और अब नहीं तो कब...?

बुधवार, 7 अप्रैल 2010


फिर वही बस्तर.. वही दंतेवाडा और फिर वही घात लगाकर हमले में कल 76 जवानों की नृशंस ह्त्या ... यह ख़बरें मीडिया में गूँज रही हैं और अहम् सवाल है कि जंगली दरिंदों की मक्कार और वहशियाना हरकतों के शिकार कब तक वे बेक़सूर जवान बनते रहेंगे जो शान्ति लाने के लिए जंगल में तैनात किये गए थे मगर धोखे में रख कर मार दिए गए| हैरानी होती है जब इस तरह की जघन्य हरकतों को किसी "वाद" का नाम दे कर यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि यह जायज है जबकि यह हरकत हर तरफ धिक्कारी जा रही है| जो जवान मारे गए हैं वे भी आम घरों से थे और सिर्फ फर्ज निभाने के लिए जंगल में गए थे| नहीं जाते तो ड्यूटी से जाते और गए तो उन लोगों के हाथों मारे गए जो समता, समानता शोषण का खात्मा के दावे करते हैं और जाने किस खूनी विचारधारा में अंधे हो कर अपनों का ही खून बहा रहे हैं| यह बस्तर की संस्कृति तो कतई नहीं है|
नक्सलियों ने फिर साबित किया क रणनीति बनाने और अपनी ख़ास शैली में झांसा दे कर मारने की उनकी दरिन्दगी से निपटने के लिए पुलिस और सुरक्षा बालों को छापामार लड़ाई में पारंगत होना ही पडेगा| नक्सलियों ने सी आर पी एफ के 76 जवान तब हालाक कर दिए जब सारे थके-मांदे जवान दंतेवाडा जिले में आंध्र प्रदेश से सटे कोंटा क्षेत्र के चिंतलनार जंगल की तीन दिवसीय गश्त कर के लौट रहे थे| तीन तरफ से पहाड़ियों और जंगली झुरमुटों के की आड़ में लगभग 1000 नक्सलियों ने जवानों को तीन तरफ से घेर लिया और बारूदी सुरंग लगा कर वाहनों के परखचे उड़ा दिए|

नक्सलियों ने अपनी पुरानी "एम्बुश" लगा कर घातक वार करने की परिपाटी के तहत इस वारदात को अंजाम दिया|
जगदलपुर के अस्पताल में दाखिल सी आर पी एफ के जवान प्रेम कुमार के मुताबिक़ उनकी पूरी कंपनी को नक्सलियों ने उड़ा दिया| वह संयोग से ज़िंदा बच गया| इस तरह की घटना में चूक के बिन्दु तलाशने वाले बता रहे हैं कि सुबह जब सारे जवान जब गश्त पर थे तब उनके साथ अमूमन साथ चलने वाली एस पी ओ (विशेष पुलिस अधिकारी )की टीम नदारद थी| एस पी ओ वे आदिवासी बनाए जाते हैं जो नक्सलियों से छिटके हुए होते हैं और इलाके के जानकार होते हैं| अमूमन छत्तीसगढ़ पुलिस जब किसी ऐसे अभियान पर निकलती है तो एक घेरा बनाया जाता है जिसमे आगे एस पी ओ के जवान होते हैं और वे एक किलोमीटर आगे रहते हैं| एस पी ओ आदिवासी जंगल के सारे ठिकानों से वाकिफ होते हैं| बताते हैं कि जो बटालियन हलाक हुई है उसमे एस पी ओ का कोई दस्ता आगे नहीं था| सारे जवान दो दिन से आपरेशन ग्रीन हंट के तहत कोंटा इलाके के सारे जंगल की गश्त करके बेस कैम्प लौट रहे थे| रास्ते में घने जंगली और ऊंची नीची पहाड़ियों के साए में चारों तरफ से फायरिंग होनी शुरू हो गयी| खबर के मुताबिक करीब एक हजार नक्सली पेड़ों की आड़ में थे और सुरक्षा दस्ते के वाहन प्रेशर माइंस व बारूदी सुरंग की चपेट में आ गए थे|नक्सलियों ने अपनी पुरानी रणनीत के तहत ताबड़तोड़ हमले किये औए सुरक्षा बल के जवानों को सम्हालने का अवसर भी नहीं दिया| यह नक्सलियों की पुरानी नीति रही है| वे बड़े हमले छुट्टी के दिनों के आसपास या लौटते हुए दस्तों पर करते हैं| हमले का वक्त शायद इस लिए चुना गया क्यों कि इतनी सुबह कोई भी अलसाया ही रहता है और मनोवैज्ञानिक तौर तरीकों से वाकिफ नक्सली जानते होंगे कि लौटते हुए जवान शायद इस खुशफहमी में भी रहे होंगे कि जाते हुए रास्ता साफ़ था तो आते हुए क्या होगा...लेकिन इस तरह की चूक का ही नक्सली फायदा उठाते रहे हैं|
हमले की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि इतनी बड़ी संख्या में नक्सली एकत्र रहे थे तो उनके मूवमेंट की सूचना इंटेलीजेंस को क्यों नहीं मिल पाई?
कुछ आला अफसर इस बात पर एतराज कर रहे हैं कि सुरक्षा के साफ़ निर्देशों में कहा गया है कि कच्ची सड़कों पर वाहन की बजाय पैदल गश्त से ही बारूदी सुरंगों से बचाव हो सकता है| इस नियम का पालन किया जाता तो कई जानें बच सकती थी| अमूमन ऐसी घटनाओं में इस नियम की अनदेखी ही घातक साबित होती रही है| नक्सलियों ने झांसा दे कर पहले सुरक्षा दस्तों को निश्चिन्त किया और फिर लौटते हुए उन पर हमला कर दिया| यह तरीका 12 जुलाई 2009 को भी राजनांदगाँव में अमल में लाया गया था| जब एक एसपी समेत 30 जवान झांसे में ला कर मार दिए गए थे| जानकारों की राय में झांसा दे कर मारना नक्सलियों के तौर तरीकों का अहम् हिस्सा है जिसे अमूमन डिस्ट्रिक्ट फ़ोर्स के पुलिसकर्मी समझ जाते है और उनको एस पी ओ की भी मदद मिलती है लेकिन सी आर पी एफ के जवान एक तो जंगल के भूगोल से नावाकिफ होते हैं और सीधी लड़ाई में ही भारी पड़ते हैं मगर छुप कर किये गए वार में उनको जान गवानी पड़ती है|यह महकमे के लिए संकेत है कि जंगल के सापों से लड़ना है तो जंगली तौर तरीके अपनाने ही पड़ेंगे |और अब नहीं तो कब...?

8 comments:

Jandunia 7 अप्रैल 2010 को 7:56 am  

सरकार सोई हुई है, सरकार को जागना होगा। इंतजार कीजिए कि कब सरकार जागती है।

मिहिरभोज 7 अप्रैल 2010 को 8:10 am  

आज ये घटना हुई तो सब जोर जोर से रोने मैं लग रहे हैं....कितने ब्लोग हैं जो नक्सलियों के लिए लिखते हैं....और कितनी बार आपने उन पर जाकर उन्हें रोकने की कोशिश की आपने...

RAJNISH PARIHAR 7 अप्रैल 2010 को 9:10 am  

और सरकार अभी भी कह रही की सेना का सहयोग नहीं लिया जायेगा तो कब लोगे जब...बाज़ी हाथ से निकल जाएगी?एक जवान की कीमत का शायद अंदाज़ा नहीं है तभी तो...

jay 7 अप्रैल 2010 को 9:32 am  

"जंगल के सापों से लड़ना है तो जंगली तौर तरीके अपनाने ही पड़ेंगे" बिल्कुल सही निष्कर्ष....जैसा कि कांकेर के जगल वारफेयर कॉलेज का मूलमंत्र है....fight gurrilla like a gurrilla .....शत-प्रतिशत सहमत.
पंकज झा.

Sanjeet Tripathi 7 अप्रैल 2010 को 1:13 pm  

sehmat hu lekin mihirbhoj jee ke sawal ka javab bhi chahta hu...

ek channel hai chhattisgarh me jo aksar naxaliyo ke bich jakar unki report dikhata hai, naam batane se pahle hi aap jante hain. kabhi us channel ke journalist ya oher staff ne hinsa rokne ki baat kahi hai unse?

श्याम कोरी 'उदय' 7 अप्रैल 2010 को 6:28 pm  

...शहीदों को नमन ... श्रद्धांजलि ...!!!!

Anil Pusadkar 8 अप्रैल 2010 को 6:34 am  

तकलीफ़ ये है कि करने वाले न कुछ करते है और ना ही सोचते हैं,और जो सोच रहे हैं या कुछ करना चाह्ते हैं उन्हे कोई पूछ्ता भी नही है,जैसे हमको-आपको.आपकी सलाह सौ प्रतिशत सही है.

Ramesh Sharma 14 अगस्त 2010 को 2:59 am  

मिहिरभोज साहब ! मैं किसी को लिखने से नहीं रोक सकता आप ही रोक लीजिए जनाब और संविधान की किस धारा के तहत रोकेंगे यह भी बता दीजिए| कोई नक्सली समर्थक कुछ लिख रहा है तो इसमें क्या बुराई है? बुराई हत्याओं और दहशत फैलाने में है| लिख कर ही तो संवाद संभव है | संवाद की डोर टूटनी नहीं चाहिए|

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