सवाल गणतंत्र में आस्था का है..

गुरुवार, 28 जनवरी 2010


रायपुर में प्रेस क्लब के एक निर्णय ने आजकल एक ऐसा विवाद पैदा कर दिया है मानो बर्र के छत्ते पर हाथ पड़ गया हो| मैं छत्तीसगढ़ में पिछले छह सालों से सतत हूँ और यहाँ घटनाक्रम जिस तरह से चल रहा था उसमे मेरा मानना है कि यह स्थिति आनी ही थी|हालात सचमुच कठिन होने की तरफ हैं| एक तरफ बस्तर और सरगुजा में पिछले 30-35 सालों से जंगली बेल-बूटों की तरह पसर गए तथाकथित माओवादी लड़ाके हैं जो बंदूकें हाथ में लिए बेधड़क घूमते हैं| उनका गनतंत्र देश के तंत्र के सामने लगातार चुनौती बन गया था| जाहिर है, कोई भी चुनी हुई सरकार अपने नागरिकों को इस तरह से अराजकता की लम्बी छूट नहीं दे सकती है और अब तो गृह मंत्री पी चिदंबरम के दौरे के बाद बस्तर में आपरेशन ग्रीनहंट का पार्ट-२ बहुत खतरनाक और महाआक्रामक तरीके से संचालित होने जा रहा है| इस मोड़ पर चीजें जिस दिशा में जाती हुई नजर आ रही थीं उनमे एक यह भी रहा कि जो लोग नक्सलियों की विचारधारा का समर्थन करते हैं, यह मानते हैं कि देश में सशस्त्र क्रान्ति के जरिये ही बदलाव संभव है और यह भी मानते हैं कि पुलिस और सरकारें सिर्फ और सिर्फ दमन ही कर रही हैं, उनको यह नागवार लग रहा है कि बस्तर को फ़ोर्स के हवाले क्यों कर दिया गया है|वे यह भी विलाप कर रहे हैं कि बस्तर में टाटा समेत दीगर पूंजीपतियों के लिए लाल कालीन बिछाने की खातिर यह सारी सरकारी कवायद हो रही है| इसी मौके पर पिछले दिनों मेधा पाटकर और उनके कुछ साथी बस्तर आए और उन्होंने रैली निकाली लेकिन उनके ऊपर सड़े हुए टमाटर और अंडे फेंके गए| रैली धरने में बदल गई और रायपुर आ कर मेधा के साथी बिफर पड़े| इससे पहले उनके साथ आए बुद्धिजीवी बस्तर में पत्रकारों से भी उलझे और आरोप लगाया कि वे सरकार से मिले हैं और पुलिस की दलाली कर रहे हैं| प्रेस क्लब रायपुर ने जो निर्णय लिया है वह इन सारी परिस्थितियों के मद्देनजर लिया गया लगता है|
अब शायद छत्तीसगढ़ में हालात यह बन चुके हैं कि यहाँ काम करने वाले मीडियाकर्मियों को अपनी प्रतिबद्धताओं को बिलकुल साफ़ करना होगा,और यह भी स्पष्ट करना होगा कि वे भारतीय संविधान के साथ हैं या उस बन्दूक तंत्र को मानते हैं जिसमे हर कसूर का जवाब सिर्फ गोली है| बोली नहीं गोली की भाषा में जो बात करते हों और अपने विरोधी को सिर्फ दुश्मन मानते हों| जो सिर्फ हरा ही हरा देखते हों और सावन के आने से पहले ही बावरे हो गए हों, वे किसी टापू पर तो राज कर सकते हैं लोकतंत्र में उनको सरकार इजाजत नहीं दे सकती| सरकार अगर गलत करती है तो जवाब भी लोकतंत्र मांग लेता है लेकिन गनतंत्र में कौन किसको जवाब देता है| वहाँ सिर्फ गोली चलती है|जो लोग शोषण के खात्मे का नाम लेकर एक हिंसक खूंरेजी शोषण का संगठन चला रहे हों, उनका साथ कोई भी सभ्य समाज नहीं दे सकता| यह देश शान्ति को पसंद करता है| पंजाब का उदाहरण सामने है| वहाँ आतंकवाद ने कम मुश्किलें पैदा नहीं की लेकिन अंततः जीत लोकतंत्र की ही हुई| आपको दिक्कत है तो कई रास्ते संविधान में हैं| संविधान में आस्था नहीं है तो महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश की परम्पराओं में है| संवाद में है|विरोध में है| प्रदर्शन में है| और यह भी नहीं कर सकते तो लड़िये चुनाव और बदलवाइए क़ानून,लाइए सर्वहारा का समाजवाद,कौन रोक सकता है लेकिन यह तो नितांत असभ्य और बर्बर है कि चंद लोग संगठित हो कर उस निरीह आदिवासी का सुख चैन और शान्ति छीन लें जो जंगल में पहले साहूकारों और शोषकों के चंगुल में फंसा था और अब उन लोगों की बंदूकों के आगे थरथरा रहा है जिनके रहनुमा होने का भरोसा था| अब बन्दूकधारी आदिवासियों को भी मारने से झिझक नहीं रहे| यह कौन सा माओवाद है? और कौन इस तरह की नेत्रहीन दिशाहीन आत्मघाती विचारधारा का समर्थन कर सकता है|
मुद्दा रायपुर प्रेस क्लब की नई बंदिशों का है| मेरा मानना है कि इस तरह की बंदिशों से चीजें और उलझेंगी|जिसे रायपुर में बात रखने का अवसर नहीं मिलेगा वह भिलाई प्रेस क्लब में जा कर प्रेसवार्ता ले लेगा|...और सबसे बड़ा सवाल है कि यह किस मापदंड से तय होगा कि कौन किसका समर्थक है| किसी की एंट्री बैन कर देना,विचार व्यक्त करने से रोकना या विरोधी के बयान को तवज्जो न देना समस्या का समाधान नहीं हो सकता है|किसी में एस्टीम है तो उसे रिलीज करने का मौक़ा मीडिया देता है और मेरा मानना है कि इस दौर में भी लोकतंत्र की समझ रखने वाले बहुत से वामपंथी बुद्धिजीवी भी माओवादी हिंसा की खुली खिलाफत कर चुके हैं| लेकिन मैं समझता हूँ,प्रेस क्लब ने अपनी पारदर्शिता और प्रतिबद्धता जाहिर करने के लिए यह कदम उठाया है| कोई मुझसे पूछे तो मैं भी अपनी प्रतिबद्धता संविधान के प्रति जाहिर करूंगा| रायपुर में नौकरी कर रहा हूँ तो भी और कश्मीर में करूंगा तो भी| फिलहाल तो एक आम राय है कि शान्ति लौटना ही चाहिए|विडंबना यह है कि सलवा जुडूम(बस्तर में चला शान्ति के लिए जन जुडाव अभियान)लहूलुहान हो चुका है पर बस्तर और सरगुजा में शान्ति आनी ही चाहिए| अमन-चैन आदिवासी का नैसर्गिक अधिकार है|

3 comments:

राजेश अग्रवाल 28 जनवरी 2010 को 7:38 am  

ये भिलाई बिलासपुर में बात करने वाले लोग नहीं हैं. रायपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी है. वहीं बात करेंगे तब नेशनल इंटरनेशनल मीडिया में छपेंगे. मेरा मानना है कि प्रेस क्लब को तय करने का अधिकार है कि किसे बैन किया जाए. क्या उसके आंख कान खुले नहीं है. नक्सलियों के ढ़ाल बनकर आने वाले सफेदपोशों की तरफ से आंख मूंद कर कैसे रहा जा सकता है.

श्याम कोरी 'उदय' 28 जनवरी 2010 को 9:09 am  

...अभिव्यक्ति प्रभावशाली है किन्तु पूर्णत: सारगर्भित प्रतीत नही जान पडती है, ....नक्सली, नक्सली समस्या और समस्या के कारण... तीनों मे विरोधाभाष स्पष्टत: झलक रहा है .... अब देखने वाली बात ये है कि इस विरोधाभाष को कितने लोग देख पा रहे हैं और कितने लोग समझ पा रहे हैं..... ये बात और है कि हर आदमी का अपना-अपना नजरिया है..... आलम ये भी है कि इस मुद्दे पर हर कोई "अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग" अलाप रहा है!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

Sanjeet Tripathi 28 जनवरी 2010 को 10:58 am  

bhai sahab, bat dar-asal us chashme ki hai jo aise logo ne pahne hue hai. ya kahein ki unki paribhashayein hi alag hai aur ek samanya aadmi ki paribhasha hi alag hai.

vaise aise logo ko manch naa dene ka nirnay ek tarah se to sahi hai, kyonki manch na mile to aise logo ka yah vidhwa pralap apne aap dabta chalaa jayega....

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