सेना क्यों ना...

गुरुवार, 8 जुलाई 2010


मेरे ही एक साथी ने दिल्ली से अपनी टिप्पणी में छत्तीसगढ़ के प्रति स्वाभाविक जुडाव और यहाँ की चिर शान्ति पर लगे नक्सली ग्रहण को लेकर एक सवाल पूछा है कि क्या दंतेवाडा, बीजापुर और नारायणपुर में बद से बदतर होते हालात का उपाय सेना की तैनाती ही है| सवाल जरूर मेरे से है मगर ना तो सेना की तैनाती मेरे या आपके हाथ है और न ही सेना आ गयी तो उसकी विदाई हमारे आपके हाथ होगी| हम और आप सिर्फ चर्चा कर सकते हैं और हद से हद विश्लेषण कर सकते हैं| अगर मेरी राय पूछी जाए तो मैं भी ना ही कहूंगा मगर मेरा मानना है कि हालात से सख्ती से ही निपटना होगा वरना जिनको खबर नहीं है वे जान लें कि यह आग अब बिलासपुर के गांवों में भी फ़ैल रही है और रायपुर दूर नहीं है|
हाथ में बन्दूक हो और सामने संदूक हो तो कोई भी टटपूंजिया उठाईगीरा भी नक्सली बन जाने के लिए तैयार हो जाएगा| सुदूर गांवों में क्या हो रहा है? ज्यादातर लड़के गैंग बना कर लूटपाट कर रहे हैं| चिट्ठियां भेज कर वसूली कर रहे हैं| नाम माओत्से तुंग और कानू सान्याल का हो रहा है| कौन नक्सली और कैसा नक्सलवाद ? यह माजरा कुछ और है| आसानी से नेट पर उपलब्ध उन चेहरों को देखिए वे आपके हमारे बीच के ही लड़के-लडकियां हैं| रास्ता गलत चुन लिया है| बढ़ चले हैं मौत की मंजिल की तरफ| एक अपराधी जब कईयों को जोड़ लेता है तो दाऊद इब्राहिम बन जाता है और फिर सुनियोजित तरीके से सारा काम चलता है| नक्सली कर तो अपराध ही रहे हैं मगर उनकी जो घुट्टी है वो यह मानने नहीं देती कि यह अपराध है, गलत है| वास्तव में पीछे जाएं तो जंगल के लोगों की एक पीढी ने वर्षों तक जो उत्पीडन और वर्गभेद सहा है, अब नई पीढी उस सबका प्रतिकार चाहती दीखती है| अब दब कर, सिसक कर और घुट कर जीने वाले लोग बहुत कम हैं | ऐसा लगता है कि गाँव में सामंतवाद के बाद नक्सलवाद को ही आना था| गांवों में भी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की चेतना आई है और स्थानीयता (क्षेत्रीयता) का हिंसक आग्रह बढ़ा है जिसके संगठित उपाय होने लगे हैं| एक पूरे बैल्ट में लाल ही लाल क्यों दिख रहा है? जिनको हम माओवादी कहते आए हैं वे भी अब वामपंथ की कई खूंटियों से टंगे हैं और इस नई बेलगाम खूंरेजी धारा से भौचक हैं| एक धडा कहता है कि ट्रेन को उड़ाना गलत है दूसरा इसे जायज ठहराता है| नक्सलियों ने शुरुआत उन मुद्दों से की जो लोगों को आकर्षित करते थे| लगता था क्रांति पास ही है मगर क्रान्ति दूर रही शान्ति भी चली गई| कोई देवता का नाम लेकर दानव जैसा काम करे तो वह गलत ही साबित होगा| और फिर बन्दूक उठाए फौरी समाधान तो किया जा सकता है लेकिन बन्दूक से चली गोली कई समस्याएँ खडी कर देती है| समस्या की जड़ बन्दूक ही है| पहले बंदूकें थमें| समस्या अब नासूर हो चुकी है और गृह सचिव कह रहे हैं तो कुछ आकलन है उनका कि नक्सलियों से निपटने में पांच से सात साल लगेंगे| दरअसल शुरुआत में ही इसे नियंत्रित किया जाना था| मुझे याद है कि छत्तीसगढ़ में आज से कोई पांच साल पहले जब स्थानीय स्तर पर नक्सली हत्याएं होती थी और यहाँ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह नक्सलवाद को राष्ट्रीय समस्या मानने के लिए कहते थे तो दिल्ली में एक लाइन की खबर भी नहीं बनती थी मगर अब जब पानी सिर से गुजर गया है तो सब नक्सली- नक्सली चीख रहे हैं| समाज के एक कमजोर और लगातार उपेक्षित हिस्से में उनकी सोच गहरे पैठ चुकी है और सेना के आने के बाद व्यापक संहार ही होगा जिससे समस्या उलझेगी| जम्मू कश्मीर का उदाहरण सामने है| नक्सलवाद के खात्मे के लिए नक्सलियों के दुश्मन नंबर एक महेंद्र करमा का मैंने कई साल पहले इंटरव्यू किया था तो उन्होंने शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म प्लानिंग की बात कही थी जो कि आज भी मौजूं लगती है| यह लगातार लिखा जा रहा है कि गांवों में शोषण, विकास, समरसता, स्थानीय जरूरतों को तवज्जो जैसे मसलों की पड़ताल में ही समाधान है| और इस देश में चूंकि प्रजातंत्र है लिहाजा उसे कुचलने वाली सारी ताकतों की पहचान किये बिना हम सिर्फ आईसबर्ग को सतह पर ही देखते रहेंगे|

7 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 8 जुलाई 2010 को 8:48 am  

बहुत सहीं लिखा है भाई साहब आपने. आपसे सहमत हैं.

धन्‍यवाद.

Jandunia 8 जुलाई 2010 को 10:23 am  

नक्सलवाद की समस्या कब खत्म होगी

ललित शर्मा 8 जुलाई 2010 को 5:52 pm  

इस देश में चूंकि प्रजातंत्र है लिहाजा उसे कुचलने वाली सारी ताकतों की पहचान किये बिना हम सिर्फ आईसबर्ग को सतह पर ही देखते रहेंगे|

प्रजातंत्र में फ़ैसले आम सहमति से लिए जाते हैं,
शायद तभी इस मामले पर सहमति बनती दिखाई नहीं दे रही है।

अच्छी पोस्ट
आभार

shikha varshney 9 जुलाई 2010 को 1:32 am  

ये नक्सलवाद न जाने कब खत्म होगा .

अहफ़ाज रशीद 9 जुलाई 2010 को 11:39 am  

करोड़ों रुपये गुप्त सैनिकों के नाम पर गुप्त रूप से खा गए , जब ये काम गुप्त रूप से भी नहीं हो पा रहा है , तो सेना - वेना की बात सोचो ही मत. बात फंड की है और कुछ नहीं.

ललित शर्मा 9 जुलाई 2010 को 6:10 pm  

उम्दा पोस्ट

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सूर्यकान्त गुप्ता 9 जुलाई 2010 को 9:16 pm  

नक्सलवाद अब अपनी विचारधारा से हटकर हप्ता/महीना धारा के चक्कर मे उलझ गया है। ऐसा प्रतीत होता है इस नक्सलवाद की आड़ मे चोर डकैतों की बन आयी है। यह नक्सलवाद नासूर बनता जा रहा है। सही विषय उठाया है आपने……आभार!

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