अलविदा अमर सिंह

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

 सचमुच अफसोसनाक खबर। 

अमर सिंह नहीं रहे जबकि मार्च में उनके बारे में बुरी अफवाह उड़ी तो वीडियो जारी करके कहा था टाईगर ज़िंदा है और कई बार यमराज को ठेंगा दिखा चुका है मगर बुरी खबर सच हुई।

दिल्ली में केंद्रीय राजनीति की खबरें कवर करते पार्लियामेंट या इतर उनके घर जितनी भी लगभग औपचारिक ही मुलाकातें हुई, मुझे लगता रहा अमर सिंह के दो रूप थे, एक वो रूप जिसके चहेते देश विदेश तक और हरेक दल में थे, दूसरा वो जो लगता था। उन्होंने यूपी के गांव की मिट्टी को अपने भीतर बदस्तूर कायम रखा था और सहज व्यवहार से पल में अपना बनाने की कला उनका नैसर्गिक गुण थी। उनकी आलोचना बेशक करने वाले करते ही थे मगर जो इंसान खुद कहे "हां मैं ...लाल हूं सो हूं"। उनकी आलोचना करने वाले भी चुप हो जाते। वे जहां भी होते अपनी हैसियत और दमदार उपस्थिति दर्ज करा देते थे। 

दुरभिसंधि के कुशल राजनीतिज्ञ, उस पर भी घाघ किस्म की राजनीति में उनका जवाब लाजवाब था गिरती सरकारें थाम लेने का हुनर हर किसी में नहीं होता  लेकिन खूबी और कमी जो भी किया दिल से किया वाला अंदाज़ था उनका, दोस्ती करते दुश्मनी कर लेने और पूरे दिल से दुश्मनों से निपटने में ही उम्र जाया हो गई, लगता है, वरना जितना उनका कैलिबर था उतना बड़े बड़ों में भी नहीं दिखा। भावुक पल तब थे जब पार्लियामेंट में आतंकवादी घुसे थे। हाऊस में उस दिन मैं भी गेट पर फंसा था। अमर सिंह भी भीतर फंसे थे। वो एक अलग किस्सा है मगर उनकी खूबी थी कि यार दिलदार टाइप इंसान थे, मगर यारी लंबी क्यों नहीं चल पाती थी यह खबरों का विषय रहता था। कारण वही बेहतर जानते रहे होंगे। 


शख्सियत से दिलचस्प थे और बेलाग बेखौफ साफ साफ बोलने का माद्दा रखते थे। हर पार्टी में उनके हमराज दोस्त थे तो बैरी भी खूब बना लेते थे। सपा में मुलायम सिंह से उनका लगाव जुड़ाव था मगर इस जोड़ी पर भी आंच आ गई तो फिर वे नेपथ्य में ही चले गए। फिर कभी नहीं लौटने के लिए। सादर नमन।

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