याद- ए- साहिब सिंह

बुधवार, 17 मार्च 2010


विगत 15 मार्च को दिल्ली में भूतपूर्व मुख्यमंत्री डा. साहिब सिंह की याद में लोग जुटे और उनका 66वां जन्म-दिन मनाया गया जिसमे हजारों लोगों ने उनको श्रद्धा सुमन अर्पित किये| इस खबर के साथ जेहन में कई यादों के भावुक पल उभर गए| मैं सौभाग्यशाली रहा हूँ कि स्वर्गीय साहिब सिंह को मैंने नजदीक से जाना | उनसे मुलाक़ात दिल्ली में ही हुई थी जब 1995 -98 के दौर में वे मुख्यमंत्री थे और संयोग से सरकार की बीट मेरे पास थी| रोजाना दिल्ली सरकार के मुख्यालय में जाना होता था जो आजकल आई टी ओ पर है मगर तब शामनाथ मार्ग पर विधान-सभा परिसर में हुआ करता था| पंजाब केसरी के पत्रकार स्वर्गीय उमेश लखनपाल सारे पत्रकारों को एक प्रकार से लीड करते थे और उनके चुटीले सवालों के साथ प्रेस वार्ताओं में तो साहिब सिंह को जम कर घेरा जाता था| ये प्रेस वार्ताएं दिलचस्प मुकाम पर पंहुचती थी|जानदार सवाल शानदार जवाब, एक दिन साहिब सिंहजी से पूछ लिया गया कि बताइये महंगाई इतनी है कि लोग सब्जी तक नहीं खरीद पा रहे हैं| उन्होंने आंकड़े पेश करने शुरू कर दिए | चटाक से सवाल पूछ लिया गया ..जनाब आपको मालूम है कि मार्केट में लौकी और टमाटर के क्या भाव हैं? साहिब ने तपाक से रेट बता दिए| यह अप्रत्याशित था| कोई मुख्यमंत्री टमाटर और लौकी के ताजा रेट तभी बता सकता है जब उसे वाकई में जानकारी हो|
साहिब सिंह गाँव से जुड़े हुए नेता थे| वे लाईब्रेरियन के पद पर काम करते हुए ऊपर उठे और राजनीति में गाँव की मिट्टी की खुशबू बिखेरते रहते थे| वे धोती पहनते,आम आदमी के नजदीक आ कर बात करते और उनका घर हमेशा ग्रामीणों से भरा रहता था| सफारी संस्कृति के दौर में भी वे खादी और सादगी के उदाहरण थे| उन्होंने तुगलक रोड स्थित अपने आवास में तब एक झोपडी बनाई थी और ढिबरी जला कर उसमे सोते थे|

एक दिन पत्रकार वार्ता के बाद जलपान के समय सबने देखा.. टेबिलों पर टोकरियों में पके हुए आम रखे हैं| ताजे रसीले आम| साहिब ने एक-एक पत्रकार के पास आ कर उनसे आम खाने का आग्रह किया और जब सबने आम खा लिए तो दूध भी आ गया | ...कुल्हड़ में दूध| यह तब की बात है जब लालू यादव ने रेलों में कुल्हड़ को इंट्रोड्यूस नहीं किया था| साहिब के आग्रह पर आम खा कर पत्रकारों ने दूध पिया| साहिब बताने लगे दूध इसलिए ताकि आम पच जाए| आम तौर पर ठंडा पीने वाले कुछ भाईयों और उनकी कुछ बहनों को यह बात हजम नहीं हुई| मगर साहिब साहिब थे| जो जंचता वही कहते, वही करते| यह तब की बात है जब बाबा रामदेव अवतरित नहीं हुए थे, ठंडा मतलब जहर सुनीता नारायण के द्वारा उजागर नहीं हुआ था और शीतल पेय की बोतलें पार्टियों की शान हुआ करती थी|
साहिब सिंह जब तक सीएम् रहे खुराना जी से उनकी ठनी रही| बाद में दोनों में सुलह हो गई| गुजरते 1998 में एक शाम साहिब को बताया गया कि उनकी जगह सुषमा स्वराज को सीएम् बनाया जा रहा है| साहिब के लिए यह सदमे की बात थी| वे पार्टी से बंधे थे| पद छोड़ दिया और अगले दिन डी टी सी बस में बैठ कर अपने घर गए| उस दिन खूब हंगामा मचा और मुझे याद है उनके इर्दगिर्द सब दुखी तो थे साहिब के कुत्ते ने भी दो दिनों तक खाना नहीं खाया| वो दिन और आज का दिन... दिल्ली में भाजपा कभी सत्ता में दुबारा नहीं लौट सकी| चुनाव में पार्टी को सिर्फ 14 सीटें मिली| चार महीने में सुषमा भी कुछ करने की स्थिति में नहीं थीं| बताते हैं हठात बदलाव का यह प्रयोग स्वर्गीय प्रमोद महाजन की दिलचस्पी पर किया गया था| वे सुषमा को केंद्र से हटाना चाहते थे, ऐसी अफवाह थी| इसमें शिकार हुए साहिब| जबकि साहिब के रहते यह आम आकलन था कि 25 -30 सीटें आएंगी| उसी साल चुनाव हुए और भाजपा विपक्ष में आ गयी जबकि साहिब रहते तो सीटें जरूर कम होती मगर सरकार दुबारा बनाने के पूरे आसार थे| अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारने और शायद साहिब को हटाने का शाप भाजपा आज तक दिल्ली में भुगत रही है|
2003 में साहिब बतौर श्रम मंत्री रायपुर आए| खुश हो कर मिले| श्रम विभाग के दफ्तर में लान में बैठ गए और समस्त स्टाफ से मिले| वे नेता कैसे थे इस पर पक्ष-विपक्ष में राय हो सकती है या बतौर मंत्री उनके काम में नुक्स निकल सकते हैं और इस पर मिले-जुले विचार भी हो सकते हैं मगर एक इंसान के रूप में वे साफगोई पसंद और हरदिल अजीज थे और यही चीज किसी के साथ रहती है और साथ जाती है| विनम्र श्रद्धांजलि...|

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