घटना प्रायोजित थी - मेधा पाटकर

मंगलवार, 12 जनवरी 2010



मेधा पाटकर ने आरोप लगाया है कि बस्तर में उनके ऊपर जो कीचड और सड़े अंडे-टमाटर फेंके जाने की घटना हुई थी उसके पीछे सरकार का हाथ था| उन्होंने यह भी दोहराया कि बस्तर में शान्ति तभी बहाल हो सकती है जब वहाँ हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं दिया जाए बल्कि बातचीत का रास्ता बनाया जाए| यह कह कर मेधा ने साफ़ तौर पर संकेत दे दिया कि वे बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन ग्रीन हंट का समर्थन नहीं करती हैं|

सुश्री पाटकर जब प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता ले रही थीं तब बाहर सैकड़ों बच्चे और उनकी अगुआई कर रहे गुरुकुल आश्रम के कार्यकर्ता उनके खिलाफ नारे लगा रहे थे| इन सब से विचलित हुए बिना सुश्री पाटकर ने यह भी आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ई एल एस नरसिम्हन के कहने पर गृह मंत्री पी चिदंबरम ने अपना प्रस्तावित छत्तीसगढ़ दौरा टाला है|
उनके साथ मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडे भी थे| दोनों को दंतेवाडा में जनसुनवाई में भाग लेना था मगर वहाँ व्यापक विरोध के कारण दोनों को वापस आना पडा| रायपुर में भी 'मेधा पाटकर वापस जाओ, नक्सलियों का साथ मत दो' के नारों की बौछार के बीच कड़ी सुरक्षा में पाटकर की कार को प्रेस क्लब से निकाला गया|

प्रदर्शनकारियों में नक्सलियों द्वारा मारे गए आदिवासियों के बच्चे भी शामिल थे जिनके हाथों में तख्तियों पर लिखा था 'आदिवासी बच्चों को मत सताओ, बाहरी तत्व होश में आओ "
सुश्री पाटकर के साथ बाहर से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि उनकी टीम ने बस्तर में दोनों पक्षों की बात समझने की कोशिश की मगर उनको यह उम्मीद नहीं थी कि नक्सलियों के कारण अनाथ हो गए बच्चे अचानक उनके सामने आ जाएंगे|
उन बच्चों से न तो मेधा ने बात की और न ही उनके साथ आए कार्यकर्ताओं ने मिलना गवारा किया जबकि दंतेवाडा में हुए विरोध के बाद मेधा पाटकर ने कहा था कि वे विरोध करने वालों से बात करने के इच्छुक थीं| मेधा के साथी यह जरूर कहते रहे कि उनका जो भी विरोध हो रहा है वह सब प्रायोजित है|

उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ में आपरेशन ग्रीन हंट की आड़ में आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने की साजिश रची जा रही है और देश को गृह युद्ध में धकेलने की तैयारी की जा रही है| उन्होंने पत्रकारों से कहा कि राज्य में आतंक का माहौल पैदा करके मानवाधिकार कार्यकार्ताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है| यह सब इस लिए किया जा रहा है ताकि खनिज खदानों के पट्टे निजी हाथों में सौंपे जा सकें |
उन्होंने बताया कि आगामी १६ जनवरी को इस बाबत एक नया आन्दोलन खडा करने दिल्ली में समस्त कार्यकर्ताओं और जागरूक लोगों की एक बैठक रखी गई है|

राज्य के पुलिस महानिदेशक विश्व रंजन ने अपनी प्रतिक्रया में कहा कि बड़े लोगों की सही या गलत टिप्पणी पर अपनी राय जाहिर नहीं करेंगे|

इस मुद्दे पर सृजन गाथा के सम्पादक जयप्रकाश रथ का कहना है कि मेधा पाटकर या वे सभी आदिवासियों को मूर्ख समझते हैं और उनके विरोध को प्रायोजित बताते हैं, चाहे वे नक्सलियों के विरोध में ही क्यो न हो । यह बस्तर के आदिवासियों के आक्रोश को सरलीकरण करके देखने की चाल है । वास्तविकता नहीं । और यही माओवादी भी चाहते हैं कि बस्तर के हर प्रतिरोध को सरकारी कहा जाये और माओवादियों द्वारा दमन, हत्या और अत्याचार को असरकारक । और उसे लोग आदिवासियों का ही प्रतिरोध कहते रहें, चाहे उसमें मारे जाने वाले लोग सिर्फ आदिवासी ही क्यों न हों । संवाद, संविधान, समाज पर विश्वास, माओवादी यह सब नहीं मानते । यह भी समाजसेवियों को जानना चाहिए । इसलिए उन्हें अब मानना ही होगा कि बातचीत नक्सली समस्या के समाधान का रास्ता नहीं । यह संवेदनात्मक होते हुए भी ऐतिहासिक भूल होगी और इसी भूल के लिए माओवाद, मार्क्सवाद, अतिवाद, रक्तक्रांति आदि पर विश्वास करनेवाले वातावरण बना रहे हैं । ऐसे मानवाधिकारवादी व्यवस्था के विरोध में ज़रूर हंगामा खड़ा करते हैं किन्तु हिंसक माओवाद की आलोचना से मुँह छुपाते हैं ।






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1 comments:

Amit 12 जनवरी 2010 को 6:08 am  

थू है मेघा पाटकर और इनके साथ के विदेशी पैसे पर पलने वाले मनावाधिकार वाले गिरोह पर

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