खुश रहना मेरे यार...

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010


छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड में पिछले कई वर्षों से जंगलों में उत्पात के लिए कुख्यात हो चुके हाथियों को लेकर अच्छी खबर आई है| केंद्र सरकार ने इसी महीने एक समिति का गठन किया है जो प्रोजेक्ट टाईगर की तर्ज पर प्रोजेक्ट एलीफेंट को कार्यान्वित करने पर एक रिपोर्ट देगी|इस समिति में ऐसे लोग रखे गए हैं जो वन्यजीव-जंतुओं के मामले में जानकार हैं और पर्यावरण के विनाश के कारणों पर लगातार चिंता करते रहे हैं|

इस तरह की खबर जब भी आती है कि धरमजयगढ़ या रायगढ़ के कुछ इलाकों में हाथियों ने जम कर उत्पात मचाया है तो मेरी तरह और भी कई लोग इस समस्या की तह में जाने की कोशिश करते हैं| कोशिश में पता चलता है कि हाथियों के भड़कने के सटीक कारण हैं| जंगल काटे जा रहे हैं और उनका विचरण -चारा क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है| एक पूरा कारीडोर है जिसमे हाथी लगातार आते-जाते रहते हैं| यह कारीडोर झारखंड से शुरू होता और उड़ीसा मेंविलीन होता है| हाथी इस अंचल में शायद हजारों वर्षों से हैं| उनके उत्पात के शिकार वे ग्रामीण बनते हैं जो इस कारीडोर के आसपास बसे हैं| हाथी उनकी बस्तियों में जा घुसते हैं और झोपड़ियां उजाड़ कर सारा सामान जमींदोज कर देते हैं| दुखद यह भी है कि वे लोगों को अपनी सूंड से उठा कर जमीन पर पटक देते हैं| सैकड़ों लोग हाथियों के कोप के चलते मारे गए हैं| मारे जा रहे हैं| लोगों में गहरा रोष है और इस इलाके में हाथियों को भगाने के लिए जो उपाय किये जाते हैं उससे हाथी और भड़कते हैं| शोरगुल, पटाखे फोड़ना या उन पर हथियारों से हमला करना और भीड़ के साथ उनको उकसाना इत्यादि सारे उपाय एक ऐसी स्थिति को जन्म दे रहे है जिसमे वर्गभेद और पलटवार के रक्तरंजित प्रतिशोध में हाथी समाज को इंसानों के प्रति क्रुद्ध है| हाथी अब इंसान को देखते ही भड़कते हैं और सबसे पहले हमला कर देते हैं| समस्या बेहद गंभीर हो चुकी है| इसमें वन महकमा सिर्फ मारे गए लोगों के निमित्त मुआवजा देने और नुकसान की भरपाई में ही हर साल लाखों रूपये खर्च कर रहा है|मरने वाले इंसानों के संख्या भी हजारों में पंहुच गयी है|
सबसे पहले तो यह देखने वाली बात है कि हाथी कहाँ हमले कर रहे हैं? वे जंगल में हमले कर रहे हैं| जंगल में उनका नैसर्गिक अधिकार है और इंसान ने उसके अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण किया है जिसके जवाब में हाथी अब इंसानी बस्तियों पर हमले कर रहे हैं| जो जंगल का क़ानून समझते हैं वे जानते हैं कि अगर भालू ने शेर पर हमला किया तो सारे शेर भालुओं के दुश्मन माने जाते हैं| इसी तरह किसी भी जानवर ने अपनी नैसर्गिक परम्परा तोड़ कर किसी दूसरे जानवर को निशाना बनाया तो उसका पूरा समाज निशाने पर रहता है| यह बात इंसानी समाज पर भी लागू हो रही है| हाथी मनुष्य को अपना दुश्मन समझ बैठे हैं तो इसके कारणों पर गौर करके उपाय ढूंढे जाने चाहियें| न कि हाथियों को मार दिया जाना चाहिए जैसा कि हो रहा है| इससे जंगल में इंसान का जीना मुश्किल हो जाएगा| वैसे भी हम जंगलों को उजाड़ कर कंक्रीट का जंगल बना रहे है जिसमे हम तो एक नए विनाशकारी दौर में मन मसोस कर रह रहे हैं लेकिन शायद.. हाथी नहीं रह सकते| कोई भी वन्यजीव नही रह सकता| शहरों में पालतू और आवारा कुत्ते रहते हैं मगर सड़क पर किसी कुत्ते पर गाडी चढ़ा दी जाए तो सारे कुत्ते हरेक वाहन के पीछे भूंकते हुए दौड़ते हैं| आजकल पर्यावरण से गिद्धों के और कौओं के गायब होने की चिंता जताई जाती है| हाथियों को लेकर भी हालात बेहद गंभीर है| देश भर में कुल २६ अभ्यारण्यों में महज २५-२६ हजार हाथी रह गए हैं और इनमे छत्तीसगढ़ कारीडोर में महज ५-६ हजार हाथी रह गए हैं| हम एक तरफ देश भर में गणेशोत्सव में हाथी के प्रतिरूप गणपति बप्पा की पूजा करते हैं| दूसरी तरफ उनको उनके कीमती दांतों के लिए संसारचंद जैसे तस्करों के हाथों मार दिया जाता है|
मैं अक्सर जब भी 'हाथी मेरे साथी' का गाना सुनता हूँ तो हालात पर सोचने के लिए विवश हो जाता हूँ -

....नफरत की दुनिया को छोड़ के, प्यार की दुनिया में,
खुश रहना मेरे यार...

जब जानवर कोई इंसान को मारे..
कहते हैं दुनिया में वहशी उसे सारे..
इक जानवर की जान आज इंसानों ने ली है ..चुप क्यूं है संसार ...
खुश रहना मेरे यार...

5 comments:

Udan Tashtari 25 फ़रवरी 2010 को 5:22 pm  

प्रोजेक्ट एलिफेन्ट का इन्तजार करते हैं.

श्याम कोरी 'उदय' 25 फ़रवरी 2010 को 6:39 pm  

...इस दिशा में निश्चित ही सार्थक प्रयास होने चाहिये अन्यथा जिस तरह हम "डायनासोर के अवशेष" ढूंढ रहे हैं उसी तरह भविष्य में लोग "हाथी के अवशेष" ढूंढने में मशगूल रहें !!!

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 28 फ़रवरी 2010 को 10:03 am  

रमेश भैया आपको होली की हार्दिक शुभकामनाये.

श्याम कोरी 'उदय' 28 फ़रवरी 2010 को 7:06 pm  

...होली की लख-लख बधाईंया व शुभकामनाएं !!

शरद कोकास 2 मार्च 2010 को 7:30 pm  

बहुत स्वाभाविक चिंता है यह लेकिन हाथी दाँत को इतना महिमामंडित किया गया है कि उसका प्रभाव इतनी जल्दी खत्म हो जायेगा ऐसा नही प्रतीत होता इसके लिये विशेष अभियान की ज़रूरत है ।

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