नक्सली शिविर ध्वस्त करेंगे, गाँव नहीं - डा. रमन सिंह

मंगलवार, 3 नवंबर 2009


देश भर में नक्सल प्रभावित सभी राज्यों में हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के सफाए के लिए आपरेशन ग्रीन हंट शुरू करने की औपचारिक घोषणा की जा चुकी है| मतलब साफ़ है कि नक्सली और सुरक्षा बलों में सीधी भिडंत के बाद जो हालात बनेंगे, उन पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी|
इन हालात में राज्य के मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह क्या सोच रहे हैं और दरअसल उनकी मंशा क्या है. इसे ले कर ख़ास बातचीत की गयी, पेश है-प्रमुख अंश-

* केंद्र और राज्य सरकार ने अब यह तय कर लिया है कि वामपंथी उग्रवाद से सख्ती से निपटेंगे और शुरूआत छत्तीसगढ़ से की जाएगी| इस मोड़ पर भी क्या ऐसी कोई संभावना है कि बातचीत से कोई रास्ता निकल आए?
- हमारा उद्देश्य यह है कि किसी भी तरह से शान्ति हो और शान्ति के लिए चलाए जाने वाले अभियान का मतलब ही है कि वे लोग (नक्सली) आत्म समर्पण करें| केंद्र सरकार ने आत्म समर्पण के लिए नीति भी अच्छी बनाई है| अधिकाँश लोग जो इस आन्दोलन में हैं वे वापस आएँगे और ये (हार्डकोर माओवादी) अकेले हो जाएंगे तो मैं समझता हूँ कि कंही न कंही चर्चा से समाधान संभव होगा|

* नक्सलवाद को अब तक जितना समझा गया है उसमे वे लोग समता, समानता, शोषण के खात्मे की बात करते हैं और कानून में भी यह स्पष्ट है जिसका पालन सरकार को करना है| तो फिर गड़बड़ क्या है?
* गड़बड़ देखिये , एक तरफ तो वे रिफार्म की बात करते हैं, क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने की बात करते हैं | शहरों जैसी सुविधाएं चाहते हैं मगर जो आन्दोलन चला रहे हैं उसने बस्तर को १८ वीं सदी में जीने के लिये मजबूर कर दिया है| यह किस तरह की क्रान्ति है जिसमे हजारों स्कूलों-अस्पतालों को तबाह कर दिया जाता है| मेरा स्पष्ट मानना है कि यह आन्दोलन अपने उद्देश्य से भटक गया है| हम ढाई लाख लोगों को पट्टे दे रहे हैं उसका विरोध क्यों? सबको स्वास्थ्य , शिक्षा और रोज़गार मुहैय्या कराना चाहती है सरकार लेकिन वे लोग इसका भी विरोध करते हैं | आप कहाँ से क्रांतिकारी हो गए, ३०० करोड़ रूपये की सालाना अवैध वसूली करते हैं| उसमे से तीन करोड़ भी क्यों खर्च नहीं करते ? सारा पैसा जाता कहाँ है उसका हिसाब कौन देगा?

ऐसा नहीं है कि किसी गाँव पर गोलीबारी की जाएगी| आक्रमण नक्सली शिविरों पर होगा| सरकार को चिंता है कि एक भी बेक़सूर व्यक्ति ना मारा जाए| अंततः हमारा उद्देश्य यह है कि हिंसा करने वाले को सही जवाब दिया जाए और जो सामने आएगा उससे बात भी की जाएगी|

* नक्सलवाद के पैदा होने के कारणों की भी तलाश करके स्थाई समाधान निकालने पर आपकी सोच क्या है?

* आज से ३०-४० साल पहले एक कारण था कि बस्तर या सरगुजा की या फिर छत्तीसगढ़ की उपेक्षा को एक कारण माना जा सकता था लेकिन जंगल में तो कोई वर्गभेद नहीं होता वंहा न कोई गरीब है न कोई अमीर है, न जमीदार है | वनों में जनजीवन कृषि पर नहीं वनोपज पर आधारित है| जंगल में सभी एक हैं| हमने नीतियाँ भी समग्र रूप से सोच कर बनाई हैं |
हमने इस बार कहा है कि हमें पैसा नहीं जरूरत की चीजें दे दीजिये| मसलन बुलेट प्रूफ़ जेकेट,एंटी लैण्ड माइन वेहीकल वगैरह केंद्र स्वयं हमें उपलब्ध करा सकता है|वे एक नीति तय करके हमें बेहतर सामान उपलब्ध करा दें तो यह बेहतर रहेगा और समय भी बचेगा|
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2 comments:

शरद कोकास 3 नवंबर 2009 को 9:23 am  

एक पत्रकार के नाते हमे आपसे भी इस पर अपने विचार की अपेक्षा थी ।

Ramesh Sharma 4 नवंबर 2009 को 3:47 am  

my reply : sharadji poore blog me mere wichaar hain aur interview mera nahi, sawaal zaroor mere hain.

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