हो गयी है पीर पर्वत

बुधवार, 19 मई 2010


दंतेवाडा में यात्री बस को विस्फोट के जरिये उड़ा कर नक्सलियों ने अपनी क्रूरता का एक नया इतिहास लिख दिया है और अब यह मान लेना चाहिए कि इस मूमेंट की कोई विचारधारा नहीं रह गयी है| इसे धिक्कारधारा ही कहा जाएगा| यह जो भी हो रहा है वह शुद्ध रूप से चंद आत्ममुग्ध लोगों की हताशा और तिलमिलाहट का फलितार्थ ही है|यह तिलमिलाहट क्यों?

अब तो हालत इतने विदग्ध हो चुके हैं की उनको नक्सली लिखने से भी गुरेज होगा क्योंकि यह अगर नक्सलवाद है तो वे लोग कौन थे जो 1960 के दशक में जल,जंगल और जमीन की रक्षा के दावों के साथ बस्तर की सरजमीं पर उतरे थे और जन क्रान्ति के उनके गीत समता और ममता से लबरेज हुआ करते थे| बदलाव के सपने दिखाने वाले लोग भटके तो ऐसे भटके कि अब उस जंगल से निकलने की कोई सूरत नजर नहीं आती जो दावानल बन कर जल रहा है| उनके पूरे आन्दोलन के केंद्र में कोई था तो आदिवासी ही था| दुःख और शर्म की बात है कि ..वो आदिवासी ही निशाना बन गया| यह कौन सा वाद है कि जिसकी रक्षा का दम भरो उसी को धमाके से उड़ा दो| बन्दूक और बारूद की भाषा में संवाद करने वाली जमात अगर बेगुनाह और निहत्थे में भी फर्क करना नहीं जानती है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि अति का सदैव अंत होता है| अति सर्वत्र वर्जयेत| पांच हजार साल पहले वेद और पुराण लिखे गए थे तब उनमे यह पंक्तियाँ रची गयी थी| तब नक्सली नहीं थे मगर ताजा उदाहरण पंजाब का है जहां दर्द हद से गुजर गया तो लोगों ने खुद ही दवा कर दी| दंतेवाडा की घटना में जो जैन युगल मारा गया है वो शादी से लौट रहा था| पुलिस वाले उनकी बस में चढ़ गए थे| बस में चढाने वाले ड्राईवर और कंडक्टर भी नहीं बचे| यह कृत्य करके नक्सलियों ने अपना जनाधार बारूद के ढेर में फूंक दिया है और उनको जन अदालत में खुद अपने इस गुनाह के लिए आदिवासियों से सजा मांगनी चाहिए| पर ऐसा करने के लिए पश्चाताप जैसी कोई भावना होनी चाहिए| यह महसूस किया जा रहा है कि बस्तर में आपरेशन ग्रीन हंट को लेकर ही सरकार में कई तरह के विरोधाभास हैं|केंद्र सरकार का एक हिस्सा मानने को तैयार नहीं है कि ऐसा कोई आपरेशन चल रहा है| तो बस्तर में क्या चल रहा है? सुपरकॉप कहे जाने वाले जाने माने पूर्व पुलिस अधिकारी के पी एस गिल की राय में गृह मंत्रालय और अन्य एजेंसियां अभी तक यह तय नहीं कर पाई हैं कि नक्सलियों से कैसे लड़ा जाए|
अब तो यह सूरत बदलनी ही चाहिए| हिंसा का ज्वार समाप्त होना चाहिए और इसका अंतिमतः समाधान बातचीत ही है|गोली का जवाब गोली नहीं बोली ही है|बस्तर में अशांति का यह दौर ख़त्म होना चाहिये और दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियाँ सामयिक हैं कि
हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नही
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

3 comments:

दिलीप 19 मई 2010 को 7:10 am  

sahi kaha koi bhi vaad ho jab nirdosh maare jaayenge to har vaad ki waat laga di jaayegi...

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 19 मई 2010 को 8:35 am  

रमेश भईया आपका सोंचना सही है, अभी कुछ दिन पहले ही देशबंधु के संपादक सुरजन जी नें अपने विशेष संपादकीय में इस संबंध में लिखा था, उन्‍होंनें क्षेत्र के और देश के कुछ लोगों का नाम भी सुझावस्‍वरूप दिया था कि बात इनके द्वारा शुरू की जानी चाहिए. मानवाधिकारवादियों और अन्‍य लोगों से भी चर्चा करनी चाहिए. क्‍योंकि हम सब की दिली ख्‍वाहिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

sunil kumar 25 मई 2010 को 5:13 am  

Ho gai pir parvat... ke liye badhai.Padh kar laga ki chalo koi to aadiwasiyon ke bare me etna positive sochta hai, Unke dukh-dard ko samajhta hai. Bhaiya, Itihas gawah hai, Har aati ka aant huaa hai aur aap dekh lena naxalwad ka bhi aant ek din nischit hai. Ek Dehati kahawat hai ki jab Diya(Deep) bujhna hota hai to o bujhne ke pahle tej bhabhakne lagta hai. Aaaj yahi hal naxalwad ka ho gaya hai....

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