वैचारिक साख के आइकॉन थे ललित सुरजन जी

शनिवार, 5 दिसंबर 2020


 ललित सुरजन (74) नाम ही काफी था। आप उनकी विचारधारा से असहमत हो सकते थे, आलोचना भी कर सकते थे मगर उनके अडिग विचारों को लेकर उनकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकते थे, ऐसे दौर में जबकि कदम कदम पर लेखक पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग सत्ता के आगे लिजलिज करता लुंजपुंज वैचारिक तौर पर बिछते नजर आता है, ललित सुरजन जी अपनी वैचारिक साख के आइकॉन थे। उनके असामयिक निधन पर समूचे मीडिया जगत में स्तब्धता है। वाम पंथी चिंतन की तरफ झुकाव था तो था, उन्होंने कभी न छुपाया न कभी दाएं बाएं से भटके। यह उनकी खासियत उनको भीड़ से अलग करती थी। महीना भर पहले जब मैंने अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी के तरीके के विरोध में लिखा तो उनकी भी आपत्ति खुलकर सामने आई थी (मेरे वॉल पर उनके कमेंट की आखिरी यादगार क्लिप)।

 ललित जी के मातहत 1985 में काम करने का मुझे अवसर मिला था जब देशबंधु के पश्चिमी उड़ीसा कालाहांडी संवाददाता के रूप में उन्होंने मुझे आगे बढ़ने का समझ लीजिए दूसरा मौका दिया था (पहला मौका युगधर्म में बबन जी ने दिया था) और सच कहूं छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में वह स्वर्णिम काल था जब देशबंधु को "पत्र नहीं मित्र" के रुप में ललित जी ने स्थापित किया और बड़े-बड़े व्यंग्यकार लेखक असरदार दमदार पत्रकारों की एक टीम तैयार की जिनमें कुछ नाम बड़े आदर के साथ लेना चाहूंगा -स्वर्गीय सत्येंद्र गुमास्ता, रामाधार तिवारी, प्रभाकर चौबे के लिखे हुए को पढ़ने का एक किसम का चस्का पाठकों को लगा हुआ था और देशबंधु की धारदार रिपोर्टिंग का इंतजार सुबह अखबार पढ़ने को लालायित लोग करते थे। देशबंधु सजीला संवरा छपाई में आकर्षक अखबार माना जाता था। गिनती नहीं हो सकती, न जाने कितने पत्रकार देशबंधु से ट्रेनिंग लेकर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता में अपनी धाक बना चुके हैं। ललित जी को मैंने दिल्ली में भी पूरी प्लानिंग के साथ समय से आगे की सोच को लेकर काम करते हुए देखा। जिन दिनों विज्ञापन विभाग को बहुत ज्यादा लाइमलाइट में नहीं लाया जाता था। मुझे याद है सेंटर प्वाइंट होटल में ललित जी ने विज्ञापन अभिकर्ताओं का बाकायदा एक सेमिनार किया था जिसमें पुरस्कार वगैरह भी वितरित किए गए थे ताकि रेवेन्यू को बूस्टअप मिले। उस दौर में यह एक अनोखा प्रयोग था। देशबंधु में फुल पेज कवरेज खास विषय पर करने का ट्रेंड भी ललित जी के समय की ही बात रही है। बस्तर की समस्याओं को सामने लाने में भी देशबंधु का योगदान ज्यादा रहा है। मुझे याद है कि छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में उस दौर में प्रिंटिंग का काम जब एक एक अक्षर को जमाने और फिर उसकी गेली का प्रूफ पढ़ने से लेकर पेज तैयार करने के ट्रेडल मशीन वाले दौर में था तब ललित जी ने देशबंधु का बाकायदा कंप्यूटराइजेशन किया था और अपने सारे रिपोर्टरों को प्रूफ पढ़ने के बहाने कंप्यूटर की निशुल्क ट्रेनिंग दिलाई थी। पाठकों में देशबन्धु की एक अलग ही साख थी, धाक थी और नवभारत से कंपटीशन का बड़ा दिलचस्प दौर था। 

शुरुआत में  उस वक्त जो उनके अलफाज थे मुझे आज भी याद है रमेश, कैरियर बनाओ आगे बढ़ो। ललित जी की खासियत यह थी कि वे अपने विचारों पर वह हमेशा अडिग थे और दम ठोक कर लिखने वाले छत्तीसगढ़ के यशस्वी संपादकों में उनका नाम शीर्ष पर हमेशा चमकता रहेगा।

 मेरा शत-शत नमन।

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