छत्तीसगढ़ के दस साल

बुधवार, 8 सितंबर 2010


दृश्य एक : रायपुर शहर, गौरव पथ में रात का नजारा . लगता है कनाट प्लेस में टहल रहे हैं..| नियोन साईन बोर्ड और लकदक करती लाईटें, कृत्रिम झरना और फव्व्वारे ...चमकती हुए सड़क पर भागती हुई कारें ...लगता है छत्तीसगढ़ का नवा बिहान(नया सवेरा) यहीं हुआ है|

दृश्य दो; बागबाहरा-जिला महासमुंद, रायपुर से महज 90 किलोमीटर दूरस्थ महासमुंद जिले का यह सीमान्त इलाका बदहाली के दिन गिन रहा है| मुख्य राजमार्ग पर पूरे दस किलोमीटर सड़क पर सिर्फ कीचड और नुकीले पत्थर हैं| आसपास गांवों में सहूलियतें सिफर| सड़क पर चलना हो तो गाडी में अतिरिक्त पहिया रख लें. ख़ास बात यह है कि पुलिसिया उदासीनता के कारण अब यहाँ भी बस्तर वाली लाल बयार खुल कर गावों में बहने लगी है और शायद किसी दिन धमाकों के साथ इलाके का नया परिचय दुनिया के सामने आए|

इस दृश्य की चर्चा यूँ कि एक अच्छी खबर बीते दिनों आई-दिल्ली से, दस साल पहले एक नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ ने पिछले दस वर्षों में बीमारू और अविकसित कहे जाने वाले सदियों पुराने कलंक को धो कर विकास दर के मामले में राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया है और कई बड़े राज्यों से होड़ कर ली है| यह एक अच्छा संकेत रहा है और इसके लिए सरकार- प्रशासन को यकीनन शाबासी मिलनी चाहिए लेकिन जिस राज्य में शान्ति के लिए प्रख्यात रहे घने जंगल रोजाना होने वाले धमाकों से थर्रा रहे हों, विनाश दर की लाल छलांग अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गयी हो और नक्सली मोर्चे पर जवानों की शहादत की लिस्ट देश भर के मुकाबले अव्वल हो वहाँ इस तरह के खिताब केवल कागजी संतोष दे सकते हैं और ज्यादा से ज्यादा एक सरकारी सुकून, जिसकी आंकड़ेबाजी अर्थशास्त्री ही ज्यादा समझ सकते हैं, अपन नहीं|
एक ख़ास बात तो यह भी है कि तमाम दिक्कतों के बावजूद छत्तीसगढ़ बढ़ा, यह भी कोई कम अचम्भे की बात नहीं है| राज्य को बनना था तो बढना ही था, अपने को तो उसी दिन राज्य का भविष्य दिखाई दे रहा था जिस दिन राज्य बना और तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस ने खुश हो कर मिठाई भेजी| इन दस सालों में दो तरह का छत्तीसगढ़ बनता दीख रहा है| एक शहर वाला , एक गाँव कस्बों और छोटे शहरों वाला , फर्क साफ़ किया जा सकता है| अपराध बढ़ रहे हैं, समाज रोज बदल रहा है| जमीनों के सौदों में दलाल लाल हो रहे हैं और बेचने वाले बर्बादी की तरफ बढ़ते दीख रहे हैं| एक ग्रामीण पीढी होंडा गाड़ियों में भागती हुई दिखाई दे जाती है| अचानक जमीन की कीमत बढ़ गयी तो उनके सौदे होने लगे और किसानी से मुंह चुराने वाली पीढी ने शहरों का रुख करना शुरू कर दिया है| दिल्ली-गुडगाँव- फरीदाबाद में जाट-गुर्जर किसानों की नई पीढी के साथ जो हुआ था वैसा ही यहाँ होता दीख रहा है|सब कुछ बेचो और एक बढ़िया कार खरीदो- इस मानसिकता का असर देखा जा रहा है|

रायपुर में अपराध की स्थिति यह है कि 1980 -90 के दशक में आजाद चौक पर दो गुटों के बीच झगडे में चाकू निकलता था तो दो कालम की खबर बनती थी| अब रोज़ ह्त्या और लूट की ख़बरें राज्य की प्रगति के साथ बोनस में आई हैं| पहली नवंबर को प्रदेश की स्थापना के 10 साल पूरे हो रहे हैं। राज्य बना और शहरीकरण बढ़ गया| शहरों में भीड़ बढ़ गई है| एक छत्तीसगढ़ जो रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और दीगर शहरों में नजर आता है जहां कुछ ख़ास इलाकों में साफ़ सड़कों का शहरी रूतबा है,प्रगति पथ की धाक है, हाई मास्ट लाईटें ग्रामीण आगंतुक को शहरी रुतबे से सहमा देती हैं| .... और दूसरी तरफ बहुतेरे छोटे कस्बे हैं जहां बारिश में चलना मुहाल है | लोग मुफ्त में चावल ले रहे हैं मगर सब्जी नहीं खरीद पा रहे हैं| मोबाईल बजते हैं, लडकियां साइकिल पर स्कूल जाती दीखती हैं मगर बारिश मे उनके पास रेन-कोट नहीं हैं| धमतरी एक जिला मुख्यालय है| वहा जा कर लौटा हूँ| सदर बाजार जैसी मुख्य सड़क पर इतने गड्ढे हैं कि सड़क में गड्ढे या गड्ढे में सड़क वाला जुमला याद आता रहा| धन्य हैं जनप्रतिनिधि और धन्य है नगर पालिका| यह वही शहर है जो पूरे रायपुर शहर को गर्मियों में गंगरेल बाँध का पानी पिलाता है मगर शहर में नागरिक प्रशासन नाम की चीज नजर नहीं आती|

बहरहाल यह राज्य सरकार या प्रशासन की उपलब्धि की विरोधी दल मार्का आलोचना नहीं है और यह अवसर ऐसे मुद्दे उठाने का भी नहीं है| लेकिन सवाल तो उठते ही हैं| बहरहाल दस साल में कई मुकाम तय करके दस वर्षीय छत्तीसगढ़ के लड़कपन को अब जवानी की तरफ बढ़ते देखना है| विकास दर के मामले में शीर्ष पर आने के मौके पर राज्य में एक स्लोगन जारी हुआ है- क्रेडिबल छत्तीसगढ़| मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा कि यही इस प्रतीक वाक्य की रचना की बुनियाद है। उन्होंने कहा कि पहले छत्तीसग़ढ की पहचान अपार प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण एक ऐसे राज्य के रूप में थी, जो देश की आजादी की लगभग आधी शताब्दी गुजर जाने के बाद भी पिछड़ेपन की छाया से मुक्त नहीं हो पाया था। राज्य में सामाजिक-आर्थिक विकास के अनेक क्षेत्रों में कई अभूतपूर्व और महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज की गयी हैं। राज्य के संसाधनों में विकास की क्षमता के प्रति भी राज्य के भीतर और बाहर विश्वास की एक नई लहर देखी जा रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन्हीं भावनाओं को शामिल करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य के नए प्रतीक ‘ विश्वसनीय छत्तीसगढ़’ की रचना की गई है। इसमें हर रंग राज्य की वन-संस्कृति और कृषि-संस्कृति का प्रतीक है। नई दिल्ली के प्रगति मैदान पर 14 से 27 नवंबर तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में छत्तीसगढ़ की दस साल की विकास यात्रा भी प्रदर्शित की जाएगी। प्रदेश की लोक कला और लोक संस्कृति के साथ वर्किंग मॉड़ल प्रस्तुत किए जाएंगे। क्लीन एंड एनर्जी एफिशिएंट टेक्नालाजी प्रोडक्ट एंड सर्विसेस। इसी थीम के आधार पर राज्य के क्रेडा, ऊर्डा, वन, सीएसईबी, पर्यावरण मंडल, औद्योगिक इकाईयों आदि विभागों के वर्किंग मॉडल पेश किए जाएंगे।

7 comments:

Rahul Singh 8 सितंबर 2010 को 10:19 am  

प्रशंसनीय संतुलन.

Swarajya karun 8 सितंबर 2010 को 11:16 am  

चलना ही जिंदगी है. तमाम चुनौतियों के बीच सिर्फ दस साल के
अविराम सफर में छत्तीसगढ़ ने सफलता के कई महत्वपूर्ण
मुकाम हासिल किए हैं . समस्याएं ज़रूर हैं ,पर इस यात्रा में
हमारी सफलताएं भी कुछ कम नहीं हैं. हमारी आंचलिकता को
एक राज्य के रूप में मिली राष्ट्रीय पहचान इस दिशा में
सबसे बड़ी सफलता है. शिक्षा , स्वास्थ्य, कृषि , सिंचाई
जैसे अनेक क्षेत्रों में कामयाबियों की फेहरिस्त बहुत लंबी
होती जा रही है. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने
एकदम ठीक कहा है - देश अब छत्तीसगढ़ पर भरोसा कर सकता है .
बहरहाल आपने एक सार्थक चिंतन की शुरुआत की है ..
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ .

ललित शर्मा 8 सितंबर 2010 को 7:25 pm  


बेहतरीन लेखन के बधाई

356 दिन
ब्लाग4वार्ता पर-पधारें

डॉ महेश सिन्हा 8 सितंबर 2010 को 10:49 pm  

विकास और विनश के बीच झूलता अबोध बालक

डॉ महेश सिन्हा 8 सितंबर 2010 को 10:49 pm  

विनश = विनाश

jay 8 सितंबर 2010 को 11:39 pm  

bahut behatar likha hai ranesh ji ne. vaastav me jab ham vikaas ke naye paimaane tay kar rahe hon tab chiraag talae ke andhera ko bhee dekhne kee zaroorat hai....achha chintan.
Pankaj jha.

Vivek Rastogi 9 सितंबर 2010 को 6:58 pm  

वास्तविकता बहुत कटु होती है

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