डमी सही टीचर तो हैं

सोमवार, 15 नवंबर 2010


बन्दूक के जोर पर टिके नक्सलवाद के दुष्परिणामों को लेकर काफी कुछ कहा जा चुका है और अब प्रभावित इलाकों में एक- दर -एक नए तरह की स्थितियां सामने आ रही हैं| ऐसे इलाकों में जान के जोखिम को देखते हुए सरकारी टीचर अब अपनी जगह स्कूल में पढ़ाने के लिए स्थानीय युवकों को डमी टीचर बना कर भेज रहे हैं। ये टीचर अपनी आधी सैलरी इसी आउट-सोर्सिंग पर खर्च कर रहे हैं।
हाल में प्रकाश में आए तथ्य हैं कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सात जिलों में केवल 526 टीचर काम कर रहे हैं जबकि इन जिलों में 2,558 टीचर होने चाहिए। इसी तरह नक्सलियों की नई पसंदगाह बने उड़ीसा में नक्सल प्रभावित पांच जिलों में 6,003 टीचर होने चाहिए जबकि वहां केवल 3,566 टीचर हैं।यह आंकड़े कुछ पुराने हैं क्योंकि नक्सलवाद का विस्तार काफी तेजी से हुआ है और सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही 18 में से ११ जिले नक्सलियों के शिकंजे में हैं| यहाँ जिक्र सिर्फ टीचरों का ही हो रहा है | कह सकते हैं कि शुक्र है कि पढ़ा तो रहे हैं| आदिवासी बच्चे पढाई का मुंह तो देखेंगे| हकीकत में कौन कहाँ पोस्टिंग पर है और उसकी जगह कौन ड्यूटी बजा रहा होगा यह कहना मुश्किल है| इसकी विभागीय तस्दीक के लिए जंगल के भीतर जाना होगा| जाए कौन? बस्तर की ही बात करें तो कई अफसर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए राजी हैं मगर जाने के लिए राजी नहीं हैं| ऐसे हालात सभी विभागों के हैं| कोई जाना नहीं चाहता| जो गया है वो "कब निकलूं और खुली हवा छोड़ प्रदूषित शहर में सांस लूँ" इसकी जुगत भिडाने में ही ड्यूटी का आधा और शेष का पूरा समय निकाल रहा है| जान सबको प्यारी है|

परंपरा ऐसी बन गयी है कि हर राज्य में कुछ इलाके पनिशमेंट पोस्टिंग के मान लिए गए हैं| अब नक्सली खौफ है, पहले बस्तर को पिछड़ेपन की वजह से पनिशमेंट क्षेत्र माना जाता था| गौर करें कि जब सरकारे कारिंदे आएँगे ही नहीं तो विकास नहीं होगा और विकास नहीं होने का फायदा ही तो नक्सलियों को मिलता आया है| तब हालात काबू थे तो साहब से आया नही गया, अब बेकाबू हैं तो आने का चांस ही नहीं है| जो किसी तरह से डटे है वे काम नही करते यह कहना गलत होगा| अच्छा काम करने वाले भी उन लोगों के साथ नाप लिए जाते हैं जिनको पनिशमेंट नहीं मिला होता है और सचमुच वे अच्छा काम कर रहे हैं| यहाँ एक पहलू गौर करने लायक है कि नक्सलियों से ज्यादा उनका टेरर काम कर रहा है| होना यह चाहिए कि क़ानून का, सरकार का, व्यवस्था का टेरर(अर्थात असर) काम करे|
मुझे दिल्ली में कुछ लोग मिले जिनने रायपुर का नाम सुन कर कहा कि वही दंतेवाड़ा वाला..!! जबकि रायपुर से दंतेवाडा पूरी रात के सफ़र के फासले पर है| कई काबिल लोग जो नक्सलवाद के कारण इलाके से परहेज करते हैं और दुःख इस बात का होता है कि उनके अनुभव का लाभ उस इलाके को नहीं मिल पा रहा| इसका परिणाम फिलहाल तो यही दिख रहा है कि देश के निस्पृह और सरल नागरिक सदियों से सुविधाओं से महरूम रह कर पाषाण-युगीन जीवन जीने को बाध्य हैं और दो पाटों में पिस रहे हैं|

2 comments:

bahujankatha 21 नवंबर 2010 को 9:53 pm  

आपका आशावाद एक उजली किरण प्रस्तुत करता है। तदर्थ ही सही शिक्षण का काम कुछ तो हो ही रहा है लेकिन इससे कुछ हासिल होगा मानना ठीक भी नहीं है। नक्सल समस्या का कोई तोड़ अब ज़रूरी हो गया है वरना लाल सलाम यहाँ की दिनचर्या में शामिल हो जाएगा। अभी हाल ही बारनवापारा में नक्सली हलचल देखी गई है। यानी जल्द ही प्रदेश उनकी चपेट में होगा।

Swarajya karun 23 नवंबर 2010 को 12:37 am  

आपने पूरी गंभीरता से एक गंभीर विषय को उठाया है. सरकारी कर्मचारी कहीं भी हों , अगर अपनी नौकरी को राष्ट्र-निर्माण, मानव-कल्याण और समाज-सेवा का एक महत्वपूर्ण अवसर मान कर काम करें , तो शायद हमारे देश की तस्वीर ही बदल जाए .

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