अलविदा श्रीश मिश्र जी

रविवार, 6 दिसंबर 2020

 कुछ शख्सियतें इतनी प्रभावशाली होती हैं कि आप एक बार अगर उनसे मिल लेते हैं तो जीवन भर फिर उनको भूल नहीं सकते।

 वरिष्ठ पत्रकार जनसत्ता के पूर्व सीनियर एडिटर श्रीशचंद्र मिश्र ऐसी ही ख्यात हस्तियों में एक थे जिनके साथ मेरी जितनी भी मेल मुलाकातें संगत रही हर बार मैं उनसे कुछ न कुछ सीखता था। त्रासद है कि दो दिन पहले वे इस दुनिया से विदा हो गए। दिल्ली में उनका निधन हो गया। यकीनन जब यह खबर आई तो मुझे बहुत भीतर से इस तरह से अफसोस हुआ जैसे अपना कोई सगा चला गया हो।

बात है 1990- 9091 की, तब फिल्म रिपोर्टिंग में भी मेरी दिलचस्पी बढ़ी थी। बहुत सी फिल्मस की कवरेज भी मैंने की। श्रीश जी जनसत्ता में फिल्म क्रिटिक थे। उस दौर में हर रंग से रंगीन फिल्मी दुनिया मुझे बड़ी अजीब ही लगती थी। श्रीश जी के व्यवहार व्यक्तित्व से तो लगता ही नहीं था कि वे उन फिल्म लेखकों के बैच में कहीं फिट हैं जिसमें ब्रजेश्वर मदान जैसे अलमस्त तबीयत के बिंदास लिखने बोलने खाने पीने जीवन जीने वाले वरिष्ठ फिल्म पत्रकार थे। श्रीश जी बहुत धीमा बोलते थे। कम बोलते थे। नपा तुला बोलते थे मगर जब भी बोलते थे तो सब एकटक उनको सुनते थे। कई बार तो यह भी होता था कि समूह वार्तालाप में फिल्म कलाकार से अमूमन सामान्य सवाल पूछे जाते हैं कि "आपकी नई फिल्म कौन सी आ रही है" या "फलाने से आपका अफेयर सचमुच चल रहा है" मगर श्रीश जी के सवाल गंभीरता लिए हुए किसी ऐसी रिसर्च से जुड़े होते थे जो फिल्म पत्रकारिता को एक अलग ही दिशा देती थी। श्रीश जी की गंभीर खबरें या लेख जब भी जनसत्ता में छपते चाव से पढ़े जाते थे।

 फिल्म "हीर रांझा" की शूटिंग कवरेज के के लिए दिल्ली से मुंबई की ट्रेन यात्रा में मेरी और श्रीश जी की सीटें अगल-बगल थी।  इस सफर में मुझे उनसे काफी बातचीत करने का मौका मिला था। बेधड़क बातचीत में मैंने अपनी कुछ व्यक्तिगत समस्याएं भी उनसे डिस्कस की थी और यकीनन उन्होंने मुझे जो बातें कहीं मेरे लिए बहुत कारगर साबित हुई। उस दिन से उनके प्रति मेरे मन में सम्मान भाव जग गया और हमेशा मैं उनको बड़े भाई की तरह ही मानता रहा। श्रीश जी ने मुझे जनसत्ता में लिखने के अवसर भी दिए। एक नए पत्रकार को जो जो काम की टिप्स दी जा सकती हैं वह भी दी। और जब तक दिल्ली में मैं रहा मुझे लगता रहा कि श्रीश जी के रूप में एक ऐसा व्यक्ति रिजर्व है जिनके पास अगर मैं गया अपनी किसी प्रॉब्लम को डिस्कस करने या कोई हेल्प मांगने तो वह मना नहीं करेंगे। यह अलग बात है कि उनसे बहुत कम मुलाकातें हुई। किसी मदद की कभी जरूरत भी नहीं पड़ी। मगर संबंधों के बैंक में रिजर्व बैंक की तरह लगते थे। मित्रों, पत्रकार तो बहुत से होते हैं। लेखक भी कई होते हैं लेकिन जो व्यक्ति जैसा लिखता है वैसा ही जीता है, ऐसे बहुत कम लोग होते हैं। जिनकी कथनी और करनी में कोई फर्क महसूस नहीं होता, चुनिंदा शख्स जैसे भीतर होते हैं वैसे ही बाहर होते हैं। इस नाते श्रीश जी पारदर्शी व्यक्तित्व की बेमिसाल हस्ती थे और कहीं ना कहीं कह लें कि यूपी से जा कर दिल्ली में बस जाने के बावजूद उनके भीतर महानगरीय व्यस्तता से उपजी वो सतहीपन वाली तल्खी भी कहीं नजर नहीं आती थी जिनसे कोई आहत हो। आत्मीय भाव से भरे लगते थे।

 एक राइटर के तौर पर सबसे बड़ी चीज जो मुझे आश्चर्य में डालती थी वह यह थी कि हम लोग डायरियां लिए, पैन लिए किसी भी कलाकार के इर्द-गिर्द झूम जाते। कहीं न कहीं मन में एक प्रबल इच्छा भी होती थी कि गांव भिजवाने के लिए एक फोटो ही खिंचवा लिया जाए मगर श्रीश जी भीड़ में भी किनारे खड़े रहते थे और सबसे बड़ी बात यह है कि वह कुछ नोटिंग भी नहीं करते थे चाहे इंटरव्यू कितना भी लंबा हो मगर क्या मजाल... अगले दिन आश्चर्य होता था जब जनसत्ता छप के आता था। हूबहू वही सवाल वही जवाब..शैली धारदार दमदार।

 और साथ में अगर उनकी अपनी टिप्पणियां होती तो लाजवाब कर देती थी। इतना शांत चित्त, धैर्यवान और प्रचंड स्मरण शक्ति से लैस लेखक मैंने आज तक नहीं देखा। 

श्रीश जी अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें हमेशा कायम रहेगी। मैं उनके परिजनों के प्रति गहन संवेदना व्यक्त करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वे उन को श्री चरणों में स्थान दें।


 

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