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यूट्यूब पर यायावर रमेश

बुधवार, 22 मार्च 2023

 सभी मित्र ब्लॉग के साथी यूट्यूब पर भी यायावर की वीडियो पोस्ट देख सकते हैं। सुस्वागतम।

Pl type yayavar ramesh


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https://youtube.com/@yayavarramesh?si=QN7vSfMciEQwHJoZ

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पत्रकारों के पत्रकार थे रमेश नैयर जी

सोमवार, 9 जनवरी 2023

#रमेश शर्मा

दरणीय रमेश नैयर जी ने लोक की यात्रा पूरी कर ली और देवलोक को गमन कर गए हैं लेकिन उनकी यादें हमेशा जीवंत प्रकाशित रहेंगी। हमारे दिलों में वे सदा रहेंगे।

स्व. रमेश नैयर ने छत्तीसगढ़ के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी पत्रकारिता के प्रतिमान स्थापित किये। वे अपने कृतित्व और व्यक्तित्व से नयी पीढ़ी के #पत्रकारों को हमेशा प्रेरित करते रहेंगे।
बताने की जरूरत नहीं, वे पत्रकारों के पत्रकार थे संपादकों के #संपादक थे और अर्ध शताब्दी से उनका नाम चमकता रहा है।

नैयर जी उस पीढी से थे जिसने हमेशा सत्य का साथ दिया। वह हमेशा सत्य पर अडिग रहे।
#मुख्यमंत्री  #भूपेशबघेल  ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा कि स्व. नैयरजी ने छत्तीसगढ़ के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी पत्रकारिता के प्रतिमान स्थापित किये हैं। वे अपने कृतित्व और व्यक्तित्व से नयी पीढ़ी के पत्रकारों को हमेशा प्रेरित करते रहेंगे।
नैयर जी का जीवन सादगी से भरा हुआ था जब परिवार के साथ वक्त देते थे लेकिन समाज के लिए भी समर्पित थे उनको अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया। उनके निधन की सूचना से पूरे पत्रकार जगत में शोक की लहर व्याप्त हो गई।
सम्मान का कोई भी मंच हो नैयर जी की जगह सुरक्षित थी। विमोचन हो या पुरस्कार वितरण तक।
नैयर सर से जुड़े अनेक संस्मरण हैं। वे नौजवानों को प्रोत्साहित करने वाले सम्पादक थे। उनके अपने स्थापित मानदंड थे जिन पर वे उम्र भर कायम रहे l मां सरस्वती उनके कंठ में विराजमान रहती थी और जब वे दिल से लिखते थे तो जमाना गौर से पढ़ता था।
प्रिंट मीडिया से बेशक नैयर जी ने शुरुआत की थी लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी वे सिद्धहस्त वक्ता थे।
आशावाद और उम्मीद नैयर जी की पत्रकारिता के केंद्र बिंदु थे  उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वे दो टूक समीक्षक थे।

जब #करोना_वायरस  फैला तो नैयर जी भी महामारी के खिलाफ डीपीआर छत्तीसगढ़ द्वारा शुरू किए गए जन जागरूकता अभियान में सीना तान कर समाज को #जागरूक  बनाने आगे आए।
वे  पत्रकारिता जगत के सिद्धहस्त पुरोधा और प्रकाशमान नक्षत्र थे।समाज सेवा में भी अग्रणी थे।

उनकी #कलम  की धार बहुत पैनी थी और उस कलम में एक सजग नागरिक सजग पत्रकार सर्जक संपादक सर्जक समाजसेवी नजर आता था।

विचार कभी नही मरते। उनका यूं जाना शोक का इसलिए कारण नहीं, क्योंकि वे वे पंच महाभूत में विलीन हुए हैं, देह से मुक्त हुए हैं, विचारों में लेखों में सदा अमर रहेंगे।

रमेश नैय्यर का जाना पत्रकारिता में बौद्धिक खालीपन उत्पन्न करेगा। मगर वो पत्रकारिता जगत के ध्रुव सितारे हैं। उनकी  प्रेरणा कई युवाओं को दिशानिर्देशित करेगी।
वे सदैव हम सबके बीच में नहीं हैं लेकिन उनके विचार आने वाले कई वर्षों तक हम सब पत्रकारों को अनुप्राणित करते रहेंगे।
रमेश नैयर जी मूल्यों के पक्षधर थे। उन्होंने मीडिया में यह बात अपने तइ स्थापित की कि हमेशा सच के साथ चलो और वे जीवनभर सच के मूल्यों के प्रहरी बने रहे।
आदरणीय रमेश नैयर जी हम सब पत्रकारों के प्रेरणा स्रोत रहे हैं।
उनको मेरा शत-शत नमन

You tube story के लिए click करें

https://youtu.be/ZJIvrfH0S7Q

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माता कौशल्या का भव्य मंदिर बनेगा

रविवार, 16 अगस्त 2020

 रायपुर। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की तैयारियां जोरों पर हैं जबकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के ननिहाल छत्तीसगढ़ में उनकी माता कौशल्या के भव्य मंदिर का भी निर्माण काम चल रहा है। 15करोड़ रुपयों की लागत से भव्य मन्दिर बनाया जाएगा।

छत्तीसगढ़ में राजधानी रायपुर के समीप माता कौशल्या की जन्मभूमि चंदखुरी में पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यह घोषणा की। बघेल अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मुक्तेश्वरी बघेल और परिवार के सदस्यों के साथ चंदखुरी पहुंचे और वहां स्थित माता कौशल्या के प्राचीन मंदिर में उन्होंने पूजा-अर्चना कर प्रदेश की खुशहाली और समृद्धि की कामना की। उन्होंने मंदिर के सौन्दर्यीकरण और परिसर के विकास के लिए तैयार परियोजना की विस्तृत जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने कहा कि मंदिर के सौन्दर्यीकरण के दौरान मंदिर के मूलस्वरूप को यथावत रखते हुए यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए।    
   उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ सरकार राम वन गमन पथ पर पड़ने वाले महत्वपूर्ण स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है। इसकी शुरूआत चंदखुरी स्थित माता कौशल्या के मंदिर के सौंदर्यीकरण कार्य के बीते 22 दिसम्बर को भूमि-पूजन के साथ कर दी गई है। भव्य मंदिर की निर्माण की कार्ययोजना में परिसर में विद्युतीकरण, तालाब का सौंदर्यीकरण, घाट निर्माण, पार्किंग, परिक्रमा पथ का विकास आदि कार्य शामिल किए गए हैं।
     बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ भगवान राम का ननिहाल है। यहां कण-कण में भगवान राम बसे हुए है। भगवान राम ने वनवास का बहुत सा समय यहां व्यतीत किए हैं। छत्तीसगढ़ सरकार भगवान राम के वन गमन मार्ग को पर्यटन परिपथ के रूप में विकसित कर रही है ताकि इन स्थलों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिल सके। 15 करोड़ की लागत से सौन्दर्यीकरण का कार्य कराया जाएगा। उन्होंने इस अवसर पर यहां तालाब के बीच से होकर गुजरने वाले पुल की मजबूती के साथ ही यहां परिक्रमा पथ, सर्वसुविधायुक्त धर्मशाला और शौचालय बनाने कहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सौन्दर्यीकरण कार्य का भूमिपूजन हो गया है यहां अगस्त के तीसरे सप्ताह से निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाएगा।
मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर ग्रामीणों की मांग पर मंदिर के पास से बायपास सड़क की स्वीकृति प्रदान करते हुए आवश्यक कार्यवाही के निर्देश दिए। वहीं ग्राम वासियों की सहुलियत को देखते हुए चंदखुरी में राष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा खोलने के निर्देश जिला अधिकारियों को दिए है। 
      गौरतलब है कि त्रेतायुगीन छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम दक्षिण कोसल एवं दण्डकारण्य के रूप में विख्यात था। प्रभु श्रीराम ने उत्तर भारत से छत्तीसगढ़ में प्रवेश के बाद विभिन्न स्थानों पर चौमासा व्यतीत करते हुए दक्षिण भारत में प्रवेश किया गया था। छत्तीसगढ़ में कोरिया जिले की गवाई नदी से होकर सीतामढ़ी हरचौका नामक स्थान से प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया था। इस दौरान उन्होंने 75 स्थलों का भ्रमण करते हुए सुकमा जिले के रामाराम से दक्षिण भारत में प्रवेश किया था। उक्त स्थलों में से 51 स्थल ऐसे है, जहां प्रभु श्रीराम ने भ्रमण के दौरान रूक कर कुछ समय व्यतीत किया था। प्रथम चरण में इनमें से 9 स्थलों को विकसित किया जाएगा। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राम वन गमन पथ का, पर्यटन की दृष्टि से विकास की योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य राज्य में आने वाले पर्यटकों, आगन्तुकों के साथ-साथ देश और राज्य के लोगों को भी राम वन गमन मार्ग एवं स्थलों से परिचित कराना एवं इन ऐतिहासिक स्थलों के भ्रमण के दौरान पर्यटकों को उच्च स्तर की सुविधाएं भी उपलब्ध कराना है।
छत्तीसगढ़ में राम वन गमन पर्यटन परिपथ को विकसित करने के उद्देश्य से प्रथम चरण में 09 स्थलों का चयन किया गया है। इन स्थलों में सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया), रामगढ़ (अम्बिकापुर), शिवरीनारायण (जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया (बलौदाबाजार), चंदखुरी (रायपुर), राजिम (गरियाबंद), सिहावा-सप्तऋषि आश्रम (धमतरी), जगदलपुर (बस्तर), रामाराम (सुकमा) शामिल हैं। राम वन गमन पर्यटन परिपथ में प्रस्तावित 09 स्थलों को लेते हुए पर्यटन विभाग द्वारा एक कॉन्सेप्ट प्लान तैयार किया गया है, जिसकी लागत 137.45 करोड़ रूपए है। राम वन गमन पर्यटन परिपथ हेतु राज्य शासन द्वारा गत वर्ष (2019-20) राशि 5 करोड़ रूपए और इस वर्ष (2020-21) 10 करोड़ रूपए का प्रावधान बजट में किया गया है। इस तरह कुल राशि रूपए 15 करोड़ राज्य शासन द्वारा स्वीकृति दी गई है।

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18वें बरस में छत्तीसगढ़

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

नवंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर एक नया राज्य छत्तीसगढ़ बना था।  एक छोटे से राज्य के रूप में उदित हुआ छत्तीसगढ़ अपनी स्थापना के 18वें वर्ष में प्रवेश कर गया है। विकास तो हुआ है जो बताने के काबिल है। एक छत्तीसगढ़ जो स्मार्ट सिटी रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और दीगर शहरों में नजर आता है जहां कुछ ख़ास इलाकों में अचंभित कर देने वाली शान का किसी आदिवासी को सहमा देने वाला रूतबा है, प्रगति पथ की धाक है, चमचमाती हाई मास्ट लाईटें हैं और दूसरी तरफ बहुतेरे छोटे खूबसूरत गांव -कस्बे हैं ..जहां नागरिक सुविधाएं और एक समूची पीढ़ी को गांव में ही टिकाए रखने के अवसर चाहिए .. शहर और गांव के बीच की खाई है.. यह बताता है कि सफर अभी बहुत लंबा है..मीलों चलना है।



राज्योत्सव में लोगों को संगीत और लोकनृत्य के अनेक रंग देखने को मिले..  ख़ास तौर पर आए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के समापन समारोह में शहीद जवानों को याद किया । उन्होंने कहा कि जवानों ने कुर्बानी नहीं दी होती तो आज हम यह उत्सव भी नहीं मना रहे होते। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने नया रायपुर में पांच दिवसीय राज्योत्सव का शुभारंभ किया।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने रायपुर आ कर कहा कि आयोग ने राज्य सरकार को आश्वासन दिया है कि छत्तीसगढ़ के विकास के लिए नीति आयोग पूरी मदद करेगा. कुमार ने कहा कि छत्तीसगढ़ में तेज गति से विकास हुआ है और इसे और तेज होना है. आदिवासी क्षेत्रों में जहां गरीबी ज्यादा है, वहां और भी बेहतर काम करने की जरुरत है. वहीं, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अधिक काम करने की जरुरत है.
उन्होंने कहा कि राज्य में कुपोषण तथा संपर्क साधनों पर भी काम करने की जरूरत है. यहां बहुत से ऐसे इलाके हैं जहां रेल, सड़क और टेलीकॉम की सुविधा अन्य स्थानों के मुकाबले कम है. इस क्षेत्र में भी काम करने की जरूरत है.

कुछ मसले अहम् हैं। छत्तीसगढ़-झारखंड-उड़ीसा  के सीमाई जंगलों में उन्मत जंगली हाथियों के झुंडों और इंसानी बस्तियों के बीच अरसे से भिड़ंत चल रही है। वर्चस्व कायम रखने के इस शुध्द नैसर्गिक संघर्ष में फिलहाल हाथी ही आगे हैं लेकिन जब भी हाथियों को गुस्सा आता है, वे मानव बस्तियों में घुसकर उन्हें रौंद डालते हैं और फसलों को जितना चट करते हैं, उससे  अधिक नुकसान पहुंचा जाते हैं।दरअसल, झारखंड अलग राज्य बनने के बाद वहां जारी उत्खनन और पेड़ों की कटाई के चलते हाथी जंगलों को छोड़ रहे हैं। वे झुंडों में चिंघाड़ते हुए राज्य की सीमाओं को चुनौती देते हैं। मूलत: शाकाहारी इस प्राणी ने इंसान की मुश्किल बढ़ाई जरूर है लेकिन उसकी मुश्किलें भी कम नहीं हैं। दांत वाले हाथी घात लगाकर गोली दागने वालों से डरे रहते हैं और लंबे अरसे तक हिंसक बने रहते हैं। उनसे छेड़छाड़, पथराव, बम-पटाखे, ढोल-नगाड़े बजाने जैसी कोशिशों के कारण उनका क्रोधित हो जाना स्वाभाविक है। नेचर क्लब बिलासपुर का मानना है कि वन्य प्राणियों का लगातार होता शिकार और उनके निवास क्षेत्र में इंसानी अतिक्रमण उनके अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी है। नवनिर्मित छत्तीसगढ़ में वन्य प्राणी संरक्षण की नीति को कारगर बनाने की जरूरत है। सरकार को सुरक्षित वन क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्यों की सीमा रेखा में वन ग्रामों का सीमांकन करना चाहिए। वनों की कटाई हाथियों ही नहीं, दीगर जानवरों के लिए भी बेहद मुश्किलों का सबब बनती जा रही है।

पिछले कुछ समय में नक्सलवाद भारत की आन्तरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद कैंसर की तरह फैल चुका है और प्रथम स्टेज पर ही बीमारी को टालते रहने का नतीजा यह हुआ है कि अब यह पूरी तरह जानलेवा बन चुका है लेकिन मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी हाल में इंटरव्यू में कहा कि विकास कार्यों के चलते नक्सलवाद की समस्या अपने अंतिम दौर में है।  देश में नक्सलवाद के खिलाफ अंतिम लड़ाई छत्तीसगढ़ में होगी। बस्तर अंचल में नक्सल विरोधी अभियान जारी रहेगा।
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चुपचाप दफन..चौतरफा गूँज

शनिवार, 19 अगस्त 2017

इसी हफ्ते जब पूरा देश गौभक्त कृष्ण की जन्माष्टमी के धार्मिक उल्लास में डूबा हुआ था तब दुर्ग जिले की शगुन गौशाला में दर्जनों गौमाताएँ भूख-प्यास से तड़प कर बेमौत मर रही थीं।  छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के धमधा ब्लॉक की एक गोशाला में यकायक दो सौ से ज्यादा गायों की कारूणिक मौत...राजपुर गांव के गौशाला संचालक ने मरी हुई गायों को चुपचाप दफना दिया जिसकी चौतरफा गूँज हुई है ...

मामला तब फूटा जब सोशल मीडिया पर मरी हुई गायों की तस्वीरें वायरल हुईं। घटना की जानकारी गौशाला के संचालकों ने न तो प्रशासन को दी और ना ही पशुपालन विभाग -स्थानीय प्रशासन को सूचित किया। गांव के सरपंच सेवाराम साहू का कहना है 200 से ज्यादा गायों की मौत हुई है।  गौशाला में लगभग पांच सौ गाए हैं। बताया जा रहा कि इस गौशाला में भूख और प्यास के चलते हफ्ते भर के भीतर दो सौ से ज्यादा गायों की मौत हो गई।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि इस गौशाला में ना तो चारा है और ना ही दाना-पानी और इसी वजह से गायों की मौत हुई है।   
राजपुर-धमधा की इस गौशाला के बाहर गेट पर  कमल का फूल यानि बीजेपी का चुनाव चिन्ह बना हुआ है।  इसे गौशाला प्रबंधन समिति के अध्यक्ष और जामुल नगर पालिका के उपाध्यक्ष  बीजेपी  नेता हरीश वर्मा चलाते हैं। मुख्य विपक्षी कांगेस ने आरोप लगाया है कि गायों की मौत भूख के कारण हुई है। प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता ज्ञानेश शर्मा  के मुताबिक धमधा में करीब 250 गायों की मौत, इससे पहले जुलाई में ही रायगढ़ जिले में स्थित चक्रधर गौशाला में 15 गायों की मौत और उससे भी पूर्व दुर्गुकोंदल के कर्रामाड़ में स्थित गौशाला में अगस्त 2016 में करीब 150 गायों की मौत, इन सब मामलों को देखकर साफ जाहिर होता है कि गौमाता को लेकर भाजपा सरकारों की कथनी और करनी में फर्क है। भाजपा के लिए गौमाता महज एक मुद्दा है जिसे लेकर वह जनता की भावनाओं से खेलती आई है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इसी वर्ष 'गौहत्यारों को फांसी पर लटका देंगे' कहते हुए राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां जरुर बटोर ली थी  लेकिन लेकिन वे तो महज नए सिरे से सभी गौशालाओं के जांच के आदेश देने में व्यस्त हैं। साफ जाहिर है कि धमधा गौशाला का संचालक चूंकि भाजपा नेता है, इसलिए उसे बचाने ऐसा आदेश दिया गया है।
पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा  के मुताबिक कि गौसेवा आयोग की शिकायत पर गायों की मृत्यु के मामले में हरीश वर्मा से पूछताछ की जाएगी।
एसडीएम ने भी घटनास्थल का दौरा किया और कहा कि घटना की जांच के बाद ही जानवरों की मौत के कारणों का पता चल सकेगा।   गौशाला संचालक एवं भाजपा नेता हरीश वर्मा ने मीडिया
वालों से कहा कि 15 तारीख को क्षेत्र में तेज बारिश के कारण गौशाला की 90 फीट लंबी दीवार गिर गई थी। चोट लगने के कराण ही पिछले तीन दिनों में 27 गायों की मौत हुई है। वर्मा ने दावा किया कि पिछले एक साल से उन्हें गौशाला के लिए छत्तीसगढ़ राज्य गौसेवा आयोग से कोई भी अनुदान नहीं मिला है। हरीश वर्मा का बयान है कि उसे अनुदान नहीं मिलता था।  अनुदान के एवज में उससे  रिश्वत की मांग की जा रही थी। 

 मामला अब राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में उछल गया है लिहाजा  बची हुई गायों को दूसरी जगह शिफ्ट करने के इंतज़ाम हो रहे हैं। गौशाला के क्रूर संचालक को गिरफ्तार करके आज कोर्ट में पेश किया जा रहा था तब उसके मुंह कालिख पोत दी गई।गायों की मौत से गुस्साए लोगों ने हरीश को लोगों  कालिख पोत दी। पुलिस वाले चुपचाप देखते रहे।

यह शर्मनाक हादसा ऐसे मौके पर हुआ है जब हाल में सरकार ने घोषणा की है कि राज्य में हादसों में घायल गायों को अस्पताल पहुंचाने के लिए दस जिलों में एम्बुलेंस सेवा शुरू की जाएगी और 10 सबसे अच्छी गौशालाओं का चयन कर उन्हें दस-दस लाख रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा।

 राजपुर गांव में गौशाला की गाएं आजकल नुमाइश की चीज बन गई है. उनको देखने अफसरों की फ़ौज चली आ रही है है। हरे चारे के इंतज़ाम हो रहे हैं। डाक्टर तीमारदारी में लगे हैं जबकि तीन दिन पहले शगुन गौशाला के जिस मेन गेट पर  ‘कमल’बना हुआ है, दर्जनों गायें मौत के आगोश में जाती रही हैं। जो जिन्दा बची हैं उनके जिस्म की हड्डियां उनकी हालत और बेबसी की गवाह हैं, पसलियां साफ दिखाई देती हैं। गांव भर में पिछले हफ्ते भर में मौत की शिकार हुई कई गायों के अवशेष पड़े हैं। कुछ गौ-शव खेतों में सड़ रहे हैं और कुछ आवारा कुत्‍तों की खुराक बन रहे हैं।  अब दुर्गन्ध उठ रही है इलाके में और गायों के शवों को उठाने का कार्य नहीं किया गया है।  आवारा कुत्ते मृत गायों के शव को नोंच रहे हैं।  ग्रामीणों को शंका तब हुई और हल्ला मचा जब जेसीबी से गहरे गड्ढे खोदते और ट्रैक्‍टर में गायों के अवशेष ले जाते देखा गया। राजपुर गांव के सरपंच पति शिव राम साहू का कहना है कि आरोपी कभी किसी को गौशाला में घुसने नहीं देता था। जो गाएं बची हैं, उनके खाने पीने को कुछ नहीं है।
अब सनसनी फैली तो गौ सेवा आयोग भी जगा जबकि उनको पहले ही इस गौशाला के बारे में अनियमितता की शिकायतें मिलती रही है। आयोग ने संचालक को नोटिस जारी कर उससे जवाब तलब भी किया था लेकिन आरोपी हरीश वर्मा चूंकि जमूल नगर पंचायत क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष है लिहाजा उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। सिर्फ फाइलें नोटिसों से भरती रही।
गौ सेवा आयोग ने अब पाया कि 'गौशाला में गायों के चारे आदि की व्यवस्था बहुत ही खराब है। गौशाला में पहले भी गायों की मौत होती रही है, लेकिन उसे छिपाया जाता था।' लेकिन किसी भी अफसर ने कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस भी मूकदर्शक रही। हल्ला मचा तो संचालक को गिरफ्तार किया गया मगर थाने में नहीं रख कर उसे होटल में रखा गया।  छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने जारी बयान में कहा कि गौ-रक्षा, गौ-सेवा, गौ-सुरक्षा का दावा कर रही भाजपा का असली चेहरा उजागर हुआ है। जिस भाजपा नेता ने गौ-माता की सेवा के नाम पर 93 लाख रूपये डाकरे हों उसके व्यवस्थापन में 250 गायों की भूख से मौत हो जाना बेहद शर्मनाक घृणित और निंदनीय घटना है। इससे भी ज्यादा निंदनीय रवैया भाजपा सरकार का उस आरोपी को संरक्षण दिया जाना है। भाजपा नेता हरीश वर्मा गिरफ्तार का समाचार फैला पंरतु जिस थाने में उसकी गिरफ्तारी बतायी जा रही है, वहां वह नही मिला। उसे वीआईपी सुविधा प्रदान की जा रही है। उसे होटल में भोजन कराया जा रहा है।
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जे के संस्थापक अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने सगुन गौशाला मे 250 से अधिक गायों की मृत्यु प्रदेश को कलंकित करने वाली घटना निरूपित करते हुए कहा कि इस गौहत्याकांड ने भाजपा के दिखावटी गौ प्रेम की बखिया उधेड़ कर रख दी है। शासकीय अनुदान की राशि गौशाला के संचालक स्वयं डकार गये और मूक गौमाताओं को भूखा रख कर मार डाला गया जो सुनियोजित एवं अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता है। गोरक्षा का स्वांग रचने वाले भाजपा एवं उनके जनप्रतिनिधियों के पास इतना भी समय नहीं था कि वह शगुन गौशाला का निरीक्षण कर लेते । पशुपालन विभाग द्वारा निरीक्षण किया गया होता तो गौशाला के अव्यवस्थित रखरखाव एवं गायों की दयनीय स्थिति की सही जानकारी मिल सकती थी तथा मृत गायों को बचाया जा सकता था । भाजपा सरकार मे ही दुर्गुकोंदल गांव स्थित शासकीय गौशाला में बड़ी संख्या में गायों के अचानक भूख से मरने की दर्दनाक घटना से भी प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया।
 बताया जा रहा है कि हरीश वर्मा पर गौशाला का प्रबंधन सही तरह से न करने और गायों की देखभाल न करने का लगातार आरोप रहा मगर नेता होने के नाते वह बचता रहा।
गायों की मौत के आंकड़े अबूझ हैं। पशुचिकित्सक दो दिन में 27 गायों का पोस्टमार्टम करने की बात मान रहे हैं।

गायों की कथित रूप से भूख से मौत के बाद गौशाला संचालक हरीश वर्मा के खिलाफ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम की धारा 4 और 6 तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 एवं भारतीय दण्ड अधिनियम की धारा 409 के तहत अपराध पंजीकृत किया गया है। 

भाजपा नेता हरीश वर्मा पर आरोप लगा है कि मृत गायों की खाल उतारकर बेच देता था और मांस को मछलियों के चारे के रूप में इस्तेमाल करता था।
छत्तीसगढ़ छात्र संगठन जोगी के अहिवारा ने एक ज्ञापन में कहा है कि संचालक गायों की तस्करी करने, गाय की हड्डियों को टेलकम कंपनी (पाउडर) को बेचने में  लिप्त रहा  है।   ग्रामीणों का कहना  है कि हरीश मृत गायों की खाल उतारकर मछलियों के चारा के रूप में इस्तेमाल करने बेच देता था। मांस गांव के निकट एक तालाब के किनारे मृत गायों को फेंक देता था।

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने राज्य के दुर्ग जिले में एक गोशाला में बड़ी संख्या में गायों की मौत के बाद राज्यभर में गोशालाओं की जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने दुर्ग की घटना को गंभीरता से लिया है और गोशाला के संचालक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। जांच में सभी गोशालाओं को शामिल किया जाएगा, चाहे उन्हें राज्य शासन से अनुदान मिलता हो या नहीं। 

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बस्तर / पत्रकार.. दोधारी तलवार..

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016




लगातार प्रेशर बम, लैंड माइन बिछे हुए इलाकों में काम कर रहे बस्तर  के  पत्रकार अब निरंतर भय के माहौल में काम कर रहे हैं...  हालात यह हैं  कि नक्सल प्रभावित इलाकों में पत्रकार दोधारी तलवार पर चल रहे है. पत्रकारों को यहां कोई “नक्सली एजेंट” समझता है तो कोई “पुलिस एजेंट”,.वे सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच पिस रहे हैं अब चूंकि क्योंकि कलम बंदूक से ज्यादा ताकतवर होती है.  लिहाजा इलाके के दमदार लोगों ने क़ानून को ही नही कलम को भी बंधक सा बना लिया है। अकबर इलाहाबादी ने कहा है कि तीर  निकालो ना तलवार निकालो गर मुक़ाबिल  हो तोप तो अखबार निकालो मगर बस्तर में  रहा है ऐसे हालात हैं कि पत्रकार को ही बाहर निकलो।शायद दुनिया से बाहर।
बस्तर  के  पत्रकार के लिए चित्र परिणाम मगर जुझारू पत्रकार डटे हैं यह मानकर कि सत्य परेशान तो हो सकता है ..पराजित नही|  पत्रकार एजिटेटेड हैं और अब सड़कों पर भी हैं| पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग करते हुए पत्रकार आंदोलन कर रहे हैंउनको दबाने वालो की यह गलतफहमी है कि कलम हमेशा के लिए दबेगी| एक अनुमान के मुताबिक बस्तर में करीब 300 पत्रकार काम कर रहे हैं.अब यह राष्ट्रीय सुर्ख़ियों का मुदा है क्योंकि पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति छत्तीसगढ़ ने बस्तर सहित पूरे प्रदेश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के खिलाफ और पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर में प्रदर्शन किया।
 हाल में दंतेवाड़ा के पत्रकार प्रभात सिंह को भी आईटी एक्ट के एक मामले में जेल भेज दिया गया । बीजापुर के ही पत्रकार कमलेश पैकरा को पुलिस ने नक्सली मामले में गिरफ्तार किया था। कुछ दिनों पहले दरभा के पत्रकार संतोष यादव और सोमारू नाग को भी पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है। इसके अलावा एक अन्य मामले में जगदलपुर के पत्रकार अनिमेश पाल को भी जेल जाना पड़ा था। प्रभात के खिलाफ़ स्कूल परिसर में जबरन घुसने, शिक्षकों और स्टाफ से हाथापाई करने और पैसे मांगने के कथित आरोप में एफआईआर पिछले साल हुई थी। अधिवक्ता महेंद्र दुबे के मुताबिक  प्रभात सिंह के खिलाफ की गयी लिखित शिकायत और एफआईआर के तथ्यों से प्रभात सिंह के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 67, 67A और आईपीसी की धारा 292 का अपराध बनता ही नहीं है इसके बावजूद उसे बिना किसी कानून सम्मत कारण के गिरफ्तार किया जाना पुलिस की नीयत पर सवाल खड़ा करता है।
मुख्य्मंत्री डा रमन सिंह  पत्रकार मामले में एक कमेटी बनने का एलान कर चुके हैं। कमेटी राज्य में पत्रकारों की समस्याओं को लेकर विशेष तौर पर गठित  की .
छत्तीसगढ़ में दो पत्रकारों की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ बस्तर -जगदलपुर में पत्रकारों के शुरू हुए आंदोलन के पहले दिन राज्य सरकार ने एलान कर दिया कि राज्य में पत्रकारों की समस्याओं को लेकर एक विशेष समिति गठित  की जाएगी। किसी भी पत्रकार की गिरफ्तारी के संबंध में 72 घण्टे के भीतर समिति को मिलने वाली शिकायत की जांच सरकार के पास उपलब्ध ठोस तथ्यों के आधार पर की जाएगी और आवश्यक हुआ तो संबंधित पत्रकार को राहत देने के लिए उपयुक्त निर्णय लिया जाएगा। बस्तर में दो पत्रकारों को कथित तौर पर नक्सली समर्थक बता कर गिरफ्तार किए जाने के विरोध में बस्तर के पत्रकार लामबंद हुए और धरना दिया गया। ये मुद्दा राज्य की विधानसभा में भी उठा ।

मुख्यमंत्री डा रमन सिंह ने रायपुर से टेलीफोन पर आंदोलित पत्रकारों के प्रतिनिधियों को यह भी आश्वासन दिया कि उनकी सुरक्षा के लिए राज्य सरकार सजग है और इसके लिए सभी जरूरी उपाय किए जाएंगे।
डा. रमन सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का गौरवशाली इतिहास रहा है। यहां की माटी पत्रकारिता एवं साहित्य की उर्वरा भूमि रही है। स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप राज्य सरकार छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है। रमन सिंह ने बस्तर के अधिकारियों को निर्देश दिये हैं कि पत्रकारों को भरोसे में लेकर काम करें.
  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निर्देश पर परिपत्र  में कहा गया है कि प्रदेश में समय-समय पर पत्रकारों के विरूद्ध आपारिधक प्रकरण दर्ज करने या गिरफ्तार करने की स्थिति में पत्रकारिता की स्वतंत्रता के मुददे पर सवाल उठते हैं। शासन को कई बार इस प्रकार की शिकायतें भी प्राप्त होती हैं कि किसी पत्रकार पर पुलिस कर्मियों द्वारा ज्यादती की गयी है, या उनके विरूद्ध आपराधिक प्रकरण दुर्भावनावश कायम किया गया है।

पत्रकारों के निंमित्त जारी परिपत्र में दी गयी व्यवस्था इस प्रकार होगी -

(1) पत्रकारों पर ज्यादतियां होने की शिकायतों को संचालक जनसम्पर्क विभाग एकत्रित कर पुलिस मुख्यालय में कार्यरत उप पुलिस महानिरीक्षक (शिकायत) को भेजेंगे। संचालक जनसम्पर्क से प्राप्त प्रकरणों में पुलिस मुख्यालय द्वारा आवश्यक कार्रवाई किए जाने के बाद इसकी सूचना संचालक जनसम्पर्क को और प्रतिलिखि गृह विभाग को दी जाएगी।

(2) जहां तक पत्रकारों के विरूद्ध कोई प्रकरण कायम किए जाने का प्रश्न है, इस संबंध में राज्य शासन ने यह निर्णय लिया है कि यदि किसी भी (चाहे वह अभी स्वीकृत पत्र प्रतिनिधि हो या न हो) के विरूद्ध कोई प्ररकण कायम किया जाता है, तो उन प्रकरणों में चालान किए जाने के पहले उन पर उपलब्ध साक्ष्य की समीक्षा संबंधित पुलिस अधीक्षक और क्षेत्रीय उप पुलिस महानिरीक्षक कर लें और स्वयं को आश्वस्त कर लें कि कोई भी प्रकरण दुर्भावनावश या तकनीकी किस्म के स्थापित नहीं किए जाए। यदि उप महानिरीक्षक के मत में यह पाया जाए कि कोई प्रकरण दुर्भावनावश कायम किया गया है, तो तत्काल उनको समाप्त करने के निर्देश दिए जाएं और संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरूद्ध कार्रवाई की जाए। इस कंडिका में यह भी कहा गया है कि बगैर समीक्षा किए हुए प्रकरणों का चालान न्यायालय में प्रस्तुत न किया जाए। प्रत्येक तिमाही में क्षेत्रीय उप पुलिस महानिरीक्षण इस प्रकार के प्रकरणों की समीक्षा करेंगे और वे पुलिस महानिदेशक को सूचना भेजेंगे। पुलिस महानिदेशक से यह सूचना गृह विभाग को भेजी जाएगी।

(3) यह व्यवस्था यथावत जारी रहेगी। इसके अन्तर्गत उप पुलिस महानिरीक्षक के स्थान पर अब पुलिस महानिरीक्षक (रेंज) कार्रवाई करेंगे।

(4) उपरोक्त व्यवस्था के अतिरिक्त शासन स्तर पर एक उच्च स्तरीय समन्वय समिति का भी गठन किया गया है, जो पत्रकारों और शासन के बीच आपराधिक प्रकरणों और संबंधित विषयों में आवश्यक समन्वय स्थापित करने की कार्रवाई करेगी। समन्वय समिति के अध्यक्ष सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव होंगे। समिति में गृह (पुलिस) विभाग के सचिव, पुलिस मुख्यालय की अपराध अनुसंधान शाखा के प्रभारी अधिकारी और शासन द्वारा नामांकित दो वरिष्ठ पत्रकार सदस्य होंगे। समन्वय समिति में जनसम्पर्क विभाग के संचालक सदस्य सचिव होंगे। समिति द्वारा संबंधित रेंज पुलिस महानिरीक्षक को भी आवश्यकतानुसार आमंत्रित किया जा सकता है।

(5) उपरोक्त समन्वय समिति के संदर्भ की शर्ते इस प्रकार होंगी - परिपत्र की कंडिका-2 में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार यदि कार्रवाई से संतुष्टि नहीं होती है, तो उन प्रकरणों में उच्च स्तरीय समन्वय समिति द्वारा विचार किया जाएगा। समिति द्वारा विचारण से संबंधित मामले के चयन का अधिकार संचालक जनसम्पर्क के पास रहेगा।  पत्रकार के रूप मंे किए गए किसी कार्य के कारण पत्रकारो के विरूद्ध दर्ज आपराधिक प्रकरणों के संबंध में यह उच्च स्तरीय समन्वय समिति पुलिस और पत्रकारों के बीच समन्वयक की भूमिका का निर्वहन करेगी। समिति पुलिस और पत्रकारों की ओर से आवश्यक सूचना और जानकारियों को आदान-प्रदान करेगी। इसके लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त करने और प्रकरण से जुड़े पक्षों को बुलाने के लिए समिति आवश्यक निर्देश भी जारी करेगी।

परिपत्र की प्रतिलिपि पुलिस महानिदेशक और सामान्य प्रशासन विभाग तथा जनसम्पर्क विभाग के सचिवों सहित समस्त संभागीय कमिश्नरों, कलेक्टर और जिला दण्डाधिकारियों, रेंज पुलिस महानिरीक्षकों और सभी पुलिस अधीक्षकों को भी भेजी गयी है।
छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के लिए बनी बीमा एवं सम्मान निधि (पेंशन योजना) की तकनीकी खामियों को दूर करने एवं वेतन बोर्ड की सिफारिशों को प्रदेश स्तर पर लागू करवाने की मांग को लेकर एक प्रतिनिधिमंडल  ने राज्यपाल बलरामजी दास टंडन से मिलकर ज्ञापन सौंपा।
ज्ञापन में बताया गया कि सम्मान निधि (पेंशन योजना) में सेवानिवृत्त पत्रकार इसलिए पात्र नहीं माने जा रहे है क्योंकि विभिन्न समाचार पत्रों में काम करने के बाद भी जनसंपर्क विभाग में उनकी अधिमान्यता नहीं रही है। 

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सवाल इस्तीफे का नहीं है : रमन सिंह

सोमवार, 17 नवंबर 2014

नसबंदी कांड में 13 महिलाओं की मौत ने समूचे देश को हिला कर रख दिया है। बिलासपुर जिले के विभिन्न अस्पतालों में 122 महिलाओं का इलाज चल रहा है। 61 को अपोलो में भर्ती कराया गया है, जबकि 37 को सीआईएमएस और 24 को जिला अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार की इस घटना को लेकर खासी किरिकरी हुई है और लोग सरकार को आड़े हाथों ले रहे हैं। 
आरोप है कि मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का बचाव क्यों किया? उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री का बचाव करते हुए कहा था कि नसबंदी डॉक्टर करता है, न कि स्वास्थ्य मंत्री। डॉ. रमन सिंह ने सम्पूर्ण घटनाक्रम की न्यायिक जांच कराने की भी घोषणा की है। मौजूदा हालात में डॉ. रमन सिंह आरोपों से घिरे हुए हैं। 

पेश है उनसे हुई बातचीत के अंश। 

-नसबंदी कांड की की गूंज समूचे देश में हुई है। नकली दवा कारोबार से जानें जा रही हैं, लेकिन सरकार का दखल कहीं नजर नहीं आता?
 -बिलासपुर की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। ज्यूडिशियल इन्क्वायरी कराई जा रही है। सवाल इस्तीफे का नहीं है। हमने पहले दिन से ही कठोरतम कार्रवाई की है और सारे मसलों पर नजर है। फिर चाहे मरीजों के इलाज का मसला हो या फिर दवा खरीद का। आगे भी कठोर कार्रवाई की जाएगी। 

-छत्तीसगढ़ की कई सेक्टर में साख है, लेकिन इस तरह की घटनाएं साबित करती हैं कि स्वास्थ्य के मोर्चे पर सरकार कमजोर है? 
-इस प्रकरण में एसओपी (मानक प्रक्रिया) का उल्लंघन तो हुआ है। ज्यादा जवाबदेही की जरूरत थी। अगर इतने सारे आपरेशन होने थे तो सावधानी जरूरी थी, लेकिन आगे से इस प्रक्रिया का सख्ती से पालन कराएंगे। 

-नकली दवा का कारोबार कैसे बंद होगा? 
-जहां जरूरी होगा लाइसेंस निरस्त करेंगे और सख्ती से इससे निपटेंगे। जांच में इन घटनाओं के लिए जो भी दोषी पाया जाएगा, चाहे वह औषिध निर्माता हो, औषिध वितरक या डॉक्टर, उसके खिलाफ की कार्रवाई की जाएगी। किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। 

-यह सवाल क्यों उठ रहे हैं कि स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का इस्तीफा न लेने के लिए कारोबार लाबी का आप पर भारी दबाव है? - -
सवाल इस्तीफे का नहीं है। इस मामले में जो भी कदम उठाए जाने थे, उठाए गए और जिनके खिलाफ कार्रवाई जायज थी, वह हुई। अब राजनीति की जानी है तो इस संवेदनशील मुद्दे पर नहीं होनी चाहिए। और भी कई मुद्दे हैं। 

-जो बच्चे पीड़ित और प्रभावित हैं, उनके लिए सरकार क्या सोच रही है? 
-मृत महिलाओं के सभी बच्चों के वयस्क होने तक उन्हें राज्य सरकार की ओर से गोद लिया जाएगा। मृत महिलाओं के प्रत्येक नाबालिग बच्चे के नाम पर दो लाख रपए की एफडी की जाएगी, जो उस बच्चे और कलक्टर के नाम से संयुक्त रूप से होगी। बच्चे के वयस्क होने पर यह राशि उसे मिल जाएगी। खाते का संचालन वह स्वयं कर सकेगा। 18 वर्ष की उम्र तक प्रत्येक बच्चे और उसके परिवार की इच्छा के अनुसार राज्य सरकार की ओर से निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी। प्रत्येक बच्चे का हेल्थकार्ड बनेगा। इसके आधार पर उसको बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में 18 वर्ष की उम्र तक निशुल्क इलाज की सुविधा मिलेगी।  www.rashtriyasahara.com        
page 11 date 18-11-14


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फिर से बस्तर

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

आज़ादी के 64 सालों बाद धुर जंगली इलाके बस्तर में अब जाकर शायद विकास की नई कहानी लिखी जाए| घोर नक्सल प्रभावित दंतेवाडा जिले को दो फाड़ करके सुकमा को नया जिला बनाया गया है| इसमें क्या नई बात है ये कोई भी कह सकता है, जिला बनाना कोई ऐसी खबर या मुद्दा तो नही है जिस पर बड़ा लेख लिखा जाए|

आपको बता दें दंतेवाडा वो इलाका है जहां नक्सली हुकूमत के आगे सरकार भी पस्त हो जाती है और सदियों से बस्तर की तरक्की की राह में नश्तर जैसे चुभने वाले सघन वन क्षेत्र में आज भी बड़े पत्तों वाले साल वन से ढंके ऐसे इलाके हैं, जहां जमीन तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती।
बेशकीमती खनिज से लबालब इस धरती के लोगों के लब गर्मी में पानी को तरस जाते हैं| आज आदिवासियों वाला बस्तर हिंसा से तप्त है|
मुम्बई की हिंसा में बीस लोग मारे जाते हैं तो बवाल मच जता है मगर बस्तर मे कभी पुलिस पार्टी पर हमले तो कभी आदिवासियों पर हमले और कभी नक्सलियों से मुठभेड़ में औसतन इतनी मौतें रोज़ हो रही हैं जितनी नार्थ ईस्ट और जम्मू कश्मीर में भी नही होती तो ऐसा लगता है किसी को कोई रंज नही होता मानो ये इलाके भारत में हैं ही नहीं|

करीब चार हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले सुकमा में अबूझमाड़ की कंदराएं हैं जहां सूरज भी घुसने से घबराता है और नंग- धड़ंग आदिवासी यहाँ आदिम युगीन सभ्यता में जी रहे हैं| इलाके का राजस्व सर्वे तक नही हो पाया क्योंकि अमला जा नही सका. आपको बता दें यहाँ कई सड़कें सम्राट अकबर के ज़माने में बनी हुई जस की तस हैं. बस्तर का मतलब मीलों तक फैला डरावना जंगल ..सन्नाटा और बीच-बीच में पक्षियों का कलरव-गान या अब बन्दूकों की गूंज..
विकास की किरण छूने को तरसते इस इलाके में केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश भी जा पहुचे और नया जिला बनने के मौके पर उमड़ी आदिवासियों की भीड़ के बीच उन्होंने ऐलान किया कि केंद्र सरकार इलाके के विकास के लिए 30 करोड़ रूपये सालाना देगी और इलाके में एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम चलाया जाएगा| अब देखा ये जाएगा कि सरकार कितना देती है और कितना विकास किसका होता है. नए जिले सुकमा और कोंडागांव नक्सल प्रभावित क्षेत्र हैं। घने जंगलों वाला आदिवासी बाहूल्य ये इलाक़ा इतना पिछड़ा हुआ है कि अगर आप अपने वाहन से एक बार इलाके में घुस जाएं तो पानी की एक बोतल खरीदने और बिस्कुट का एक पैकेट खरीदने के लिए मीलों दूर तक भटकना पड़ सकता है|
इसी दंतेवाडा का सुकमा (अब जिला) इलाक़ा भारत के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक माना जाता रहा है| यहां नक्सलियों के पक्के शिविर चलते हैं-जैसे पीओके में हिजबुल के| यहां नक्सली हिंसा की बड़ी वारदातें होती रही हैं.
वर्ष अप्रैल 2010 में चिंतलनार में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ के 75 जवानों की नक्सली हमले में मौत समेत कई बड़ी घटनाएं दंतेवाड़ा -सुकमा अनुमंडल में ही हुई हैं|
सच यह है कि इलाके में पुलिस घुसने से आज भी डरती है| नए जिले बनाने के पीछे तर्क है कि आदिवासियों को जिला मुख्यालय जाने के लिए ज्यादा चलना नही पडेगा|
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बीते सोमवार नवगठित सुकमा जिले का शुभारंभ किया। सिंह ने कहा कि इससे राज्य में विकास की प्रक्रिया में तेजी आएगी और यकीनन जब जिला बन गया तो अफसर जाएंगे ही. अफसर जाएंगे तो अमला भी होगा. सब जाएंगे तो काम करना ही पड़ेगा . काम होगा तो नजर भी आएगा. कुछ तथ्य हैं कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सात जिलों में केवल 526 टीचर काम कर रहे हैं जबकि इन जिलों में 2,558 टीचर होने चाहिए। इसी तरह नक्सलियों की नई पसंदगाह बने उड़ीसा में नक्सल प्रभावित पांच जिलों में 6,003 टीचर होने चाहिए जबकि वहां केवल 3,566 टीचर हैं।यह आंकड़े कुछ पुराने हैं मगर हालात को बयां करने के लिए काफी हैं.

माना जा रहा है कि जिला बनने से इलके में सरकारी आमद-रफ्त बढ़ेगी और विकास के काम होने से नक्सलियों के पांव उखड़ेंगे जो पिछड़ेपन को ढाल बनाते आए है| शबरी नदी के तट पर स्थित सुकमा जिला न केवल बस्तर संभाग बल्कि छत्तीसगढ़ के भी दक्षिणी छोर का आखिरी जिला है। इसकी सीमा ओड़िशा और आन्ध्रप्रदेश से लगी हुई है। इलाके में नक्सलवाद शुरू हुआ तो कहा गया कि वह आदिवासी के लिए बन्दूक चला रहा है मगर यह सच भी सामने आने लगा कि नक्सली नेता दूरबैठे किसी और ठिकाने से से संचालन करने लगे और बस्तर में गुरिल्ला स्क्वाड के नाम पर अब आदिवासी ही आदिवासी पर बंदूक चलाने लगा | आदिवासी के हाथ में चीन की बनी हुई रायफलें पहुचने लगी .
बस्तर का ही कोंडागांव दूसरा ऐसा संवेदनशील इलाक़ा है जो सुरक्षा बलों और माओवादी हिंसा से लहुलुहान हुआ पड़ा है| यह भी जिला बन गया है| छत्तीसगढ़ में इस तरह नौ में से पांच नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नए जिलों का गठन हुआ है| छत्तीसगढ़ में पिछले लगभग दस सालों में ही ज़िलों की संख्या 16 से बढ़ते कर 27 पहुंच गई है| सुकमा और कोंडागांव के अलावा जिन इलाक़ों को ज़िलों का दर्ज़ा दिया गया है, उनमें बालौद, गरियाबंद, मुंगेली, बेमेतरा, सूरजपुर, बलौदाबाज़ार और बलरामपुर शामिल हैं| बस्तर में पदस्थ सीआरपीएफ़ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह की भी राय है कि छोटे जिलों से अभियान को बल मिलेगा|
सरकार चला रहे रमन सिंह का यह कदम बताता है कि अब यह भी माना जा रहा है कि हिंसा की बजाय किसी और रास्ते से लोगों का जीवन बदला जाए. अब बस्तर का हल गोली नही बोली है और बंदूकों से हो रहे विनाश की जगह विकास से ही है. अबूझमाड़ में सभी आदिवासी इलाकों में अस्पताल, स्कूल और सड़क की दिक्कतों को दूर किया जाए और औद्योगिकरण की स्थिति में विस्थापन औऱ रोजगार की कारगर योजना के साथ वनोपज संग्रह-विपणन में भी आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए| सारी बंदूकों को वहां से रुखसत करा के आदिवासियों को उनकी संस्कृति के हाल पे ही छोड़ दे तो बस्तर की मैना फिर से चहक सकती है.

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शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

नए साल में आपको **

खुशियों की सौगात मिलें **

सुख से महके सारा जीवन **

समृद्धि के दीप जलें **


नए साल की शुभकामनाएं
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sssssssssssssssssssssss
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लता मंगेशकर और अशक्त बच्चे

रविवार, 25 सितंबर 2011

गीतों की कोई महफ़िल सजी हो तो अमूमन मै उसमे जरूर समय पर जा धमकता हू. पुराने गीत अपनी तरफ खींचते हैं और यह आज तक समझ नही आया कि जितनी बार भी सुना जाए मन नही भरता और फिर फिर सुन कर भी बोरियत नही लगती. मौक़ा था सुरों की साम्राज्ञी लता मंगेशकरजी के ८२वें जन्मदिवस के मौके पर उनको भावभीने गीतों में जरिये याद करके उस सुहाने पुराने दौर में लौटने का जिसकी सुरमयी शाम बाकायदा सजी और श्रोताओं में बड़े-बड़े लोग गीतों की फुहारों से तृप्त होते रहे।
शहीद सभागार रायपुर में लताजी के नगमों की गीतों भरी वो शाम एक अनूठे अंदाज में मनी जिसे हम किसी से कम नही समझे जाने वाले अशक्त बच्चों ने अपने सुरों के जरिये एक यादगार शाम बना दिया.

इस कार्यक्रम का आयोजन नेचर्स केयर एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी ने किया जिसमे विशेष अतिथि श्रीमती वीणा सिंह, महापौर किरणमयी नायक, सभापति संजय श्रीवास्तव, संस्कृति विभाग के संचालक नरेन्द्र शुक्ल इत्यादि न सिर्फ शरीक हुए बल्कि बच्चों का हौसला बढ़ाने देर तक जमे रहे. सफल सरस संचालन सुश्री गांगुली ने किया. संयोजिका डा. विनीता पाण्डेय की मेहनत रंग लाई जिनकी एक पंक्ति ने श्रीताओं की खूब सराहना पाई, उनका कहना था की उन्हें निशक्त शब्द बहुत चुभता है और ये बच्चे कहीं से भी अशक्त नही हैं . बस जरुरत है उनको प्रोत्साहन की, आगे बढाने की.
कई दिन रिहर्सल करके सबको मंच के मुकाबले के लिए तैयार करने में घर वालों, साजिंदे और आयोजक सबने अथक मेहनत की . इन बच्चों ने नृत्य और गीत की अभिनव प्रस्तुति दी।
ब्लाइंड स्कूल की तेजल ने फूलों का तारों का सबका कहना है...गाया तो सब की आंखें नम हो आईं. ऐसे और कई कलाकार मंच पर आकर माईक सम्हाले जब सधी हुई आवाज में गीत गाते तो अंत में तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गूंज उठता.
अनेक कार्यक्रमों में शरीक हो कर नाम कमा चुकी चार वर्षीय नन्ही पलक तिवारी ने सजीव नृत्य किया और प्रज्ञा श्रीवास्तव ने बंइया न धरो...पर अनूठी प्रस्तुति दी। सारिका के गीत रात का समां ने सचमुच समां बांध दिया . दसवीं की छात्रा मेघा पिल्लई गीत और डांस दोनों में सटीक रहीं । सारिका व जितेन्द्र मिश्रा ने परदेसिया ये सच है पिया... और सारिका व मनोज अग्रवाल ने हम तुम चोरी से बंधे एक डोरी से... पेश किया। सरिता ने नैनो में बदरा छाए गाया और अर्पणा ने आजकल पॉंव जमीन पर नहीं पड़ते...गीत पेश किया और खूब दाद पाई । अनोखी प्रतिभा के धनी डा. गौतम देवनानी जब मंच पर आए और सुरीली तान छेड़ी तो सभी हकबक रह गए. डा. देवनानी को महारत हासिल है कि वे लता की हूबहू नक़ल कर लेते हैं . उद्घोषिका ने परिचय दिया तो यकीन नही हुआ मगर जब जब उन्होंने दो रास्ते फिल्म के गाने की बिंदिया चमकाई तो सभागार हर्ष ध्वनि से गूंज उठा.

सोलह बरस की बाली उम्र को सलाम वाला दिलकश आवाज में पेश हुआ गाना जब ख़त्म हुआ तो राज छबिगृह के पुराने मैनेजर जोशीजी भावुक हो गए .मंच के समीप आ कर उन्होंने गायिका के पांव छू कर अनूठी दाद दी. गीत ने रस घोला था, एक दूजे के लिए फिल्म उनके थिएटर में लगी थी और कई दिनों तक चली थी.
डा विनीता के इस प्रयास पर उनके साथ कार्यक्रम को सफलता के मुकाम तक लाने में जुटे अशोक मिश्रा ने कहा कि वे लगातार अकेले डटी रहीं और सारा बीड़ा अकेले उठाया है. कार्यक्रम में जाने की एक और ललक उस निमंत्रण ने पैदा की जिसने मुझे अभिभूत किया और मै अंत तक जमा रहा जबकि अधिकांश लोग जा चुके थे. वजह बने वे बच्चे जिनको कुदरत ने पूरी तवज्जो नही दी लिहाजा उनमे कोई ना कोई कमी रह गयी, ऐसे बच्चे जब कुछ करते हैं तो उनको प्रोत्साहन स्वरुप ही कार्यक्रम में जाना चाहिए और हौसला-आफजाई करनी चाहिए यह तो मूल भावना थी जिसके चलते मैं गया मगर असलियत यह है कि मै ऐसे कार्यक्रम में कई बार जब बिन बुलाए पहुच जाता हू तो किसी पीछे की सीट पर जम जाता हूं , चाहता हूं कि मुझे कोई ना पहचाने, डिस्टर्ब ना करे. शायद इसकी वजह यह हो सकती है कि मै पपी-एज के शुरुआती दौर का असफल कलाकार तो रहा ही हूं मगर कला से श्रोता वाला नाता अब भी इस रूप में है कि कई बार चिर परिचित गीत-संगीत की लय मेरे सारे दुःख-दर्द भुला कर मुझे नई ऊर्जा से लबरेज भी कर देती है जो मुझे बिन मांगी सलाह देते हुए लगता है यह युक्ति तनाव-नाशी गोली खाने वालों को भी एक बार तो आजमानी चाहिए.

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हिंदी की अविरल धारा

रविवार, 18 सितंबर 2011

बालकोनगर में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिंदी दिवस पर साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अविरल धारा बहती रही. भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) प्रबंधन द्वारा आयोजित हिंदी सप्ताह-2011 के अंतर्गत मुख्य कार्यक्रम बालकोनगर के सेक्टर-1 स्थित प्रगति भवन में धूमधाम से मना ।
वक्ताओं ने हिंदी भाषा की परंपरा, उसके मजबूत पक्षों तथा भाषा विकास में आने वाली बाधाओं के विषय में विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दैनिक नई दुनिया, रायपुर के संपादक रवि भोई, कार्यक्रम अध्यक्ष छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर, विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार गिरीश पंकज, बालको के मानव संसाधन प्रमुख अमित जोशी तथा बालको के प्रशासन महाप्रबंधक के.एन. बर्नवाल सहित अन्य विशिष्ट जनों की उपस्थिति में हिंदी सप्ताह के दौरान आयोजित काव्य-पाठ, निबंध-लेखन और भाषण स्पर्धा के विजेता छात्र-छात्राओं को पुरस्कार दिए गए ।

श्री नैयर ने कहा कि मातृ भाषा हमारी सांसों में बसती है। हम अपने सपने भी हिंदी भाषा में ही देखते हैं। प्रेम की भाषा हिंदी है। हमें अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए।
श्री भोई ने कहा कि हिंदी को आगे ले जाने के लिए स्कूलों और घरों में बच्चों से शुरूआत करनी होगी। हिंदी भाषा संबंधी भेदभाव को समाप्त करना होगा।
श्री पंकज ने कहा कि हिंदी भाषा गैर हिंदी भाषियों के हाथों में अधिक सुरक्षित है। उन्होंने गांधी जी के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चा सुराज हिंदी के रास्ते ही आ सकता है।
श्री जोशी और श्री बर्नवाल का जोर था की कि हमें निश्चित ही अंग्रेजी और अन्य भाषाएं सीखनी चाहिए परंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि इससे राष्ट्रभाषा को नुकसान न हो।
6वीं से 8वीं कक्षा वर्ग के लिए आयोजित काव्य पाठ स्पर्धा में अंकुश पांडेय को प्रथम, अंशु विश्वकर्मा को द्वितीय और प्रभात कुमार जांगड़े को तृतीय पुरस्कार मिला। आयुश धर द्विवेदी और अम्बरीश पांडेय को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए आयोजित भाषण प्रतियोगिता में संजना साहू को पहला पुरस्कार मिला। श्वेता तिवारी को दूसरा और प्रिया त्रिवेदी को तीसरा पुरस्कार मिला। गौतम सिदार और रंजन कुमार सिंह को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए आयोजित निबंध लेखन में रंजन, कुमार सिंह, शशांक दुबे और अविनाश तिवारी क्रमशरू पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। शुभम यादव और दिशा चंद्रा को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। निबंध लेखन के 11वीं से 12वीं कक्षा वर्ग में श्रद्धा कुंभकार को पहला, किरण गोस्वामी को दूसरा और रेणुका कंवर को तीसरा पुरस्कार दिया गया। प्रिया त्रिवेदी और आयशा खातून को सांत्वना पुरस्कार मिला।

अतिथियों ने बालको आयोजित हिंदी सप्ताह की सराहना करते हुए स्पर्धा के प्रतिभागियों की हौसला अफजाई की।
बालको के कंपनी संवाद महाप्रबंधक बी.के. श्रीवास्तव ने स्वागत उद्बोधन में बताया कि छत्तीसगढ़ सरस्वती साहित्य समिति के सचिव महावीर प्रसाद चंद्रा ‘दीन’ द्वारा शेक्सपीयर के नाटक ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’ के छत्तीसगढ़ी भावानुवाद ‘मया के रंग’, समिति के कोषाध्यक्ष रविंद्रनाथ सरकार रचित काव्य संग्रह ‘सुबह का सूरज’, समिति के पदाधिकारी लोकनाथ साहू रचित नाट्य संकलन ‘रंगविहार’ और समिति के पूर्व अध्यक्ष प्रमोद आदित्य रचित काव्य संग्रह ‘अगोरा’ का प्रकाशन बालको के सौजन्य से हुआ है.
देवी सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरूआत हुई जिसमे विभिन्न साहित्यिक संगठनों के पदाधिकारी, कोरबा के अनेक साहित्यकार, बालकोनगर के विभिन्न स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाएं, बड़ी संख्या में विद्यार्थी और बालको महिला मंडल की अनेक पदाधिकारी मौजूद थीं। कार्यक्रम का संचालन छत्तीसगढ़ सरस्वती साहित्य समिति के अध्यक्ष शुकदेव पटनायक ने किया। सचिव महावीर प्रसाद चंद्रा ने आभार जताया। इस अवसर पर राष्ट्रीय धर्म ऊर्जा के संपादक विकास जोशी और दैनिक नई, दुनिया के सह-संपादक सुनील गुप्ता भी मौजूद थे।
कार्यक्रम में अगले दिन काव्य गोष्ठी का आयोजन स्मरणीय रहा|

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लाल लड़ाकों का इमोशनल अत्याचार

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

बस्तर में अपहरण और रिहाई की का एक और एपिसोड देखने को मिला है जिसमे अंत तो सुखांत ही रहा है| नक्सलियों के चंगुल से छूट कर रिहा हुए जवान और उनके परिजन राहत की साँसें ले रहे हैं , मीडिया को भरपूर खबर मिली है|स्वामी अग्निवेश ने कहा कि हम एक बड़ी चुनौती, बड़ी समस्या का हल ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी इस कोशिश में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सकारात्मक रूचि दिखाते हुए पहल की है। रिहाई के बाद जो बातें सामने आई हैं उससे हम कह सकते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार ने एक सकारात्मक पहल की है।

जानकारों की राय में इस एपिसोड में एक बात खुल कर स्थापित हुई है कि पिछले दो वर्षों से बस्तर में तथाकथित आपरेशन ग्रीन हंट चलाने के नाम पर जो 700 करोड़ रूपये फूंके गए हैं- नक्सली लड़ाकों ने उस पर पूरी तरह पानी फेर दिया है और अब वे शुद्ध रूप से इमोशनल अत्याचार पर उतर आए हैं| मीडिया का चस्का लग चुका है| यह चस्का नेताओं को भी लगा रहा है|बस्तर के कई गांवों में पीने के पानी के नल नहीं है लेकिन बस्तर के नक्सली कमांडर मीडिया को रिकार्डेड बयानों की सी डी भेजते हैं|

इस तरह के छत्तीसगढ़ के कुल तीन और बेगुसराय बिहार के पुलिस अपहरण काण्ड की रोशनी में देखें तो साफ़ है कि गुरिल्ला वार का नया मन्त्र है- जवानो को उठाओ और सरकार की उठक-बैठक कराओ| इस पर भी तुर्रा यह कि दिक्कत सरकार से है , मांगें भी सरकार मानेगी मगर सरकार के किसी नेता या अफसर से बात नहीं करेंगे| ऐसा अपहरण छत्तीसगढ़ में वे पिछले छह महीनों मे दो बार कर चुके हैं और ताजा घटनाक्रम में पांच पुलिसकर्मी पिछले 18 दिनों तक उनके चंगुल में बंधक रहे हैं|

अपहृत जवान अबूझमाड़/बस्तर इलाके में रखे गए थे मगर इस इलाके में झाँकने तक की किसी की हिम्मत नहीं रही है क्योंकि इलाका पूरी तरह से जंगली और पहाडी है| दिन में भी यहाँ सूरज की रोशनी जमीन पर बमुश्किल पहुचती है|

नारायणपुर के गवाड़ी गर्दा गांव के जंगल से आठ नवंबर को दो जवानों का अपहरण कर लिया गया था| हफ्ते भर तक पुलिस खोज में लगी रही और मीडिया के लोग जंगल में नक्सलियों के चंगुल में फंसे जवानों से जा कर मिल आए| इससे पूर्व सितम्बर में सात जवानों का अपहरण करने के बाद नक्सलियों ने तीन जवानों की ह्त्या कर दी थी और शेष चार जवानों को 12 दिनों तक बंधक बनाने के बाद 1 अक्टूबर को रिहा कर दिया था| यह रिहाई मीडिया और सामाजिक संगठनों की पहल पर की गयी थी| नक्सलियों के केशकाल दलम के कमांडर रमेश ने मीडिया में दावा किया था कि वे जवानों को छोड़ देंगे बशर्तें उत्तर बस्तर के उन सभी ग्रामीणों को छोड़ दिया जाए जिनको नक्सली होने के शक में गिरफ्तार किया गया है| हालाकि मीडिया और लोगों के दबाव में सभी रिहा कर दिए गए|

ताजा हालात में देखें तो नक्सलियों की रणनीति लगता है अब सीधे वार करने की बजाय दबाव बना कर मांगें मनवाने की है और उनके निशाने पर हर बार पुलिस वाले ही होते हैं जिनको बस से बगैर सुरक्षा सफ़र की मनाही है| इस बार भी पुलिसकर्मी बस में निहत्थे सवार थे और आसानी से नक्सली उनको बंधक बना कर ले गए| अपहरण करो और एहसान दिखा कर रिहा करो यह नक्सलियों की नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है| नक्सलियों की इस नीति का फिलहाल कोई तोड़ नजर नहीं आता क्योंकि बंधक उनके कब्जे में महफूज रहते हैं उनके रहमोकरम पर और कोई उनका किला भेद नहीं पाता हैं और वे कहाँ हैं इसे लेकर सिर्फ कयास भर लगते रहते हैं| वे जिस इलाके में काबिज हैं वह चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला अबूझमाड जंगली इलाका है जहां नंग-धडंग आदिम सभ्यता आज भी ज़िंदा है और यह भी सच है कि पिछले दो वर्षों के सतत काम्बिंग अभियान के बावजूद नक्सली इलाके में महफूज हैं|
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वे जो हमसे बड़े हैं

सोमवार, 27 सितंबर 2010

सुबह एक अच्छी खबर से दिन का आगाज हुआ| खबर है कि छत्तीसगढ़ सरकार आगामी अक्टूबर माह में बुजुर्ग लोगों के लिए एक विशेष अभियान चलाएगी जिसमे एक जगह पर शिविर लगा कर उनके स्वास्थ्य परीक्षण से लेकर जरूरी मुफ्त चीजों के वितरण तक के कार्य संपन्न होंगे| यह खबर अखबार में प्रथम पृष्ठ पर नहीं किसी भीतरी पन्ने के निचले पायदान पर मिली लेकिन खबर ने मन को प्रसन्न किया| मैं जानता हूँ कि ऐसी वास्तविक मदद वाली योजना का खाका होता तो सबके मन में है मगर अमल में लाने का हौसला दिखाने वाले ही सराहे जाते हैं| दिल्ली में डा. हर्षवर्धन जब स्वास्थ्य मंत्री थे तब वे इसी तरह के अनूठे काम हाथ में लेते थे और यह बताने की जरुरत नहीं है कि भारत से पोलियो को उखाड़ फेंकने के वृहत अभियान चलाने का बीड़ा डा. हर्षवर्धन ने ही उठाया था| अब डा. रमन सिंह ऐसे कामों को आगे बढ़ा रहे हैं तो यकीनन उनकी साख और लोगों के दिल में उनके प्रति सम्मान में बढ़ोतरी ही होगी| राजनीति में एक चीज साफ़ दिख रही है कि जहां भी पढ़े लिखे लोग सत्ता या विपक्ष में हैं वहां चीजें बदल रही हैं | नजरिया बदला है और एक दिन शायद आए जब नेताओं से तौबा करने वाली जनता सचमुच अपने नायकों के ऊपर फख्र करे|

बताने की जरुरत नहीं है कि हमारे देश में बुजुर्गों की औसतन क्या स्थिति है| वे सिर्फ एक चलते-फिरते या सोए हुए या अध् सोए ऐसे सदस्य समझे जाते हैं जिनसे यही उम्मीद की जाती है कि टाईम पर खा लें और चुपचाप पड़े रहें| बोलना हो तो पूजाघर में सिर्फ मन्त्र बोलें या शादी ब्याह या किसी अन्य मौके पर आशीष वचन बोलें वरना चुप ही रहें|

भारत में एक हज़ार से भी अधिक वृद्धाश्रम हैं। वहाँ जा कर देखा जा सकता है कि यह वही देश है जहां वानप्रस्थ की कल्पना की गयी थी मगर समय ने सब कुछ बदल दिया और जिनको पकी उम्र में सहारा मिलना था वे बेसहारा कर के छोड़ दिए जाते हैं| कोई उनसे दो बोल भी नहीं बोलना चाहता है | आज घर से चला तो मुझे सड़क पर एक सज्जन दिख गए| वे साइकिल थामे चले जा रहे थे| मैंने मुस्करा कर देखा और रुका तो वे समझे कि मैं उनका कोई परिचित हूँ| वे लगे बताने- उम्र हो गयी है 90 साल | बस कट रही है| वगैरह वगैरह .. मैं आश्चर्य से भरा देखता रहा गया नब्बे की साल उम्र !! सड़क पर अकेले साइकिल थामे| प्रणम्य सेहत | ऐसा ही होता है| लोग चलते रहते हैं जब तक चल सकें| कुछ घरों में जरा सी दिक्कत पर डाक्टर बुला लिए जाते हैं मगर फिर भी तकलीफें हजार |

भारत सरकार की सीनियर सिटीजन की सुविधाओं को दर्शाने वाली वेबसाईट बताती है कि छत्तीसगढ़ में एक भी वृद्धाश्रम नहीं है? शायद इसका कारण कोई बता सके| मुझे लगता है कि अभी वो कल्चर यहाँ नहीं आया है जिसमे लोग पकी उम्र में ऐसे ठिकानों पर ढकेल दिए जाने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं| मगर इससे यह नतीजा निकाला नहीं जा सकता है कि यहाँ बुजुर्ग बहुत मजे में हैं| उनकी तकलीफें कम करने की दिशा में सरकार आगे आ रही है तो इसे एक सकारात्मक पहल ही माना जाए और दुआ कि वृद्धजन दिवस ( 1 अक्टूबर ) आशानुरूप मनेगा|

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हिन्दी के साथ बहते हुए

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

अवसर था हिन्दी दिवस का और कोरबा में हिन्दी को मंच देने बालको नगर के प्रगति सभागार में हिन्दी प्रेमी जुटे| सरस्वती साहित्य समिति और बालको महिला मंडल ने एक वैचारिक आयोजन किया जिसमे "हिन्दी के उत्थान में बाधाएं" विषय पर लम्बे विमर्श का कुल निचोड़ यह रहा कि अब हिन्दी को कोई खतरा नहीं है| ख़तरा अंगरेजी को हो सकता है क्योंकि हिन्दी का भूगोल बढ़ रहा और अंगरेजी अब हिन्दी के शब्दों के सहारे अपना विकास कर रही है| हिन्दी तो एक बहती हुई नदी है जिसमे कंकड़-पत्थर को भी बहा ले जाने की क्षमता है|
मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार किशोर दिवसेजी (बिलासपुर) ने कहा कि हिन्दी को सिनेमा ने बढाया और मीडिया ने घर-घर में पहुंचा दिया है| हिन्दी को उतना खतरा नहीं है जितना प्रचारित होता है|हिन्दी को बढना है तो क्षेत्रीय भाषा और बोलियों को भी बढना होगा| हिन्दी में सबको साथ लेकर चलने की क्षमता है| वह जन-जन की भाषा है|
बालको के महाप्रबंधक श्री जितेन्द्र धीर ने कहा कि हिन्दी तो एक बहती हुई नदी है जिसका विस्तार विदेश में हो रहा है और हमारे देश के लाखों हिन्दी के राजदूत अपनी भाषा और संस्कृति की खुशबू परदेस में महका रहे हैं| हिन्दी का आँगन सदा हरा-भरा रहेगा | जरूरत इस बात की है कि हम भाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकार्यता को बढ़ावा दें| मन में हिन्दी को जगह दें| कंपनी के संवाद प्रमुख श्री बी के श्रीवास्तव की राय थी कि हिन्दी को जनभाषा के रूप में उचित विस्तार दिया जाए और इसके कामकाजी भाषिक स्वरुप में क्लिष्टता को कम से कम किया जाए| बोलचाल की हिन्दी ही सर्वत्र वरेण्य है और यही भारत की नई पहचान है| उन्होंने बताया कि वेदान्त ने हिन्दी को लगातार बढ़ावा दिया है और आगे भी देता रहेगा| हिन्दी का परचम विश्व में लहरा रहा है और विदेश में भारत की साख हिन्दी से बनी है|
समिति की अध्यक्ष श्रीमती गीता विश्वकर्मा ने किरण पत्रिका का विमोचन कराया |लेखक के रूप में अपनी कृति "अंतर-द्वन्द" का विमोचन कराने के बाद अंचल के लेखक भुवनेश्वरप्रसाद देवांगन "नेही" का चेहरा खुशी से दमक रहा था| यह हिन्दी का सम्मान था और कई नए लेखक/प्रतियोगी बालको मंच से पुरस्कृत हुए| हिन्दी के मंच पर हिन्दी के निमित्त यह जो उदारता देखी गयी उससे वाकई लगा कि दीगर कारपोरेट कंपनियों को भी हिन्दी के उत्थान के लिए ऐसी ही उन्मुक्तता का कलेजा दिखाना चाहिए अन्यथा खानापूर्ति के लिए खानापूर्ति हिन्दी दिवस तो हैं ही|

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छत्तीसगढ़ के दस साल

बुधवार, 8 सितंबर 2010


दृश्य एक : रायपुर शहर, गौरव पथ में रात का नजारा . लगता है कनाट प्लेस में टहल रहे हैं..| नियोन साईन बोर्ड और लकदक करती लाईटें, कृत्रिम झरना और फव्व्वारे ...चमकती हुए सड़क पर भागती हुई कारें ...लगता है छत्तीसगढ़ का नवा बिहान(नया सवेरा) यहीं हुआ है|

दृश्य दो; बागबाहरा-जिला महासमुंद, रायपुर से महज 90 किलोमीटर दूरस्थ महासमुंद जिले का यह सीमान्त इलाका बदहाली के दिन गिन रहा है| मुख्य राजमार्ग पर पूरे दस किलोमीटर सड़क पर सिर्फ कीचड और नुकीले पत्थर हैं| आसपास गांवों में सहूलियतें सिफर| सड़क पर चलना हो तो गाडी में अतिरिक्त पहिया रख लें. ख़ास बात यह है कि पुलिसिया उदासीनता के कारण अब यहाँ भी बस्तर वाली लाल बयार खुल कर गावों में बहने लगी है और शायद किसी दिन धमाकों के साथ इलाके का नया परिचय दुनिया के सामने आए|

इस दृश्य की चर्चा यूँ कि एक अच्छी खबर बीते दिनों आई-दिल्ली से, दस साल पहले एक नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ ने पिछले दस वर्षों में बीमारू और अविकसित कहे जाने वाले सदियों पुराने कलंक को धो कर विकास दर के मामले में राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया है और कई बड़े राज्यों से होड़ कर ली है| यह एक अच्छा संकेत रहा है और इसके लिए सरकार- प्रशासन को यकीनन शाबासी मिलनी चाहिए लेकिन जिस राज्य में शान्ति के लिए प्रख्यात रहे घने जंगल रोजाना होने वाले धमाकों से थर्रा रहे हों, विनाश दर की लाल छलांग अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गयी हो और नक्सली मोर्चे पर जवानों की शहादत की लिस्ट देश भर के मुकाबले अव्वल हो वहाँ इस तरह के खिताब केवल कागजी संतोष दे सकते हैं और ज्यादा से ज्यादा एक सरकारी सुकून, जिसकी आंकड़ेबाजी अर्थशास्त्री ही ज्यादा समझ सकते हैं, अपन नहीं|
एक ख़ास बात तो यह भी है कि तमाम दिक्कतों के बावजूद छत्तीसगढ़ बढ़ा, यह भी कोई कम अचम्भे की बात नहीं है| राज्य को बनना था तो बढना ही था, अपने को तो उसी दिन राज्य का भविष्य दिखाई दे रहा था जिस दिन राज्य बना और तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस ने खुश हो कर मिठाई भेजी| इन दस सालों में दो तरह का छत्तीसगढ़ बनता दीख रहा है| एक शहर वाला , एक गाँव कस्बों और छोटे शहरों वाला , फर्क साफ़ किया जा सकता है| अपराध बढ़ रहे हैं, समाज रोज बदल रहा है| जमीनों के सौदों में दलाल लाल हो रहे हैं और बेचने वाले बर्बादी की तरफ बढ़ते दीख रहे हैं| एक ग्रामीण पीढी होंडा गाड़ियों में भागती हुई दिखाई दे जाती है| अचानक जमीन की कीमत बढ़ गयी तो उनके सौदे होने लगे और किसानी से मुंह चुराने वाली पीढी ने शहरों का रुख करना शुरू कर दिया है| दिल्ली-गुडगाँव- फरीदाबाद में जाट-गुर्जर किसानों की नई पीढी के साथ जो हुआ था वैसा ही यहाँ होता दीख रहा है|सब कुछ बेचो और एक बढ़िया कार खरीदो- इस मानसिकता का असर देखा जा रहा है|

रायपुर में अपराध की स्थिति यह है कि 1980 -90 के दशक में आजाद चौक पर दो गुटों के बीच झगडे में चाकू निकलता था तो दो कालम की खबर बनती थी| अब रोज़ ह्त्या और लूट की ख़बरें राज्य की प्रगति के साथ बोनस में आई हैं| पहली नवंबर को प्रदेश की स्थापना के 10 साल पूरे हो रहे हैं। राज्य बना और शहरीकरण बढ़ गया| शहरों में भीड़ बढ़ गई है| एक छत्तीसगढ़ जो रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और दीगर शहरों में नजर आता है जहां कुछ ख़ास इलाकों में साफ़ सड़कों का शहरी रूतबा है,प्रगति पथ की धाक है, हाई मास्ट लाईटें ग्रामीण आगंतुक को शहरी रुतबे से सहमा देती हैं| .... और दूसरी तरफ बहुतेरे छोटे कस्बे हैं जहां बारिश में चलना मुहाल है | लोग मुफ्त में चावल ले रहे हैं मगर सब्जी नहीं खरीद पा रहे हैं| मोबाईल बजते हैं, लडकियां साइकिल पर स्कूल जाती दीखती हैं मगर बारिश मे उनके पास रेन-कोट नहीं हैं| धमतरी एक जिला मुख्यालय है| वहा जा कर लौटा हूँ| सदर बाजार जैसी मुख्य सड़क पर इतने गड्ढे हैं कि सड़क में गड्ढे या गड्ढे में सड़क वाला जुमला याद आता रहा| धन्य हैं जनप्रतिनिधि और धन्य है नगर पालिका| यह वही शहर है जो पूरे रायपुर शहर को गर्मियों में गंगरेल बाँध का पानी पिलाता है मगर शहर में नागरिक प्रशासन नाम की चीज नजर नहीं आती|

बहरहाल यह राज्य सरकार या प्रशासन की उपलब्धि की विरोधी दल मार्का आलोचना नहीं है और यह अवसर ऐसे मुद्दे उठाने का भी नहीं है| लेकिन सवाल तो उठते ही हैं| बहरहाल दस साल में कई मुकाम तय करके दस वर्षीय छत्तीसगढ़ के लड़कपन को अब जवानी की तरफ बढ़ते देखना है| विकास दर के मामले में शीर्ष पर आने के मौके पर राज्य में एक स्लोगन जारी हुआ है- क्रेडिबल छत्तीसगढ़| मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा कि यही इस प्रतीक वाक्य की रचना की बुनियाद है। उन्होंने कहा कि पहले छत्तीसग़ढ की पहचान अपार प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण एक ऐसे राज्य के रूप में थी, जो देश की आजादी की लगभग आधी शताब्दी गुजर जाने के बाद भी पिछड़ेपन की छाया से मुक्त नहीं हो पाया था। राज्य में सामाजिक-आर्थिक विकास के अनेक क्षेत्रों में कई अभूतपूर्व और महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज की गयी हैं। राज्य के संसाधनों में विकास की क्षमता के प्रति भी राज्य के भीतर और बाहर विश्वास की एक नई लहर देखी जा रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन्हीं भावनाओं को शामिल करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य के नए प्रतीक ‘ विश्वसनीय छत्तीसगढ़’ की रचना की गई है। इसमें हर रंग राज्य की वन-संस्कृति और कृषि-संस्कृति का प्रतीक है। नई दिल्ली के प्रगति मैदान पर 14 से 27 नवंबर तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में छत्तीसगढ़ की दस साल की विकास यात्रा भी प्रदर्शित की जाएगी। प्रदेश की लोक कला और लोक संस्कृति के साथ वर्किंग मॉड़ल प्रस्तुत किए जाएंगे। क्लीन एंड एनर्जी एफिशिएंट टेक्नालाजी प्रोडक्ट एंड सर्विसेस। इसी थीम के आधार पर राज्य के क्रेडा, ऊर्डा, वन, सीएसईबी, पर्यावरण मंडल, औद्योगिक इकाईयों आदि विभागों के वर्किंग मॉडल पेश किए जाएंगे।

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