देविका रोटवान का कसूर क्या है

गुरुवार, 24 जून 2010


मुंबई के बांद्रा स्थित एक प्राइवेट स्कूल ने अच्छी शिक्षा के नाम पर कायरता का इंजेक्शन दिए जाने की हकीकत उजागर कर दी है| बीते साल 2008 में हुए आतंकवादी हमलों की गवाह छात्रा देविका रोटवान को स्कूल में एडमिशन नहीं दिए जाने के बाद स्कूल प्रबंधन ने सफाई में जो तर्क पेश किये हैं उससे शिक्षा संस्थानों की कलई खुल गयी है| स्कूल ने पहले देविका को साफ़ मना कर दिया था और अब कुतर्क पेश किये जा रहे हैं| स्कूल कह रहा है एडमिशन नहीं देने का का उसका इस घटना के गवाह होने से कोई लेना-देना नहीं है। स्कूल की राय में देविका इंग्लिश में "फ्लूअंट" नहीं है और इसी वजह से उसे एडमिशन नहीं मिला। ख़बरों पर भरोसा किया जाए तो न्यू इंग्लिश हाई स्कूल की संचालक संस्था इंडियन एजुकेशन सोसायटी के सचिव अमोल धामधेरे ने कहा कि देविका अंग्रेजी नहीं जानती है। उसने अब तक घर में ही शिक्षा प्राप्त की है। जब वह हमारे स्कूल में एडमिशन लेने आई तो उसे अंग्रेजी का ज्ञान नहीं था। जबकि देविका के पिता ने आरोप लगाया था कि मेरी बेटी को स्कूल में सिर्फ इसलिए एडमिशन नहीं दिया गया कि वह मुंबई हमलों के मामले की गवाह थी और स्कूल को डर था कि इस वजह से स्कूल पर आतंकवादी हमला हो सकता है। 11 साल की देविका ने अदालत में अजमल आमिर कसाब की पहचान छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन पर गोलियां बरसाने वाले शख्स के रूप में की थी। बाद में कसाब को इसी आधार पर फांसी की सजा सुनाई गई।
यह घटना क्या यह नहीं बताती है कि इस देश में अब हालात इतने बदल चुके हैं कि बच्चों को साहस, वीरता,शौर्य और सच्चाई की सीख देने का कोई मतलब नहीं है| स्कूल अब बाबू और एरिस्टोक्रेट या टेक्नोक्रेट तो पैदा कर सकते हैं मगर उनमे खुद में इतना आत्मबल नहीं है कि वे ऐसी देविकाओं को प्रोत्साहित कर सकें| होना यह चाहिए था कि स्कूल खुद आगे बढ़ कर उस साहसी लडकी को निशुल्क शिक्षा देता मगर उसे तो दो टूक कहके चलता कर दिया गया| देविका को अगर अंगरेजी नहीं आती तो भी उसने कई अंगरेजी जानने वालों से बेहतर कर दिखाया है और अगर प्रोत्साहन मिला तो आगे भी कर दिखाएगी मगर ऐसे स्कूल को क्या कहा जाए? अब ज़रा स्कूल को यह सर्वे भी कर लेना चाहिए कि इस खबर ने वहां पढने वाले बच्चों और बच्चियों पर क्या असर डाला होगा| ऐसा लगता है कि हमारे शिक्षा के कर्णधारों को अब नहीं चाहिए झांसी की रानी लक्ष्मी बाई...और भगत सिंह पैदा तो हो मगर अपने यहाँ नहीं पड़ोसी के यहाँ पैदा हो| इस मामले में मुम्बई की सरकार को भी पहल करनी चाहिए और देविका को भी पढने और बढ़ने का अवसर मिलना ही चाहिए|
जो कानूनविद यह सोच रहे हों कि देविका सिर्फ एक गवाह है और गवाह के क्या कानूनी अधिकार हो सकते हैं मगर यह भी देखा जाना चाहिए कि उसकी गवाही पर अदालत ने भी फैसले की मुहर लगाई है| समझ में नहीं आता कि बाढ़ आने पर मुम्बईकर सराहनीय साहस दिखा कर सामाजिकता का सार्थक सन्देश दे देते हैं मगर देविका के इस भविष्य निर्माण की घड़ी में कोई ऐसी सार्थक आवाज नहीं सुनाई पड़ रही है जिससे उसे संबल मिल सके और जब वह बड़ी हो तो अपने देश पर गर्व कर सके| फिलहाल तो वह अनिश्चितता के चौराहे पर है और शर्मनाक तो यह है कि जिसे मुम्बई को तबाह करने की सुपारी मिली थी वह बिरयानी उड़ाता आया है और उस पर जितना व्यय हो चुका है उससे कई देविकाओं को उच्च शिक्षा मिल सकती है|

2 comments:

लोकेश Lokesh 24 जून 2010 को 8:36 am  

शर्मनाक है स्कूल का रवैया। बदलते समय का द्योतक भी है यह मामला।

उस समय अदालत में बेशर्मी से मुस्कराने और पेशी पर लाने के दौरान पुलिसकर्मियों का मजाक उड़ाने वाला कसाब, देविका को देख पहली बार शर्मसार हुआ था, तब उसने कहा था ‘जज साहब मुझे फांसी दे दो’

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 24 जून 2010 को 2:04 pm  

सहमत

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