अति वर्जयेत अरुंधति

मंगलवार, 23 नवंबर 2010


#लेखिका एवं सामाजिक कार्यकत्री अरूधंति राय के भुवनेश्वर के एक कार्यक्रम में संघ के कार्यकर्ताओं और आयोजकों के बीच हुए एक संघर्ष में आधा दर्जन लोग घायल हो गए. अरुंधति ने नक्सलियों को देशभक्त माना है|

.# भड़काऊ भाषण देने पर लेखिका अरुंधति रॉय के खिलाफ जिला अदालत में एक याचिका दायर की गई। ग्लोबल ह्यूमन राइट्स काउंसिल की तरफ से एसीजेएम अंशुल बेरी की अदालत में दायर इस याचिका में मांग की गई है कि अरुंधति रॉय को इस तरह के बयान देने से रोका जाए।

# कश्मीर पर दिए बयान से विवादों में घिरी लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा कि देश में स्वतंत्र लेखकों की आवाज को दबाया जा रहा है। बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति रॉय ने दिल्ली में हुए एक सेमिनार में कहा कि कश्मीर के लोग दुनिया के सबसे बर्बर सैनिकों के कब्जे में रह रहे हैं।

# दिल्ली में रविवार को भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा ने अरुंधति रॉय के घर के बाहर हंगामा और तोड़फोड़ किया। भाजपा महिला मोर्चा ने कहा कि या तो अरुंधति रॉय कश्मीर पर दिए अपने बयान को वापस लें या पाकिस्तान जाकर रहें।

# पटियाला हाउस कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर पूछा है कि अरुंधति रॉय और सैयद अली शाह गिलानी के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई।

# 13 फरवरी को दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक वार्ता के दौरान युवा (यूथ यूनिटी फॉर वाइब्रेंट एक्शन) के एक सदस्य ने लेखिका पर पाकिस्तान का समर्थन करने के विरोध में जूता फेंक दिया था। बाद में एक नीलामी में यह जूता एक लाख रुपए में बिका था।
# जम्मू एवं कश्मीर को लेकर विवादास्पद बयान देनेवाली लेखिका अरुंधति राय ने कहा है कि उन्हें उस मुल्क पर दया आती है, जहां इंसाफ की बात करनेवालों को जेल में डाला जाता है। उन्होंने कहा कि उनकी ओर से कश्मीरियों के लिए सिर्फ इंसाफ की आवाज उठाई गई है।

ये कुछ शाब्दिक तस्वीरें हैं | मकसद सिर्फ यह है कि स्वतन्त्रता अब इस कदर सिर चढ़ गयी है कि बोलने की छूट है तो इसका मतलब देश को ही जुतियाने लगिए| ऐसा लगता है कि अरुंधति खुद को संविधान से भी परे मानने लगी हैं| यह इसी भारत देश में संभव है वरना आन सांग सू की को एक दशक नजरबन्द रहना पडा और बेचारी बेनजीर ज़िंदा ही नहीं रह पाईं| इस दौर में यह साफ़ देखा जा रहा है कि सविधान और भारत की अखंडता के मायने उन लोगों के लिए कुछ नहीं हैं जिनको पुरस्कारों की चिंता सर्वोपरि रहती है| ऐसे लोगों में अरुंधति रॉय आजकल टॉप पर हैं और शर्मनाक हैरत की बात यह है कि एक बार कश्मीर पर वे इतना गलत बोल चुकी हैं कि उनकी जगह और कोई और होता तो अब तक जेल में ठूंस दिया गया होता| मगर अरुंधति देश के संयम, बड़े पुरस्कार की विजेता और एक प्रगतिशील लेखिका होने के प्रति सम्मान भाव को भीरुता समझे बैठी हैं और वे एक जिद्दी और वाचाल की छवि धारण कर रही हैं| कश्मीर पर ज़माना कुछ और बोले मगर वे तो खुद को सुकरात समझ बैठी हैं| भले ही कश्मीर में पाक-पोषित इंसर्जेंसी के कारण अशांति है मगर क्या करें अरुंधति जैसे लोगों को इसमें भारत का दोष लगता है| किसी एक मामले में वे कुछ बोलें तो समझा जा सकता है मगर वे तो अलगाववादियों की जुबान बोल रही हैं और पूरा पाक मीडिया उनके बयानों पर झूम रहा है|उनका भ्रम एक बार तो दूर होना ही चाहिए|
अब एक बार फिर अरुंधति को हिंसक माओवादी भा रहे हैं| सेमिनारों में उग्र वामपंथ को खुलकर ताज पहनाने वाले लीडरों को यह देखना चाहिए कि कई गुटों में माओवादी खुद विचारधारा से भटक गए हैं| नाम माओ का, कर रहे हैं -मनमानी | जो लोग निहत्थों का, अपनों का ही खून बहा रहे हों उनकी तो मजम्मत ही की जाएगी| सुनो अरुंधति छत्तीसगढ़ आओ और एक महीना रहो, आपको सब समझ आ जाएगा| जंगल में लोग हिंसा से आजिज आ चुके हैं | कश्मीर में जिस इन्साफ की बात आप कर रही हैं वो भारतीय संविधान के जरिये ही आएगा मगर क्या करें पाकिस्तान और अमरीका जैसे देश चाहते हैं कि कश्मीर को दुनिया के फलक पर ला कर भारत को लगातार नीचा दिखाया जाए.... और आप उनकी लाबी का महज एक टूल बन कर इस्तेमाल हो रही हैं|

4 comments:

shikha varshney 23 नवंबर 2010 को 8:31 am  

बिलकुल ठीक कहा ..यह बस भारत में ही संभव है.

bahujankatha 26 नवंबर 2010 को 10:45 pm  

बोलने की आज़ादी का अर्थ सही मायने में पाकिस्तान जैसे देशों में जाकर पता लग सकता है। हमारे देश में सचमुच संविधान ने असीमित आज़ादी दी है। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि बौद्धिक वर्ग के लोग बहुत ही सोच-समझ कर अपनी इस आज़ादी का उपयोग करें अन्यथा हालात बिगड़ते देर नहीं लगेगी। आपके ब्लॉग पर अरुंधति को पढ़कर मुझे एकबार ऐसा लगा कि आपने कैसे इतनी छिछली सोच पर कुछ कहने की जहमत उठाई है। जितना महत्व उन्हें (अरुंधति) को हम दे रहे हैं उसकी कतई ज़रूरत नहीं है। लेकिन अनाप-शनाप बकने वालों के कारण, पत्रकार होने के कारण, जो हालात बनने की संभावना दिखती है उसको लेकर देशहित को लेकर जागरूक किसी भी पत्रकार के लिए चुप रहना भी संभव नहीं है। जब अरुंधति राय यह कहती हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहा है तो उनसे यह भी पूछा जाना चाहिए कि सन 47 के पहले कश्मीर किस देश का हिस्सा था।

ममता त्रिपाठी 11 दिसंबर 2010 को 5:26 am  

अरुंधती का यह पब्लिसिटी स्टंट है। इस मामले में वे फिल्मी नायिकाओं से भी आगे हैं............कुछ लोगों को लगता है कि भौंकने से वे जन-जन तक पूज्य हो जायेंगे

ममता त्रिपाठी 11 दिसंबर 2010 को 5:27 am  

आप ऐसे ही निर्भीकतापूर्वक लिखते रहें यही शुभकामनायें हैं

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