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मौत सामने खड़ी थी

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018


दंतेवाड़ा के हमले में नक्सलियों ने बाल नक्सलियों का भी इस्तेमाल किया। इलाके में 200 से ज्यादा नक्सली थे जिन्होंने जवानों और मीडिया टीम को घेर लिया था।

हमले से जिंदा बच आए जवान विष्णु नेताम ने यह बताया है कि नक्सलियों की टीम में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल थे जिनकी उम्र 10 - 12 साल रही होगी। इन बच्चों की आड़ लेकर नक्सलियों ने एंबुश लगाकर फायरिंग शुरू कर दी थी। इस हमले में एक मीडियाकर्मी सहित चार जवान शहीद हो चुके हैं। घायल का इलाज रामकृष्ण केयर अस्पताल में जारी है। विष्णु नेताम के बयान के मुताबिक 30 अक्टूबर को सुबह 9:00 बजे हम निकले थे। दूरदर्शन की टीम हमें रास्ते में मिली और फिर वह भी हमारे साथ हो गए मगर रास्ते में नक्सलियों ने चारों ओर से अचानक घेर लिया। 
 "हैंड ग्रेनेड दागे गए एके-47 से गोलियों की बौछार की गई और उसके बाद हम लोग गड्ढे में कूद गए। विष्णु ने बताया मैं दूसरे नंबर पर था। मेरे आगे रुद्र प्रताप सिंह थे जो सब इंस्पेक्टर थे जिन्हें बचने का भी मौका नहीं मिला और उनकी मौत हो गई।"

हमले का वीडियो बना लिया 

दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में ज़िंदा बच गए दूरदर्शन के सहायक कैमरामैन मोर मुकुट शर्मा ने हमले का पूरा वीडियो बना लिया और अब वे मौत के मुंह से बच निकलने के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं।
 उनका वीडियो बताता है कि सनसनाती गोलियों की आवाज के बीच के भयानक हालात क्या रहे थे। खौफ का आलम क्या रहा होगा। लाइटमैन ने हमले के दौरान अपना और मौजूद पुलिसकर्मियों का वीडियो बनाया है। वीडियो में अपनी मां को याद कर रहा है और पानी मांग रहा है लेकिन जवानों के पास पानी नहीं था मगर वे बराबर उसे दिलासा देते रहे कि फोर्स आ चुकी हैं। वीडियो में कहा गया कि मम्मी मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं। हो सकता है इस हमले में मैं मारा जाऊं। परिस्थिति सही नहीं है। पता नहीं क्यों? मौत को सामने देखते हुए डर नहीं लग रहा है। बचना मुश्किल है यहां पर। 
कुल1 मिनट 27 सेकेंड के अपने संदेश में कैमरामैन मोर मुकुट ने रिकार्ड किया। चुनाव कवरेज के लिए जाते समय अचानक नक्सलियों ने उन्हें घेर लिया। परिस्थिति सही नहीं है और पता नहीं मैं कब मारा जाऊं। मम्मी मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। मौत सामने घूम रही है और पता नहीं कि मैं लौटूंगा या नहीं।

गौरतलब है दंतेवाड़ा नीलवाय जा रही दूरदर्शन की टीम पर नक्सलियों ने हमला कर दिया था। पता चला है कि हमले के दौरान कैमरामैन आगे-आगे चल रहा था जबकि रिपोर्टर और लाइटमैन पीछे थे। गोलीबारी शुरू होते ही दोनों एक गड्ढ़े में गिर गये और पूरी गोलीबारी तक वहीं छुपे रहे जिससे उनकी जानें बच गई। पुलिस कर्मी उनको कवर करके फायरिंग करते रहे।

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क्यों बौखलाए हैं नक्सली

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बस्तर की खूनी धरती पर एक बार फिर जघन्य नक्सली वारदात ने उन रक्तरंजित सवालों को कुरेद दिया है जो इस शांत वादी में लगातार सुलग रहे हैं। नक्सली वारदातों में हाल में आई तेजी के लिए कई कारण गिनाए जा रहे हैं जिसमे पहला कारण स्ट्रैटेजिक है। 
नक्सली कतई नहीं चाहते हैं कि जंगल में उनके महफूज ठिकानो तक सड़के बने। दरअसल बस्तर में अब सडक निर्माण का काम कराना सुरक्षा बलों के जिम्मे है जिसमे रोड ओपनिंग पार्टी के लगातार बढ़ते दबाव की वजह से बस्तर संभाग में नक्सलियों के पैर उखड़ने लगे हैं।
नक्सली बयानों में हमेशा कहा गया है कि 'छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपत्ति व संसाधनों खासकर जल-जंगल-जमीन व खनिज संसाधनों एवं आदिवासी अस्तित्व पर आद्योगिक खतरे हैं। इसलिए सडके नहीं बनने देंगे।' 
वे बुरी तरह बौखला गए हैं...छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, बंगाल और मध्य प्रदेश के नक्सलियों के प्रभाव वाले 44 जिलों में 5,412 किमी सड़क निर्माण परियोजना को मंजूरी दी गई है. निर्माणकार्यों से ये नक्सली खतरा महसूस करते हैं. 
रायपुर से 500 किलोमीटर दूर सुकमा/बस्तर छत्तीसगढ़ का वो इलाका है जहां नक्सली हुकूमत तक सरकार भी नहीं पहुंच पाती है। बड़े पत्तों वाले सालवन से ढंके जंगलों में कई नक्सली ठिकाने हैं।

जाहिर तौर पर 26 जवानों की शहादत खुफिया महकमे की नाकामी मानी जा रही है लेकिन दो महीने में दूसरी बड़ी घटना बताती है कि सीआरपीएफ के ही जवान लगातार शहीद हो रहे हैं तो हैं कही न कही इनपुट ओरिएंटेड कॉर्डिनेशन में कमी है। बस्तर में आम नागरिक सिर कलम किये जाने के भय से खुफिया सूचनाएं देने का साहस नही जुटा पाता और नक्सली भय का माहौल लगातार कायम रखने इस तरह की जघन्य वारदातों को अंजाम देते हैं। यह उनकी रणनीति का हिस्सा है।
जीरम घाटी में नक्सलियों के दुश्मन नंबर एक बस्तर टाईगर के नाम से मशहूर दिलेर महेंद्र कर्मा मार डाले गए थे। 2013 की इस घटना बाद नक्सलियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नही हुई और दुश्मनो को निपटा कर नक्सली अपने मकसद में कामयाब हो गए।
बस्तर का ही सुकमा ,दंतेवाडा व नारायणपुर सबसे ज्यादा तबाह है। नक्सलियों के रास्ते में बाधक जनप्रतिनिधि व आदिवासी नक्सलियों के निशाने पर हैं। लगातार इनकी हत्या और अपहरण की घटनाएं सामने आ रही हैं। इसके पीछे लोकतंत्र को कमजोर करने और दहशत फैला कर अपना वजूद कायम रखने की नक्सली मंशा साफ है। 2015 में मोदी की बस्तर में सभा न होने पाए इस मंशा से बस्तर में काबिज माओवादियों ने एडी चोटी का जोर लगा दिया था . लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) में सेना के हाथों बुरी तरह कुचले जाने और आंध्र प्रदेश में ग्रे हाउंड फोर्स से खदेड़े जाने के बाद पश्चिम ओडीसा और दक्षिण छतीसगढ़ नक्सिलयों का अभ्यारण्य बना हुआ है।शबरी नदी के तट पर स्थित सुकमा जिला न केवल बस्तर संभाग बल्कि छत्तीसगढ़ के भी दक्षिण छोर का आखिरी जिला है। इसकी सीमा ओड़िशा और आन्ध्र प्रदेश से लगी हुई है।


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विकराल बस्तर हिंसा

सोमवार, 27 मई 2013


देश के 13 राज्यों के 165 जिलों में फैल चुका रेड कॉरीडोर आज राष्ट्रीय समस्या बन चुका है।  नक्सलवाद को आतंकवाद घोषित करने के बाद समस्या और विकराल हुई है। छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की हैवानियत एक बार फिर सामने आई है। बस्तर टाइगर महेन्द्र कर्मा की मौत ने बस्तर में नक्सलवाद से उपजी हिंसा के खिलाफ उठी सलवा जुडूम (शांति के लिए जन जुड़ाव) आंदोलन को पस्त कर दिया है। यह आंदोलन 2005 में बस्तर से शुरू हुआ था जिसके प्रणोता महेन्द्र कर्मा ही थे।

मगर उन्होंने जो अभियान शुरू किया था वह कई साल पहले ही राजनीति की भेंट चढ़ गया। तब से कर्मा नक्सलियों की आंख की किरकिरी बने हुए थे।  उन्होंने लोगों को गाड़ी से उतारा और उनके मोबाइल लिए, नाम पूछे और फिर दूर तक पैदल ले गए। कर्मा ने कार से उतर कर दिलेरी से कहा, मुझे मार दो मगर बाकियों को छोड़ दो। नक्सलियों ने गोलियां चला दी। कर्मा को मारने की धमकी के बैनर इलाके में टांगे गए थे। नक्सलियों को पता था कि कौन किस गाड़ी में है इसीलिए काफिले में चुनी हुई गाड़ियों को निशान बनाया गया। काफिले में रोड ओपनिंग पार्टी भी नहीं थी। 8 नवम्बर 2012 को महेंद्र कर्मा पर नक्सली हमला हुआ पर वह इस हमले में बाल बाल बच गए जबकि पांच लोग घायल हुए थे। महेंद्र कर्मा और उनके परिवार पर पहले भी नक्सलियों ने कई हमले किए गए थे।

शनिवार की घटना बताती है कि पिछले कई वर्षो के सतत काम्बिंग अभियान के बावजूद नक्सली इलाके में महफूज हैं। अपने खिलाफ उठने वाली कोई भी आवाज वह खामोश कर सकते है। संवाद, संविधान, और प्रजातंत्र किसी को नक्सली नहीं मानते। नक्सलियों के खिलाफ शुरू हुआ सलवा जुडूम आंदोलन अब दम तोड़ गया है। इससे जुड़े हजारों आदिवासी नक्सलियों के भय से राहत शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं। अपने आखिरी साक्षात्कार में कर्मा ने इस संवादादाता से कहा था कि बस्तर को हिंसा से मुक्त करना ही उनकी जिंदगी का मकसद है। मगर अफसोस कर्मा नक्सलियों का निशान बने। 

 नक्सलियों का टॉरगेट होने की वजह से ही कर्मा को सरकार ने जेड प्लस कमांडो सुरक्षा मुहैया करवाई थी। लेकिन इस बार नक्सलियों का सूचना तंत्र मजबूत रहा।

उन्हें पहले ही यह जानकारी मिल चुकी थी कि महेंद्र कर्मा काफिले के चौथे वाहन में सवार हैं। तीन वाहन गुजर जाने के बाद ही चौथे वाहन पर निशाना लगाया गया। नवंबर, 2012 में कर्मा के बुलेटप्रूफ वाहन पर हमला हुआ था। इस हमले में बचने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा था कि वह अपनी किस्मत की वजह से बचे। बुलेट प्रूफ वाहन के इंजन की वजह से उनकी जान बची। ब्लास्ट इंजन पर हुआ था। इसलिए वाहन के पीछे ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। उन्होंने कहा था कि नक्सली रोज हमसे जीत रहे हैं और रोज हम नक्सलियों से हार रहे हैं। नक्सली सलवा जुडूम अभियान से जुड़े अग्रिम पंक्ति के सभी नेताओं को अलग-अलग तरीके से मारने की प्लानिंग बना चुके हैं। कर्मा ने खुद कहा था कि नक्सलियों का स्माल एक्शन ग्रुप इस आंदोलन से जुड़े नेताओं को श्रृंखलाबद्ध तरीके से मार रहे है। अप्रैल 2010 में चिंतलनार में सीआरपीएफ के 75 जवानों की नक्सली हमले में मौत समेत कई बड़ी घटनाएं दंतेवाड़ा-सुकमा अनुमंडल में ही हुई थीं। 12 जुलाई 2009 को भी राजनांदगांव में एक एसपी समेत 30 जवान झांसे में ला कर मार दिए गए थे।

 13 राज्यों के 165 जिलों में  माना जा रहा है कि नक्सलवाद को आतंकवाद घोषित करने के बाद समस्या और विकराल हुई है।

बीते रविवार सुबह दूरदशर्न के टावर पर नक्सलियों के हमले में तीन जवान शहीद हो गए और एक घायल हो गया। यह टावर बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर तेलीमारेंगा गांव में स्थित है। अबूझमाड़ के इस भूभाग में आज भी नक्सलियों के स्थाई शिविर हैं और पुलिस भी वहां जाने से र्थराती है। छत्तीसगढ़ के 27 में से 18 जिलों में बुरी तरह पसर चुके नक्सलियों ने इस वारदात के बाद के बाद यही साबित किया है। लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) में सेना के हाथों बुरी तरह कुचले जाने और आंध्रप्रदेश में ग्रे हाउंड फोर्स से खदेड़े जाने के बाद ओडीसा और छतीसगढ़ नक्सलियों का अभ्यारण्य बना हुआ है।

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फिर से बस्तर

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

आज़ादी के 64 सालों बाद धुर जंगली इलाके बस्तर में अब जाकर शायद विकास की नई कहानी लिखी जाए| घोर नक्सल प्रभावित दंतेवाडा जिले को दो फाड़ करके सुकमा को नया जिला बनाया गया है| इसमें क्या नई बात है ये कोई भी कह सकता है, जिला बनाना कोई ऐसी खबर या मुद्दा तो नही है जिस पर बड़ा लेख लिखा जाए|

आपको बता दें दंतेवाडा वो इलाका है जहां नक्सली हुकूमत के आगे सरकार भी पस्त हो जाती है और सदियों से बस्तर की तरक्की की राह में नश्तर जैसे चुभने वाले सघन वन क्षेत्र में आज भी बड़े पत्तों वाले साल वन से ढंके ऐसे इलाके हैं, जहां जमीन तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती।
बेशकीमती खनिज से लबालब इस धरती के लोगों के लब गर्मी में पानी को तरस जाते हैं| आज आदिवासियों वाला बस्तर हिंसा से तप्त है|
मुम्बई की हिंसा में बीस लोग मारे जाते हैं तो बवाल मच जता है मगर बस्तर मे कभी पुलिस पार्टी पर हमले तो कभी आदिवासियों पर हमले और कभी नक्सलियों से मुठभेड़ में औसतन इतनी मौतें रोज़ हो रही हैं जितनी नार्थ ईस्ट और जम्मू कश्मीर में भी नही होती तो ऐसा लगता है किसी को कोई रंज नही होता मानो ये इलाके भारत में हैं ही नहीं|

करीब चार हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले सुकमा में अबूझमाड़ की कंदराएं हैं जहां सूरज भी घुसने से घबराता है और नंग- धड़ंग आदिवासी यहाँ आदिम युगीन सभ्यता में जी रहे हैं| इलाके का राजस्व सर्वे तक नही हो पाया क्योंकि अमला जा नही सका. आपको बता दें यहाँ कई सड़कें सम्राट अकबर के ज़माने में बनी हुई जस की तस हैं. बस्तर का मतलब मीलों तक फैला डरावना जंगल ..सन्नाटा और बीच-बीच में पक्षियों का कलरव-गान या अब बन्दूकों की गूंज..
विकास की किरण छूने को तरसते इस इलाके में केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश भी जा पहुचे और नया जिला बनने के मौके पर उमड़ी आदिवासियों की भीड़ के बीच उन्होंने ऐलान किया कि केंद्र सरकार इलाके के विकास के लिए 30 करोड़ रूपये सालाना देगी और इलाके में एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम चलाया जाएगा| अब देखा ये जाएगा कि सरकार कितना देती है और कितना विकास किसका होता है. नए जिले सुकमा और कोंडागांव नक्सल प्रभावित क्षेत्र हैं। घने जंगलों वाला आदिवासी बाहूल्य ये इलाक़ा इतना पिछड़ा हुआ है कि अगर आप अपने वाहन से एक बार इलाके में घुस जाएं तो पानी की एक बोतल खरीदने और बिस्कुट का एक पैकेट खरीदने के लिए मीलों दूर तक भटकना पड़ सकता है|
इसी दंतेवाडा का सुकमा (अब जिला) इलाक़ा भारत के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक माना जाता रहा है| यहां नक्सलियों के पक्के शिविर चलते हैं-जैसे पीओके में हिजबुल के| यहां नक्सली हिंसा की बड़ी वारदातें होती रही हैं.
वर्ष अप्रैल 2010 में चिंतलनार में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ के 75 जवानों की नक्सली हमले में मौत समेत कई बड़ी घटनाएं दंतेवाड़ा -सुकमा अनुमंडल में ही हुई हैं|
सच यह है कि इलाके में पुलिस घुसने से आज भी डरती है| नए जिले बनाने के पीछे तर्क है कि आदिवासियों को जिला मुख्यालय जाने के लिए ज्यादा चलना नही पडेगा|
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बीते सोमवार नवगठित सुकमा जिले का शुभारंभ किया। सिंह ने कहा कि इससे राज्य में विकास की प्रक्रिया में तेजी आएगी और यकीनन जब जिला बन गया तो अफसर जाएंगे ही. अफसर जाएंगे तो अमला भी होगा. सब जाएंगे तो काम करना ही पड़ेगा . काम होगा तो नजर भी आएगा. कुछ तथ्य हैं कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सात जिलों में केवल 526 टीचर काम कर रहे हैं जबकि इन जिलों में 2,558 टीचर होने चाहिए। इसी तरह नक्सलियों की नई पसंदगाह बने उड़ीसा में नक्सल प्रभावित पांच जिलों में 6,003 टीचर होने चाहिए जबकि वहां केवल 3,566 टीचर हैं।यह आंकड़े कुछ पुराने हैं मगर हालात को बयां करने के लिए काफी हैं.

माना जा रहा है कि जिला बनने से इलके में सरकारी आमद-रफ्त बढ़ेगी और विकास के काम होने से नक्सलियों के पांव उखड़ेंगे जो पिछड़ेपन को ढाल बनाते आए है| शबरी नदी के तट पर स्थित सुकमा जिला न केवल बस्तर संभाग बल्कि छत्तीसगढ़ के भी दक्षिणी छोर का आखिरी जिला है। इसकी सीमा ओड़िशा और आन्ध्रप्रदेश से लगी हुई है। इलाके में नक्सलवाद शुरू हुआ तो कहा गया कि वह आदिवासी के लिए बन्दूक चला रहा है मगर यह सच भी सामने आने लगा कि नक्सली नेता दूरबैठे किसी और ठिकाने से से संचालन करने लगे और बस्तर में गुरिल्ला स्क्वाड के नाम पर अब आदिवासी ही आदिवासी पर बंदूक चलाने लगा | आदिवासी के हाथ में चीन की बनी हुई रायफलें पहुचने लगी .
बस्तर का ही कोंडागांव दूसरा ऐसा संवेदनशील इलाक़ा है जो सुरक्षा बलों और माओवादी हिंसा से लहुलुहान हुआ पड़ा है| यह भी जिला बन गया है| छत्तीसगढ़ में इस तरह नौ में से पांच नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नए जिलों का गठन हुआ है| छत्तीसगढ़ में पिछले लगभग दस सालों में ही ज़िलों की संख्या 16 से बढ़ते कर 27 पहुंच गई है| सुकमा और कोंडागांव के अलावा जिन इलाक़ों को ज़िलों का दर्ज़ा दिया गया है, उनमें बालौद, गरियाबंद, मुंगेली, बेमेतरा, सूरजपुर, बलौदाबाज़ार और बलरामपुर शामिल हैं| बस्तर में पदस्थ सीआरपीएफ़ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह की भी राय है कि छोटे जिलों से अभियान को बल मिलेगा|
सरकार चला रहे रमन सिंह का यह कदम बताता है कि अब यह भी माना जा रहा है कि हिंसा की बजाय किसी और रास्ते से लोगों का जीवन बदला जाए. अब बस्तर का हल गोली नही बोली है और बंदूकों से हो रहे विनाश की जगह विकास से ही है. अबूझमाड़ में सभी आदिवासी इलाकों में अस्पताल, स्कूल और सड़क की दिक्कतों को दूर किया जाए और औद्योगिकरण की स्थिति में विस्थापन औऱ रोजगार की कारगर योजना के साथ वनोपज संग्रह-विपणन में भी आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए| सारी बंदूकों को वहां से रुखसत करा के आदिवासियों को उनकी संस्कृति के हाल पे ही छोड़ दे तो बस्तर की मैना फिर से चहक सकती है.

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बचे हैं सिर्फ 23 बाघ

सोमवार, 21 नवंबर 2011

दुनिया भर में पशु-चर्म , नख और हड्डी के सौदागरों ने अनमोल वन्य जीवों का जीना दूभर कर दिया है. नवम्बर का महीना छत्तीसगढ़ के जंगल से बुरी ख़बरें ले कर आया है . एक बाघिन की मौत से वन्यजीव प्रेमी उबर नहीं पाए थे कि शनिवार को सरगुजा इलाके से दो हाथियों की भी मौत की खबर ने एक और झटका दे दिया. इससे पहले एक बाघिन को पीट-पीट कर मार डालने की घटना ने राज्य के वन विभाग की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए थे.
बीते दिनों लालची लोगों ने एक बाघिन को मौत के घट उतार दिया. जांच में पता चला कि जो रक्षक था वही भक्षक बन गया. भोरमदेव अभयारण्य में बाघिन की निर्मम हत्या के आरोप में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है. पास गाय की लाश बरामद हुई है, जिसे जहर देकर मारने की पुष्टि हुई है. मामला उलझा हुआ है. विभागीय अधिकारियों की लापरवाही सामने आई है। जांच करने अधिकारियों की टीम गठित की गयी है. बाघिन के शव का पोस्टमार्टम करने वाले नंदनवन के वन्य प्राणी चिकित्सक के अनुसार गोली लगने से मौत हुई है.
बाघिन के दांत, मूंछ व नाखून भी गायब हैं। यह बताता है कि प्रदेश में तस्करों का जाल फैला हुआ है और वन्य जीवों का अवैध शिकार हो रहा है।
चिंता की बात है कि अब छत्तीसगढ़ में अब सिर्फ 23 बाघ ही बचे हैं.
आंकड़ों के मुताबिक़ प्रदेश के 13 अभ्यारण्यों एवं राष्ट्रीय उद्यानों में पिछले सात महीनों में अब तक 60 वन्य जीव रहस्यमय तरीके से मारे गए हैं। यह सचमुच चिंता की बात है.
अब धरमजयगढ़ के जंगल से ताजा खबर है- एक हाथी करंट की चपेट में आकर मर गया, दूसरे की दक्षिण सरगुजा में कीटनाशक खाने से हो मौत गई. इन मौतों में इलाके के में ग्रामीणों का हाथ होने की आशंका है. मौत के बाद बाकी हाथी रातभर चिंघाड़ते रहे. सूचना पर डीएफओ एस.जगदीशन दल-बल सहित घटनास्थल पहुंचे और पोस्टमार्टम के बाद मृत हाथी को दफना दिया गया.इसी तरह छाल वन परिक्षेत्र अंतर्गत बड़काखार के जंगल में एक 40 वर्ष के हाथी की मौत हो गयी जो जंगली सुअर के लिए बिछाए गए विद्युत प्रवाहित तार की चपेट में आ गया था. इस बारे में वन मंडाधिकारी, धरमजयगढ़ एस.पी. मसीह का कहना है शव का परीक्षण कराया गया है और मामले की जांच की जा रही है.

ये घटनाएं बता रही हैं कि कोई भी इलाका जंगली जानवरों के लिए महफूज नहीं है और वन महकमा उनकी सुरक्षा में नितांत असफल रहा है.
इससे पहले राजनांदगांव जिले के कहाड़कसा ग्राम में 7 नवम्बर को बायसन की, छुरिया के बखरूटोला में 24 सितम्बर को बाघिन की हत्या हुई थी.गांवों के लोगों ने 24 सितंबर को राजनांदगांव छुरिया के करीब बखरूटोला में दो माह से भटक रही एक बेजुबान बाघिन को पीट-पीटकर मार डाला था जबकि वह वह जाल में फंस गई थी. फिर भी जाल में फंसी बाघिन को वन विभाग के अधिकारियों और पुलिस कर्मियों के सामने ही मौत के घाट उतार दिया गया. मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राजनांदगांव में भीड द्वारा बाघिन को मारे जाने की घटना के बुधवार को जांच के आदेश दिए थे. इस घटना के बाद नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) की ओर से गठित हाई पॉवर कमेटी ने जो रिपोर्ट दी उसमे साफ़ संकेत हैं कि बाघिन की मौत के लिए महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के वन विभाग को संयुक्त रूप से जिम्मेदार रहे हैं. घटना के बाद सामने आया कि गोंदिया मंडल ने बाघिन को घायल होने के बाद दो महीने तक पिंजरे में रखकर इलाज किया। उसके बाद रिसर्च रिपोर्टो और खुद एनटीसीए की गाइडलाइंस को दरकिनार कर बाघिन को एकदम नए इलाके के खुले जंगल में छोड़ा गया। राजनांदगांव वन मंडल ने बाघिन को जिंदा पकड़ने के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं किए। वन मुख्यालय के अफसरों ने सही समय पर उचित निर्देश नहीं दिए.एनटीसीए के असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल संजय पाठक के नेतृत्व में बनी जांच कमेटी ने जांच की. जांच में महाराष्ट्र वन मंडल के एक अधिकारी, पीसीएफ टीआर टाम्टा और डब्लडब्लूएफ की प्रतिनिधि नेहा सेमुअल भाग लिय़ा था.
जिस बाघिन को लोगों ने मारा उसे लेकर बयान हैं कि यह बाघिन एक माह से क्षेत्र में दहशत बन आ गई थी मगर वह ऐसी क्यों थी ? निरंतर कम हो रहे वन्य जीव प्रागैतिहासिक आवासों की कमी ही दूनिया भर में मुख्य कारण है.अब कोई "उसके" घर को ही छीन लेगा तो जानवर क्या करेगा? जो जंगल का क़ानून जानते हैं वे जानते हैं कि जंगल में एक ही क़ानून चलता है और वह है जो आपको दुखी करे उसे दुखी करो.इसी लिए दुखी जानवर कभी आदमखोर हो रहे हैं और कभी आए दिन रायपुर की सीमावर्ती डब्ल्यू आर एस कालोनी में भटकते पाए जा रहे हैं.

अन्य राज्यों में भी बाघ और दीगर पशु दुर्घटनाओं में भी मारे जा रहे हैं . 30 जुलाई को दुधवा नॅशनल पार्क के किशनपुर के जंगल भीरा- मेलानी रोड पर रात में वाहन की टक्कर से तीन साल की किशोर बाघिन की दर्दनाक मौत हो गयी थी. इसी तरह 8 जून को कार्बेट टाइगर रिजर्व के अंतर्गत कालागढ़ रेंज में एक और बाघिन की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गईथी. मतलब साफ़ है वन्य जीव निशाने पर हैं. उनको बचाने की किसी को चिंता है भी तो वह कारगर नहीं हो पा रही है,

छत्तीसगढ़ राज्य में केंद्र सरकार की हाथी कारीडोर, हाथी उद्यान योजना , टाइगर रिजर्व योजना अधर में है, तीनों टाइगर रिजर्व में 50 प्रतिशत पड़ रिक्त पड़े हैं और फील्ड अधिकारी के पद भी भर नहीं पाए हैं.
जिस प्रदेश की प्रतिष्ठा ही जंगल से से जुड़ी हो, उस प्रदेश में वन्य जीवों का इस तरह मारा जाना शर्मिंदगी पैदा करता है और अगर यह सवाल है तो चिंता सिर्फ सरकार ही नहीं समाज को भी करनी चाहिए.

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हमेशा की तरह प्राणघाती चूक

बुधवार, 25 मई 2011

सोमवार को रक्तरंजित माओवाद का एक और हैवानियत भरा चेहरा सामने आया| छत्तीसगढ़- ओडीसा सीमा पर हमले में एक बार फिर एक झटके में 10 परिवार उजड़ गए और हमेशा की तरह निंदा भर्त्सना के स्वर उन परिवारों की रुलाई के साथ गूँज रहे हैं जिनका इकलौता कमाने वाला ही चला गया|

इस घटना ने नक्सलियों की निर्ममता को तो उजागर किया ही है यह भी बता दिया है, कोई विचारधारा अगर हमेशा के लिए आंख मूँद ले तो वह शैतान की प्रवक्ता भी बन सकती है और जब वर्ग शत्रु का सिद्धांत स्वीकार ही कर लिया जाता है तो इंसानियत की आवाज बारूद के आगे ढेर कर दी जाती है और जो लोग किसी के शव का सम्मान नहीं कर सकते वे किसी भी सूरत में कोई भी क्रान्ति कर लें अशांति उनके साथ ही रहेगी और जंगल में भटकते हुए वे जिस मंजिल को पहुचेंगे वो शायद कोई "गोली" ही होगी|

सीधे आते हैं घटना पर जिसमे पुलिस महकमे की लापरवाही को भी एक बार फिर साबित हुई है| हमले में मारे गए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश पवार जैसे दिलेर अफसरों के भरोसे ही अभियान चल रहा है , लगता है | पवार बहादुर अधिकारी थे तथा नक्सला प्रभावित बस्तर क्षेत्र में लगातार काम करते रहे हैं। वे प्रत्येक सोमवार को धवलपुर गाँव जाते रहे हैं| मतलब साफ़ था कि उनके मूवमेंट की जानकारी नक्सलियों को थी और उन्होंने जाल बिछा दिया| पवार अपने छह सिपाहियों समेत ड्राईवर सहायक को लेकर रवाना हुए थे।सूचना थी कि गाँव में नक्सलियों ने समर्पण किया है| यह भ्रामक सूचना थी |

इससे पहले भी खबर आती रही है कि इलाके में नक्सली बैठक करते रहे हैं| इस पर सवाल पूछा जा रहा है कि नक्सली होने की खबर के बावजूद यह जानलेवा चूक क्यों की गयी?
सोमवार को क्षेत्र के सोनाबेड़ा के करीब सोसिंग गांव में नक्सलियों के छिपे होने की जानकारी मिली थी। महकमे के अफसर मानते हैं कि राजेश बहादुर जरूर थे मगर सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने कई चूकें की| मसलन वे कच्चे रास्ते पर वाहन से गए जबकि जंगलवार का पहला नियम घोषित है कि वाहन का इस्तेमाल ना किया जाए| इसके अलावा एक और चूक सामने आई है कि वे उसी रास्ते से लौटे जिस रास्ते से गए थे| नक्सली ऐसे ही मौकों के इंतज़ार में रहते हैं और घात लगा कर हमले (एम्बुश) में हार बार उन्होंने साबित किया है कि चूक पुलिस करती है , वे नहीं करते|

इससे पहले भी सभी बड़े हमलों में यही चूक जानलेवा साबित होती रही है| कल घटित घटना के पहले पुलिस दल जब सोसिंग गांव जा रहा था तो आधारगांव के करीब उनकी गाड़ी खराब हो गई। मजबूरीवश पुलिस दल को सोनाबेड़ा गांव से ट्रेक्टर मंगवाना पड़ा और आगे नहीं बढ़कर वे आमामोरा गांव की तरफ चले गए। जंगल में नक्सलियों ने पुलिस दल पर घात लगाकर हमला कर दिया| शहीद परिवारों में मातम छा गया है|
एक सिपाही लापता है | आशंका है कि नक्सलियों ने उसका अपहरण कर लिया है| पुलिस पार्टी लापता पुलिसकर्मी की खोज में जंगल का चप्पा चप्पा छान रही है। शहीदों के शवों को हेलीकाप्टर से रायपुर लाया गया |
शवों की हालत बताती है कि नक्सलियों ने शवों को भी नहीं बख्शा | धारदार हथियार से अंगों को काटा गया| कई शव कटे हुए पाए गए हैं। हमेशा की तरह नक्सलियों ने पुलिस के हथियार भी लूट लिए।
क्या मानवाधिकारवादी बता पाएंगे कि इंसान के अधिकार हो सकते हैं मगर मरने के बाद क्या उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं? यह सिर्फ अधिकार की बात नहीं है| एक तो मारना ही गलत है चाहे कोई भी मारे| मार करके लाशों की दुर्गति करना पैशाचिक कृत्य हैऔर जो पिशाच बन चुके हैं वे क़ानून कायदे की भाषा समझ ही नहीं सकते, यह क़ानून-कायदे वाले कब समझेंगे- समझ नहीं आता|

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सिर्फ पलाश बाकी खलास

गुरुवार, 3 मार्च 2011

इस बार लम्बे अरसे बाद गाँव जाना हुआ और वहाँ पंहुच कर बसंत का जो नजारा देखा तो होश उड़ गए| निस्तब्ध वातावरण में प्रकृति एक नए चोले में सज रही है और बसंत ने कानन में डेरा डाल रखा है| आगबबूला हुए सुर्ख पलाश ने बाजी मार ली है और बाकी सब खलास हैं| सूखे दरख्तों के पत्ते झर रहे हैं और हवा की हिलोर भटकाने के लिए काफी है| पहाड़ अब तक हरी चादर ओढ़े सो रहे थे अब जाग रहे हैं और जंगल का हरेक दरख़्त अपने पत्तों का बोझ धरती पर पटकने को आतुर है| सूखे पत्तों के चादर सी जमी नजर आती है |अब चारों तरफ उजाड़ का मौसम है| कहीं कोई हरित पट्टी दिख जाए तो राहत मानिए|
इस पूरे नज़ारे में पलाश उर्फ़ टेसू उर्फ़ पलसा सबसे ज्यादा आकर्षित करता है| उसके लाल सुर्ख फूल खुल कर खिले हैं| यह बसंत है|और बसंत क्या है यह जंगल से ज्यादा कोई नहीं जानता| जब बड़े बड़े पत्तों वाला पलाश अपने सूखते हुए पत्तों को छोड़ सिर्फ सुर्ख लालिमा लिय्रे दहकती हुई फूलों की डालियों के साथ तेज धूप में तना रहता है तो सारे पेड़ उसकी इस आभा के सामने फीके लगते हैं| एक अकेला पेड़ सारे वीराने को अपने सौन्दर्य से भर देता है। पलाश लाख सुन्दर फूल है पर उसमें सुगन्ध नहीं होती ! वह इतना भारी होता है की उसे जूड़े में सजाया नहीं जा सकता, वह किसी भी गुलदस्ते की शोभा नहीं बन पाता| पलाश इस मौसम में केसरी आभा से दमकता है| फागुन मस्ती कीशुरुआत है| बाकी पेड़ और झाड़ियाँ भी हैं पर रूतबा तो पलाश और सेमल का ही है| सेमल हर जगह नहीं दिखता |

सुखद है कि घर के बगीचे में एक अदद पलाश का भी पेड़ साबुत खडा हुआ है और इस बार वही सबके आकर्षण का केंद्र रहा| इसका वानस्पतिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। इसकी लकड़ी से कोई फर्नीचर वगैरह नहीं बन सकता है इसीलिए अमूमन इसे लोग नहीं उगाते|

जंगलों में इसके पेड़ बहुतायात में पाए जाते हैं| ख़ास करके इस इलाके में तो सड़क का लगभग हर किनारा पलाश की उपस्थिति दर्शा जाता है| इसे "जंगल की आग" भी कहा जाता है। प्राचीन काल ही से होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है।इसके फूल सुखा कर उबाल लिए जाते हैं जिससे प्राकृतिक रंग तैयार हो जाता है| यह फूल असाध्य चर्म रोगों में भी लाभप्रद होता है। हल्के गुनगुने पानी में डालकर सूजन वाली जगह धोने से सूजन समाप्त होती है।टेसू के फूल को घिस कर चिकन पाक्स के रोगियों को लगाया जा सकता है। इससे एलर्जी नहीं होती है|
गाँव की अमराई और घर का एक अदद आम के पेड़ पर इस बार खूब बौरें आईं हैं| यह सुखद संकेत है कि आम खूब फलेंगे| इन पेड़ों के पास जा कर कोई खडा हो जाए तो उनकी खुशबू पुलकित कर देती है| अमुवा की डाली पे गाए मतवाली... हमने कोयल की कूक सुनने का इंतज़ार किया मगर शायद कोयल आजकल मौन है| याद आया... बीत गयी रुत सावन की कोयल हो गयी मौन, अब दादुर वक्ता भए तो हमको पूछी कौन| खैर आगे बढ़ने पर देखा सेमल (रुई)पर भी गुलाबी फूल आए हैं और वह भी पलाश के साथ होड़ कर रहा है|

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नक्सलियों के हवाले कालाहांडी

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

बस्तर और सरगुजा में भीषण तपाने के बाद लाल हवाओं की बढ़ती धमक ने छत्तीसगढ़ के शांत पड़े पूर्वी दक्षिणी मुहाने पर बंदूकों और बूटों की हलचल बढ़ा दी है| ये हलचल नई चिंताओं का सबब बन रही है और इलाके में आम जनजीवन आने वाले समय के एक खामोश तूफ़ान की आहट से सशंकित है| खुली ख़बरें बताती हैं कि राष्ट्रीय राजमार्ग (217) पर उनकी पदचाप एक नए संकट का आगाज कर रही है|
महासमुंद, सराईपाली,बसना, पिथौरा समेत जोंक नदी पार पश्चिमी ओडीसा में कालाहांडी और नुआपाड़ा जिले तक नक्सलियों की उपस्थिति दर्ज हो चुकी है|

कालाहांडी के नाम से भुखमरी के लिए कुख्यात एक बड़ा हिस्सा भी अब नक्सलियों के निशाने पर आ गया है|
भीषण गरीबी और जहालत की उर्वर जमीन पर नक्सली अपना सुरक्षित ठिकाना बना चुके हैं ओडीसा के नुआपाड़ा-संबलपुर-बोलांगीर जिले में गांवों में बैठकें लेनी शुरू कर दी है|ख़बरें हैं कि नुआपाड़ा-सोनाबेड़ा इलाके में नक्सलियों ने एक सरकारी इमारत को फूंक दिया और वन विभाग के अफसर की इससे पहले ह्त्या कर दी|

कालाहांडी का खरियार रोड इलाका पिछली सदी के पूर्वार्ध तक छत्तीसगढ़ में शामिल रहा है | राष्ट्रीय राजमार्ग (217) पर जोंक नदी पुल पार करते ही पश्चिम उड़ीसा शुरू हो जाता है| महासमुंद जिले के कई गांवों में वर्दी पहने नक्सलियों को देखा जा रहा है|नक्सलियों ने चारों ओर से ग्रामीणों को घेर कर नुक्कड़ नाटक दिखाया।

सोनाबेड़ा पहाड़ी इलाका है जिसकी एक सीमा छत्तीसगढ़ के देवभोग से लगी है|सोनाबेडा कोरापुट( उड़ीसा ) जिले में आता है|आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नक्सलियों पर दबाव बढ़ने लगा है लिहाजा अब वे नए सुरक्षित ठिकाने के रूप में सोनाबेड़ा-कालाहांडी में पाँव पसार रहे हैं|सोनाबेड़ा इलाका भी अबूझमाड़ -बस्तर की तरह दुर्गम और पर्वतीय है जहां पहुचना मुश्किल होने की वजह से नक्सली इस इलाके को नया सेफ जोन बना रहे हैं| कालाहांडी में दुर्भिक्ष और बेहद पिछड़ापन नक्सलियों को अपने पाँव जमाने में मददगार लग रहा है| खुद महासमुंद (छत्तीसगढ़) जिले के बागबाहरा में आलम यह है कि रायपुर से महज 90 किलोमीटर दूरस्थ महासमुंद जिले मुख्य राजमार्ग(217) पर पूरे दस किलोमीटर सड़क पर सिर्फ कीचड और नुकीले पत्थर हैं|
उन्होंने मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं के दबाव में चार पुलिस कर्मियों को रिहा करके अपना चेहरा बदलने की भी कोशिश की है लेकिन उनका विस्तार राष्ट्रीय राजमार्ग और पर होना उनकी रेड कारीडोर योजना को उजागर करता है| यह राजमार्ग रायपुर से भवानीपटना होते हुए गोपालपुर(पुरी-उड़ीसा) जाता है|ख़बरें हैं कि नक्सली अब यह भी तय करने लगे हैं कि लडकियां क्या पहनें जैसा कि एक नए फरमान में है कि वे जींस नहीं पहनें| क्या यही काम तालिबान भी नहीं करते रहे हैं?

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काल सलाम

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010


आमतौर पर अपनी विचारधारा के लिए सराहे और बुद्धिजीवी वर्ग में भी "हमारे अपने भटके हुए लोग" मान कर पुचकारे जाने वाले नक्सली मानवता को कलंकित कर रहे हैं और सभ्यता से तो उनको कभी कोई लेना-देना नहीं था, हैवानियत के मामले में भी लिट्टे और तालिबान को मात दे रहे हैं| रायपुर लाए गए 27 जवानों के शवों की हालत बताती थी कि उनके साथ कितना क्रूर बर्ताव किया गया था| जो जवान मारे गए वे ड्यूटी कर रहे थे और वे किसी और देश के नहीं इसी देश के नागरिक थे|रोजी-रोटी की खातिर फ़ोर्स में भर्ती हुए थे और हुक्म था इसलिए तैनात थे| पहला वार भी उनने नहीं किया था|

27 जवानों की हत्या के बावजूद कुल 63 सदस्यीय अभियान दल में ज़िंदा बच गये बहादुरी से लड़े चार जवान परमानद, अनिल, अजय और शफीकुल रायपुर में अपना इलाज करा रहे हैं। इन सीआरपीएफ जवानों ने घटना का जो विवरण पेश किया है, वह साबित करता है कि नक्सली जितने क्रूर और निर्मम हैं उतने ही कायर भी हैं। वे छुप कर बैठे हुए थे और इस बार उन्होंने अकस्मात् फायरिंग कर के एक झटके में करीब दस जवान हलाक कर दिए। चारों तरफ से गोलियों की बौछार ने सर्चिंग करने निकले और हर तरह के खतरे से निपटने के लिए तैयार जवानों के बीच हडकंप का माहौल बना दिया जो सारे अंदेशों के बावजूद पल भर के लिए पेड़ की छांव तले खड़े थे। उनको पोजीशन लेने का भी मौका नहीं मिला। परमानंद के मुताबिक हमारे जो साथी कुछ मिनट पहले साथ में चल रहे थे वे निर्जीव थे। ऊपर आसमान से बूंदें आ रही थी और सामने से गोलियों की बौछार.. सोचने-समझाने का वक्त ही नहीं था। जिसने पोजीशन ले ली वह बच गया। यह हमला इतना अकस्मात् और ताबड़तोड़ था कि एकबारगी होश गुम कर देने के लिए काफी था मगर जिसे जहां जगह मिली वहीं पोजीशन ले ली और फायरिंग का जवाब फायरिंग से दिया। हर कोई मौत के मुंह में फंसा था और उस वक्त एक चीज समझ में आ रही थी कि लड़ो और मारो वरना मारे जाओ। अपने साथियों के खून से लथपथ शवों के बीच शोक और सदमे के हालात थे| गोलियां चारों तरफ से आ रही थी।
शहीद जवानों के शवों का परीक्षण करने वाले रायपुर के आंबेडकर अस्पताल के डाक्टर भी नक्सलियों के क्रूरता के गवाह बने हैं। गले रेतने और अंग-भंग के शिकार जवान हुए| डॉक्टरों के मुताबिक नक्सली हमले में तीन जवानों की गला काट कर हत्या की गयी थी और दो जवानों सिर कुचल कर मारा गया था। कुछ जवानों के हाथ पांव भी काटे गये थे। मुठभेड़ के दौरान हर जवान को तकरीबन तीन से चार गोलियां मारी गयी। मारने का ढंग बताता है कि नक्सलियों ने सारी हदें पार कर ली हैं| आदमी को काटता है आदमी | इस सदी की सबसे बड़ी नीचता| शिशुपाल की सौ गलतियां पूरी हो चुकी हैं और अब कृष्ण की बारी है| कलिकाल में सुना है कल्की अवतार होना है|मैं मानता हूँ कि यह अवतार दिव्य शक्ति से लैस हो यह बिलकुल काल्पनिक है मगर समझना यह चाहिए कि सेना के रूप में भी यह अवतार हो सकता है जिसकी मांग लगातार उठ रही है| समस्या का इलाज हो,यह जरूरी है| बातचीत से हो यह सर्वश्रेष्ठ है, मगर जिसकी बोली ही गोली हो उनको समझाने के लिए श्रीमान माओ त्से तुंग को कहाँ से लाया जा सकता है|

मलहम से क्या होगा जख्म नासूरी है
जख्म का इलाज तो काँटा और छुरी है

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गफलत की ताक में गुरिल्ले

गुरुवार, 1 जुलाई 2010


ज़रा सी गफलत और लाशों के ढेर ... ज़रा सी चूक और गोलियों की बौछार ... ज़रा सा बोझिल हुए और जंगल के घने झुरमुट में अचूक निशाने पर झांकती कातिल निगाहें स्वचालित हथियारों से लाशें गिनना शुरू कर देती हैं| नक्सलियों से निपटने के लिए दिल्ली से लेकर दंतेवाड़ा तक सुरक्षा दस्तों की लगातार चल रही कवायदों के बावजूद नक्सलियों ने ह्त्या का अपना पैटर्न नहीं बदला है| वे घात लगा कर बैठे रहते हैं और सुरक्षा बलों के शिविर के पास पहुचने का इंतज़ार करते हैं|
बुधवार की घटना में भी नक्सलियों ने झांसा दे कर मारने की अपनी पुरानी तरकीब से काम लिया और कई जवान शहीद हो गए| बीते हफ्ते जिला पुलिस के प्रधान आरक्षक राजेश कुजूर, आरक्षक संतोष यादव और अशोक मरकाम को नक्सलियों ने छुप कर गोली मार दी थी| अकस्मात् हमले के कारण पुलिसकर्मियों को संभलने का मौका ही नहीं मिला। विगत ६ अप्रैल को भी दंतेवाडा में शिविर के लिए चले जवानों पर हमला हुआ था| जंगल के जानकारों की राय में दरअसल नक्सली अपने हमलों की तैयारी मनोवैज्ञानिक आधार पर करते हैं| वे जानते हैं कि कोई जवान जब गश्त के लिए जाएगा तो पूरे सफ़र में गंतव्य तक जोश में रहेगा| फिर आधे रास्ते में उसकी ऊर्जा कम हो जाएगी और जब जवान शिविर तक आएँगे और तब तक कोई मुठभेड़ नहीं होगी तो थके हुए जवान हमले के लिए मानसिक रूप से किसी और तरफ ध्यान बनता चके होंगे| यह चूक नक्सली गुरिल्लों के लिए आसान मौक़ा होती है जो आएगा, वे जानते हैं और हमेशा हमारे जवान उनके जाल में फंस जाते हैं|बुधवार की घटना में जवानों की संख्या सौ से भी कम थी और नक्सली लगभग ५०० बताए जा रहे हैं| नक्सलियों ने अपने खिलाफ पिछले साल भर से चल रहे आपरेशन ग्रीन हंट के बावजूद अपने नेटवर्क का विस्तार गाँव - गाँव तक कर लिया है और अंदेशा है कि नक्सलियों के मिलिट्री दलम ने इस वारदात को अंजाम दिया है|
चूक का फायदा उठाने में माहिर नक्सली अपने अचूक मुखबिर नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं और यह हैरत का विषय है कि जंगल में कई जगहों पर जहां मोबाईल तक काम नहीं करता उनको फ़ोर्स के आने व जाने की पूरी सूचना मिलती रहती है| नक्सलियों ने पहले धौड़ाई के पास मूमेंट कर के पुलिस को झांसा दिया और जब पलिस बल उस जगह से विजयी मुद्रा में लौट रहा था तब छुप कर गोलियां चला दी| नक्सली इस इलाके को दंद्कारन्य जोन में मानते हैं और इसे एक स्वतंत्र इलाका घोषित कर चुके हैं| कई कारणों से इस इलाके में विकास की किरण अत्यंत क्षीण है और पूरा इलाका साल के सघन वनों और दुर्गम पहाड़ियों से घिरा हुआ है| अबूझमाड़ इलाके में किमताड़ी गांव में हाल में पुलिस ने नक्सलियों के लिए हथियार बनाने वाली फैक्ट्री को उजागर किया था और जानकारों की राय में पुलिस व सुरक्षा बल नक्सलियों के इस किले में जिस प्रकार घुस कर सर्चिंग कर रहे हैं उससे वे बौखला उठे हैं | इसी वजह से अचानक हमले भी बढ़ गए हैं| | अबूझमाड़ ऐसा इलाका है जहां वर्षों से कोई सरकारी राजस्व सर्वेक्षण भी नहीं हो पाया है और सरकार का कोई भी कारिन्दा इस इलाके में जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका है| नक्सलियों के सफाए में जुटी राज्य पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा दस्तों के आला अफसरों को इसकी सूचना काफी दिनों से थी कि अबूझमाड़ के कुछ गांवों में नक्सलियों के लिए हथियार बनाए जा रहे हैं मगर जानकार बताते हैं वर्षों तक इस मुद्दे की अनदेखी के जाती रही और भस्मासुर पैदा होते रहे| किसी तरह हिम्मत जुटा कर इस साल होली पर बाकायदा छापा मारा गया |नारायणपुर में ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू होने के बाद नक्सलियों की बन्दूक फैक्ट्री पकड़ने के दो मामले सामने आ चुके हैं| अबूझमाड़ इलाका लगभग महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश से सटा हुआ है|

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नक्सलवाद ने बस्तर को बर्बर युग में धकेला - डा. रमन सिंह

बुधवार, 28 अप्रैल 2010


नक्सलवाद की पृष्ठभूमि को देखें तो यह आन्दोलन पश्चिम बंगाल में शुरू हुआ| फिर इसमें बहुत उतार चढ़ाव आए| चारू मजुमदार और कानू सान्याल के दौर में भूमि सुधार एक अहम् मुद्दा था मगर बाद में जैसे जैसे इस आन्दोलन में हिंसक गतिविधियाँ बढ़ती गयीं यह आन्दोलन पूरी तरह से भटक गया और जो सर्वहारा के हित का मुद्दा था वह गौण हो गया| इसी मुद्दे पर जबकि सन कुछ शुरू हुआ था| हिंसा ने पूरे परिदृश्य को बदल कर रख दिया| इसी वजह से यह रास्ता गलत साबित हुआ|
इसके बाद पिछले तीन दशक दीगर राजों में नक्सलवाद ने पाँव पसारे| मसलन आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और छत्तीसगढ़(तब मध्य प्रदेश)| इसे मैं आन्दोलन तो नहीं कहूंगा , यह आन्दोलन भटक कर किन हाथों में पहुच गया यह देखा जाना चाहिए| जिस गरीब और सर्वहारा के हित की बात की गयी उसी गरीब को हथियार और ढाल के रूप में इस्तेमाल किया गया| गरीब का ही शोषण किया गया जबकि वे दावा करते थे कि वे गरीबों को रक्षक हैं| जंगल और पुलिस के अफसरों को लूटने वाले लोग चंदे के बल पर पलने लगे| उन्होंने सब्जबाग दिखाए तो लोगों ने भरोसा किया मगर वह भी जाता रहा| अब वे डर और आतंक के साथ लोगों को जोड़ने के प्रयास में लगे हैं| यह मोहभंग की स्थिति आनी ही थी क्योंकि जो रास्ता है हिंसा का वह वह रास्ता ही गलत है| इसकी प्रतिक्रिया भी जबरदस्त रूप से सामने आई| छत्तीसगढ़ में लोग शान्ति के लिए उठ खड़े हुए|

जो लोग दुनिया को 18वीं सदी में धकेलने का अपराध कर रहे हैं ,विकास के सभी रास्तों पर बारूदी सुरंग बिछा चुके हैं, स्कूल भवन,अस्पताल,सड़क को नहीं बख्श रहे हैं उनके खिलाफ जनता खडी होगी ही| नक्सलवाद को पुचकारने वालों के लिए पिछले तीन दशक बेशक अच्छे रहे होंगे मगर आने वाले समय में क्या हालात बन रहे हैं - यह भी जरूर देखा जाना चाहिए| आज देश भर में हिंसा की जबरदस्त निंदा हो रही है| सवाल रास्ते का है- आप किस रास्ते से सत्ता चाहते हैं? गणतंत्र के रास्ते से या गनतंत्र के रास्ते से? यह देश कभी भी हिंसक नहीं रहा और गोली की बजाय बोली के जरिये बड़े-बड़े परिवर्तन होते रहे हैं| कम से कम छत्तीसगढ़ में तो आने वाले समय में शान्ति बहाल होगी ही| देश के अन्य हिस्सों में भी नक्सली बर्बरता को रास्ता बदलना ही होगा|

इन दिनों उठ रही सेना के इस्तेमाल संबंधी मांग को लेकर मैं यह कहना चाहूँगा कि फिलहाल इसकी जरुरत नहीं लगती है| मेरी राय है कि स्थानीय पुलिस, स्थानीय जनता और केन्द्रीय बालों के माध्यम से बेहतर तरीके से काम किया जाए तो मैं समझता हूँ कि सेना की जरुरत नहीं पड़ेगी|
इन दिनों दंतेवाडा पर ख़ास फोकस है| नक्सलियों ने एक खास रणनीति के तहत दंतेवाडा (बस्तर) को चुना है| एक तरफ आंध्र प्रदेश लगा है दूसरी तरफ उड़ीसा है और तीसरा हिस्सा महाराष्ट्र को छूता है| इस इलाके को सुरक्षित क्षेत्र मान कर नक्सली अपने टेनिंग कैम्प चला रहे थे| उन्होंने पक्के ठिकाने बना लिए | भौगोलिक कारणों से वे इसे अभ्यारण्य समझते रहे हैं| घने जंगलों में उनको छुपने में मदद मिलती रही है| एक प्रकार से वे फ्यूचर जों के रूप में इसे डिवेलप कर रहे थे| वे वहाँ हथियार बना रहे थे| अब सुरक्षा बल वहाँ दबिश दे रहे हैं तो नक्सलियों की प्रतिक्रिया को सहज ही समझा जा सकता है|
इस क्षेत्र को विकास और सुरक्षा के लिहाज से विशेष तौर पर रेखांकित किया जाना चाहिए| इसकी पहल शुरू हो चुकी है| इस इलाके को आपदाग्रस्त करने जैसी मांगों का कोई औचित्य मुझे नजर नहीं आता| राज्य सरकार ने इलाके के विकास को प्राथमिकता दी है| लोगों को भरोसे में लेने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है|
दूसरी तरफ मैं यह भी कहना चाहूँगा कि एक तरफ तो जवान शहीद हो गए और ऐसी खबर आती है कि जे एन यू जैसे शिक्षण संस्थानों में कुछ लोग जश्न मना रहे थे, ऐसी खबरें आई| इसका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और एन एस यू आई ने विरोध किया| ऐसी हरकत मानसिक दिवालिएपन की पराकाष्ठा है| वास्तव में लड़ाई लोकतंत्र की है| हिंसा और आतंक के रास्ते से कतई परिवर्तन नहीं हो सकता| जिस चीन का उदाहरण दिया जाता है तो यह भी देख लिया जाना चाहिए कि चीन में भी स्वरुप आज बदल चुका है| मेरा स्पष्ट मानना है कि बर्बरता से किसी का भी भला नहीं हो सकता है| (छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह से बातचीत पर आधारित/राष्ट्रीय सहारा-हस्तक्षेप के लिए)

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और अब नहीं तो कब...?

बुधवार, 7 अप्रैल 2010


फिर वही बस्तर.. वही दंतेवाडा और फिर वही घात लगाकर हमले में कल 76 जवानों की नृशंस ह्त्या ... यह ख़बरें मीडिया में गूँज रही हैं और अहम् सवाल है कि जंगली दरिंदों की मक्कार और वहशियाना हरकतों के शिकार कब तक वे बेक़सूर जवान बनते रहेंगे जो शान्ति लाने के लिए जंगल में तैनात किये गए थे मगर धोखे में रख कर मार दिए गए| हैरानी होती है जब इस तरह की जघन्य हरकतों को किसी "वाद" का नाम दे कर यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि यह जायज है जबकि यह हरकत हर तरफ धिक्कारी जा रही है| जो जवान मारे गए हैं वे भी आम घरों से थे और सिर्फ फर्ज निभाने के लिए जंगल में गए थे| नहीं जाते तो ड्यूटी से जाते और गए तो उन लोगों के हाथों मारे गए जो समता, समानता शोषण का खात्मा के दावे करते हैं और जाने किस खूनी विचारधारा में अंधे हो कर अपनों का ही खून बहा रहे हैं| यह बस्तर की संस्कृति तो कतई नहीं है|
नक्सलियों ने फिर साबित किया क रणनीति बनाने और अपनी ख़ास शैली में झांसा दे कर मारने की उनकी दरिन्दगी से निपटने के लिए पुलिस और सुरक्षा बालों को छापामार लड़ाई में पारंगत होना ही पडेगा| नक्सलियों ने सी आर पी एफ के 76 जवान तब हालाक कर दिए जब सारे थके-मांदे जवान दंतेवाडा जिले में आंध्र प्रदेश से सटे कोंटा क्षेत्र के चिंतलनार जंगल की तीन दिवसीय गश्त कर के लौट रहे थे| तीन तरफ से पहाड़ियों और जंगली झुरमुटों के की आड़ में लगभग 1000 नक्सलियों ने जवानों को तीन तरफ से घेर लिया और बारूदी सुरंग लगा कर वाहनों के परखचे उड़ा दिए|

नक्सलियों ने अपनी पुरानी "एम्बुश" लगा कर घातक वार करने की परिपाटी के तहत इस वारदात को अंजाम दिया|
जगदलपुर के अस्पताल में दाखिल सी आर पी एफ के जवान प्रेम कुमार के मुताबिक़ उनकी पूरी कंपनी को नक्सलियों ने उड़ा दिया| वह संयोग से ज़िंदा बच गया| इस तरह की घटना में चूक के बिन्दु तलाशने वाले बता रहे हैं कि सुबह जब सारे जवान जब गश्त पर थे तब उनके साथ अमूमन साथ चलने वाली एस पी ओ (विशेष पुलिस अधिकारी )की टीम नदारद थी| एस पी ओ वे आदिवासी बनाए जाते हैं जो नक्सलियों से छिटके हुए होते हैं और इलाके के जानकार होते हैं| अमूमन छत्तीसगढ़ पुलिस जब किसी ऐसे अभियान पर निकलती है तो एक घेरा बनाया जाता है जिसमे आगे एस पी ओ के जवान होते हैं और वे एक किलोमीटर आगे रहते हैं| एस पी ओ आदिवासी जंगल के सारे ठिकानों से वाकिफ होते हैं| बताते हैं कि जो बटालियन हलाक हुई है उसमे एस पी ओ का कोई दस्ता आगे नहीं था| सारे जवान दो दिन से आपरेशन ग्रीन हंट के तहत कोंटा इलाके के सारे जंगल की गश्त करके बेस कैम्प लौट रहे थे| रास्ते में घने जंगली और ऊंची नीची पहाड़ियों के साए में चारों तरफ से फायरिंग होनी शुरू हो गयी| खबर के मुताबिक करीब एक हजार नक्सली पेड़ों की आड़ में थे और सुरक्षा दस्ते के वाहन प्रेशर माइंस व बारूदी सुरंग की चपेट में आ गए थे|नक्सलियों ने अपनी पुरानी रणनीत के तहत ताबड़तोड़ हमले किये औए सुरक्षा बल के जवानों को सम्हालने का अवसर भी नहीं दिया| यह नक्सलियों की पुरानी नीति रही है| वे बड़े हमले छुट्टी के दिनों के आसपास या लौटते हुए दस्तों पर करते हैं| हमले का वक्त शायद इस लिए चुना गया क्यों कि इतनी सुबह कोई भी अलसाया ही रहता है और मनोवैज्ञानिक तौर तरीकों से वाकिफ नक्सली जानते होंगे कि लौटते हुए जवान शायद इस खुशफहमी में भी रहे होंगे कि जाते हुए रास्ता साफ़ था तो आते हुए क्या होगा...लेकिन इस तरह की चूक का ही नक्सली फायदा उठाते रहे हैं|
हमले की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि इतनी बड़ी संख्या में नक्सली एकत्र रहे थे तो उनके मूवमेंट की सूचना इंटेलीजेंस को क्यों नहीं मिल पाई?
कुछ आला अफसर इस बात पर एतराज कर रहे हैं कि सुरक्षा के साफ़ निर्देशों में कहा गया है कि कच्ची सड़कों पर वाहन की बजाय पैदल गश्त से ही बारूदी सुरंगों से बचाव हो सकता है| इस नियम का पालन किया जाता तो कई जानें बच सकती थी| अमूमन ऐसी घटनाओं में इस नियम की अनदेखी ही घातक साबित होती रही है| नक्सलियों ने झांसा दे कर पहले सुरक्षा दस्तों को निश्चिन्त किया और फिर लौटते हुए उन पर हमला कर दिया| यह तरीका 12 जुलाई 2009 को भी राजनांदगाँव में अमल में लाया गया था| जब एक एसपी समेत 30 जवान झांसे में ला कर मार दिए गए थे| जानकारों की राय में झांसा दे कर मारना नक्सलियों के तौर तरीकों का अहम् हिस्सा है जिसे अमूमन डिस्ट्रिक्ट फ़ोर्स के पुलिसकर्मी समझ जाते है और उनको एस पी ओ की भी मदद मिलती है लेकिन सी आर पी एफ के जवान एक तो जंगल के भूगोल से नावाकिफ होते हैं और सीधी लड़ाई में ही भारी पड़ते हैं मगर छुप कर किये गए वार में उनको जान गवानी पड़ती है|यह महकमे के लिए संकेत है कि जंगल के सापों से लड़ना है तो जंगली तौर तरीके अपनाने ही पड़ेंगे |और अब नहीं तो कब...?

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खुश रहना मेरे यार...

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010


छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड में पिछले कई वर्षों से जंगलों में उत्पात के लिए कुख्यात हो चुके हाथियों को लेकर अच्छी खबर आई है| केंद्र सरकार ने इसी महीने एक समिति का गठन किया है जो प्रोजेक्ट टाईगर की तर्ज पर प्रोजेक्ट एलीफेंट को कार्यान्वित करने पर एक रिपोर्ट देगी|इस समिति में ऐसे लोग रखे गए हैं जो वन्यजीव-जंतुओं के मामले में जानकार हैं और पर्यावरण के विनाश के कारणों पर लगातार चिंता करते रहे हैं|

इस तरह की खबर जब भी आती है कि धरमजयगढ़ या रायगढ़ के कुछ इलाकों में हाथियों ने जम कर उत्पात मचाया है तो मेरी तरह और भी कई लोग इस समस्या की तह में जाने की कोशिश करते हैं| कोशिश में पता चलता है कि हाथियों के भड़कने के सटीक कारण हैं| जंगल काटे जा रहे हैं और उनका विचरण -चारा क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है| एक पूरा कारीडोर है जिसमे हाथी लगातार आते-जाते रहते हैं| यह कारीडोर झारखंड से शुरू होता और उड़ीसा मेंविलीन होता है| हाथी इस अंचल में शायद हजारों वर्षों से हैं| उनके उत्पात के शिकार वे ग्रामीण बनते हैं जो इस कारीडोर के आसपास बसे हैं| हाथी उनकी बस्तियों में जा घुसते हैं और झोपड़ियां उजाड़ कर सारा सामान जमींदोज कर देते हैं| दुखद यह भी है कि वे लोगों को अपनी सूंड से उठा कर जमीन पर पटक देते हैं| सैकड़ों लोग हाथियों के कोप के चलते मारे गए हैं| मारे जा रहे हैं| लोगों में गहरा रोष है और इस इलाके में हाथियों को भगाने के लिए जो उपाय किये जाते हैं उससे हाथी और भड़कते हैं| शोरगुल, पटाखे फोड़ना या उन पर हथियारों से हमला करना और भीड़ के साथ उनको उकसाना इत्यादि सारे उपाय एक ऐसी स्थिति को जन्म दे रहे है जिसमे वर्गभेद और पलटवार के रक्तरंजित प्रतिशोध में हाथी समाज को इंसानों के प्रति क्रुद्ध है| हाथी अब इंसान को देखते ही भड़कते हैं और सबसे पहले हमला कर देते हैं| समस्या बेहद गंभीर हो चुकी है| इसमें वन महकमा सिर्फ मारे गए लोगों के निमित्त मुआवजा देने और नुकसान की भरपाई में ही हर साल लाखों रूपये खर्च कर रहा है|मरने वाले इंसानों के संख्या भी हजारों में पंहुच गयी है|
सबसे पहले तो यह देखने वाली बात है कि हाथी कहाँ हमले कर रहे हैं? वे जंगल में हमले कर रहे हैं| जंगल में उनका नैसर्गिक अधिकार है और इंसान ने उसके अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण किया है जिसके जवाब में हाथी अब इंसानी बस्तियों पर हमले कर रहे हैं| जो जंगल का क़ानून समझते हैं वे जानते हैं कि अगर भालू ने शेर पर हमला किया तो सारे शेर भालुओं के दुश्मन माने जाते हैं| इसी तरह किसी भी जानवर ने अपनी नैसर्गिक परम्परा तोड़ कर किसी दूसरे जानवर को निशाना बनाया तो उसका पूरा समाज निशाने पर रहता है| यह बात इंसानी समाज पर भी लागू हो रही है| हाथी मनुष्य को अपना दुश्मन समझ बैठे हैं तो इसके कारणों पर गौर करके उपाय ढूंढे जाने चाहियें| न कि हाथियों को मार दिया जाना चाहिए जैसा कि हो रहा है| इससे जंगल में इंसान का जीना मुश्किल हो जाएगा| वैसे भी हम जंगलों को उजाड़ कर कंक्रीट का जंगल बना रहे है जिसमे हम तो एक नए विनाशकारी दौर में मन मसोस कर रह रहे हैं लेकिन शायद.. हाथी नहीं रह सकते| कोई भी वन्यजीव नही रह सकता| शहरों में पालतू और आवारा कुत्ते रहते हैं मगर सड़क पर किसी कुत्ते पर गाडी चढ़ा दी जाए तो सारे कुत्ते हरेक वाहन के पीछे भूंकते हुए दौड़ते हैं| आजकल पर्यावरण से गिद्धों के और कौओं के गायब होने की चिंता जताई जाती है| हाथियों को लेकर भी हालात बेहद गंभीर है| देश भर में कुल २६ अभ्यारण्यों में महज २५-२६ हजार हाथी रह गए हैं और इनमे छत्तीसगढ़ कारीडोर में महज ५-६ हजार हाथी रह गए हैं| हम एक तरफ देश भर में गणेशोत्सव में हाथी के प्रतिरूप गणपति बप्पा की पूजा करते हैं| दूसरी तरफ उनको उनके कीमती दांतों के लिए संसारचंद जैसे तस्करों के हाथों मार दिया जाता है|
मैं अक्सर जब भी 'हाथी मेरे साथी' का गाना सुनता हूँ तो हालात पर सोचने के लिए विवश हो जाता हूँ -

....नफरत की दुनिया को छोड़ के, प्यार की दुनिया में,
खुश रहना मेरे यार...

जब जानवर कोई इंसान को मारे..
कहते हैं दुनिया में वहशी उसे सारे..
इक जानवर की जान आज इंसानों ने ली है ..चुप क्यूं है संसार ...
खुश रहना मेरे यार...

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सवाल गणतंत्र में आस्था का है..

गुरुवार, 28 जनवरी 2010


रायपुर में प्रेस क्लब के एक निर्णय ने आजकल एक ऐसा विवाद पैदा कर दिया है मानो बर्र के छत्ते पर हाथ पड़ गया हो| मैं छत्तीसगढ़ में पिछले छह सालों से सतत हूँ और यहाँ घटनाक्रम जिस तरह से चल रहा था उसमे मेरा मानना है कि यह स्थिति आनी ही थी|हालात सचमुच कठिन होने की तरफ हैं| एक तरफ बस्तर और सरगुजा में पिछले 30-35 सालों से जंगली बेल-बूटों की तरह पसर गए तथाकथित माओवादी लड़ाके हैं जो बंदूकें हाथ में लिए बेधड़क घूमते हैं| उनका गनतंत्र देश के तंत्र के सामने लगातार चुनौती बन गया था| जाहिर है, कोई भी चुनी हुई सरकार अपने नागरिकों को इस तरह से अराजकता की लम्बी छूट नहीं दे सकती है और अब तो गृह मंत्री पी चिदंबरम के दौरे के बाद बस्तर में आपरेशन ग्रीनहंट का पार्ट-२ बहुत खतरनाक और महाआक्रामक तरीके से संचालित होने जा रहा है| इस मोड़ पर चीजें जिस दिशा में जाती हुई नजर आ रही थीं उनमे एक यह भी रहा कि जो लोग नक्सलियों की विचारधारा का समर्थन करते हैं, यह मानते हैं कि देश में सशस्त्र क्रान्ति के जरिये ही बदलाव संभव है और यह भी मानते हैं कि पुलिस और सरकारें सिर्फ और सिर्फ दमन ही कर रही हैं, उनको यह नागवार लग रहा है कि बस्तर को फ़ोर्स के हवाले क्यों कर दिया गया है|वे यह भी विलाप कर रहे हैं कि बस्तर में टाटा समेत दीगर पूंजीपतियों के लिए लाल कालीन बिछाने की खातिर यह सारी सरकारी कवायद हो रही है| इसी मौके पर पिछले दिनों मेधा पाटकर और उनके कुछ साथी बस्तर आए और उन्होंने रैली निकाली लेकिन उनके ऊपर सड़े हुए टमाटर और अंडे फेंके गए| रैली धरने में बदल गई और रायपुर आ कर मेधा के साथी बिफर पड़े| इससे पहले उनके साथ आए बुद्धिजीवी बस्तर में पत्रकारों से भी उलझे और आरोप लगाया कि वे सरकार से मिले हैं और पुलिस की दलाली कर रहे हैं| प्रेस क्लब रायपुर ने जो निर्णय लिया है वह इन सारी परिस्थितियों के मद्देनजर लिया गया लगता है|
अब शायद छत्तीसगढ़ में हालात यह बन चुके हैं कि यहाँ काम करने वाले मीडियाकर्मियों को अपनी प्रतिबद्धताओं को बिलकुल साफ़ करना होगा,और यह भी स्पष्ट करना होगा कि वे भारतीय संविधान के साथ हैं या उस बन्दूक तंत्र को मानते हैं जिसमे हर कसूर का जवाब सिर्फ गोली है| बोली नहीं गोली की भाषा में जो बात करते हों और अपने विरोधी को सिर्फ दुश्मन मानते हों| जो सिर्फ हरा ही हरा देखते हों और सावन के आने से पहले ही बावरे हो गए हों, वे किसी टापू पर तो राज कर सकते हैं लोकतंत्र में उनको सरकार इजाजत नहीं दे सकती| सरकार अगर गलत करती है तो जवाब भी लोकतंत्र मांग लेता है लेकिन गनतंत्र में कौन किसको जवाब देता है| वहाँ सिर्फ गोली चलती है|जो लोग शोषण के खात्मे का नाम लेकर एक हिंसक खूंरेजी शोषण का संगठन चला रहे हों, उनका साथ कोई भी सभ्य समाज नहीं दे सकता| यह देश शान्ति को पसंद करता है| पंजाब का उदाहरण सामने है| वहाँ आतंकवाद ने कम मुश्किलें पैदा नहीं की लेकिन अंततः जीत लोकतंत्र की ही हुई| आपको दिक्कत है तो कई रास्ते संविधान में हैं| संविधान में आस्था नहीं है तो महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश की परम्पराओं में है| संवाद में है|विरोध में है| प्रदर्शन में है| और यह भी नहीं कर सकते तो लड़िये चुनाव और बदलवाइए क़ानून,लाइए सर्वहारा का समाजवाद,कौन रोक सकता है लेकिन यह तो नितांत असभ्य और बर्बर है कि चंद लोग संगठित हो कर उस निरीह आदिवासी का सुख चैन और शान्ति छीन लें जो जंगल में पहले साहूकारों और शोषकों के चंगुल में फंसा था और अब उन लोगों की बंदूकों के आगे थरथरा रहा है जिनके रहनुमा होने का भरोसा था| अब बन्दूकधारी आदिवासियों को भी मारने से झिझक नहीं रहे| यह कौन सा माओवाद है? और कौन इस तरह की नेत्रहीन दिशाहीन आत्मघाती विचारधारा का समर्थन कर सकता है|
मुद्दा रायपुर प्रेस क्लब की नई बंदिशों का है| मेरा मानना है कि इस तरह की बंदिशों से चीजें और उलझेंगी|जिसे रायपुर में बात रखने का अवसर नहीं मिलेगा वह भिलाई प्रेस क्लब में जा कर प्रेसवार्ता ले लेगा|...और सबसे बड़ा सवाल है कि यह किस मापदंड से तय होगा कि कौन किसका समर्थक है| किसी की एंट्री बैन कर देना,विचार व्यक्त करने से रोकना या विरोधी के बयान को तवज्जो न देना समस्या का समाधान नहीं हो सकता है|किसी में एस्टीम है तो उसे रिलीज करने का मौक़ा मीडिया देता है और मेरा मानना है कि इस दौर में भी लोकतंत्र की समझ रखने वाले बहुत से वामपंथी बुद्धिजीवी भी माओवादी हिंसा की खुली खिलाफत कर चुके हैं| लेकिन मैं समझता हूँ,प्रेस क्लब ने अपनी पारदर्शिता और प्रतिबद्धता जाहिर करने के लिए यह कदम उठाया है| कोई मुझसे पूछे तो मैं भी अपनी प्रतिबद्धता संविधान के प्रति जाहिर करूंगा| रायपुर में नौकरी कर रहा हूँ तो भी और कश्मीर में करूंगा तो भी| फिलहाल तो एक आम राय है कि शान्ति लौटना ही चाहिए|विडंबना यह है कि सलवा जुडूम(बस्तर में चला शान्ति के लिए जन जुडाव अभियान)लहूलुहान हो चुका है पर बस्तर और सरगुजा में शान्ति आनी ही चाहिए| अमन-चैन आदिवासी का नैसर्गिक अधिकार है|

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ह्त्या नक्सलियों ने की या हीरा खदान माफिया ने

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

छत्तीसगढ़ के हीरा खदान क्षेत्र में पिछले शनिवार की रात वन विभाग के अधिकारी की ह्त्या नक्सलियों ने की थी अथवा वे इलाके में काबिज अवैध खनन माफिया का शिकार बन गए ? यह सवाल पिछले कई दिनों से इलाके चल रही अवैध हीरा उत्खनन की वारदातों की पृष्ठभूमि में कौंध रहा है| मारे गए वनपाल मार्क तांडी को शनिवार को रात में झांसा दे कर गरियाबंद-देवभोग के जंगल में बुलाया गया था| वे बिना पुलिस सुरक्षा के चार वनकर्मियों को लेकर जंगल में चले गए थे| सूचना किसी गाँववाले से आई थी कि जंगल में अवैध कटाई चल रही है| इसकी पुष्टि और रोकथाम के लिए 48 वर्षीय तांडी इन्दागाँव के समीप जंगल में प्रवेश कर गए लेकिन वे जिंदा नहीं लौट सके|
इस घटना ने जंगलों में ड्यूटी करने वाले आम अफसरों, कर्मचारियों समेत पुलिस महकमे के मैदानी दस्तों की सुरक्षा की असलियत बयान कर दी है| गरियाबंद इलाका दरअसल सरकार से ज्यादा जंगल के उस माफिया की नजर में चढ़ रहा है जिसे मालूम है कि इलाके में ज़रा सी खुदाई करने पर असली हीरे के खनिज स्रोत निकल आते हैं| लोग रातों में इलाके में सारी रात खुदाई करते रहते हैं यह इलाके का बच्चा - बच्चा जानता है| इलाके में नक्सलियों की पकड़ भी बढ़ रही है| इस बाबत भी कई घटनाओं से प्रमाण मिलता रहा| मसलन इसी साल कांकेर की पुलिस फ़ोर्स के 13 जवान जंगल में नक्सली हमले में तब मारे गए जब झांसा दे कर उनको जंगल में बुलाया गया था| गरियाबंद इलाका रायपुर और धमतरी के समीप है| बस्तर में लाल झंडा गाड़ने के बाद नक्सली इस इलाके में लगातार दबिश दे रहे थे| पिछले साल उनका एक बड़ा नेता गोपन्ना यहाँ से पकड़ा गया था| गोपन्ना को पकड़ने के बाद नक्सलियों ने खूब कोहराम मचाया| पुलिस विभाग को भी गोपनीय इत्तला मिल रही थी कि नक्सली यहाँ लोकल आपरेशन स्क्वाड बनाने की तैयारियों में जुटे हैं| इलाके में पुलिसकर्मियों की संख्या दुगुनी करने के अलावा इसे नया पुलिस जिला बनाने की पहल पूरी हो पाती इससे पहले नक्सलियों ने वन विभाग के अफसर की ह्त्या करके पूरे महकमे के कर्मचारियों में दहशत भर दी है| इलाके में सक्रिय नक्सलियों ने 22 नवम्बर को वन विभाग का नियंत्रण कक्ष भी आग के हवाले कर दिया था| पिछले दिनों बोरई[गरियाबंद] इलाके का एक वन अधिकारी जंगल में कुछ सशस्त्र लोगों द्वारा धर लिया गया था मगर शुक्र रहा कि उन लोगों ने उसके रूपये और मोबाईल छीन कर उसे ज़िंदा वापस जंगल से खदेड़ दिया |
दरअसल यह जांच का मसला है कि इलाके में जो सशस्त्र लोग सक्रिय हैं वे कौन हैं और उन्होंने वन विभाग के अफसर को क्यों निशाना बनाया ? इलाके में नक्सली सक्रिय हैं यह पुलिस के अधिकारी भी मान रहे हैं लेकिन अब तक देखा गया है कि नक्सली झांसा दे कर पुलिस पार्टी को निशाना बनाते रहे हैं, किसी साधारण अफसर को जंगल में बुला कर मारने की संभवतः यह पहली घटना है| गोली से नहीं वरन लाठी अथवा बन्दूक के कुंदे जैसी चीज से मार डालने की घटना नक्सलियों की प्रचलित ह्त्या शैली से मेल नहीं खा रही है| जिन लोगों ने वनपाल की ह्त्या की, उन्होंने उनके साथ आए चार कर्मचारियों को जाने दिया| इलाके में रात में खुदाई करने वालों में आसपास के ग्रामीण और दूर-दूर से आए हीरा व्यापारी भी शामिल हैं जो किम्बर्लाईट और कोरेंडम का अवैध उत्खनन करा रहे हैं| इलाके में जुलाई में सुरक्षा दस्ते को हटा लिया गया था जिसे लेकर वन विभाग के आला अधिकारी नाराजगी भी जता चुके हैं| देवभोग में हीरे की खदानों में सरकारी स्तर पर पूर्वेक्षण का काम चल रहा है और सरकार अगले दोतीन वर्षों में यहाँ खुदाई की योजना पर काम कर रही है| हीरे का कारोबार करने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी डी बियर्स की सहयोगी इकाई डायमंड ट्रेडिंग कंपनी (डीटीसी) के मुताबिक दुनिया के 90 फीसदी हीरों के तराशने का काम भारत में होता है, ऐसे में यहाँ हीरा उद्योग के फलने-फूलने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं लेकिन एक बड़ा खनन माफिया अभी से खुदाई में भिड गया है जिसे रोकने का काम वन विभाग के अमले के लिए कितना जोखिम भरा है यह शनिवार को हुई घटना में सामने आ गया है|

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शान्ति की कामना में बस्तर के आदिवासी

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009


छत्तीसगढ़ को किसी जमाने में शान्ति का टापू कहा जाता था लेकिन आज हालात ऐसे नहीं हैं बस्तर की शांत वादियों में बन्दूक और बारूद की गूँज है और हजारों साल से जंगल की लौकिक तपस्या में लीन आदिवासी पुलिस बनाम नक्सली मुठभेडों से त्रस्त हो चुके हैं| एक आम शहरी अब पेड़ों की छाँव और झरनों की गोद में सुस्ताने के इरादे से बस्तर जाने का ख्वाब जरूर देखता है लेकिन उसको मालूम है कि बस्तर में नीरवता और सन्नाटे की उसकी कामना रक्तरंजित क्रान्ति के आधुनिक प्रणेताओं और उनसे लोहा ले रहे सुरक्षा बालों ने छीन ली है

बस्तर को अब शान्ति चाहिए यह बात यंहा के आदिवासी पिछले पांच सालों से सलवा जुडूम की भाषा में कह रहे हैं| सलवा जुडूम (शान्ति के लिए जनजुडाव) आन्दोलन बस्तर में १९९५ में इसी इरादे से शुरू हुआ था लेकिन यह अलग बात है कि इसमें भी शहर की राजनीति ने अड़ंगा लगा कर इसे सरकारी शिविरों में कैद कर दिया| आज भी करीब ५० हजार लोग नक्सलियों के भय से राहत शिविरों में रह रहे हैं लेकिन आदिवासियों का दर्द यह है की उनकी बात न तो सरकार सुन रही है ना नक्सली जो उनके रहनुमा बन कर जंगलों में आए थे लेकिन अब हालात यह हैं कि आदिवासियों को नक्सली भी मार रहे हैं| आदिवासी की दिक्कत देखिये, पुलिस उससे मुखबिरी कराना चाहती है और वह मुखबिरी करता है तो नक्सली उसकी जान के दुश्मन बन जाते हैं| उसके सामने दोनों तरफ से मुश्किल|

बस्तर में जा कर किसी आम नागरिक से बात की जाए तो उसका पहला सवाल यही होता है कि यह कब तक चलेगा? अव्वल तो बाहर से जाने वाले हर इंसान को आदिवासी शक की निगाह से देखते हैं क्योंकि हालात ही ऐसे हो चुके हैं कि पुलिस और नक्सली दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं| पुलिस ने अब सख्त आक्रामक रवैया अख्तियार करना शुरू कर दिया है तो नक्सली भी पलटवार में जब भी उनको मौका हाथ लगता है, वे सुरक्षा बलों से भरी हुई जीप विस्फोट के जरिये उड़ा देते हैं| छत्तीसगढ़ में इस साल अब तक २५० लोगों की ह्त्या हो चुकी है जिसका सीधा सम्बन्ध नक्सली मामले से है| नक्सलवाद के सूरमा अब निहत्थे आदिवासियों पर निशाना साध रहे हैं और आदिवासियों से भरे ट्रक को विस्फोट के जरिये उड़ा रहे हैं| बस्तर में स्कूल भवन ध्वस्त नजर आते हैं क्योंकि नक्सली यह कह कर भवन को बर्बाद कर देते हैं कि इन भवनों में सुरक्षा बल को ठहराया जाता है| बस्तर में भीतरी इलाकों में घुसते ही एक अजीब सी सिहरन और आतंक मिश्रित डर की भावना पूरे रास्ते आपके साथ चलती है जब आप चौपाया किसी वाहन में चलते हैं| क्या पता कब कोई गोली आकर आपकी खोपडी उड़ा दे या जिस गाडी में सवार हैं, वह किसी लैण्ड माइन की चपेट में आ जाए? आए दिन बस्तर में बिजली के पोल गिरा कर समूचे इलाके को मध्य युग में धकेल दिया जाता है| नक्सली यह कहते हैं कि सरकार की बिजली भी नहीं चाहिए| बस्तर में शुद्ध पेयजल आज भी झरने से ही मिल सकता है और जब झरने सूख जाते हैं तो आदिवासी कीचडयुक्त झिरिया से पानी पीते हैं|

बस्तर में एक और समस्या से आए दिन लोग परेशान होते हैं- जब भी पुलिस कोई बड़ा अभियान चला कर नक्सलियों को मारती है तो नक्सली संगठन बंद का आव्हान करके पूरे इलाके में सड़क परिवहन ठप कर देते हैं| हाल में एक अजीब से फरमान से सभी ट्रांसपोर्टर परेशान हैं| नक्सली फरमान है कि किसी भी पुलिसवाले को बस में नहीं बिठाया जाए| इस फरमान से डरे बस चालकों ने बसें खड़ी कर दी| सरकार की समस्या असल यह है कि बात किससे की जाए? सरकार कहती है कि पहले बंदूकें छोड़ कर बात के लिए नक्सली आगे आएं जबकि नक्सली कहते हैं कि हमारे पास बन्दूक है तभी तो सरकार बात के लिए आगे आती है

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नक्सलियों के सफाए की तैयारियां अंतिम दौर में

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

माओवाद को आतंकवाद घोषित करने के बाद केंद्र और राज्य सरकारें छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में नक्सलियों के सफाए की तैयारियों में जुट गयी हैं| इस बाबत घोषित अभियान "ऑपरेशन ग्रीन हंट" की शुरुआत छत्तीसगढ़ के कांकेर एवं राजनांदगाँव जिले से की जाएगी| छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इन दिनों छावनी की तरह नजर आ रही है| अर्ध सैनिक बालों की सशस्त्र बटालियनों के शिविर लग चुके हैं और नक्सलियों से सीधी भिडंत से पहले की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है|


मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कल विदेश यात्रा पर रवाना होने से पहले कहा कि अभियान काफी लंबा चल सकता है| जो लोग गुरिल्लों की तरह लड़ रहे हैं उनसे गुरिल्ला लड़ाई ही की जाएगी|
राज्य में इन दिनों ओपरेशन ग्रीन हंट को लेकर आम लोगों में कुछ अलग तरह की बेचैनी देखी जा रही है| ख़ास करके बस्तर के धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में आम आदिवासी यह पूछ रहे हैं कि सुरक्षा बल जब उनके गाँव में तलाशी के लिए आएँगे तो वे किस तरह से उनको यकीन दिलाएंगे कि वे बेक़सूर हैं | हांलाकि राष्ट्रीय सहारा से एक ख़ास बातचीत में डा. रमन सिंह ने यह खुलासा किया कि सुरक्षा बल गाँव पर हमले नहीं करेंगे बल्कि उन नक्सली शिविरों को निशाना बनाएंगे जहां नक्सली प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं|
उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार अगले पखवाडे से राजनांदगाँव और कांकेर जिलो में नक्सल सफाए का अभियान तेज हो जाएगा | वैसे तो यह अभियान बस्तर में चालू ही है लेकिन अतिरिक्त बलों की तैनाती के बाद इस अभियान में और तेजी लाई जाएगी| राजनांदगाँव में १२ अगस्त को नक्सली हमले में पुलिस अधीक्षक समेत ३५ जवानो की नक्सली हमले में मौत हो चुकी है | इन दोनों जिलों को नक्सलियों के चंगुल से पूरी तरह मुक्त कराने के बाद दीगर जिलों में सघन अभियान चलाया जाएगा| इस अभियान के तहत नक्सलियों को चारों तरफ से घेर कर उन पर हमला किया जाएगा| फिलहाल राज्य में बाहर से आए जवानो को इलाके की भौगोलिक व दीगर जानकारियों से लैस किया जा रहा है| उन अफसरों के व्याख्यान भी कराए जाएंगे जो नक्सल इलाकों में तैनात रह चुके हैं|



नक्सल ओपरेशन के लिए गठित विशेष टास्क फोर्स के मुखिया बनाए गए विशेष महानिदेशक विजय रमन ने कल रायपुर में पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन और नक्सल मामलों के अतीरिक्त महानिदेशक रामनिवास से लम्बी मंत्रणा की और फिर वे रांची के लिए कूच कर गए| विजय रमन अब रायपुर में ही कैम्पिंग करके सभी पांच राज्यों में चलाए जाने वाले अभियान की सतत निगरानी करेंगे| उनके सुपुर्द हेलीकाप्टर से वे मौका ए वारदात पर भी जाएंगे|
राज्य में जम्मू कश्मीर के अलावा जिन राज्यों में चुनाव हाल में निपटे हैं वंहा से सुरक्षा बालों की आमद रफ़्त जारी है| कांकेर में बी एस ऍफ़ की तीन बटालियनें तैनात की जा रही हैं| राजनांदगाँव में आई टी बी पी की तीन बटालियनें मोर्चा सम्हालेंगी| अभियान से पहले इलाके की सर्चिंग की जाएगी और जरूरत पड़ने पर वायु सेना के हेली काप्तर की मदद भी ली जाएगी| नक्सलियों के तमाम आधार शिविरों के नक्शे तैयार कर लिए गए हैं| अर्ध सेनी बालों को निर्देश दिए गए हैं कि वे नक्सलवादियों को रोंदते हुए आगे बढ़ें| इधर हाल में नक्सलियों जिस प्रकार जवानो को मारा है उससे अभियान दल में एक किस्म की आक्रामकता और जोश देखा जा रहा है| राज्य पुलिस के जवान भी उत्साह जनक आक्रामकता से लबरेज नजर आते हैं|


इधर राज्य के भीतरी हलकों से आ रही ख़बरों के मुताबिक नक्सली भी आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं | नक्सली इस बार अपनी रणनीति के तहत गाँव के लोगों को आगे कर रहे हैं और कुछ इलाकों में प्रत्येक परिवार से एक युवक को उठा लिया गया है| सूत्रों की माने तो अभियान में लड़ाई के मोर्चे पर संघम सदस्य के रूप में युवकों को आगे रखा जाएगा और उनकी जान जाने पर यह प्रचारित किया जाएगा कि इस अभियान में बेक़सूर मारे जा रहे हैं| जशपुर नगर इलाके में झारखंड से नाक्सालवाद चलाने वाले कमांडर ग्रामवासियों की बैठक भी ले रहे हैं| धमतरी जिले में नक्सलियों ने यह धमकी जारी कर दी है कि इस बार कोई भी ग्रामीण पलायन करके बाहर नहीं जाए वरना इसके कड़े नतीजे भुगतने होंगे| राजनांदगाँव जिले में नक्सलियों ने बच्चों की भर्ती कर ली है|
जानकारों की मानें तो जंगल में लड़ाई काफी दिलचस्प और खूंरेजी हो सकती है| एम्बुश (घात लगा कर हमले) की उनकी नीति का पुलिस क्या तोड़ निकालेगी अभी यह कह पाना मुश्किल है|

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हाथी नहीं रहे साथी

शुक्रवार, 1 मई 2009

छत्तीसगढ़-झारखंड-उड़ीसा  के सीमाई जंगलों में उन्मत जंगली हाथियों के झुंडों और इंसानी बस्तियों के बीच अरसे से भिड़ंत चल रही है। वर्चस्व कायम रखने के इस शुध्द नैसर्गिक संघर्ष में फिलहाल हाथी ही आगे हैं लेकिन जब भी हाथियों को गुस्सा आता है, वे मानव बस्तियों में घुसकर उन्हें रौंद डालते हैं और फसलों को जितना चट करते हैं, उससे  अधिक नुकसान पहुंचा जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में  हाल के वर्षों में पचास से ज्यादा लोग हाथियों के कोप के चलते मारे जा चुके हैं और करीब सवा करोड़ रूपए की संपत्ति को नुकसान हुआ है। जशपुर, सरगुजा, रायगढ़, कोरिया और कोरबा जिलों में हाथियों  का प्रकोप पूरे साल रहता है। दरअसल, झारखंड अलग राज्य बनने के बाद वहां जारी उत्खनन और पेड़ों की कटाई के चलते हाथी जंगलों को छोड़ रहे हैं। वे झुंडों में चिंघाड़ते हुए राज्य की सीमाओं को चुनौती देते हैं। हाल के वर्षों में हाथियों की क्रूरता इतनी अधिक बढ़ गई कि जंगलात के अफसरों को उन पर काबू पाने के लिए असम की हाथी नियंत्रण विशेषज्ञ पार्वती बरुवा की सेवाएं लेनी पड़ गई थीं। बरुवा भी इन मदमस्त हाथियों को ठीक नहीं कर पाईं और वे अपना मिशन आगे बढ़ातीं, इससे पहले ही भुगतान संबंधी कुछ विवाद के कारण उन्हें वापस जाना पड़ गया।

 कर्नाटक  के कुछ महावत और उनके प्रशिक्षित हाथी इन जंगली हाथियों को ठीक करने में लगे हुए हैं। राज्य के पूर्व वन संरक्षक  डॉ. एस.सी. जेना कहते हैं कि राज्य के इस खास हिस्से में हाथियों का प्रकोप है लेकिन उनका मानना है कि लोगों को हाथियों के साथ रहना सीखना चाहिए। वे कहते हैं, 'छत्तीसगढ़ में लोग हाथियों की पूजा करते हैं। हाथी पालतू हो तो बात और है लेकिन जंगली हाथियों को पूजा करके शीश नवाना और केले खिलाना सचमुच भारी पड़ सकता है।' हाथी शोर-शराबा बिल्कुल पसंद नहीं करता और बौखला उठे तो रौद्र रूप धारण कर लेता है। 

इसी रौद्र रूप के चलते 2003 में 11 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। सन् 2004 में 16 लोग मारे गए थे। इस साल अभी तक 28 लोगों के मारे जाने की सूचना है। राज्य का वन अमला हाथी के हमले में मरने वालों को प्रति मृतक एक लाख रुपए मुआवजा देता है। हाथी यदि फसल खराब भी कर दे तो मुआवजा मिलता है।

बादलखोल के जंगल में हाथियों का डेरा है। आजकल 28 हाथी एक झुंड में इसमें घूम रहे हैं। हाल में 53 हाथियों का एक दल भी आ चुका है। कोरबा-धर्मजयगढ़ में 11 हाथी हैं और 28 हाथी झारखंड से आते-जाते रहते हैं। मूलत: शाकाहारी इस प्राणी ने इंसान की मुश्किल बढ़ाई जरूर है लेकिन उसकी मुश्किलें भी कम नहीं हैं। दांत वाले हाथी घात लगाकर गोली दागने वालों से डरे रहते हैं और लंबे अरसे तक हिंसक बने रहते हैं। उनसे छेड़छाड़, पथराव, बम-पटाखे, ढोल-नगाड़े बजाने जैसी कोशिशों के कारण उनका क्रोधित हो जाना स्वाभाविक है।

नेचर क्लब बिलासपुर का मानना है कि वन्य प्राणियों का लगातार होता शिकार और उनके निवास क्षेत्र में इंसानी अतिक्रमण उनके अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी है। नवनिर्मित छत्तीसगढ़ में वन्य प्राणी संरक्षण की नीति को कारगर बनाने की जरूरत है। सरकार को सुरक्षित वन क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्यों की सीमा रेखा में वन ग्रामों का सीमांकन करना चाहिए। वनों की कटाई हाथियों ही नहीं, दीगर जानवरों के लिए भी बेहद मुश्किलों का सबब बनती जा रही है। पिछले 33 महीनों में अवैध वन कटाई के 66 हजार 705 प्रकरण दर्ज किए जा चुके हैं। कुल 52 हजार 310 व्यक्तियों पर कार्रवाई हुई है और इस गोरखधंधे में छह राजपत्रित अफसरों समेत 233 दीगर कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई है। कोरबा वनमंडल के फुटका पहाड़ क्षेत्र में अवैध कटाई की जांच में दो रेंजरों समेत 10 वन कर्मियों को दोषी ठहराया गया। अहम् यह है कि राज्य में 44 प्रतिशत वनक्षेत्र हैं जिसका संरक्षण जरूरी है।

झारखंड से जुड़ा यह इलाका नक्सल प्रभावित है। हाथी तो कभी-कभार चुनौती बनते हैं लेकिन नक्सली तो पूरे साल अपनी धमक बनाकर रखते हैं। जंगल में अकेला वनकर्मी दो पुलिस वालों को साथ लेकर भी डयूटी पर जाने में गुरेज करता है। हाथियों के बढ़ते उत्पात को देखते हुए इलाके में सौर ऊर्जा बाड़ (फेंसिंग) के बंदोबस्त किए गए। 9343 मामलों में एक करोड़ 20 लाख रुपये मुआवजे के रूप में बांटे जा चुके हैं। यह राशि पिछले तीन वर्षों में बांटी गई है।

आजकल कर्नाटक  के प्रशिक्षित हाथी इन उत्पाती हाथियों को काबू करते हैं। जिस हाथी को घेरना होता है, उसके पीछे तीन हाथी दौड़ा दिए जाते हैं। दो हाथी अगल-बगल से घेरते हैं और तीसरा हाथी पीछे से काबू करता है। हाथी के पैरों में बाकायदा बेड़ी डाल दी जाती है और एक बार काबू आने के बाद उसे दूर झुंड के साथ जंगलों में छोड़ दिया जाता है।

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