जन्म दिन पर बिच्छू को याद करते हुए

बुधवार, 25 अगस्त 2021

  मेरे जन्मदिन आम से दिन को, साधारण दिवस को खास और अहम बनाने वाले मित्रों परिजनों का हार्दिक हार्दिक आभार और इसी के साथ ही एक घटना का भी जिक्र करता चलूं जो हाल में घटी, जिसमें मेरी भिड़ंत बिच्छू महाशय से हो गई और बिच्छू ने अगर कमाल दिखा दिया होता तो आज मेरा नमस्ते वाला दिन बन गया होता।

 हुआ यह कुछ दिन पहले सुबह अचानक जब नींद खुली तो मैंने देखा जमीन पर एक कनखजूरा रेंग रहा था। अमूमन घर में कीड़े मकोड़े आ ही जाते हैं और हरित बस्तियों में जो लोग ग्राउंड फ्लोर पर रहते हैं वह इस समस्या से प्रायः बावस्ता होते रहते हैं। तो हुआ यह कनखजूरा जब पता नहीं किधर से कमरे में घुस आया और बाहर निकलने के लिए भटकने ही

लगा होगा। मैंने एक कपड़ा उसके ऊपर डाला और उसी कपड़े से उठाकर उसको बाहर का रास्ता दिखाने लगा। अमूमन कीड़े मकोड़े घुस आते हैं तो मैं कोशिश करता हूं कि उनको झाड़ू से या पेपर में यह किसी और तरीके से सुरक्षित बाहर की यात्रा करा दो। जाओ बेटा, जहां से आए हो वहीं जाओ, दिस इस नॉट सेफ प्लेस फॉर यू, वी आर ह्यूमन, वी कैन नॉट टॉलरेट यू इन आवर सोसाइटी। अब हुआ यह कि जिस कपड़े से मैंने उस कनखजूरा को पकड़ा और घर के बाहर खुले में खुलने वाले सिंक में डाला, उस सिंक में ही पहले से एक बिच्छू बैठा हुआ था। मैंने फुर्ती से कपड़ा सिंक में डाला, सिंक का ढक्कन खोल कर पानी के साथ उस कनखजूरा को बहा दिया ताकि वह बाहर चला जाए और अब क्योंकि कपड़े को धोना जरूरी था इसलिए मैंने नल के नीचे कपड़े को धोना शुरू किया कि अकस्मात मेरे हाथों में जलन होने लगी और इतनी तेज जलन होने लगी कि मैं हैरत में। अबे तुझे सेफ बाहर किया तुझे भी लगता है कलियुग का असर हो गया। यह भी सोचने लगा कि यह क्या कहानी है, कनखजूरा को तो मैंने छुआ या पकड़ा भी नहीं, क्या उसने अपना विष छोड़ दिया? जलन का क्या कारण हो सकता है? इतनी तेज जलन जैसे एसिड छू लिया हो, जैसे-जैसे मैं कपड़े को धोता गया,  जलन मेरी कई उंगलियों में होने लगी। मुझे समझ में नहीं आया क्या मसला हुआ यह सुबह सुबह, होम करते हाथ जला लिए। आखिरकार मैंने कपड़े का पानी झटका और तार में सूखने के लिए डाल दिया। जैसे ही मैंने तार में कपड़े को डाला होश उड़ गए। एक बिच्छू लटका हुआ था उस कपड़े में और वह जो जगह-जगह मेरे हाथों में जलन हो रही थी वह यकीनन उसके डंक की थी। जो कपड़े निचोड़ते हुए आधा दर्जन पॉइंट्स के साथ चुभी, या कहें खुद मैने चुभो ली, लो बेटा भुगतो।😭 चक्कर खाने की थी घड़ी थी। सामने अधमरा अचेत बिच्छू🦂 और होश फाख्ता होने का झटका झेलता मैं। खुद ही मुसीबत बुलाई। बस यहीं से भीतर के उस आत्मविश्वास ने अंगड़ाई ली जो चीटी से भी डरता है मगर शेर भी आ जाए तो डर कर तो मरेगा नहीं। ख्याल कौंधा, क्या होगा, होगा वही जो मंजूरे डेस्टिनी होगा। 1 मिनट को मैंने खुद को संयत किया और पानी की तेज धार में जितना हो सके हाथ को डेटॉल से धोया, जलन कुछ रुकी, उसके बाद मैंने एहतियात के तौर पर हाथ में रुमाल को बांध लिया ताकि जहर ऊपर तक ना जा पाए और फिर सोचने लगा सुबह के 5*30 बजे कौन डॉक्टर मिलेगा?जो मिलेगा वो पहले कोविड टेस्ट कराएगा, अभी तो यकीनन सोया होगा। इसी उधेड़बुन में मैंने सोचा अब इंजेक्शन लगाएंगे, दवाएं खिलाएंगे, पेट खाली नहीं होना चाहिए। चाय खुद बनाई इससे पहले कि घर पर कोहराम मचे, चाय पी, बिस्कुट खाए और घर पर बिना किसी को इत्तिला दिए हड़कंप मचाए मैं घर से निकल पड़ा। रास्ते में डॉक्टर को फोन किया तो उनका मोबाइल बंद था। जा पहुंचा नर्सिंग होम। बांछे खिला कर स्वागत हुआ। वहां बीपी शुगर चेक हुआ। दोनों बड़े हुए थे मामूली से, क्योंकि चाय में शक्कर ज्यादा थी और जिसको बिच्छू काट ले वह सदमे से भी निपट सकता है। बहरहाल नर्सिंग होम में हालात यह थे कि एक भी मरीज नहीं था और जूनियर डॉक्टर खाली बैठा हुआ था। उसने ऑनर को फोन लगाया। ओनर ने कहा कि तत्काल आईसीयू में एडमिट कर दिया जाए। मुझे कहा गया कि अब आप भर्ती हो जाइए। मैंने नंबर लिया खुद बात की। मैंने कहा मुझे कोई भी परेशानी नहीं है और अगर यहां भर्ती किया तो यकीनन परेशानी शुरू हो जाएगी। अब मामला बिच्छू का था और बिच्छू को भी सांप की श्रेणी में ही रखा जाता है और anti-venom इंजेक्शन दिया जाता है। संचालक ने कहा आप अपनी रिस्क पर जाइए और लिखकर दे दीजिए। फौरन लिख दिया। इंजेक्शन लगाए, गोलियां दी गई। मैंने गाड़ी उठाई। माताजी के घर आ गया। माताजी के पास पहुंचा। उन्होंने हंसते हुए मुझे कहा तुमको बिच्छू ने काटा कि नहीं काटा, मुझे नहीं मालूम लेकिन मुझे तो दो बार काटा है गांव में और गांव में कोई खास इलाज भी नहीं हुआ। बस 24 घंटे जलन हुई। उन्होंने पूछा कि कौन से रंग का बिच्छू था, मैंने कहा बताया कि काला बिच्छू नहीं था। उन्होंने हिम्मत दी। कहा चिंता की कोई बात नहीं। खैर, कई तरह की आशंकाएं लिए मैं घर आ गया। बिच्छू पर आंखे तरेरी जो उसी हालत में कपड़े में लटक रहा था। मैंने सोचा कि इसका क्या कुसूर। अब उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाए। मैंने घर के पीछे झाड़ियां इकट्ठा की और माचिस की तीली जैसे ही जलाई और बिच्छू सहित कपड़े को उसमें डाला... हैरान हो जाइए तपिश पाकर पानी से भीगा हुआ बिच्छू उठ खड़ा हुआ और फुर्ती से रेंगता हुआ चला गया। ओ माय गॉड। उसकी पूंछ जिसमें जहर होता है वो टूट चुकी थी और उसके डैने डंक भी क्षतिगस्त थे। जब वह जाने लगा तो मैंने हाथ जोड़े, कहा जाओ भाई मुझसे गलती हुई, माफ करो दुबारा बदला लेने मत आना। जिसको बचाया वो भाग गया तुम हम फंस गए।
अगले 24 घंटे का ऑब्जरवेशन पीरियड बहुत एब्नॉर्मली नॉर्मल था। बस विचित्र ख्याल आते रहे और रात बीत गई, बात बीत गई। वो बच गया, मैं भी बच गया।
Moral of the story किसी भी कपड़े को हाथ में लो तो एक बार झटक कर जरूर देख लो कि उसमें कोई जीव जंतु तो नहीं है। कोशिश यह जरूर रहे कि लंबा झाड़ू या किसी लंबी लकड़ी से  rescue किया जाए। सबसे बढ़िया कोई रेंग रहा हो तो दरवाजे का रास्ता दिखा दो, होशियार भारी पड़ सकती है। जय हो।

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फिर से बस्तर

गुरुवार, 22 जुलाई 2021


बस्तर की शांत
फिजाओं में अब बारूद की इतनी गंध फैल चुकी है कि पहाड़ी मैना के चहचहाने की कोई गुंजाइश ही नजर नही आती। विचारधारा से भटका खूंरेजी माओवाद भी लड़ते लड़ते अब एक ऐसी जहरीली सुरंग में फंस गया है जिसम सिर्फ बंदूक की भाषा में बात हो रही है और एक दर एक शांति के सारे प्रयास तब तिरोहित हो जाते हैं जब मुठभेड़ में सिर्फ शहादतों की खबरें आती है। 

घटनाक्रम पर नजर डालें तो एक शुभ संकेत यह भी नजर आता है  कि बस्तर में माओवादी भी लगता है खून खराबे से तंग आ चुके हैं। उदाहरण तब देखने को मिला जब सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह को नक्सलियों ने मुठभेड़ के बाद पहले तो पकड़ लिया लेकिन हमेशा की तरह वे उसे मार नहीं सके और एक खास बात और हुई है कि बस्तर में स्वयंसेवी संगठनों और शांति के असली पहलकर्ताओं के भारी दबाव में नक्सलियों को राकेश्वर सिंह को छोड़ना पड़ा।

जानकारों की मानें तो बस्तर में 1980 से शुरू हुआ नक्सलवाद अब इस टर्निंग पॉइंट पर आ चुका है कि उनसे सरकार की बातचीत तभी इसी सार्थक मुकाम पर पहुंच सकती है जब स्वयंसेवी संगठनों और वास्तव में आदिवासियों का भला चाहने वाले लोगों को मध्यस्थ की भूमिका में लाया जाए।


बीजापुर में 22 जवानों की हालिया शहादत का मसला अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि चूक कहां हुई। ऑपरेशन के लिए दो हजार से ज्यादा जवानों को जंगलों में उतारा गया जबकि नक्सलियों की संख्या बताते हैं कि 5 या 7 सौ ही थी। फिर भी नक्सली भारी पड़े। 

मौके का मुआयना करने वालों के मुताबिक नक्सली ऊंची पहाड़ी पर थे और जवान उन पहाड़ियों के बीच मैदान में फंसे हुए थे। ऊपर से गोलियां चलती रही और एक-एक कर जवान ढेर होते गए। यहां गौर करने वाली बात है कि नक्सली हमेशा ऐसा ही एंबुश लगाते हैं जब फोर्स लौट रही हो और थकी हुई हो। कई जवान एक साथ एक ही इलाके में मौजूद थे। गोलियां सीधे सामने चल रहे जवानों को लगी। मतलब नक्सलियों ने जवानों को पहले अंदर आने दिया और फिर फंसाया।

जोनागुड़ा गांव में नक्सली छुपे हुए थे। हुआ यह कि पहाड़ी मोर्चे पर जब जवानों को लगा कि यहां में फंस गए हैं तो वह गांव की तरफ भागे। गफलत यहीं हो गई। गांव में भी नक्सली मौजूद थे। नक्सलियों ने बड़े आराम से घेर कर न सिर्फ जवानों को मारा जो कि पहले से घायल थे बल्कि उनके कपड़े जूते और हथियार भी लूट कर ले गए। खबरें यह भी हैं कि 11 बजे मुठभेड़ शु़रू हुई जो 3 बजे तक चलती रही। इन पांच घंटो में कोई बैकअप फोर्स मौके पर नही आ पाई।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि दस दिनों के अंदर नक्सलियों ने दूसरी बार बड़ी घटना को अंजाम दे कर बता दिया कि  माओवादी कमजोर नही हुए वे अपनी पुरानी गोरिल्ला वार की रणनीति पर कायम है और एक ही तरीके से पहले झूठी सूचनाएं देकर जवानों को जंगल में बुलाते हैं और वापस लौटते समय ताबड़तोड़ हमला कर देते हैं। पिछले बीस साल में 12 हजार से अधिक निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं। कांग्रेस के नेता राजबब्बर ने राजीव गांधी भवन में 2018 मे कहा था कि नक्सली क्रांतिकारी हैं। यह माना जा रहा था पूर्ववर्ती राज्य की बीजेपी सरकार के पट्टी नक्सली ज्यादा आक्रामक है और कांग्रेस से उनको कोई परेशानी नहीं है लेकिन यह धारणा भी फिजूल साबित हुई है। एक मुखर जानकर की मानें तो नक्सलियों ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी के सगे नहीं है और जंगल में वह सिर्फ अपनी मनमानी ही चाहते हैं फिर सरकार चाहे किसी भी पार्टी की क्यों ना हो।

नक्सलियों ने 17 मार्च 2021 को शांति वार्ता का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा था। नक्सलियों ने विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि, वे जनता की भलाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बातचीत के लिए तीन शर्तें भी रखी थीं। इनमें सशस्त्र बलों को हटाने, माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने और जेल में बंद उनके नेताओं की बिना शर्त रिहाई शामिल थीं। मगर कोई बातचीत परवान नहीं चढ़ सकी। दरअसल कश्मीर में आतंकवाद के सफाई की तुलना अगर बस्तर में की जाए तो सरकार को जानकारों की राय में सबसे पहले यह करना होगा की जंगल के भीतर तक पक्की पहुंच बनानी पड़ेगी। बीजापुर मे तर्रेम क्षेत्र जहाँं सड़के नहीं है, सिर्फ पगडंडी है। यहां फोर्स का मोमेंट कैसे हो सकता है नक्सलियों की यह खास रणनीति है कि वह पक्की सड़क बनने ही नहीं देते। जानकारों की राय में सरकार को पक्की सड़कों का इंतजाम किए बगैर जंगल में पैदल सेना के भरोसे इस लड़ाई को जीतने में बहुत मुश्किलें आएंगी। इस इलाके की कमांड हिड़मा और सुजाता जैसी नक्सली लीडर के हाथ में है। जो घर में पैदा हुए जंगल में पैदा हुए और 24 घंटे वहीं गुजारते हैं। नक्सलियो को यह मालूम है की फरवरी, मार्च , अप्रैल के महीने में इलाके में अपनी पकड़ बनाने के लिए इस तरह की बड़ी वारदातों को अंजाम देना होगा और वह हमेशा से यही करते आए हैं जितनी भी बड़ी घटनाएं हुए हैं वह मार्च और अप्रैल के महीने में ही हुई है। महीनों में नक्सली जंगल में ट्रेनिंग कैंपों का संचालन करते हैं। पर चलकर मुठभेड़ों के शिवाय फिलहाल कुछ हासिल होने वाला नहीं है। फोर्स जंगल के बाहर तो पूरी मुस्तैदी से काम करती है लेकिन जंगल के भीतर की ट्रेनिंग अभी पक्की नहीं है और जिस तरह से नक्सलियों का बिल भी पसीजा है तो अब एक ही सूरते हाल है कि सरकार को किसी तरीके से माओवादियों को बातचीत की टेबल पर लाना चाहिए और यह वक्त की मांग है कि सरकार  आदिवासियों को विश्वास में लेकर नक्सली लीडरों से बात करने की पहल करे। 

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सायबर ठगों का जामताड़ा

रविवार, 7 मार्च 2021

 एक अकेले जामताड़ा ने पूरे छत्तीसगढ़ ही नही समूचे आसपास के राज्यों की पुलिस की नाक में दम कर दिया है।  झारखंड का कुख्यात जामताड़ा साइबर अपराध का अभ्यारण्य बन गया है। छत्तीसगढ़ पुलिस ने इलाके से 725 सिम कार्ड जब्त कर आधा दर्जन आरोपियों को रायपुर लेन में सफलता हासिल की है जिन पर हजारों लोगों से ठगी के आरोप हैं। 

झारखंड के दो जिलों में सक्रिय साइबर अपराधी डिजिटल डकैती के लिए देश भर की पुलिस के सामने चुनौती बन गए हैं। गिरिडीह और जामताड़ा के छह थाना क्षेत्र में सायबर अपराध के हजारों मामलों दर्ज हैं। दुमका जिले को विभाजित करके बनाया गया एक नया जिला है। यह उत्तर में देवघर जिले से, पूर्व में दुमका और पश्चिम बंगाल, दक्षिण में धनबाद और पश्चिम बंगाल तथा पश्चिम में गिरिडीह से घिरा हुआ है| देश के किसी भी कोने में साइबर ठगी होती है, तो 80 फीसदी मामलों में जामताड़ा के करमाटांड़ का मोबाइल लोकेशन आता है और अब यह एक अहम् समस्या बन गई है। 
छत्तीसगढ़ पुलिस ने स्थानीय पुलिस के सहयोग से साइबर अपराध में  संलिप्त दो आरोपितों को गिरफ्तार किया । खोपचवा गांव  के राहुल मंडल (पिता श्यामचंद्र मंडल) व दूसरे आरोपित कल्याणरायठाढ़ी  निवासी पप्पू कुमार मंडल (पिता प्रकाश मंडल) की उम्र 25 से 30 साल के बीच है। आरोपी बैंक अधिकारी बन कर लोगों से पासवर्ड पूछते और ऑनलाइन ठगी कर लेते थे। पुलिस ने इन्हें नाटकीय ढंग से इनके घर से पकड़ा। छापेमारी  में दलबल के साथ पहुंची तो पूरा गांव पुलिस के खिलाफ खड़ा हो गया। बाद में स्थानीय पुलिस की मदद मिली। 

सिरदद  बन चुके सायबर अपराधियों के खिलाफ झारखण्ड इलाके की पुलिस भी सक्रिय है। गिरिडीह पुलिस को एक बार पुनः फर्जी बैंक अधिकारियों को पकड़ने में सफलता हाथ लगी है। हाल में साइबर अपराध के जुर्म में माइनिंग इंजीनियर के छात्र समेत चार अपराधियों को पकड़ा गया है। निर्वाचन आयोग के हाल के जागरूकता सप्ताह के दौरान प्रस्तुत एक नोट में जिक्र किया गया है कि खराब सिग्नल और कनेक्टिविटी की समस्या के बावजूद जामताड़ा में सेलफोन की तादाद अन्य संचार माध्यमों से काफी ज्यादा है जो चौकाने वाली बात है । यहां का एक संलिप्त युवा अमूमन दस सेलफोन एक साथ हेंडल करता है। इलाके में सायबर क्राइम सबसे ज्यादा है यह प्रायः हर थाने में दर्ज है। आकलन के मुताबिक अलग-अलग 150 गिरोह इस काम में संलिप्त हैं जो पुलिस के लिए चुनौती बने हुए हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में फोन कर लोगों को झांसे में डालकर उनसे एटीएम पिन लेकर उनके अकाउंट पर हाथ साफ़ करने वाले अपराधी स्कॉर्पियो में चलते हैं और कई मकान खरीद चुके हैं। वे बाकायदा ट्रेनिंग देते हैं। एक पुलिस अफसर के मुताबिक जामताड़ा में गिरोह द्वारा बीस हजार रूपये ले आकर सायबर ठगी की ट्रेनिंग दी जा रही है। इनके पास ऐशो आराम के हर साधन मौजूद हैं।  इस क्राइम सिंडिकेट में बीसियों गांवों के सैकड़ो टीन एजर्स शामिल हैं। सबसे पहले दो लड़के दिल्ली से साइबर ठगी की ट्रेनिंग लेकर आए, इसके बाद उन्होंने यहां के युवाओं को ट्रेनिंग दी और तकरीबन हर घर में एक कल सेंटर चल पड़ा। कम पढ़े लिखे ये युवा अपराधी इतने सलीके से बात करते हैं कि ठगी के शिकार  आसानी से जाल में फंस जाते हैं।  
संपत मीणा, आइजी, सीआइडी झारखण्ड पुलिस ने बाकायदा वेबसाइट पर इश्तहार दिया है कि आए दिन साइबर अपराधियों द्वारा एटीएम फ्रॉड से लोगों को चूना लगाए जाने की खबर आती है। इसकी जानकारी के बाद भी लोग लगातार ठगी के शिकार हो रहे हैं। साइबर अपराधियों का गढ़ बन चुके जामताड़ा जिले से गिरफ्तार 12 अपराधियों ने एटीएम फ्रॉड को अंजाम देने के तरीके का खुलासा किया है। इन अपराधियों की उम्र 19 साल से 35 साल तक है। इनके मुताबिक फ्रॉड के लिए वे लोग दो तरह के मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं। एक साधारण और दूसरा स्मार्टफोन। मामले में जामताड़ा पुलिस ने सीआइडी को रिपोर्ट भेजी है।

ऐसे देते हैं फ्रॉड को अंजाम :

 ''स्मार्ट फोन में वे पेटीएम, ई वैलेट और एम पैसा मोबाइल वैलेट एप्लीकेशन इंसटॉल करके रखते हैं। इसके बाद वे कई नंबरों से में से किसी एक नंबर को अंदाज पर चयन करते हैं। उसके बाद उस सीरीज के नंबरों पर साधारण मोबाइल से कॉल करते हैं। लोगों को वे अपना परिचय बैंक अधिकारी के तौर पर देते हैं। साथ ही लोगों को कहते हैं कि उनका एटीएम नंबर एक्सपायर होने वाला है और उनसे उनके एटीएम कार्ड का 16 डिजिट वाला नंबर मांगते हैं। नंबर लेने के बाद उस नंबर को मोबाइल वैलेट में डालते हैं। कुछ राशि उस वैलेट में ट्रांसफर करते है। इससे एटीएम का वन टाइम पासवर्ड जेनरेट होकर भुक्तभोगी के मोबाइल नंबर पर चला जाता है। इसके बाद साइबर अपराधी उसको फोन करके यह कहते हुए वह पासवर्ड ले लेता है कि उस नंबर के जरिए आपके एटीएम को लॉक करने से बचाया जा सकता है। नंबर लेते ही उसको वह फिर से मोबाइल वैलेट एप्लीकेशन में डालता है। इससे जो राशि खाते में होती है वह सफलतापूर्वक ट्रांसफर हो जाता है। उस पैसे से अपराधी ऑनलाइन शॉपिंग के अलावा मोबाइल और डीटीएच रिचार्ज कराने के काम में इसका उपयोग करते हैं।

किसी भी परिस्थिति में मोबाइल से बात करनेवाले व्यक्ति को अपने एटीएम या डेबिट कार्ड के बारे में किसी तरह की सूचना नहीं दें। कोई अगर बैंक अधिकारी बनकर कुछ पूछता है तो उसे यह बोलें कि कुछ देर बाद वे जानकारी दे सकते हैं। इसके तत्काल बाद अपने संबंधित बैंक से संपर्क कर वास्तविकता का पता करें। शंका होने पर पुलिस को इसकी तत्काल सूचना दें।'' 

  नौबत यह है कि अलग अलग राज्यों की पुलिस का प्रायः यहां आना जाना लगा रहता है। वजह है ठगी। राष्ट्रीय अपराध अनुसन्धान ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक  2013 में पूरे देश में साइबर अपराध के कुल 5,613 मामले दर्ज किए गए जबकि 2015 में इसकी संख्या बढ़कर 11,331 हो गई।
पुलिस के आला अफसर भी  रहे हैं कि जामताड़ा में ही यह अपराध क्यों संगठित रूप से पनप रहा है। एक वजह यह मानी जा रही है कि पुलिस के पास दक्ष सायबर टीम का अभाव है और अपराधी बेखटके काम को सफाई से अंजाम दे रहे हैं।  
(राष्ट्रीय सहारा नई दिल्ली मे   2016 में प्रकाशित मेरी खबर)

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अलविदा श्रीश मिश्र जी

रविवार, 6 दिसंबर 2020

 कुछ शख्सियतें इतनी प्रभावशाली होती हैं कि आप एक बार अगर उनसे मिल लेते हैं तो जीवन भर फिर उनको भूल नहीं सकते।

 वरिष्ठ पत्रकार जनसत्ता के पूर्व सीनियर एडिटर श्रीशचंद्र मिश्र ऐसी ही ख्यात हस्तियों में एक थे जिनके साथ मेरी जितनी भी मेल मुलाकातें संगत रही हर बार मैं उनसे कुछ न कुछ सीखता था। त्रासद है कि दो दिन पहले वे इस दुनिया से विदा हो गए। दिल्ली में उनका निधन हो गया। यकीनन जब यह खबर आई तो मुझे बहुत भीतर से इस तरह से अफसोस हुआ जैसे अपना कोई सगा चला गया हो।

बात है 1990- 9091 की, तब फिल्म रिपोर्टिंग में भी मेरी दिलचस्पी बढ़ी थी। बहुत सी फिल्मस की कवरेज भी मैंने की। श्रीश जी जनसत्ता में फिल्म क्रिटिक थे। उस दौर में हर रंग से रंगीन फिल्मी दुनिया मुझे बड़ी अजीब ही लगती थी। श्रीश जी के व्यवहार व्यक्तित्व से तो लगता ही नहीं था कि वे उन फिल्म लेखकों के बैच में कहीं फिट हैं जिसमें ब्रजेश्वर मदान जैसे अलमस्त तबीयत के बिंदास लिखने बोलने खाने पीने जीवन जीने वाले वरिष्ठ फिल्म पत्रकार थे। श्रीश जी बहुत धीमा बोलते थे। कम बोलते थे। नपा तुला बोलते थे मगर जब भी बोलते थे तो सब एकटक उनको सुनते थे। कई बार तो यह भी होता था कि समूह वार्तालाप में फिल्म कलाकार से अमूमन सामान्य सवाल पूछे जाते हैं कि "आपकी नई फिल्म कौन सी आ रही है" या "फलाने से आपका अफेयर सचमुच चल रहा है" मगर श्रीश जी के सवाल गंभीरता लिए हुए किसी ऐसी रिसर्च से जुड़े होते थे जो फिल्म पत्रकारिता को एक अलग ही दिशा देती थी। श्रीश जी की गंभीर खबरें या लेख जब भी जनसत्ता में छपते चाव से पढ़े जाते थे।

 फिल्म "हीर रांझा" की शूटिंग कवरेज के के लिए दिल्ली से मुंबई की ट्रेन यात्रा में मेरी और श्रीश जी की सीटें अगल-बगल थी।  इस सफर में मुझे उनसे काफी बातचीत करने का मौका मिला था। बेधड़क बातचीत में मैंने अपनी कुछ व्यक्तिगत समस्याएं भी उनसे डिस्कस की थी और यकीनन उन्होंने मुझे जो बातें कहीं मेरे लिए बहुत कारगर साबित हुई। उस दिन से उनके प्रति मेरे मन में सम्मान भाव जग गया और हमेशा मैं उनको बड़े भाई की तरह ही मानता रहा। श्रीश जी ने मुझे जनसत्ता में लिखने के अवसर भी दिए। एक नए पत्रकार को जो जो काम की टिप्स दी जा सकती हैं वह भी दी। और जब तक दिल्ली में मैं रहा मुझे लगता रहा कि श्रीश जी के रूप में एक ऐसा व्यक्ति रिजर्व है जिनके पास अगर मैं गया अपनी किसी प्रॉब्लम को डिस्कस करने या कोई हेल्प मांगने तो वह मना नहीं करेंगे। यह अलग बात है कि उनसे बहुत कम मुलाकातें हुई। किसी मदद की कभी जरूरत भी नहीं पड़ी। मगर संबंधों के बैंक में रिजर्व बैंक की तरह लगते थे। मित्रों, पत्रकार तो बहुत से होते हैं। लेखक भी कई होते हैं लेकिन जो व्यक्ति जैसा लिखता है वैसा ही जीता है, ऐसे बहुत कम लोग होते हैं। जिनकी कथनी और करनी में कोई फर्क महसूस नहीं होता, चुनिंदा शख्स जैसे भीतर होते हैं वैसे ही बाहर होते हैं। इस नाते श्रीश जी पारदर्शी व्यक्तित्व की बेमिसाल हस्ती थे और कहीं ना कहीं कह लें कि यूपी से जा कर दिल्ली में बस जाने के बावजूद उनके भीतर महानगरीय व्यस्तता से उपजी वो सतहीपन वाली तल्खी भी कहीं नजर नहीं आती थी जिनसे कोई आहत हो। आत्मीय भाव से भरे लगते थे।

 एक राइटर के तौर पर सबसे बड़ी चीज जो मुझे आश्चर्य में डालती थी वह यह थी कि हम लोग डायरियां लिए, पैन लिए किसी भी कलाकार के इर्द-गिर्द झूम जाते। कहीं न कहीं मन में एक प्रबल इच्छा भी होती थी कि गांव भिजवाने के लिए एक फोटो ही खिंचवा लिया जाए मगर श्रीश जी भीड़ में भी किनारे खड़े रहते थे और सबसे बड़ी बात यह है कि वह कुछ नोटिंग भी नहीं करते थे चाहे इंटरव्यू कितना भी लंबा हो मगर क्या मजाल... अगले दिन आश्चर्य होता था जब जनसत्ता छप के आता था। हूबहू वही सवाल वही जवाब..शैली धारदार दमदार।

 और साथ में अगर उनकी अपनी टिप्पणियां होती तो लाजवाब कर देती थी। इतना शांत चित्त, धैर्यवान और प्रचंड स्मरण शक्ति से लैस लेखक मैंने आज तक नहीं देखा। 

श्रीश जी अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें हमेशा कायम रहेगी। मैं उनके परिजनों के प्रति गहन संवेदना व्यक्त करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वे उन को श्री चरणों में स्थान दें।


 

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वैचारिक साख के आइकॉन थे ललित सुरजन जी

शनिवार, 5 दिसंबर 2020


 ललित सुरजन (74) नाम ही काफी था। आप उनकी विचारधारा से असहमत हो सकते थे, आलोचना भी कर सकते थे मगर उनके अडिग विचारों को लेकर उनकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकते थे, ऐसे दौर में जबकि कदम कदम पर लेखक पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग सत्ता के आगे लिजलिज करता लुंजपुंज वैचारिक तौर पर बिछते नजर आता है, ललित सुरजन जी अपनी वैचारिक साख के आइकॉन थे। उनके असामयिक निधन पर समूचे मीडिया जगत में स्तब्धता है। वाम पंथी चिंतन की तरफ झुकाव था तो था, उन्होंने कभी न छुपाया न कभी दाएं बाएं से भटके। यह उनकी खासियत उनको भीड़ से अलग करती थी। महीना भर पहले जब मैंने अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी के तरीके के विरोध में लिखा तो उनकी भी आपत्ति खुलकर सामने आई थी (मेरे वॉल पर उनके कमेंट की आखिरी यादगार क्लिप)।

 ललित जी के मातहत 1985 में काम करने का मुझे अवसर मिला था जब देशबंधु के पश्चिमी उड़ीसा कालाहांडी संवाददाता के रूप में उन्होंने मुझे आगे बढ़ने का समझ लीजिए दूसरा मौका दिया था (पहला मौका युगधर्म में बबन जी ने दिया था) और सच कहूं छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में वह स्वर्णिम काल था जब देशबंधु को "पत्र नहीं मित्र" के रुप में ललित जी ने स्थापित किया और बड़े-बड़े व्यंग्यकार लेखक असरदार दमदार पत्रकारों की एक टीम तैयार की जिनमें कुछ नाम बड़े आदर के साथ लेना चाहूंगा -स्वर्गीय सत्येंद्र गुमास्ता, रामाधार तिवारी, प्रभाकर चौबे के लिखे हुए को पढ़ने का एक किसम का चस्का पाठकों को लगा हुआ था और देशबंधु की धारदार रिपोर्टिंग का इंतजार सुबह अखबार पढ़ने को लालायित लोग करते थे। देशबंधु सजीला संवरा छपाई में आकर्षक अखबार माना जाता था। गिनती नहीं हो सकती, न जाने कितने पत्रकार देशबंधु से ट्रेनिंग लेकर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता में अपनी धाक बना चुके हैं। ललित जी को मैंने दिल्ली में भी पूरी प्लानिंग के साथ समय से आगे की सोच को लेकर काम करते हुए देखा। जिन दिनों विज्ञापन विभाग को बहुत ज्यादा लाइमलाइट में नहीं लाया जाता था। मुझे याद है सेंटर प्वाइंट होटल में ललित जी ने विज्ञापन अभिकर्ताओं का बाकायदा एक सेमिनार किया था जिसमें पुरस्कार वगैरह भी वितरित किए गए थे ताकि रेवेन्यू को बूस्टअप मिले। उस दौर में यह एक अनोखा प्रयोग था। देशबंधु में फुल पेज कवरेज खास विषय पर करने का ट्रेंड भी ललित जी के समय की ही बात रही है। बस्तर की समस्याओं को सामने लाने में भी देशबंधु का योगदान ज्यादा रहा है। मुझे याद है कि छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में उस दौर में प्रिंटिंग का काम जब एक एक अक्षर को जमाने और फिर उसकी गेली का प्रूफ पढ़ने से लेकर पेज तैयार करने के ट्रेडल मशीन वाले दौर में था तब ललित जी ने देशबंधु का बाकायदा कंप्यूटराइजेशन किया था और अपने सारे रिपोर्टरों को प्रूफ पढ़ने के बहाने कंप्यूटर की निशुल्क ट्रेनिंग दिलाई थी। पाठकों में देशबन्धु की एक अलग ही साख थी, धाक थी और नवभारत से कंपटीशन का बड़ा दिलचस्प दौर था। 

शुरुआत में  उस वक्त जो उनके अलफाज थे मुझे आज भी याद है रमेश, कैरियर बनाओ आगे बढ़ो। ललित जी की खासियत यह थी कि वे अपने विचारों पर वह हमेशा अडिग थे और दम ठोक कर लिखने वाले छत्तीसगढ़ के यशस्वी संपादकों में उनका नाम शीर्ष पर हमेशा चमकता रहेगा।

 मेरा शत-शत नमन।

🙏

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अलविदा अमर सिंह

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

 सचमुच अफसोसनाक खबर। 

अमर सिंह नहीं रहे जबकि मार्च में उनके बारे में बुरी अफवाह उड़ी तो वीडियो जारी करके कहा था टाईगर ज़िंदा है और कई बार यमराज को ठेंगा दिखा चुका है मगर बुरी खबर सच हुई।

दिल्ली में केंद्रीय राजनीति की खबरें कवर करते पार्लियामेंट या इतर उनके घर जितनी भी लगभग औपचारिक ही मुलाकातें हुई, मुझे लगता रहा अमर सिंह के दो रूप थे, एक वो रूप जिसके चहेते देश विदेश तक और हरेक दल में थे, दूसरा वो जो लगता था। उन्होंने यूपी के गांव की मिट्टी को अपने भीतर बदस्तूर कायम रखा था और सहज व्यवहार से पल में अपना बनाने की कला उनका नैसर्गिक गुण थी। उनकी आलोचना बेशक करने वाले करते ही थे मगर जो इंसान खुद कहे "हां मैं ...लाल हूं सो हूं"। उनकी आलोचना करने वाले भी चुप हो जाते। वे जहां भी होते अपनी हैसियत और दमदार उपस्थिति दर्ज करा देते थे। 

दुरभिसंधि के कुशल राजनीतिज्ञ, उस पर भी घाघ किस्म की राजनीति में उनका जवाब लाजवाब था गिरती सरकारें थाम लेने का हुनर हर किसी में नहीं होता  लेकिन खूबी और कमी जो भी किया दिल से किया वाला अंदाज़ था उनका, दोस्ती करते दुश्मनी कर लेने और पूरे दिल से दुश्मनों से निपटने में ही उम्र जाया हो गई, लगता है, वरना जितना उनका कैलिबर था उतना बड़े बड़ों में भी नहीं दिखा। भावुक पल तब थे जब पार्लियामेंट में आतंकवादी घुसे थे। हाऊस में उस दिन मैं भी गेट पर फंसा था। अमर सिंह भी भीतर फंसे थे। वो एक अलग किस्सा है मगर उनकी खूबी थी कि यार दिलदार टाइप इंसान थे, मगर यारी लंबी क्यों नहीं चल पाती थी यह खबरों का विषय रहता था। कारण वही बेहतर जानते रहे होंगे। 


शख्सियत से दिलचस्प थे और बेलाग बेखौफ साफ साफ बोलने का माद्दा रखते थे। हर पार्टी में उनके हमराज दोस्त थे तो बैरी भी खूब बना लेते थे। सपा में मुलायम सिंह से उनका लगाव जुड़ाव था मगर इस जोड़ी पर भी आंच आ गई तो फिर वे नेपथ्य में ही चले गए। फिर कभी नहीं लौटने के लिए। सादर नमन।

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माता कौशल्या का भव्य मंदिर बनेगा

रविवार, 16 अगस्त 2020

 रायपुर। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की तैयारियां जोरों पर हैं जबकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के ननिहाल छत्तीसगढ़ में उनकी माता कौशल्या के भव्य मंदिर का भी निर्माण काम चल रहा है। 15करोड़ रुपयों की लागत से भव्य मन्दिर बनाया जाएगा।

छत्तीसगढ़ में राजधानी रायपुर के समीप माता कौशल्या की जन्मभूमि चंदखुरी में पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यह घोषणा की। बघेल अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मुक्तेश्वरी बघेल और परिवार के सदस्यों के साथ चंदखुरी पहुंचे और वहां स्थित माता कौशल्या के प्राचीन मंदिर में उन्होंने पूजा-अर्चना कर प्रदेश की खुशहाली और समृद्धि की कामना की। उन्होंने मंदिर के सौन्दर्यीकरण और परिसर के विकास के लिए तैयार परियोजना की विस्तृत जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने कहा कि मंदिर के सौन्दर्यीकरण के दौरान मंदिर के मूलस्वरूप को यथावत रखते हुए यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए।    
   उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ सरकार राम वन गमन पथ पर पड़ने वाले महत्वपूर्ण स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है। इसकी शुरूआत चंदखुरी स्थित माता कौशल्या के मंदिर के सौंदर्यीकरण कार्य के बीते 22 दिसम्बर को भूमि-पूजन के साथ कर दी गई है। भव्य मंदिर की निर्माण की कार्ययोजना में परिसर में विद्युतीकरण, तालाब का सौंदर्यीकरण, घाट निर्माण, पार्किंग, परिक्रमा पथ का विकास आदि कार्य शामिल किए गए हैं।
     बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ भगवान राम का ननिहाल है। यहां कण-कण में भगवान राम बसे हुए है। भगवान राम ने वनवास का बहुत सा समय यहां व्यतीत किए हैं। छत्तीसगढ़ सरकार भगवान राम के वन गमन मार्ग को पर्यटन परिपथ के रूप में विकसित कर रही है ताकि इन स्थलों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिल सके। 15 करोड़ की लागत से सौन्दर्यीकरण का कार्य कराया जाएगा। उन्होंने इस अवसर पर यहां तालाब के बीच से होकर गुजरने वाले पुल की मजबूती के साथ ही यहां परिक्रमा पथ, सर्वसुविधायुक्त धर्मशाला और शौचालय बनाने कहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सौन्दर्यीकरण कार्य का भूमिपूजन हो गया है यहां अगस्त के तीसरे सप्ताह से निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाएगा।
मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर ग्रामीणों की मांग पर मंदिर के पास से बायपास सड़क की स्वीकृति प्रदान करते हुए आवश्यक कार्यवाही के निर्देश दिए। वहीं ग्राम वासियों की सहुलियत को देखते हुए चंदखुरी में राष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा खोलने के निर्देश जिला अधिकारियों को दिए है। 
      गौरतलब है कि त्रेतायुगीन छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम दक्षिण कोसल एवं दण्डकारण्य के रूप में विख्यात था। प्रभु श्रीराम ने उत्तर भारत से छत्तीसगढ़ में प्रवेश के बाद विभिन्न स्थानों पर चौमासा व्यतीत करते हुए दक्षिण भारत में प्रवेश किया गया था। छत्तीसगढ़ में कोरिया जिले की गवाई नदी से होकर सीतामढ़ी हरचौका नामक स्थान से प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया था। इस दौरान उन्होंने 75 स्थलों का भ्रमण करते हुए सुकमा जिले के रामाराम से दक्षिण भारत में प्रवेश किया था। उक्त स्थलों में से 51 स्थल ऐसे है, जहां प्रभु श्रीराम ने भ्रमण के दौरान रूक कर कुछ समय व्यतीत किया था। प्रथम चरण में इनमें से 9 स्थलों को विकसित किया जाएगा। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राम वन गमन पथ का, पर्यटन की दृष्टि से विकास की योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य राज्य में आने वाले पर्यटकों, आगन्तुकों के साथ-साथ देश और राज्य के लोगों को भी राम वन गमन मार्ग एवं स्थलों से परिचित कराना एवं इन ऐतिहासिक स्थलों के भ्रमण के दौरान पर्यटकों को उच्च स्तर की सुविधाएं भी उपलब्ध कराना है।
छत्तीसगढ़ में राम वन गमन पर्यटन परिपथ को विकसित करने के उद्देश्य से प्रथम चरण में 09 स्थलों का चयन किया गया है। इन स्थलों में सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया), रामगढ़ (अम्बिकापुर), शिवरीनारायण (जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया (बलौदाबाजार), चंदखुरी (रायपुर), राजिम (गरियाबंद), सिहावा-सप्तऋषि आश्रम (धमतरी), जगदलपुर (बस्तर), रामाराम (सुकमा) शामिल हैं। राम वन गमन पर्यटन परिपथ में प्रस्तावित 09 स्थलों को लेते हुए पर्यटन विभाग द्वारा एक कॉन्सेप्ट प्लान तैयार किया गया है, जिसकी लागत 137.45 करोड़ रूपए है। राम वन गमन पर्यटन परिपथ हेतु राज्य शासन द्वारा गत वर्ष (2019-20) राशि 5 करोड़ रूपए और इस वर्ष (2020-21) 10 करोड़ रूपए का प्रावधान बजट में किया गया है। इस तरह कुल राशि रूपए 15 करोड़ राज्य शासन द्वारा स्वीकृति दी गई है।

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