमा पर हमले में एक बार फिर एक झटके में 10 परिवार उजड़ गए और हमेशा की तरह निंदा भर्त्सना के स्वर उन परिवारों की रुलाई के साथ गूँज रहे हैं जिनका इकलौता कमाने वाला ही चला गया|

इस घटना ने नक्सलियों की निर्ममता को तो उजागर किया ही है यह भी बता दिया है, कोई विचारधारा अगर हमेशा के लिए आंख मूँद ले तो वह शैतान की प्रवक्ता भी बन सकती है और जब वर्ग शत्रु का सिद्धांत स्वीकार ही कर लिया जाता है तो इंसानियत की आवाज बारूद के आगे ढेर कर दी जाती है और जो लोग किसी के शव का सम्मान नहीं कर सकते वे किसी भी सूरत में कोई भी क्रान्ति कर लें अशांति उनके साथ ही रहेगी और जंगल में भटकते हुए वे जिस मंजिल को पहुचेंगे वो शायद कोई "गोली" ही होगी|

सीधे आते हैं घटना पर जिसमे पुलिस महकमे की लापरवाही को भी एक बार फिर साबित हुई है| हमले में मारे गए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश पवार जैसे दिलेर अफसरों के भरोसे ही अभियान चल रहा है , लगता है | पवार बहादुर अधिकारी थे तथा नक्सला प्रभावित बस्तर क्षेत्र में लगातार काम करते रहे हैं। वे प्रत्येक सोमवार को धवलपुर गाँव जाते रहे हैं| मतलब साफ़ था कि उनके मूवमेंट की जानकारी नक्सलियों को थी और उन्होंने जाल बिछा दिया| पवार अपने छह सिपाहियों समेत ड्राईवर सहायक को लेकर रवाना हुए थे।सूचना थी कि गाँव में नक्सलियों ने समर्पण किया है| यह भ्रामक सूचना थी |

इससे पहले भी खबर आती रही है कि इलाके में नक्सली बैठक करते रहे हैं| इस पर सवाल पूछा जा रहा है कि नक्सली होने की खबर के बावजूद यह जानलेवा चूक क्यों की गयी?
सोमवार को क्षेत्र के सोनाबेड़ा के करीब सोसिंग गांव में नक्सलियों के छिपे होने की जानकारी मिली थी। महकमे के अफसर मानते हैं कि राजेश बहादुर जरूर थे मगर सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने कई चूकें की| मसलन वे कच्चे रास्ते पर वाहन से गए जबकि जंगलवार का पहला नियम घोषित है कि वाहन का इस्तेमाल ना किया जाए| इसके अलावा एक और चूक सामने आई है कि वे उसी रास्ते से लौटे जिस रास्ते से गए थे| नक्सली ऐसे ही मौकों के इंतज़ार में रहते हैं और घात लगा कर हमले (एम्बुश) में हार बार उन्होंने साबित किया है कि चूक पुलिस करती है , वे नहीं करते|

इससे पहले भी सभी बड़े हमलों में यही चूक जानलेवा साबित होती रही है| कल घटित घटना के पहले पुलिस दल जब सोसिंग गांव जा रहा था तो आधारगांव के करीब उनकी गाड़ी खराब हो गई। मजबूरीवश पुलिस दल को सोनाबेड़ा गांव से ट्रेक्टर मंगवाना पड़ा और आगे नहीं बढ़कर वे आमामोरा गांव की तरफ चले गए। जंगल में नक्सलियों ने पुलिस दल पर घात लगाकर हमला कर दिया| शहीद परिवारों में मातम छा गया है|
एक सिपाही लापता है | आशंका है कि नक्सलियों ने उसका अपहरण कर लिया है| पुलिस पार्टी लापता पुलिसकर्मी की खोज में जंगल का चप्पा चप्पा छान रही है। शहीदों के शवों को हेलीकाप्टर से रायपुर लाया गया |
शवों की हालत बताती है कि नक्सलियों ने शवों को भी नहीं बख्शा | धारदार हथियार से अंगों को काटा गया| कई शव कटे हुए पाए गए हैं। हमेशा की तरह नक्सलियों ने पुलिस के हथियार भी लूट लिए।
क्या मानवाधिकारवादी बता पाएंगे कि इंसान के अधिकार हो सकते हैं मगर मरने के बाद क्या उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं? यह सिर्फ अधिकार की बात नहीं है| एक तो मारना ही गलत है चाहे कोई भी मारे| मार करके लाशों की दुर्गति करना पैशाचिक कृत्य हैऔर जो पिशाच बन चुके हैं वे क़ानून कायदे की भाषा समझ ही नहीं सकते, यह क़ानून-कायदे वाले कब समझेंगे- समझ नहीं आता|

2 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) 31 मई 2011 को 6:17 pm  

हमारे जांबाज सैनिक हर तरह का खतरा उठाते है, फ़िर भी नेता अपनी मांद में छुपे रहते है,
जो लाश के साथ भी बुरा करे, वो सही मार्ग पर कैसे हो सकता है?

Dr Satyajit Sahu 5 जून 2011 को 11:25 pm  

इस घटना ने नक्सलियों की निर्ममता को तो उजागर किया ही है यह भी बता दिया है, कोई विचारधारा अगर हमेशा के लिए आंख मूँद ले तो वह शैतान की प्रवक्ता भी बन सकती है

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